Tuesday, June 21, 2016

वर्तमान परिदृश्य में योग की आवश्यकता

आज के भौतिकवादी युग में एक ओर जहां हम विज्ञान द्वारा विकास की दृष्टि से उन्नति के शिखर पर पहुंच रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक रूप से हमारा पतन परिलक्षित हो रहा है। आज  मनुष्य के खान-पान, आचार-व्यवहार सभी में परिवर्तन होने से उसका स्वास्थ्य दिन -ब-दिन गिरता जा रहा है। यही कारण है कि आज हमें ऋषि-मुनियों की शिक्षा को जानने के लिए, उनके द्वारा बनाये उत्तम स्वास्थ्य के रास्ते पर चलने के लिए योग की परम आवश्यकता है, जिससे हम “बहुजन हिताय बहुजन सुखाय“ की सुखद कल्पना को साकार कर सकें।    
         प्राचीनकाल में योगी समाज से बहुत दूर पर्वतों और जंगलों की गुफा-कंदराओं के एकांत में तपस्या किया करते थे। वे प्रकृति पर आश्रित सादा व सरल जीवन व्यतीत किया करते थे। जीव-जन्तु ही उनके महान शिक्षक थे, क्योंकि जीव-जन्तु सांसारिक समस्याओं और रोगों से मुक्त जीवन व्यतीत करते हैं। प्रकृति उनकी सहायक है। योगी, ऋषि और मुनियों ने पशु-पक्षियों की गतिविधियों पर बड़े ध्यान से विचार कर उनका अनुकरण किया। इस प्रकार वन के जीव-जन्तुओं के अध्ययन से योग की अनेक विधियों का विकास हुआ। इसीलिए अधिकांश योगासनों के नाम जीव-जन्तुओं के नाम पर आधारित हैं। 
           कहा जाता है कि जब योग का प्रचार दुनिया में शुरू हुआ तो इसका पहला प्रचार पश्चिमी देशों में उन लोगों में हुआ जो लोग वैज्ञानिक और ईसाई धर्म को मानने वाले थे। शुरूआत में जब भारत में रहकर ये लोग विदेश वापस गए तो अपने साथ आसन, प्राणायाम लेकर गए। प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जब ये लोग कैदी हो जाते थे तब इनकी कैदखाने में हालत खस्ता रहती थी। भोजन, पानी, दूषित हवा के कारण किसी को कोलाइटिस, किसी को पेचिश तो किसी को खड़े-खड़े सोने के कारण पीठ की हड्डी में दर्द हो जाया करता था। जब उन्हें वहाँ डाॅक्टरी इलाज से फायदा नहीं मिलता था तो वे उन कैदियों के शरण में जाते थे जो योग जानते थे।  ऐसे में योग के जानकार अपने साथ ही अन्य कैदियों को भी शीर्षासन, सूर्य नमस्कार और उड्डियान बंध अादि द्वारा स्वस्थ रखने का काम करते थे।   कहा जाता है कि दूसरे महायुद्ध में कई लोग ऐसे थे, जिन्होंने जेल खाने में बंदी कैम्पों में योग द्वारा अपने शरीर को सुधारा। इनमें एक डाॅक्टर पोल्डर मैन हाॅलैंड के रहने वाले और दूसरी अॉस्ट्रेलिया की एक महिला रोमाब्लेयर भी थी। यह महिला 15 महीने से अधिक युद्ध बंदियों के बीच रही, जब उसको वहां पीलिया हुअा, तब उसने वहां एक अफ्रीकन व्यक्ति से कुछ आसनों को सीखा और उनका अभ्यास करने से रोगमुक्त  हुई। इस प्रकार अनेक लोगों ने योगाभ्यास द्वारा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया।
          ऐसे ही अनेक लोगों के द्वारा जब योग का पता चला तो पश्चिम के लोग चौकें और उन्होंने इस पर अनुसंधान करना शुरू किया। सबसे पहला अनुसंधान बंगाल के प्रख्यात डाॅक्टर दास ने फ्रांस में किया। वे वहां अस्थि रोग विशेषज्ञ थे। उन्होंने लोगों को अनुसंधान करके बताया कि योग की क्रिया करने से उसका असर न केवल मांसपेशियों पर, बल्कि इसका असर हड्डियों पर भी पड़ता है। इसका सीधा अर्थ हुआ कि योग में आसन केवल शारीरिक व्यायाम भर नहीं है।  आज विज्ञान ने मनुष्य को व्यावहारिक जीवन में अनेक तरह की सुख-सुविधाएं प्रदान की हैं, जिससे आज मनुष्य सुविधा भोगी होने से निष्क्रिय और आलसी बनता जा रहा है।  परिणामस्वरूप मनुष्य की जीवन-शैली अप्राकृतिक होने से वह प्रकृति से बहुत दूर चला गया है। इस कारण वह अनेक तरह के कष्टों, दुःखों, कठिनाईयों से घिरता जा रहा है। इन शारीरिक व्याधियों  के अलावा वह मानसिक और आत्मिक रूप से भी रूग्ण होता जा रहा है। उसे शांति नहीं है। अत्यन्त अशांति एवं तनाव में रहने के कारण वह मानसिक रूप से कमजोर होता जा रहा है। कमोवेश यह स्थिति युवाओं और वृद्धों की ही नहीं बल्कि बच्चों की भी है। बच्चों के ऊपर टेलीविजन और कम्प्यूटर, मोबाईल आदि इलेक्ट्राॅनिक उपकरणों का जबरदस्त प्रभाव है। इस कारण मुख्य रूप से उनकी दृष्टि प्रभावित होने से अनेक तरह के आंखों की व्याधियों से बच्चे ग्रस्त हो जा रहे हैं। 
          मनुष्य कितना ही महत्वाकांक्षी क्यों न हो मगर स्वस्थ मन व शरीर के अभाव में कुछ भी नहीं कर सकता। चाहे खेल का मैदान हो या नौकरी में तरक्की, कुछ कर दिखाने के लिए स्वस्थ रहना पहली प्राथमिकता है। सिद्ध योगियों ने इसका अनुभव किया और आसनों के महत्व पर प्रकाश डाला। पूर्व के मानव मस्तिष्क तथा आधुनिक मानव मस्तिष्क में भले ही थोड़ा-बहुत अंतर क्यों न हो, लेकिन आसन आज भी उतने ही उपयोगी हैं जितने हजारों वर्ष पूर्व, उनके जानने वालों के लिए थे। आज इसकी जागृति हो रही है, क्योंकि थोड़े ही समय में आधुनिक मस्तिष्क भी अपने आधुनिक उपकरणों के प्रयोग को असफल होते देख रहे हैं, जिससे वे योग को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए उचित माध्यम मानने लगे हैं। 
           योग का मुख्य लक्ष्य हमें परम चेतना मार्ग पर ले जाना है, जिससे हमेें अपने अस्तिस्व का ज्ञान हो सके। यदि शरीर रोग ग्रस्त है तो हमें परम चेतना की ओर जाने की इच्छा भी नहीं होगी, क्योंकि शरीर रोग होने से मन पर असर पड़ता है। शरीर में खुजली-दर्द हो तो बेचैन शरीर से बेचैन मन पकड़ में नहीं आता। इसलिए योग द्वारा शरीर को रोग मुक्त करना अत्यन्त आवश्यक है। भारत में योग दर्शन के द्वारा शारीरिक और मानसिक रोगों का निदान बताया गया है। इसमें शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए योग दर्शन को अपनाने पर बहुत बल दिया गया है। योग दर्शन दैहिक, मानसिक और आत्मिक दुःखों को दूर कर मनुष्य को अरोग्यता प्रदान करता है। सच्चे अर्थ में योगशास्त्र को देह, मन तथा आत्मा का चिकित्सा शास्त्र कहा जाना अधिक उपयुक्त होगा, क्योंकि इसके माध्यम से व्यक्ति अपने समस्त दुःखों पर विजय पा सकता है।
          प्रायः देखा गया है कि बहुत हिम्मत वाले व्यक्ति भी रोगग्रस्त होने पर हिम्मत हार जाते हैं, क्योंकि शारीरिक स्वास्थ्य की गिरावट से मन कमजोर हो जाता है, लेकिन वही व्यक्ति स्वास्थ्य प्राप्त करने पर पुनः मजबूत बन जाता है।  योग शरीर को चुस्त, स्वस्थ रखने का सबसे आसान माध्यम है। शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक संस्कृति के रूप में योगासनों का इतिहास समय की अनंत गहराईयों में छिपा है। मानव जाति के प्राचीनतम साहित्य वेदों में इनका उल्लेख मिलता है। वेद आध्यात्मिक ज्ञान के भंडार हैं। उनके रचयिता अपने समय के महान आध्यात्मिक व्यक्ति थे। कुछ लोगों का ऐसा भी विश्वास है कि योग विज्ञान वेदों से भी प्राचीन हैं।
         आधुनिक युग में योग सारे संसार में जिस तीव्र गति से फैल रहा है वह प्रशंसनीय व स्वागत योग्य है। योग का ज्ञान हर एक की संपत्ति बनता जा रहा है। आज डाॅक्टर और वैज्ञानिक भी योग के माध्यम से स्वस्थ रहने की सलाह दे रहे हैं। यही कारण है कि भारत ही नहीं, अपितु दुनिया भर के लोग यह अनुभव कर रहे हैं कि स्वस्थ जीवन और निरोग रहने के लिए योग सर्वोत्तम माध्यम है।

Monday, June 13, 2016

गाँव में शादी-ब्याह की रंगत

दो चार दिन ही सही लेकिन जब भी शहर की दौड़-भाग भरी जिन्दगी से दूर पहाड़ी हरे-भरे पेड़-पौधों, गाँव की टेढ़ी-मेढ़ी बलखाती पगडंडियों, खेत-खलियानों, मिट्टी-पत्थरों से बने घरों के बीच गाँव की सरल, सौम्य मिलनसार लोगों से मिलती हूँ तो मन खुशी से झूम तरोताजगी से भर उठता है।
गर्मियों में जब बच्चों की स्कूल की छुट्टियाँ होती हैं, तब मेरी तरह ही भले ही दो-चार दिन के लिए ही सही लेकिन हर प्रवासी की प्राथमिकता मेरे पहाड़ के गाँव ही होते हैं। गर्मियों में पहाड़ के गाँव बहुत याद आते हैं। हम प्रवासी पंछियों को शहर में आग उगलते सूरज से घबराकर पहाड़ों की गोद में बड़ा सुकून मिलता है। शहरी भीड़-भाड़ से उकताया मन पहाड़ का नाम सुनते ही शांति और ठण्डक से भर उठता है।
पहाड़ों के नैसर्गिक सौन्दर्य का अनुभव किसी के सुनाने-सुनने से नहीं अपितु वास्तविक आनन्द तो वहाँ पहुंचने पर ही मिलता है। पहाड़ों की बात निकले और उसमें हमारे उत्तराखंड का जिक्र न हो, ऐसे कैसे हो सकता है। यहाँ जब भी कोई सैलानी आता है, उसे यहाँ के मंदिर, मठ, साधु-संतों से ही नहीं अपितु सदियों से किसी संत की तरह तपस्या में लीन पहाड़ों को देखकर इसके देवभूमि कहे जाने का आशय स्वयं ही समझ में आ जाता है।      
अभी हाल ही में अपने एक रिश्तेदार की लड़की के विवाह समारोह में सम्मिलित होकर गाँव की कई खट्टी-मीठी यादें लेकर लौटी हूँ। प्रायः गर्मियों के दिनों में मेरी तरह ही जब अधिकांश प्रवासी गर्मी से राहत पाने, अपने घर-द्वार की सुध लेने, शादी-ब्याह या पूजन आदि समारोह में सम्मिलित होने के लिए गांव की ओर कूच करते हैं, तो हम प्रवासियों की तरह उजाड़ होते गाँवों की रौनक लौट आती है। शहर में घर-दफ्तर की चार-दीवारी से बाहर जब भी गाँव की खुली हवा में एक अलग दुनिया देखने, नाच-गाने, हंसी-मजाक एवं मेलमिलाप कर मौज-मस्ती का सुनहरा अवसर मिलता है, तो इसके लिए मैं बहुत ज्यादा सोच-विचार न करते हुए अपने पहाड़ के गाँव की ओर निकल पड़ती हूँ।           
गर्मियों के दिनों में गांव में शादी-ब्याह की खूब चहल-पहल रहती है। कई लोग तो बकायदा शहर से गाँव शादी करने जाते हैं। वे बखूबी जानते हैं कि गाँव में शादी कराने के फायदे ही फायदे  हैं। एक तो शादी-ब्याह का खर्चा भी कम होता है ऊपर से नाते-रिश्तेदारों से मिलने-जुलने के साथ ही शहर की गर्मी से कुछ दिन दूर पहाड़ की ठंडी-ठंडी हवा-पानी और अपनी जड़ों से मिलने का सुनहरा अवसर भी हाथ लग जाता है। इसके अलावा शादी में दिखावा से दूर अपनों का छोटी-छोटी खुशियों में घुल-मिल जाने का हुनर मन को बड़ा सुकून पहुंचाता है। यही बात  है कि मुझे आज भी शहर की चकाचौंध भरी शादी-समारोह के बजाय गांव की सादगी भरी शादियाँ बहुत भली लगती हैं। गांव की शादी में सबके चेहरे पर जो रौनक देखने को मिलती है, वह शहर की चकाचौंध भरी शादी-समारोह के ताम-झाम से हैरान-परेशान लोगों के चेहरों पर कहीं नज़र नहीं आती है।

हम शहर की बारात में कुछ देर के लिए भले ही बम-फटाखों और कनफोडू डीजे की धक-धक पर एक-दूसरे को देख-देख कितना भी उछल-कूद कर लें, लेकिन जो बात गांव की बारात में देखने को मिलती है, वह शहर से कोसों दूर हैं। गाँव की बारात में जब  ढोल-दमाऊ और बैंड-बाजे के साथ पहाड़ी धुन पर गाने बजते हैं तो फिर जो सुरीली झंकार घर-आंगन से लेकर सुदूर घाटियों तक गूंज उठती है, वह और कहीं सुनने-देखने को नहीं मिल पाती है। 
गाँव की एक झलक भर देखने से बचपन के दिनों की ढेर सारी यादें एक-एक कर ताजी हो उठती हैं।  बचपन में जब कभी किसी की शादी-ब्याह का न्यौता मिलता तो मन खुशी के मारे उछल पड़ता, लगता जैसे कोई शाही भोज का न्यौता दे गया हो। तब आज की तरह रंग-बिरंगे शादी के कार्ड बांटने का चलन नहीं था।
मौखिक रूप से ही घर-घर जाकर बड़े विनम्र आग्रह से न्यौता दिया जाता था। जैसे ही घर को न्यौता मिलता बाल मन में खुशी के मारे हिलोरें उठने लगती। नए-नए कपड़े पहनने को मिलेंगे, खूब नाच-गाना होगा और साथ ही अच्छा खाने-पीने को भी मिलेगा। यही सब ख्याल मन में उमड़ते-घुमड़ते। किसकी-किससे शादी होगी, कहाँ होगी, उसमें कौन बराती, कौन घराती होगा, सिर्फ खाना-पीना, नाचना-गाना ही चलेगा या कुछ लेना-देना भी पड़ेगा, किससे कैसा बात-व्यवहार निभाना पड़ेगा, इन तमाम बातों से कोसों दूर हम बच्चों को तो केवल अपनी मस्ती और धूम-धमाल मचाने से मतलब रहता। उस समय शादी में बैण्ड बाजे की जगह ढोल-दमाऊ, मुसक बाजा, रणसिंघा (तुरी) और नगाड़े की ताल व स्वरों पर सरांव (ऐसे 2 या 4 नर्तक जो एक हाथ में ढ़ाल और दूसरे में तलवार लिए विभिन्न मुद्राओं में मनमोहक नृत्य पेश करते हैं) बारात के आगे-आगे नृत्य करते हुए गांव के चौपाल तक जब पहुंचते थे तब वहां नृत्य का जो समा बंध जाता था, उसे देखने आस-पास के गांव वाले भी सब काम धाम छोड़ सरपट दौड़े चले आते थे।
हम बच्चे तो घंटों तक उनके समानांतर अपनी धमा-चौकड़ी मचाते हुए अपनी मस्ती में  डूबे नाचते-गाते रहते। घराती और बारातियों को खाने-पीने से ज्यादा शौक नाच-गाने का रहता। उन्हें खाने की चिन्ता हो न हो लेकिन हम बच्चों के पेट में तो जल्दी ही उछल-कूद मचाने से चूहे कूदने लगते, इसलिए जैसे ही खाने की पुकार होती हम फ़ौरन अपनी-अपनी पत्तल संभाल कर पंगत में बैठ जाते और बेसब्री से अपनी बारी का इंतजार करने लगते। पत्तल में गरमा-गरम दाल-भात परोसते ही हम उस पर भूखे बाघ के तरह टूट पड़ते। तब हंसी-मजाक और अपनेपन से परोसे जाने वाला वह दाल-भात आज की धक्का-मुक्की के बीच छप्पन प्रकार के व्यंजनों से कहीं ज्यादा स्वादिष्ट लगता था। 
......कविता रावत

Wednesday, June 8, 2016

जन्मदिन की खुशियाँ

आमतौर पर बच्चे रात को 10:30 बजे तक सो जाया करते हैं।  लेकिन कल वे 12 बजे तक खेलते रहे, नींद उनसे कोसों दूर थी।  मैंने सोने को कहा तो कहने लगे नींद नहीं आ रही हैं, जब आएगी सो जायेंगे। मैंने भी सोचा दिल्ली से उनकी बुआ और भतीजा आये हुए हैं, इसलिए मस्ती कर रहे हैं।  यही सोचकर मैं चुपचाप अपने कमरे में बैठकर टीवी देख रही थी कि ठीक 12 बजे सभी दूसरे कमरे से निकलकर मेरे कमरे में घुसते ही एक साथ जोर-जोर से "हैप्पी बर्थडे टु यू " चिल्लाए तो मैं अचानक चौंक पड़ी।  सबने आकर मेरे आगे केक और खुद का बनाया ग्रीटिंग कार्ड रख दिया, तो माजरा समझ में आया। 
मेरे ऑफिस जाने का बाद बच्चों ने इस तरह बुआ  के साथ मिलकर मुझे सरप्राइज़ देने का प्लान बनाया था। यह मुझे तभी मालूम हुआ। अपने जन्मदिन पर केक और बच्चों के हाथ से बना ग्रीटिंग पाकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई।  सोचती हूँ इस तरह के अपनेपन से भरे क्षण पाकर मेरी तरह ही सबको भी ख़ुशी मिलती होगी, है न   ....................  






















Saturday, June 4, 2016

बचाना होगा हिमालय को

हिमालय एक पूरी पर्वत श्रंखला है। यह श्रृंखला पूर्व से पश्चिम तक 2500 किमी क्षेत्र में फैली हुई है, जिसका आच्छादन लगभग 5 लाख 95 हजार कि.मी. क्षेत्र है। हिमालय भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्र में विस्तार लिये हुए है। यह पर्वत श्रृंखला भारतीय उपमहाद्वीप और तिब्बत को अलग करती है। हिमालय पांच देशों भारत, भूटान, नेपाल, चीन और पाकिस्तान से सटा हुआ है। यद्यपि हिमालय के अधिकांश हिस्सों पर भारत भूटान और नेपाल का प्रभुत्व है, तथापि चीन और पाकिस्तान इसके कुछ हिस्सों पर शासन करते है।
           हिमालय पर्वत श्रृंखला का निर्माण आज से लगभग सात करोड़ साल पहले इण्डियन टेक्टोनिक प्लेट और यूरेशियन टेक्टोनिक के टकराने से हुआ था। वैज्ञानिकों के अनुसार यह दोनों प्लेट्स अभी भी घूम कर रहीं है। यही कारण है कि हिमालय क्षेत्र के पहाडों की ऊंचाई बढ़ रही है। दिलचस्प बांत यह है कि हिमालय इतना पुराना होने के बाद भी अन्य पर्वत श्रंखलाओं की तुलना में युवा है। 
वैज्ञानिकों के मुताबिक हिमालय पर्वत जियोलाॅजिकली लिविंग है। इसका दक्षिणी भाग हर साल लगभग 20 मिलीमीटर आगे बढ जाता है। एक अनुमान लगाया गया है कि एक करोड़ साल में हिमालय एशिया में 1500 किमी तक आगे खिसक आयेगा। 
सोचो अगर हिमालय नहीं होता
         हिमालय भारत के लिये यह कितना महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा इस एक तथ्य से लगाया जा सकता है कि अगर यह नहीं होता तो आज पूरा क्षेत्र मौसमी कहर से नहीं बच पाता। यह मध्य एशिया से आने वाली ठण्डी हवाओं को रोक देता है, जिससे भारत कड़ाके की ठण्ड से बचा रहता है। हिमालय मानसूनी हवाओं को भी रोकता है, जिसके कारण पूरे क्षेत्र में तमाम हिस्सों में बारिश होती है। इसकी ऊंचाई और मानसूनी हवाओं के रास्ते में स्थित होने के कारण ऐसा होता है। 
         हिमालय भारत के लिये लम्बे समय से उत्तर का प्रहरी रहा है। यह हमारे देश के लिये एक प्रकार की नैचुरल बाउन्ड्री है। हिमालय के दर्रे काफी ऊंचे हैं और ठण्ड के मौसम में तो पूरी तरह बर्फ से ढके रहते हैं। इतिहास में कभी कोई आर्मी इसे पार नहीं कर सकी है। यह ट्रान्सपोर्ट और कम्यूनिकेशन के लिये भी एक अच्छा बैरियर है।        
गंगा, यमूना, ब्रह्मपुत्र समेत कई विशालकाय नदियों के लिये हिमालय पानी के विशाल भण्डार के रूप में कार्य करता है। देश की लगभग सभी बड़ी और बारहमासी नदियां हिमालय के पहाड़ों या ग्लेशियर से उत्पन्न होती है। हिमालय की नदियां उत्तर भारत के लिये जीवन रेखा जैसी है। यह भारी बारिश, बर्फ और ग्लेशियर के कारण गर्मियों में भी नदियां सदाबहार बनीं रहती है। 
        हिमालय से उत्पन्न होने वाली नदियां अपने साथ पहाड़ों पर से उपजाऊ मिट्टी मैदानों तक लाती है। एक अनुमान के अनुसार गंगा प्रतिदिन अपने साथ 19 लाख टन गाद और सिंधु नदी अपने साथ 10 लाख टन गाद लाती है। यही कारण है कि उत्तर भारत के मैदान हिमालयांे का तोहफा कहा जाता है। इसके अलावा इस क्षेत्र में कई प्रकार के बहुमूल्य खनिज भी पाये जाते है। 
        हिमालय की गहरी घाटी बांधों के निर्माण के लिये सबसे बढि़या जगह है। यहां पर कई जगह ऐसे प्राकृतिक झरने है जिसके कारण हाइड्रोइलेक्ट्रीसिटी जनरेशन में और आसानी होती है। यद्यपि बांधों को लेकर हाल के वर्षाें में विवाद भी हुआ है। इतना ही नहीं यहां पर कई तरह की मूल्यवान जड़ी बूटियां और काष्ठ सम्पदा पाई जाती है। यहां वनस्पतियों की ऐसी कई प्रजातियां पाई जाती हैं, जो दुनियां के किसी कोने में नहीं पाई जाती है। 
क्या-क्या समाया है हिमालय में 
नदियाँ -हिमालय में 19 मुख्य नदियां है। इनमें सिंधु और ब्रह्मपुत्र सबसे बड़ी है। इन दोनों ही नदियांे का कैचमैंट बैसिन 2,60,000 वर्ग किमी का है। अन्य नदियों में पांच नदी झेलम, चेनाब, रावी, व्यास और सतलज सिंधु सिस्टम की हैं। गंगा सिस्टम की नदियों में गंगा यमुना, रामगंगा, काली, करनाली, राप्ती, बाघमती और कोसी है। 
पहाड़ -  हिमालय में 100 से भी ज्यादा पहाड़ 7200 मीटर से भी उंचे है। इसमें माउंट एवरेस्ट भी शामिल है। जो दुनिया का सबसे उंचा पहाड़ हैं। इतना ही नहीं हिमालय आज लाखों लोगों का घर है और जीव जन्तुओं की सैकडों युनिक प्रजातियां यहां रहती हैं। पूर्वी हिमालय में अकेले 10 हजार किस्म के पौधंे, 750 प्रकार की चिडियां और 300 प्रजातियों के प्राणी रहते हंै। 
ग्लेशियर्स - अंटार्कटिका और आर्कटिक के बाद हिमालय दुनिया का तीसरा सबसे अधिक बर्फ वाला स्थान है। पूरे हिमालय में लगभग 15 हजार ग्लेशियर्स हैं। इन ग्लेशियर्स में सियाचिन ग्लेशियर्स सबसे प्रमुख है। करीब 70 किमी लंबा यह ग्लेशियर नाॅन पोलर एशिया का सबसे लंबा ग्लेशियर है। इसके अलावा बाल्टारोे, बिआफों, नुब्रा और हिसपुर अन्य मुख्य ग्लेशियर है। 
मिट्टी - हिमालय के नाॅर्थ फेसिंग स्लोप्स (उत्तर मुखी ढलानों) पर मिट्टी की मोटी परत है। यह मिट्टी कम ऊंचाईयों पर घने जंगलों तथा अधिक ऊंचाईयों पर घास का पोषण करती है। जंगल की मिट्टी गहरे भूरे रंग की तथा इसकी बनावट चिकनी दोमट है। 

        हम कई दशकों से हिमालय का लगातार दोहन करते आ रहे हैं। हमने नदियों से बिजली बनाने, वनों से लकड़ी लेने और पहाडों से खनन करने की होड़ में इसका प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ना शुरू कर दिया है। हिमालय के एक हिस्सेे से छेड़छाड़ का असर दूसरे हिस्से पर भी पड़ता है। जुलाई 2012 में नेचर क्लाइमेंट चंेज में छपी स्टडी में कहा था कि हिमालय के ग्लेशियर तेजी से कम हो रहे हैैं। इसी तरह हाल ही में आई अन्य स्टडी में दावा किया गया है कि हिमालय में बढ़ती गर्मी के कारण यहां सैकडों की तादाद में झीलें बन गई है, जो कभी भी घातक हो सकती हैं। 

Monday, May 30, 2016

तम्बाकू ऐसी मोहिनी जिसके लम्बे-चौड़े पात

कभी गांव में जब रामलीला होती और उसमें राम वनवास प्रसंग के दौरान केवट और उसके साथी रात में नदी के किनारे ठंड से ठिठुरते हुए आपस में हुक्का गुड़गुड़ाकर बारी-बारी से एक-एक करके-
“ तम्बाकू नहीं हमारे पास भैया कैसे कटेगी रात, 
भैया कैसे कटेगी रात, भैया............ 
तम्बाकू ऐसी मोहिनी जिसके लम्बे-चौड़े पात, 
भैया जिसके लम्बे चौड़े पात....
भैया कैसे कटेगी रात। 
हुक्का करे गुड़-गुड़ चिलम करे चतुराई, 
भैया चिलम करे चतुराई, 
तम्बाकू ऐसा चाहिए भैया 
जिससे रात कट जाई, 
भैया जिससे रात कट जाई" 
सुनाते तो हम बच्चों को बड़ा आनंद आता और हम भी उनके साथ-साथ गुनागुनाते हुए किसी सबक की तरह याद कर लेते। जब कभी हमें शरारत सूझती तो किसी के घर से हुक्का-चिलम उठाकर ले आते और बड़े जोर-जोर से चिल्ला-चिल्ला कर बारी-बारी गाना सुनाया करते। हम बखूबी जानते कि गांव में तम्बाकू और बीड़ी पीना आम बात है और कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है। इसलिए हम तब तक हुक्का-चिलम लेकर एक खिलाने की तरह उससे खेलते रहते, जब तक कि कोई बड़ा-सयाना आकर हमसे हुक्का-चिलम छीनकर, डांट-डपटकर वहाँ से भगा नहीं लेता।  डांट-डपट से भी हम बच्चों की शरारत यहीं खत्म नहीं हो जाती। कभी हम सभी अलग-अलग घरों में दबे पांव, लुक-छिपकर घुसते हुए वहाँ पड़ी बीड़ी के छोटे-छोटे अधजले टुकड़े बटोर ले आते और फिर उन्हें एक-एक कर जोड़ते हुए एक लम्बी बीड़ी तैयार कर लेते, फिर उसे माचिस से जलाकर बड़े-सयानों की नकल करते हुए बारी-बारी से कस मारने लगे। यदि कोई बच्चा धुंए से परेशान होकर खूं-खूं कर खांसने लगता तो उसे पारी से बाहर कर देते, वह बेचारा मुंह फुलाकर चुपचाप बैठकर करतब देखता रहता। हमारे लिए यह एक सुलभ खेल था, जिसमें हमें  बारी-बारी से अपनी कला प्रदर्शन का सुनहरा अवसर मिलता। कोई नाक से, कोई आंख से तो कोई आकाश में बादलों के छल्ले बनाकर धुएं-धुएं का खेल खेलकर खुश हो लेते।  
          हमारे देश में आज भी हम बच्चों की तरह ही बहुत से बच्चे इसी तरह बचपन में बीड़ी, हुक्का-चिलम का खेल खेलते हुए बड़े तो हो जाते हैं, लेकिन वे इस मासूम खेल से अपने को दूर नहीं कर पाते हैं। आज गांव और शहर दोनों जगह नशे का कारोबार खूब फल-फूल रहा है। गाँव में भले ही आज हुक्का-चिलम का प्रचलन लगभग खत्म होने की कगार पर है, लेकिन शहरों में बकायदा इसके संरक्षण की तैयारी जोर-शोर से चल रही है, जिसके लिए हुक्का लाउंज खुल गए हैं, जहाँ हमारे नौनिहाल खुलेआम धुआँ-धुएं का खेल खेलकर धुआँ हुए जा रहे हैं। गांव में पहले जहांँ सिर्फ बीड़ी और हुक्का-चिलम पीने वाले हुआ करते थे, वहीं आज वे शहरी रंग में रंगकर गुटखा, सुपारी, पान-मसाला, खैनी, मिश्री, गुल, बज्जर, क्रीमदार तम्बाकू पाउडर, और तम्बाकू युक्त पानी खा-पीकर मस्त हुए जा रहे हैं।
हर वर्ष विश्व तम्बाकू निषेध दिवस आकर गुजर जाता है। इस दौरान विभिन्न  संस्थाएं कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को तम्बाकू से होने वाली तमाम बीमारियों के बारे में समझाईश देते है, जिसे कुछ लोग उस समय गंभीर होकर छोड़ने की कसमें खा भी लेते है, लेकिन कुछ लोग हर फिक्र को धुंए में उड़ाने की बात कहकर उल्टा ज्ञान बघार कर- “कुछ नहीं होता है भैया, हम तो वर्षों से खाते आ रहे हैं, एक दिन तो सबको ही मरना ही है, अब चाहे ऐसे मरे या वैसे, क्या फर्क पड़ता है“  हवा निकाल देते हैं। कुछ ज्ञानी-ध्यानी ज्यादा पढ़े-लिखे लोग तो दो कदम आगे बढ़कर “सकल पदारथ एही जग माही, कर्महीन नर पावत नाही“ कहते हुए खाने-पीने वालों को श्रेष्ठ और इन चीजों से दूर रहने वालो को कर्महीन नर घोषित करने में पीछे नहीं रहते। उनका मानना है कि-
बीडी-सिगरेट, दारू, गुटका-पान 
आज इससे बढ़ता मान-सम्मान 
 दाल-रोटी की चिंता बाद में करना भैया 
 पहले रखना इनका पूरा ध्यान! 
मल-मल कर गुटका मुंह में डालकर 
 हुए हम चिंता मुक्त हाथ झाड़कर 
 जब सर्वसुलभ वस्तु अनमोल बनी यह 
 फिर क्यों छोड़े? क्या घर, क्या दफ्तर!        
          एक दिन विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर ही नहीं बल्कि इस बुरी लत को जड़मूल से नष्ट करने के अभियान में सबको हर दिन अपने आस पड़ोस, घर-दफ्तर और गांव-शहर से दूर भगाने के लिए संकल्पित होना होगा और ईश्वर ने हमें जो निःशुल्क उपहार दिए हैं- स्वस्थ शरीर, पौष्टिक भोजन, स्वच्छ हवा, निर्मल जल, उर्वरा शक्ति संपन्न भूमि व विविध वनस्पतियां, जीव-जन्तु व मानसिक बौद्धिक क्षमता जिनसे हमें  निरन्तर आगे बढ़ने को प्रेरणा मिलती हैं, उसे सुरक्षित, संरक्षित कर अपनाना होगा।
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धूम्रपान से होने वाले कुछ प्रमुख रोगों के बारे में जानिए 
और आज ही छोड़ने का संकल्प कीजिये  
  • कैंसर:  तम्बाकू के  धुएं से उपस्थित बेंजपाएरीन कैंसर जनित रोग होता है। लगभग 95 प्रतिशत फेफड़ों के कैंसर के मरीज धूम्रपान के कारण होते हैं। विपरीत धूम्रपान मुख कैंसर का कारण होता है। विपरीत धूम्रपान में सिगार का जलता हुआ सिरा मुख में रखा जाता है। विपरीत धूम्रपान आंध्रप्रदेश के गांवों में सामान्य होता है। बीड़ी के धूम्रपान के कारण जीभ, फैरिंग्स (गला), लैरिंग्स, टांन्सिल एवं ग्रासनली के कैंसर हो जाता है। होंठ कैंसर सिगार एवं पाइप के द्वारा होता है। तम्बाकू चबाने से मुख कैंसर होता हैं
  • टी.बी. (तपेदिक):  धूम्रपान से हमारे भारत में सबसे ज्यादा टीबी या तपेदिक के रोगी मिलते हैं। तपेदिक के जीवाणु संक्रमति व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्ति में फैल सकते हैं।
  • खांसी एवं ब्रोंकाइटिस : तम्बाकू के धूम्रपान से फैरिंग्स और ब्रोंकाई की म्यूकस झिल्ली उत्तेजित होने के कारण खांसी एवं ब्रोंकाइटिस हो जाता है।
  • हृदय संवहनी रोग : तम्बाकू के धूम्रपान के कारण एड्रीनील का स्त्रावण बढ़ जाता है जिससे धमनियों के संकुचन द्वारा रक्त दाब, हृदय स्पंदन की दर में वृद्धि हो जाती है। उच्च रक्त दाब हृदय संबंधी रोगों की संभावनाओं को बढ़ाता है। निकोटीन हृदय के द्विपट कपाट को नष्ट करता हैं
  • एम्फाइसिमा- तम्बाकू का धुआं फेफड़ों की एल्वियोलाई की भित्ति तोड़ सकता है। गैसीय विनिमय के लिए सतही क्षेत्रफल को कम कर देता है, जिससे एम्फाइसिमा हो जाता है।
  • प्रतिरक्षा तंत्र पर प्रभाव :  यह प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर करता है।
  • आॅक्सीजन वहन क्षमता में कमी :  तम्बाकू के धुंए की कार्बनमोनोआॅक्साइड शीघ्रता से आरबीसी की होमोग्लोबिन को बांधती है एवं सह विषाक्तता का कारण होती है, जो हीमोग्लोबिन की आॅक्सीजन वहन क्षमता को कम करता है

...कविता रावत 




        
     

Friday, May 13, 2016

उज्जयिनी का सिंहस्थ कुम्भ महापर्व

कुंभ का शाब्दिक अर्थ 'कलश' है। प्रारंभ से ही प्रत्येक शुभ कार्य में कलश पूजन का अपना अलग महत्व होता है। 'कलश' कला और संस्कृति का ही प्रतिनिधित्व ही नहीं करता अपितु यह सृष्टि तथा पूर्ण व्यक्तित्व का भी प्रतीक माना जाता है।
वेदों में कलश को 'ऋतसदन' पुराणों में 'अमृत घट' कहा गया है, जो सागर मंथन से प्राप्त अमृत को रखने के लिए हुआ था। अर्थात् इन बातों से इतना तो स्पष्ट हो गया कि इस महत्वपूर्ण पर्व का यह नाम इसकी पवित्रता एवं इसके महत्व पर प्रकाश डालने वाला नाम है।
वेद शास्त्रों के उल्लेख से स्पष्ट है कि कुंभ पर्व प्राचीन काल से चला आ रहा है। श्रीमद् भागवत पुराण के अनुसार जब देवताओं एवं दानवों के युद्ध में देवताओं का पक्ष कमजोर पड़ गया और वे इस युद्ध में हार गए, तब भगवान विष्णु की दोनों पक्षों में समझौते की राय मान ली गई। यह निर्णय लिया गया कि दानव और देव एक साथ समुद्र मंथन आरंभ करें और दोनों पक्षों ने समुद्र मंथन किया, जिसके फलस्वरूप समुद्र के गर्भस्थल से अनेक महत्व के रत्न प्राप्त होने के बाद चौदहवां रत्न 'अमृत' प्राप्त हुआ।
अमृत को लेकर देवता और दानवों में पुनः मतभेद हो गया और उनके बीच 12 दिनों तक युद्ध हुआ लेकिन जिस कुंभ में यह अमृत भरा पड़ा था, उसे कोई भी दल प्राप्त नहीं कर सका। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया और वे नाचती-नाचती संघर्ष स्थल पर पहुंची और उन्होंने अपनी युक्ति से कुंभ में रखे अमृत का वितरण किया।
अमृत कुंभ को प्राप्त करने के लिए देवताओं व दानवों के 12 दिन के युद्ध के फलस्वरूप अब 'कुंभ' रखा गया। लेकिन शास्त्रों के अनुसार पृथ्वी पर केवल 4 स्थानों पर कुंभ रखा गया- हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक। यही कारण है कि सिर्फ इन चार स्थानों पर कुंभ मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि मानव जितने समय को एक वर्ष की अवधि मानता है, उतना ही समय देवताओं के लिए केवल एक दिन के बराबर होता है। इस अनुपात से युद्ध के 12 दिनों को मानव समाज 12 वर्ष गिनता है और यही कारण है कुंभ का पर्व चारों जगह 12-12 वर्षों के बाद आता है।
'मेष के सूर्य और सिंह के गुरू के समावेश का ये पर्व महापर्व का रूप लिए उज्जयिनी में आता है। सिंह का गुरू के साथ ये बारह संयोग 'सिंहस्थ' महापर्व कहलाता है, इसलिए इस कुंभ का विशेष महत्व है। इसी समय सूर्य भी मेष राशि पर होता है। बारह वर्षों के इस चक्र को हम पूरी भावना से बांध देते है। उज्जयिनी के लिए अनेक प्रकार की संभावनाओं और उपलब्धियों का अमृत कलश लेकर ये पर्व शनैः-शनैः द्वार पर दस्तक देने आ पहुंचा है।
मालवा की गंगा शिप्रा नदी के इर्द-गिर्द चार क्षेत्रों में विभाजित यह 'सिंहस्थ' मेला देश-विदेश से समागत जनता, गृहस्थ और विरक्त का आकर्षण केन्द्र बन जाता है। इन चारों क्षेत्रों में से अंकपात वैष्णव महात्माओं रामनंदी के लिए, दत्त अखाड़ा दशनामियों के लिए, रूद्रसागर वैदिक मतावलंबियों व सनातन धर्मी शंकर दंडी सन्यासियों के लिए तथा नृसिंह घाट में रामानुज संप्रदाय के संत महात्मा एवं आचार्यों के पड़ाव रहते हैं। इसी प्रकार लालपुल के समीप परमहंस साधुगण कल्पवास करते हैं तथा विरक्त साधु संत भी इसी स्थान पर रहते हैं। इसी प्रकार नाथ संप्रदाय के साधुओं का पड़ाव ऋणमुक्तेश्वरी, भर्तृहरि की गुफा और पीर मछन्दरनाथ की समाधि पर होता है। लेकिन शासन तंत्र, आध्यात्म एवं जनता का जब समन्वय होता है तो शासन तंत्र अपने से जुड़े हुए शब्द-तंत्र की विद्या से जनता एवं आध्यात्म के किसी भी रूप को अपने अनुरूप बना लेता है।
साधुओं के विभिन्न स्वरूप कहीं-कहीं अदम्य मानवता से ओतप्रोत और निराकार तथा वैदुष्य संपन्न तो कहीं इसके बिलकुल विपरीत, लेकिन उज्जयिनी की पवित्र माटी तो समदर्शिनी है। उसका तो नाम ही क्षमा है। उसकी छाती तो बारह वर्षों के इस पवित्र पर्व पर सभी के लिए समान रूप से बिछी है। साधुओं का एक लक्ष्य होते हुए भी अनेक मठों और मठाधीशों के मतों में आवान्तर भेद है। वैष्णवी धारा इस जीवन दर्शन में आस्था रखती है जो राग के दमन पर नहीं शोधन पर आधारित है। ये लोग मुक्ति से भी आगे भक्ति को आधार बताते है, तो दंडी संन्यासी वेद विहित मार्ग पर चलना अपनी लकीर मानते है। समाविष्ट सन्यासी वर्ग जो दशनामी से विभूषित हैं, चारों वेदों के आधार पर चार पीठ में विभाीजित है। योगतंत्र को अपनी साधना मानना इस वर्ग का रूप है।
इनके विभिन्न स्वरूपों के बावजूद भारतीय आध्यात्मिक जीवन में जल और स्नान ध्यान आदि का बड़ा महत्व है। पर्व के समय समीपवर्ती सरोवर, कुण्ड नदी या समुद्र में स्नान करना अधिक पुण्यदायी माना जाता है। गृहों की विशेष स्थिति पर कुंभ और सिंहस्थ के स्नान की प्रथा इसी परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। पौराणिक गाथा के अनुसार वैशाख मास में जो श्रेष्ठ मनुष्य पावन सलिला शिप्रा नदी में स्नान करते है, उन्हें किसी भी प्रकार के नर्क का भय नहीं रहता है। इसी अवधि में पंचक्रोशी यात्रा में लाखों यात्री नागेश्वर  सहित चारों दिशाओं में स्थित शिवालय के दर्शन करते हुए संपूर्ण नगर की 118 कि.मी. लंबाई की प्रदक्षिणा पूरी करते नागेश्वर हैं। अंत में शिप्रा तट के 28 तीर्थों की यात्रा अष्टारट विशांति यात्रा, जो अब 'अष्टतीर्थी' यात्रा करते हुए मंगलनाथ पर पांच दिवसीय यात्रा पूर्ण करते हैं। सिंह राशि के गुरू के साथ मेष के सूर्य का संयोग विशेष महत्वपूर्ण होने से संक्रमण स्नान पर्व वैशाखी अमावस्या, पितरों का पर्व है। पिण्डदान, तर्पण, जलांजलि, श्रद्धांजलि के रूप में अर्पित करते हैं। इसी श्रृंखला में अक्षय तृतीया पुण्य को क्षय से बचाती है। वैशाखी शुक्ल पंचमी शंकराचार्य के प्रति श्रद्धांजलि अर्पण पर्व है।
वैशाख मास के अंतिम पांच दिन अथवा एक दिन के तीर्थ वास और स्नान का विशेष पुण्य काशी के लंबे निवासी की अपेक्षा वैशाख मास के पांच दिन उज्जयिनी वास करने से प्राप्त है। क्षिप्रा में वैशाखी पूर्णिमा के स्नान का महत्व विशेष तौर से इसलिए भी है क्योंकि इसमें सिंहस्थ और कुंभ दोनों पर्व मिलते हैं। उज्जैन के कुंभ में ये योग मुख्य है-वैशाख मास, शुक्ल पक्ष पूर्णिमा, मेष राशि का सूर्य, सिंह राशि का बृहस्पति, चंद्र का तुला राशि पर होना, स्वाति नक्षत्र व्यतिपात, स्कंद पुराण के अनुसार अत्रि नामक एक ऋषि ने अपने एक हाथ को उठा कर तीन हजार वर्ष तक कठोर तपस्या की थी। तत्पश्चात् उनके शरीर से दो स्त्रोतों का प्रवाह हुआ। एक आकाश की ओर चला गया, जो बाद में चंद्र बन गया और दूसरा धरती की ओर जिसने बाद में क्षिप्रा नदी का रूप धारण किया। क्षिप्रा के शाही स्नान का अपना एक विशेष महत्व है। जब इस शाही स्नान में साधु संतों के सभी अखाड़े पावन क्षिप्रा के दत्त अखाड़ा एवं रामघाट पर स्नान करते हैं। सभी अखाड़े अपने पवित्र ध्वज (अणी) की पूजा करते हैं और बाद में स्नान के पूर्व अणी को पवित्र जल से स्पर्श करते हैं। सन्यासियों के भस्म की छाल को शिप्रा अपने में समा लेती है और उस समय ऐसा प्रतीत होता है जैसे क्षिप्रा में भस्म का रंग घुल गया हो। इस अवसर पर सभी को मालवा की ये गंगा अपने सीने से लगा लेती है।
शास्त्रों के अनुसार देवराज इंद्र का पुत्र जयंत जब अमृत कलश लेकर भागा तो उसके साथ चंद्रमा ने अमृत छलकाने, सूर्य देव ने कलश फटने से और बृहस्पति ने कलश को दैत्यों के हाथों से जाने से रोकने में काफी योगदान किया था। इसलिए इन्हीं गृहों के संयोग से सिंहस्थ (कुंभ पर्व) की तिथि निश्चित की जाती है। बताया जाता है कि जिस दिन सुध कुंभ गिरने की राशि पर सूर्य, चंद्रमा व बृहस्पति का संयोग हो, उसी समय पृथ्वी पर कुंभ का योग पड़ता है। उज्जयिनी का सिंहस्थ पर्व योगियों एवं जोगियों दोनों का ही अद्भुत समागम सम्मेलन है। इस शुभ अवसर पर योगी योनि की संत महापुरूष एवं जोगी यानि जिज्ञासु गृहस्थ गण को सूक्ष्म रूप से ज्ञान प्रदान करके उनकी जिज्ञासा शांत करते हैं। साथ ही उनके सामने अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत करके उन्हें अंधकार से प्रकाश की ओर आकृष्ट करते हैं। ऐसी प्रेरणा लेकर यहां पहुंचने वाला प्रत्येक भक्त भविष्य के लिए नई प्रेरणा लेकर लौटता है।
...द्वारकाधीश चौधरी



Sunday, May 1, 2016

पेट की खातिर

video
कुछ लोग भले ही शौक के लिए गाते हों, लेकिन बहुत से लोग पेट की खातिर दुनिया भर में गाते फिरते हैं।   ऐसे ही एक दिन दुर्गेलाल और उसका भाई गाते - भटकते हुए घर के द्वार पर आये तो, उनका गाना अच्छा लगा तो घर पर बिठाकर मैंने रिकॉर्डिंग की, जो आज मई दिवस पर प्रस्तुत है।     ..




Friday, April 8, 2016

नव संवत्सर 2073

नव संवत्सर
  नव धरा, नव विहान
   बीता अतीत अब नव भविष्य
    नव कल्पना, नव विचार
     नव संवेदना, नव संरचना
      संवारे गाँव गरीब
       यह संकल्पना साकार करें
        गढ़े संवारे नवराष्ट्र
         आप सुखमय होवे
          यह समाज सुखमय होवे
           यही शुभेच्छा हमारी  
            नव प्रकाश से आलोकित
             हो जगती सारी

'चैत्रे मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमेऽहनि।
शुक्लपक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदये सति।।
- ब्रह्म पुराण में वर्णित इस श्लोक के अनुसार चैत्र मास के प्रथम सूर्योदय पर ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। इसी दिन से संवत्सर की शुरूआत होती है।


हिन्दू नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा एवं चै़त्र नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं!  


Monday, April 4, 2016

भारत में अंग्रेजी परस्तों की साजिश

हमारा देश लगभग 1000 वर्ष तक विदेशियों का गुलाम रहा है। भारत को गुलाम बनाने में विदेशियों से कहीं अधिक भारतीय लोगों का भी हाथ रहा। हमारे एक मित्र ने एक कविता लिखी जिसका शीर्षक था- “यह देश है वीर गद्दारों का“ इस देश के वीरों ने पराक्रम कम और परिक्रमा के द्वारा सभी कुछ प्राप्त कर लिया और हमारे ऊपर, विदेशियों से हाथ मिलाकर शासन करते रहे और हमें गुलाम बनाकर रखे रहे। जब हम स्वतंत्र होने की दिशा में आगे बढ़ रहे थे, सुविधा भोगी भारतीय लोग हमारे ऊपर शासन तथा हमें गुलाम बनाये रखने के लिए भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों की परिक्रमा करने लगे और मुखौटा बदल कर इस ओर हो लिए। वैसे तो हमारा संविधान ही अंग्रेजी के संविधान की नकल और उनके हस्तक्षेप के नीचे बना है और देश के वीर गद्दार लोग, भाषा के मामले में भी दबाव बनाने लगे कि भारत की राजभाषा अंग्रेजी बने, किन्तु महात्मा गांधी और उनके जैसे अनेक राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत नेताओं ने इसका तीव्र विरोध किया और भारतीय भाषा विशेषकर हिन्दी को ही राष्ट्रभाषा/राजभाषा बनाने की वकालत की। जब संविधान बनने लगा तो अंग्रेजी परस्तों ने फूट डालो और राज करो की नीति के तहत् अहिन्दी भाषियों को उकसाया व दावेदारी खड़ी करवा दी। किन्तु संविधान सभा के अध्यक्ष डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद जी ने तीन अहिन्दी भाषी संविधान सभा के सदस्यों की समिति बनाकर राजभाषा सम्बन्धी सुझाओं और उन्हीं के प्रयासों और विचारों को महत्ता देकर संविधान के अनुच्छेद 343 से लेकर 351 तक के राजभाषा खण्ड को सर्वसम्मति से पारित कराया, जिसमें अनुच्छेद 343(1) के अनुसार देवनागरी में लिखी हिन्दी को भारत संघ की राजभाषा एवं अनुच्छेद 345 के अनुसार भारत की प्रादेशिक भाषाओं को भी प्रदेशों की राजभाषा बनाने की व्यवस्था की गई। 
हमारे संविधान निर्माताओं एवं राजभाषा समिति के अहिन्दी भाषी सदस्यों ने बड़ी सूझ-बूझ एवं ईमानदारी से तत्कालीन परिस्थितियों से ताल-मेल/समन्वय कर जो व्यवस्था प्रस्तुत की, उसकी सराहना ही की जानी चाहिए। किन्तु भारतीय अंग्रेजी परस्तों को चैन नहीं था और वे दक्षिण भारतीयों के नेताओं को उकसा कर और पं. जवाहर लाल नेहरू को उल्टा सीधा पढ़ाकर अहिन्दी भाषियों के हितों के नाम पर वर्ष 1963 में राजभाषा अधिनियम में देश में कुछ कार्यों के लिए द्विभाषिक स्थिति (अंग्रेजी परस्ती को बढ़ावा) और पुनः आन्दोलन करवा कर वर्ष 1967 में अधिनियम में संशोधन कर धारा 3 में एक उपधारा 5 जोड़कर पुनः कुछ कार्यों के लिए अंग्रेजी के काम काज को जारी रखने की व्यवस्था (अंग्रेजी परस्तों को बढ़ावा) करवा लिया। सच तो यह है कि यह सब कुछ हिन्दी भाषी/उत्तर भारतीय अभिजात्य वर्ग के अंग्रेजी परस्तों के द्वारा कुचक्र रचा गया था। इस व्यवस्था से देश के अहिन्दी भाषा-भाषियों को कोई लाभ नहीं दिया गया और आगे भी अंग्रेजी परस्त अहिन्दी भाषियों के नाम की आड़ में सारा कुचक्र चला रहे हैं और देश पर जबरदस्ती गैर कानूनी तरीके से अंगे्रजी को लादकर देश की सामान्य जनता को लूट व ठग रहे हैं, जिसका बहुत लम्बा चौड़ा  इतिहास है। अभी हाल ही में इन अभिजात्य वर्ग के अंग्रेजी परस्तों ने वर्ष 2011 में भारतीय प्रशासनिक सेवा में चुपके से सी-सेट लागू कर 22.5 अंकों की अंग्रेजी को, प्रतिभागियों पर लाद दिया, ताकि हिन्दी तथा अन्य भाषा-भाषी पीछे चले जाये। वर्ष 2013 में तो इन लोगों ने 100 अंकों का एक और अंग्रेजी का पर्चा थोप दिया, जिसके अंक मेरिट में जुड़ना था, किन्तु संसद में तीव्र विरोध के कारण अंग्रेजी परस्त सरकार को अध्यादेश वापस लेना पड़ा था।
इस संबंध में मुझे एक कहानी याद आ रही है कि काफी समय पहले भारत का एक पहलवान इंग्लैण्ड गया और उसने घोषणा किया और प्रसारित किया कि यहां को कोई पहलवान हमसे कुश्ती लड़ सकता है। यह बात जब इंग्लैण्ड के पहलवानों को पता चली तो वे आपस में जुटकर विचार किये कि कुश्ती में भारत के पहलवान को हराने की क्षमता किसी में नहीं है, लेकिन कुछ तिकड़म करके उसे परास्त किया जा सकता है। इंग्लैण्ड के पहलवान, वेट लिफ्टिंग (भार उठाने) में माहिर थे। उन लोगों ने भारत के पहलवान के सामने शर्त रखी कि यदि आप इस 10 मन (लगभग 400 किलो बराबर) की नाल उठा लेंगे तो, तभी हम लोग आपसे कुश्ती लड़ेंगे। भारत का पहलवान चालाक था। दूसरे दिन जब वह अखाड़े में गया तो उसने इंग्लैण्ड से पहलवानों से कहा कि जो पहलवान इसको उठाते हैं, उनसे कहिए कि वे उसे उठाकर दिखायें। इंग्लैण्ड का पहलवान चूंकि 10 मन की नाल (भार) उठाने में अभ्यस्त था, तुरन्त मिनट भर में उसे उठा लिया। ठीक उसी समय भारत के पहलवान ने फुर्ती के साथ नाल उठाने वाले पहलवान के पीछे से पैरों के बीच एक हाथ डालकर और एक हाथ गर्दन में डालकर उस पहलवान को उठा लिया, क्योंकि वह 10 मन से अधिक वहन के पहलवानों को उठाने का अभ्यस्त था। फिर इसके बाद इंग्लैण्ड के पहलवानों ने उसके समक्ष हार मान ली। इसी तरह देश का उच्च सरकारी तंत्र/अभिजात्य वर्ग इसी प्रकार से अंग्रेजी की दीवाल खड़ी कर देश की सामान्य जनता के युवाओं को परास्त करने की जुगत/कुचक्र रचता रहता है। अतः इस देश की सामान्य जनता, गरीब तथा पिछड़े वर्गों के युवाों को भाषा, विशेष कर देश की राजभाषा की स्थिति को जानना चाहिए और उसे प्रतिष्ठापित कराने के लिए संघर्ष करना चाहिए, ताकि इस देश में सामाजिक आर्थिक न्याय व जनतांत्रिक व्यवस्थाएं पुष्पित व पल्लवित होती रहें। यह भी ध्यान में रखना होगा कि वर्ष 2011 में जारी संघ लोग सेवा आयोग का आदेश अभी लागू है, जिसके लिए संघर्ष करने की जरूरत है। 
अंग्रेजी परस्तों का आतंक जारी है। नई सरकार कुछ हिन्दी के लिए करना तो चाहती है किन्तु सरकारी अमला देश की वर्तमान सरकार की राजभाषा नीति को विफल करने के लिए तमाम कुचक्र चला रहे हैं। 
- जगदीश नारायण राय

Tuesday, March 29, 2016

ईर्ष्या और लालसा कभी शांत नहीं होती है

मूर्ख लोग ईर्ष्यावश दुःख मोल ले लेते हैं।
द्वेष फैलाने वाले के दांत छिपे रहते हैं।।

ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की सुख सम्पत्ति देख दुबला होता है।
कीचड़ में फँसा इंसान दूसरे को भी उसी में खींचता है।।

ईर्ष्या  के दफ्तर में कभी छुट्टी नहीं मिलती है।
ईर्ष्या खाली घर में कभी पाँव नहीं रखती है।।

जैसे लोहे को जंग वैसे ही ईर्ष्या मनुष्य को भ्रष्ट करती है।
भले ही ईर्ष्यालु मर जाय लेकिन ईर्ष्या कभी नहीं मरती है।।

ईर्ष्या के बल पर कभी कोई धनवान नहीं बनता है।
ईर्ष्या के डंक को कोई भी शांत नहीं कर सकता है।।

ईर्ष्या लोभ से भी चार कदम आगे रहती है।
ईर्ष्या और लालसा कभी शांत नहीं होती है।।


....कविता रावत

Friday, March 11, 2016

आवाजों को नजरअंदाज न करें

हमारे शरीर में नाक से लेकर घुटनों तक समय-समय पर कुछ आवाजें आती हैं। ये आवाजें शरीर का हाल बयां करती हैं। इन्हें नजरअंदाज न करें। इस बारे में प्रस्तुत है मासिक पत्रिका आरोग्य सम्पदा से संकलित उपयोगी जानकारी। 
1. खर्राटों की आवाज
सोते समय खर्राटे लेने की आवाज सांस लेते हुए  मुँह और गले के मुलायम टिश्यू के वाइब्रेट होने के कारण आती हैं। नैसेल स्प्रे से यह ठीक हो जाती है। आप अपने वजन को कम करके भी इस परेशानी से निजात पा सकते हैं।
यदि खर्राटे की समस्या अधिक हो और सोते समय आपकी सांस फूलती हो या जगने के बाद आप पसीने से भीगे हुए होते हों तो तुरन्त डाॅक्टर से संपर्क करें। यह स्लीप एप्निया के लक्षण है। इस बीमारी में एयरफ्लो रूक जाता है और डाॅयबिटीज तथा स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।
2. घुटने और टखने की आवाज
घुटने और टखने से आवाज आना सामान्य बात है। यह जोड़ों के फ्लूइड शिफ्ट होते समय एयर बबल आने, नसों के जोड़ों पर चढ़ जाने अथवा जोड़ों के खिसकने के कारण होता है। इससे घबराने की जरूरत नहीं है।
        यदि घुटने और टखनों से चटकने के साथ ही दर्द भी होता हो तो डाॅक्टर से जरूर मिलें। इसके अलावा सूजन आना और जोड़ों का बहुत अधिक न खुलना भी परेशानी का संकेत है। यह मेनिस्कस (जोड़ों के पास की हड्डी का कुशन) के फटने व आस्टिमेंट आर्थराइटिस का लक्षण हो सकता है।
3. कान की आवाज
कान में झनझनाहट या घंटी बजने की आवाज भी हमेें अक्सर सुनाई देती है। यह बजती है और तुरन्त खत्म हो जाती है, इसे टिनीटस कहते हैं। यह इसलिए होता है क्योंकि कई बार दिमाग कुछ इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स को शोर समझ लेता है।
यदि यह समस्या बार-बार और एक ही कान में होती है तो यह कान का इंफेक्शन हो सकता है। इसलिए डाॅक्टर से परामर्श जरूरी है। हालांकि अधिकांश मामलों में डाॅक्टर्स को इसकी कोई ठोस वजह नहीं मिलती है। इसलिए इस बीमारी का कोई ठोस इलाज भी नहीं है।
4. पेट की आवाज
पेट से गुड़गुड़ाने की आवाजें भूख लगने पर भी आती हैं और कई बार खाना खाते समय भी आती हैं। यह आंतों के मरोड़ के कारण होता है। यह डाइजेशन की ही प्रक्रिया है। यह समस्या कई लोगों के साथ होती है।
पेट से आवाज आना तो कुछ हद तक ठीक है, लेकिन यदि इन आवाजों का आना बढ़ जाए तो खतरा हो सकता है। साथ ही यदि आंतों में सूजन हो और आवाज के साथ दर्द भी हो तो तुरन्त डाॅक्टर से संपर्क करें। कई मामलों में आंतों के अधिक सिकुड़ने के कारण भी ऐसा होता है।
5. नाक की आवाज
कई बार नाक से हल्की सीटी बजने की आवाज आती है। यह नाक में स्पेस की कमी के कारण होता है। कम स्पेस में जब सांस लेते समय एयर पास होती है तो सीटी बजने की आवाज आती है। यह रात को अधिक परेशान करती है।
यदि नाक से आवाज आनी किसी इंजुरी के बाद शुरू हुई है तो तुरन्त डाॅक्टर से मिलें। इसके अलावा यदि यह आवाज लम्बे समय तक आती है तो भी डाॅक्टर से संपर्क करें। ऐसा नथुनों के कार्टीलेज में छेद होने के कारण भी होता है। इसे ठीक करने के लिए सर्जरी करानी पड़ती है।

Tuesday, March 1, 2016

परीक्षा का भूत

           इन दिनों बच्चों की परीक्षा हो  रही है, जिसके कारण घर में एक अधोषित कर्फ्यू लगा हुआ है। बच्चे खेल-खिलौने, टी.वी., कम्प्यूटर, मोबाईल और संगी-साथियों से दूर संभावित प्रश्नों को कंठस्थ करने में लगे हुए हैं। ये दिन उनके लिए परीक्षा-देवी को मनाने के लिए अनुष्ठान करने के दिन हैं। परीक्षा रूपी भूत ने उनके साथ ही पूरे घर भर की रातों की नींद और दिन का चैन हर लिया है। बच्चों को रट्टा लगाते देख अपने बचपन के दिन याद आने लगे हैं, जब हम भी खूब रट्टा मारते तो, हमारे गुरूजी कहने लगते- “रटंती विद्या घटंती पानी, रट्टी विद्या कभी न आनी।“ लेकिन तब इतनी समझ कहाँ? दिमाग में तो बस एक ही बात घुसी रहती कि कैसे भी करके जो भी गलत-सलत मिले, उसे देवता समझकर पूज लो, विष को भी अमृत समझकर पी लो और पवनसुत हनुमान की भाँति एक ही उड़ान में परीक्षा रूपी समुद्र लांघ लो। परीक्षा करीब हों तो न चाहते हुए भी तनाव शुरू हो जाता है। जब हम कॉलेज में पढ़ते तो  मेरी एक सहेली अक्सर कहती- यार आम के पेड़ों पर बौर देखकर मुझे बड़ा टेंशन  होने लगता है क्योंकि इससे पता चलता है परीक्षा आने वाली है।
             घर में परीक्षा का भूत सबको डरा रहा है। बच्चे परीक्षा के भूत को भगाने के लिए दिन-रात घोटे लगाने में लगे हुए हैं, लेकिन परीक्षा का भूत है कि जाता ही नहीं! उनके मन-मस्तिष्क में कई सवाल आकर उन्हें जब-तब आशंकित किए जा रहे हैं। यदि कंठस्थ किए प्रश्न नहीं आए तो? प्रश्न पत्र की शैली में परिवर्तन कर दिया तो? यदि प्रश्न पाठ्यक्रम से बाहर से पूछ लिए तो? यदि कठिन और लम्बे-लम्बे प्रश्न पूछ लिए तो?
           जानती हूँ बच्चों को समझाना दुनिया का सबसे कठिन काम है, फिर भी समझा-बुझा रही हूँ कि आत्मविश्वास बनाए रखना। जो कुछ पढ़ा है, समझा है, कंठस्थ किया है, उस पर भरोसा करना।  परीक्षा देने से पहले मन को शांत रखना। परीक्षा देने से पहले पढ़ने के लिए न कोई किताब-कापी साथ नहीं ले जाना और नहीं कहीं से पढ़ने-देखने की कोशिश करना। उन प्रश्नों पर चिन्ह लगाना जिन्हें कर सकते हो और जो प्रश्न सबसे अच्छा लिख सकते हो, उन्हें सबसे पहले करना। जो प्रश्न बहुत कठिन लगे उसे सबसे बाद में सोच-विचार कर जो समझ में आता हो, उसे लिखना। हर तरह से प्रत्येक परीक्षा के दिन समझाने की माथा-पच्ची करती हूँ, लेकिन बच्चे यह कहते हवा निकाल देते हैं कि प्रश्न पत्र देखते ही उन्हें यह सब भाषणबाजी याद नहीं रहती? अब उन्हें कैसे समझायें कि यह सब भाषणबाजी नहीं है! 
         बच्चों की परीक्षा जल्दी से खत्म हो, इसका मुझे ही नहीं बल्कि बच्चों के प्यारे राॅकी को भी बेसब्री से इंतजार है। जब से परीक्षा के दिन आये हैं, बच्चों के साथ उसका खेलना-कूदना क्या छूटा कि वह बेचारा उछलना-कूदना भूलकर मायूस नजरों से टुकुर-टुकुर माजरे को समझने की कोशिश में लगा रहता है। 
           बच्चों को पढ़ाने का काम बोझिल जरूर लगता है, लेकिन यदि उनके रंग में  रम जाओ तो कभी-कभी रोचक प्रसंग देखकर मन गुदगुदा उठता है। ऐसा ही एक प्रसंग मुझे मेरे बेटे जो कि चौथी कक्षा की परीक्षा दे रहा है, देखने को मिला।  मैं जब उसकी हिन्दी विषय की कॉपी देख रही थी तो मुझे उसमें उसके द्वारा लिखे मुहावरों का वाक्यों में प्रयोग देखकर बहुत हँसी आई, जिसे देखकर वह नाराज होकर रोने लगा कि शायद उसने गलत लिखा है। बहुत समझाने के बाद कि उसने बहुत अच्छा लिखा है, चुप हुआ। आप भी पढ़िए आपको भी मेरी तरह जरूर हँसी आएगी।   

...कविता रावत 

Thursday, February 11, 2016

प्रकृति के आनन्द का अतिरेक है वसंत

व्रत ग्रंथों और पुराणों में असंख्य उत्सवों का उल्लेख मिलता है। ‘उत्सव’ का अभिप्राय है आनन्द का अतिरेक। ’उत्सव’ शब्द का प्रयोग साधारणतः त्यौहार के लिए किया जाता है। उत्सव में आनन्द का सामूहिक रूप समाहित है। इसलिए उत्सव के दिन साज-श्रृंगार, श्रेष्ठ व्यंजन, आपसी मिलन के साथ ही उदारता से दान-पुण्य किये जाने का प्रचलन भी है। वसंत इसी श्रेणी में आता है।
        ’वसन्त्यस्मिन् सुखानि।’ अर्थात् जिस ऋतु में प्राणियों को ही नहीं, अपितु वृक्ष, लता आदि का भी आह्लादित करने वाला मधुरस प्रकृति से प्राप्त होता है, उसको वसन्त कहते हैं। वसंत प्रकृति का उत्सव है, अलंकरण है। इसीलिए इसे कालिदास ने इसका अभिनंदन ’सर्वप्रिये चारुतरं वसन्ते’ कहकर किया है।
          माघ शुक्ल पंचमी को मनाये जाने वाले इस त्यौहार को ‘श्री’ पंचमी भी कहते हैं, क्योंकि मान्यता है कि इसी दिन समुद्र मंथन के समय श्री (लक्ष्मी) का अवतरण हुआ। यह दिन श्रावणी से आरम्भ होने वाले वैदिक शिक्षा के सत्र का समापन तथा नए शिक्षा का प्रारम्भ दिन माना गया है। एक कथानुसार यह सरस्वती का प्रकट होने का दिन भी है। इस दिन सरस्वती का पूजन किया जाता है। इस प्रकार वसंत पंचमी शक्ति के दो माधुर्यपूर्ण रूपों-लक्ष्मी तथा सरस्वती की जयंती है।
वसंत न केवल भारत, अपितु समूचे विश्व को पुलकित करता है। इस समय धरती से लेकर आसमान का वातावरण उल्लासपूर्ण हो जाता है। प्रकृति की विचित्र देन है कि वसंत में बिना वर्षा के ही वृक्ष, लता आदि पुष्पित होते हैं। कचनार, चम्पा, फरथई, कांकर, कवड़, महुआ आम और अत्रे के फूल धरा के आंचल को ढ़क लेते हैं। पलाश तो ऐसा फूलता है मानों धरती माता के चरणों में कोटि-कोटि सुमनांजलि अर्पित करने को आतुर हो। सरसों वासन्ती रंग के फूलों से लदकर मानों वासन्ती परिधान धारण कर लेती है। घने रूप में उगने वाले कमल के फूल जब वसंत ऋतु में अपने पूर्ण यौवन के साथ खिलते है, तब जलाशय के जल को छिपाकर वसन्त के ’कुसुमाकार’ नाम को सार्थक करते हैं। आमों पर बौर आने लगते हैं। गुलाब, हारसिंगार, गंधराज, कनेर, कुन्द, नेवारी, मालती, कामिनी, कर्माफूल के गुल्म महकते हैं तो रंजनीगंधा, रातरानी, अनार, नीबू, करौंदों के खेत ऐसे लहरा उठते हैं, मानों किसी ने हरी और पीली मखमल बिछा दी हो। ’मादक महकती वासंती बयार’ में मोहक रस पगे फूलों की बहार में, भौरों का गंुजन और कोयल की कूक मानव हृदय को उल्लास से भर देती है।         
वसंत में नृत्य-संगीत, खेलकूद प्रतियोगिताएं तथा पतंगबाजी का विशेष आकर्षण होता है। ‘हुचका, ठुमका, खैंच और ढ़ील के चतुर्नियमों में जब पेंच बढ़ाये जाते हैं तो देखने वाले रोमांचित हो उठते हैं। ऐसे में अकबर इलाहाबादी की उक्ति “करता है याद दिल को उड़ाना पंतग का।“ सार्थक हो उठती है। वसंत पंचमी के दिन जब आम जनमानस पीले वस्त्र धारण कर, वसन्ती हलुआ, पीले चावल और केसरिया खीर का आनंद लेकर उल्लास से भरी होती है, तब सुभद्राकुमारी चैहान देशभक्तों से पूछती है- 
वीरों का कैसा हो वसन्त?
फूली सरसों ने दिया रंग
मधु लेकर आ पहुंचा अनंग
वधु-वसुधा पुलकित अंग-अंग
है वीर देश में किन्तु कंत
वीरों का कैसा हो वसन्त?