Wednesday, July 30, 2014

कलम के सिपाही मुंशी प्रेमचंद

          हिन्दी साहित्य की आजीवन सेवा कर हिन्दी-गद्य का रूप स्थिर करने, उपन्यास-साहित्य को मानव-जीवन से संबंधित करने एवं कहानी को साहित्य-जगत् में अग्रसर करने वाले महामानव मुंशी प्रेमचंद का जन्म बनारस से चार मील दूर लमही ग्राम में 31 जुलाई, 1880 को हुआ। उनकी आरंभिक शिक्षा उर्दू, फारसी से हुई। सात वर्ष की अवस्था में माता और चैदह वर्ष की अवस्था में पिता के देहान्त के बाद उनका संषर्घमय जीवन शुरू किया हुआ, जिसने मृत्युपर्यन्त उनका साथ नहीं छोड़ा। पन्द्रह वर्ष की आयु में विवाह हुआ जो सफल नहीं रहा तो उन्होंने बाल-विधवा शिवरानी देवी से विवाह किया, जिनसे उनकी तीन संताने हुई- श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव।
अध्यापन से जीविका चलाने वाले प्रेमचन्द जी पहले उर्दू में ‘धनपत राय’ नाम से लिखते रहे। उर्दू में उनका पहला उपलब्ध उपन्यास ‘असरारे मआबिद’ माना जाता है। उनका आरंभिक लेख उर्दू में प्रकाशित होने वाली 'जमाना पत्रिका' में छपते रहे। इस पत्रिका के सम्पादक मुंशी दयानारायण निगम की सलाह पर उन्होंने हिन्दी में ‘प्रेमचंद’ नाम से वर्ष 1915-16 से लिखना आरम्भ किया। लगभग 20 वर्ष की अल्पावधि में उन्होंने 11-12 उपन्यास और लगभग 300 से अधिक कहानी तथा नाटक लिखकर हिन्दी-साहित्य को समृद्ध किया। 
मुंशी प्रेमचंद का प्रगतिशील सुधारवादी दृष्टिकोण सदा उनके सम्मुख रहा है। उन्होंने विधवा-विवाह पर रोक, बाल-विवाह, दहेज, अनमेल विवाह, वृद्ध विवाह, आभूषण प्रियता, वेश्या जीवन आदि सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के निमित्त ‘सेवासदन’, गबन, निर्मला जैसे कालजयी उपन्यास लिखे। वेे शताब्दियों से पददलित और उपेक्षित, अपमानित कृषकों की आवाज और परदे में कैद, पग-पग पर लांछित और अपमानित असहाय नारी जाति की महिमा के जबरदस्त वकील माने जाते हैं । उन्होंने अपने उपन्यास, कहानी आदि में जिस तरह सीधी-सादी, मंजी हुई परिष्कृत संस्कृत पदावली से प्रौढ़ और उर्दू से चंचल भाषा के साथ प्रचलित ग्रामीण शब्दों से भरे मुहावरों और कहावतों का प्रयोग कर सहज रूप दिया है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। प्रेमचंद जी का  लेखन आज भी इतना प्रासंगिक है कि बड़े-छोटे सभी प्रकाशक समय-समय उनके उपन्यास, कहानी प्रकाशित कर जनमानस तक सुगमता से पहुंचाने का काम कर रहे हैं। इंटरनेट पर उनके साहित्य को सहजने का जो सराहनीय प्रयास भारत कोश द्वारा किया गया है वह अभूतपूर्व और अनुकरणीय है। 
मुंशी प्रेमचंद जी को 'कलम के सिपाही', 'कलम के जादूगर' या फिर 'उपन्यास सम्राट' किसी भी नाम से जानिये उनके   बारे में आज जो भी जितना चाहे लिखे, वह अत्यल्प होगा। प्रेमचंद जी मेरे पंसदीदा लेखकों में से एक हैं। उनकी कहानी हो या उपन्यास जितनी बार पढ़ती हूंँ, उतनी बार मुझे उनमें नयापन नजर आता है। प्रेमचंद जयंती के अवसर पर उनके लिए ‘हिन्दी साहित्य’ में उद्धृत आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी का कथन समीचीन होगा- "अगर आप उत्तर भारत की समस्त जनता के आचार-विचार, भाषा-भाव, रहन-सहन, आशा-आकांक्षा, दुःख-सुख और सूझ-बूझ जानना चाहते  हैं तो प्रेमचंद जी से उत्तम परिचायक आपको नहीं मिल सकता। झोपडि़यों से लेकर महलों तक, खोमचे वालों से लेकर बैंकों तक, गांव से लेकर धारा-सभाओं तक आपको इतने कौशलपूर्वक और प्रामाणिक भाव से कोई नहीं ले जा सकता। आप बेखटके प्रेमचंद का हाथ पकड़ कर मेढ़ों पर गाते हुए किसान को, अंतःपुर में मान किए बैठी प्रियतमा को, कोठे पर बैठी हुई वार-वनि-वनिता को, रोटियों के लिए ललकते हुए भिखमंगों को, कूट परामर्श में लीन गोयन्दों को, ईर्ष्या- परायण प्रोफेसरों को, दुर्बल-हृदय बैंकरों को, साहस-परायण चमारिन को, ढ़ोंगी पंडितों को, फरेबी पटवारी को, नीचाशय अमीर को देख सकते हैं और निश्चिन्त होकर विश्वास कर सकते हैं कि जो कुछ आपने देखा, वह गलत नहीं है।"

...कविता रावत

Wednesday, July 23, 2014

जग में कैसा है यह संताप

कोई भूख से मरता,
       तो कोई चिन्ताओं से है घिरा,
किसी पर दु:ख का सागर
       तो किसी पर मुसीबतों का पहाड़ गिरा।
कहीं बजने लगती हैं शहनाइयाँ
       तो कहीं जल उठता है दु:ख का चिराग,
कहीं खुशी कहीं फैला दु:ख
       जग में कैसा है यह संताप।।

कोई धनी तो कोई निर्धन
       किसी को निराशा ने है सताया
प्रभु की यह कैसी लीला!
       किसी को सुखी, किसी को दु:खी बनाया।
किसी की बिगड़ती दशा
       तो किसी के खुल जाते हैं भाग,
देख न पाता कोई कभी खुशियाँ
       जग में कैसा है यह संताप।।

कोई सिखाता है प्रेमभाव
       पर किसी की आँखों में झलकती नफरत,
कोई दिल में भरता खुशियाँ
       तो कोई भरता है दिल में उलफत।
किसी के सीने में दर्द छिपा
       कोई उगलता शोलों की आग
कोई संकोच, कोई दहशत में
       जग में कैसा है यह संताप।।

कोई शोषित, कोई पीड़ित
       किसी को निर्धनता ने है मारा,
कोई मजबूर कोई असहाय
       किसी को समाज ने है धिक्कारा।
सजा मिलती किसी और को
       पर कोई और ही करता है पाप
कहीं धोखा, कहीं अन्याय फैला
       जग में कैसा है यह संताप।।


Saturday, June 14, 2014

लोक उक्ति में कविता

कल्पना पब्लिकेशन, जयपुर ने मेरे पहले लघु कविता संग्रह ‘लोक उक्ति में कविता’ को प्रकाशित कर मेरे भावों को शब्दों में पिरोया है, इसके लिए आभार स्वरूप मेरे पास शब्दों की कमी है; लेकिन भाव जरूर है। भूमिका के रूप में श्रद्धेय डॉ. शास्त्री ‘मयंक’ जी के आशीर्वचनों के लिए मैं नत मस्तक हूँ।
इस लघु कविता संग्रह के माध्यम से शैक्षणिक संस्थाओं के विद्यार्थियों के साथ ही जन-जन तक लोकोक्तियों का मर्म सरल और सहज रूप में पहुंचे, ऐसा मेरा प्रयास रहा है।
इस अवसर पर मैं अपने सभी सम्मानीय ब्लोग्गर्स, पाठकजनों और विभिन्न समाचार पत्र पत्रिकाओं  का भी हृदय से आभार मानती हूँ, जो समय-समय पर ब्लॉग के माध्यम से मुझे लेखन हेतु प्रेरित करते रहते हैं।
मेरे लघु कविता संग्रह की पाण्डुलिपि को आद्योपान्त पढ़कर शुभकामना के रूप में आदरणीय रश्मि दीदी जी के अनमोल आशीष पुष्प को भी मैं तहेदिल से स्वीकार करती हूँ।
अन्त में मैं सम्माननीय रवीन्द्र प्रभात जी द्वारा मेरे भावानुरूप प्रेषित आत्मिक शुभकामना के प्रति आभार व्यक्त करते हुए प्रस्तुत करना चाहूँगी।
इस अवसर पर मुझे मेरे सम्माननीय  ब्लोग्गर्स  और पाठकों की प्रतिक्रिया का भी इंतजार रहेगा।
....... कविता रावत 

                      

अंधेरा काटकर सूरज दिखाती कविता रावत की कविताएं....

कहा गया है, कि साधना जब सरस्वती की अग्निवीणा पर सुर साधती है तो साहित्य की अमृतधारा प्रवाहित होती है, जिससे हित की भावनाएं हिलकोरें मारने लगती है । इन हिलकोरों में जब सृजन की अग्नि की धाह आंच मारती है तो वह कलुषित परिवेश की कालिमा जलाकर उसके बदले एक खुशहाली से भरे विहान को जन्म देती है। सही मायनों में इसी को कविता कहते हैं। मुझे खुशी है कि कविता रावत की लघु काव्य कृति 'लोक उक्ति में कविता' में ये सारे भाव मैंने महसूस किए हैं।
कविता रावत अपनी कविताओं में कहीं आग बोती नज़र आती है तो कहीं आग काटती। ऐसी आग जो आँखों के जाले काटकर पुतलियों को नई दिशा देती है, अंधेरा काटकर सूरज दिखाती है, हिमालय गलाकर वह गंगा प्रवाहित करती है जिससे सबका कल्याण हो। कविता रावत की कविता रुलाती नहीं हँसाती है, सुलाती नहीं जगाती है, मारती नहीं जिलाती है। सचमुच कविता की कविता शाश्वत एवं चिरंतन है।
कविता रावत की कुछ कवितायें मन-मस्तिष्क को आंदोलित करती है, जैसे संगति का प्रभाव,  दुर्जनता का भाव,  वह राष्ट्रगान क्या समझेगा,  भाग्य कुछ भी दान नहीं; उधार देता है,  अभिमान ऐसा फूल है जो शैतान की बगिया में उगता है, बुरी आदत,  गरीब,कमजोर पर हर किसी का जोर चलने लगता है,  हाय पैसा! हाय पैसा.... आदि।
कविता रावत की कविताओं में शब्द-शब्द से दर्शन टपकता नज़र आता है। शायद उन्हें इस बात का भान होगा कि कविता में जीवन दर्शन नहीं हो तो वह निष्प्राण है। कुछ कवितायें तो पत्थरों में भी प्राण-प्रतिष्ठा करती नज़र आती है, जो इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता है। संग्रह की कुछ कवितायें जीवन के प्रति एक गहरी आसक्ति, ललक अर्थात रागधर्मी जीवनोंमुखता व रोमांटिक नवीनता का आभास कराती है । 
यह संग्रह वास्तव में प्राणवान कविताओं की पुष्पांजलि है जिसे कविता रावत ने पूरे मनोयोग से सजाकर माँ सरस्वती की अग्निवीणा को समर्पित करने का प्रयास किया है। यह संग्रह पठनीय ही नहीं सहेजकर रखने योग्य भी है।
अपने अभिप्रेत भाव को तद्भव रूप में संप्रेषित करने की दक्षता के साथ ब्लॉग पर शब्दों,लोकोक्तियों व मुहावरों की सामर्थ्य एवं सीमा का सूक्ष्म संधान करने वाली कविता रावत की लघु काव्य कृति 'लोक उक्ति में कविता'  के प्रकाशन पर मेरी अनंत आत्मिक शुभकामनायें।

रवीन्द्र प्रभात
प्रधान संपादक: परिकल्पना समय(मासिक)
एन-1/107, सेक्टर-एन-1, संगम होटल के पीछे, अलीगंज, लखनऊ (उ. प्र.)

Saturday, June 7, 2014

पचमढ़ी की वादियों में

जब सूरज की प्रचण्ड गर्मी से हवा गर्म होने लगी, तो वह आग में घी का काम कर लू का रूप धारण कर बहने लगी। सूरज के प्रचण्ड रूप को देखकर पशु पक्षी ही नहीं, वातावरण भी सांय-सांय कर अपनी व्याकुलता व्यक्त करनी लगी तो प्रसाद जी की पंक्तियां याद आयी- "किरण नहीं, ये पावक के कण, जगती-तल पर गिरते हैं।" लू की सन्नाटा मारती हुई झपटों से तन-मन आकुल-व्याकुल हुआ तो मन पहाड़ों की ओर भागने लगा। सौभाग्यवश पिछले सप्ताह आॅफिस की ओर से पचमढ़ी की वादियों में 3 दिवसीय कार्यालय प्रबन्धन प्रशिक्षण का सुअवसर मिला तो तपती गर्मी से झुलसाये तन-मन में पचमढ़ी हिल स्टेशन घूमने की तीव्र उत्कण्ठा जाग उठी।
गर्मी के प्रकोप से बचने के लिए सुबह 19 सहकर्मियों के साथ हम बड़े उत्साह और उमंग के साथ बस द्वारा सतपुड़ा पर्वत श्रेणी पर स्थित सुन्दर पठारों से घिरे ‘सतपुड़ा की रानी‘ पचमढ़ी के लिए रवाना हुए।  भोपाल से पचमढ़ी लगभग 200 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। लगभग 4 घंटे तपते-उबलते जैसे ही हमारी बस पिपरिया से सर्पाकार पहाड़ी घाटी की ओर बढ़ी तो गर्मी के स्थान पर ठंडी हवा के झौंकों ने आकर हमारा स्वागत किया तो मन मयूर नाच उठा और आंखे चारों ओर फैली शस्य-श्यामला और हरे-भरे साल-सागौन, देवदार, नीलगिरि, गुलमोहर और अन्य छोटे-बड़े दुर्लभ किस्म के पेड़-पौधों की मनमोहक दृश्यावली में डूबने-उतरने लगा। चारों ओर  फैली घनेरी झाड़ियों, लताओं, ऊँचे-ऊँचे पेड़-पौधों के रूप  में प्रकृति ने अपने विविध रूप से  "मांसल सी आज हुई थी, हिमवती प्रकृति पाषाणी" (प्रसाद जी) बनकर मन मोह लिया।
पचमढ़ी पहुंचने पर उसकी खूबसूरती और शांति में डूबकर श्रांत-क्लांत मन ताजा हो उठा। पचमढ़ी में ठहरने के लिए टूरिस्ट बंगले, हाॅलीडे होम्स और काॅटेज के साथ ही सस्ते रेस्ट हाउस भी उपलब्ध हैं लेकिन हम सभी सहकर्मियों के लिए आॅफिस की ओर से पंचायत गेस्ट हाउस में खाने-ठहरने की उचित व्यवस्था की गई थी। शाम को सभी पैदल-पैदल पचमढ़ी बाजार की सैर को निकल पड़े। यहाँ के सुव्यवस्थित और पाॅलीथीन मुक्त बाजार देखना शहरवासी के लिए सबक है।  हमारे प्रशिक्षण का समय सुबह 9 बजे से 3 बजे निश्चित था इसलिए उसके मुताबिक ही सबने आपस में मिल बैठ आसपास के दर्शनीय स्थलों जैसे- पांडव गुफा, धूपगढ़, बी फाॅल, अप्सरा फाॅल, रजत प्रपात, जटाशंकर, हांडी खोह, राजेन्द्र गिरि आदि खंगालने का प्रोग्राम बनाया।
 गर्मियों में शरीर को ऊर्जावान व स्वस्थ बनाये रखने के लिए सुबह-सवेरे ताजी हवा में घूम-फिर कर थोड़ा बहुत योग, व्यायाम कर लेना लाभप्रद माना गया है और अगर घूमने-फिरने की जगह कोई हिल स्टेशन हो तो फिर समझो कारूं का खजाना हाथ आ गया। यह बात ध्यान में रखते हुए मैं सुबह 5 बजे पैदल-पैदल सघन वृक्षों से आच्छादित वन गलियारों और घाटियों की मनमोहक दृश्यावली में गोते लगाने निकल पडी। यहाँ मुझे एक ओर सैनिकों का अभ्यास तो दूसरी ओर हरियाली से घिरा राजभवन और कलेक्टर का बंगला देखना बड़ा सुहावना लगा। कभी गर्मियों में एक माह के लिए पूरा मंत्रिमंडल का कुनबा और उच्च शासकीय अधिकारी इसी आरोग्य धाम में आकर सरकार चलाये करते थे। नगरों की बढ़ती पर्यावरण प्रदूषण समस्या से दूर यहाँ शुद्ध हवा के साथ शांत वायुमण्डल पाकर मन तरोताजगी से भर उठा। 
पहले दिन के प्रशिक्षण से छूटते ही लगभग 3 बजे जिप्सी लेकर वी फाॅल और धूपगढ़ के आलौकिक सौन्दर्य देखने निकल पड़े। घने वृक्षों के बीच निकली सड़क के चारों ओर फैली हरियाली, पक्षियों का कलरव, वन्य जन्तुओं की क्रीड़ा देख अभी मन अतृप्त था कि पहाड़ों से फूटते स्वच्छ निर्मल जल स्रोत ने बरबस ही ध्यान आकर्षित किया तो मुंह से भारतेन्दु जी के पंक्ति फूट पड़ी- "नव उज्ज्वल जलधार, हार हीरक-सी सोहती।" ऊँचाई से गिरते बी फाॅल की ठण्डी-ठण्डी फुहारों ने पल भर में शहर की उबासी भरी तपन को निकाल बाहर कर ताजगी भर दी। ताजगी का अहसास लिए हम सूरज ढ़लने से पहले हम सूर्यास्त की सुन्दरता का अद्भुत नजारा देखने धूपगढ़  पहुंचे। यहाँ सतपुड़ा की ऊँची चोटी से एकाग्रचित होकर छोटी-छोटी पहाडि़यों से दूर होते सूरज को बादलों की ओट में छिपते देखना खूबसूरत और यादगार नजारा बन पड़ा। 
दूसरे दिन सुबह हमें पहले योग सिखलाया गया और फिर हमारे घूमने के प्रोग्राम केअनुरूप जल्दी प्रशिक्षण दिया गया। जैसे ही प्रशिक्षण समाप्त हुआ जल्दी से खा-पीकर सभी गुप्त महादेव, बड़ा महादेव, हांडी खोह, पांडव गुफा की सैर को निकल पड़े। सबसे पहले हम पवित्र गुप्त महादेव की गुफा में उनके दर्शनों के लिए संकरी राह से तिरछे-तिरछे होकर सरकते हुए पहुंचे। उसके बाद बन्दरों, लंगूरों की उछलकूद का देखते-दाखते ऊंची-ऊंची चट्टानों के बीच स्थित एक बड़ी गुफा के अंदर बड़े महादेव के दर्शन के लिए आगे बढ़े जहाँ गुफा के अंदर लगातार टपकते पानी को देख शंकर की जटाओं से निकली गंगा के उद्गम का अहसास होता रहा।
शिवदर्शन के बाद हांडीखोह पहुंचते ही यहां बनी रेलिंग प्लेटफार्म से एक ओर घाटी के विहंगम दृश्य देखने को मिला तो दूसरी ओर घने जंगलों से ढकी खाई के इर्द-गिर्द कलकल बहते झरनों की आवाज कानों में मधुर रस घोलने लगी। यहां हमारे सामने एक ओर ऊंचे-ऊंचे पेड़-पौधों से घिरी पहाडि़यों का रोमांच था तो दूसरी ओर हांडीखोह की 300 फीट गहरी खाई का भयानक स्वरूप, जो सुरसा की तरह मुंह फाड़कर निगलने को आतुर नजर आ रही थी।  
यहाँ से आगे बढ़ते हुए हम पचमढ़ी नाम दिलाने वाले पांडव गुफा देखने निकले। यहां पांच गुफानुमा कुटियों को करीब से देखकर सुखद आश्चर्य हुआ। मान्यता है कि कभी वनवास के दौरान लम्बी-चैड़ी कद काठी के महाबलशाली पांडव विशेषकर हजारों हाथियों के बल से अधिक बलशाली लम्बे-चौड़े भीम इनमें कैसे रहे होंगे! गुफाओं के बारे में सोचते-विचारते जैसे ही नीचे तलहटी स्थित खूबसूरत उद्यान पर नजर अटकी तो मोबाइल कैमरे से एक के बाद कई तस्वीर कैद कर डाली। इस पर भी जब मन नहीं भरा तो उद्यान की सैर करते हुए उसकी उपयोगिता और नैसर्गिक सौंदर्य संसार में खो गई। पेड़-पौधे जब पुष्पों-फलों से लदे होते हैं तो अपनी सुगंध से वातावरण को सुगंधित कर पर्यावरण को मोहित करते हैं। मादक महकती बासंती बयार में, मोहक रस पगे फूलों के पराग में, हरे-भरे पौधों की उड़ती बहार में पर्यावरण के दोषों को दूर करने की अद्भुत शक्ति है। इसीलिए वैदिक ऋषि ने इसे महाकाव्य की संज्ञा दी- 'पश्य देवस्य काव्यं न भमार न जीर्यति।' अर्थात् यह ईश्वर का एक महाकाव्य है, जो अमर है, अजर है।  
अंतिम तीसरे दिन प्रशिक्षण समाप्ति के बाद हमने शेष दर्शनीय स्थलों की अधूरी सैर को अगली बार के लिए छोड़ सतपुड़ा की रानी से विदा लेते हुए घर की राह पकड़ी। रास्ते भर प्राकृतिक दृश्यों के अनन्त, असीम सौन्दर्य में मन डूबता-उतरता रहा।  
   ...... कविता रावत

Saturday, May 31, 2014

धुएं में फिक्र

कभी बचपन में हम बच्चों को दुबले-पतले, खांस-खांस कर बीड़ी फूंकते हुए बुजुर्गो के मुंह से बीड़ी खींच कर और फिर उन्हें यह कह कर चिढ़ाते हुए खूब मजा आता था कि ‘बीडी पीकर ज्ञान घटे, खांसत-खांसत जी थके, खून सूखा अंदर का, मुंह देखो बन्दर का’ । हमारी इन हरकतों से नाराज होकर जब कोई बुजुर्ग हमारे पीछे अपनी बीड़ी के लिए हांफ-हांफ कर दौड़ लगा बैठते तो हम एक ही सांस में दूर तक भाग खड़े होते। तब हताश होकर वे बेचारे थोड़ी दूर भागने के बाद ही थक हारकर वहीं बैठ बंडल से दूसरी बीड़ी जलाकर धुंआ उगलने बैठ जाते। यह देख हम चोरी-छिपे दबे पांव आकर उनके पीछे चुपचाप इस ताक में बैठ जाते कि कब हमें फिर से यह खेल खेलने का मौका मिले। इस दौरान जब कभी उनकी नजर हम पर पड़ती तो वे डांटने डपटने के बजाय मुस्कराते हुए उल्टी-सीधी बीड़ी मुंह में फंसा कर कभी नाक से तो कभी मुंह से हवा में धुंए की विभिन्न कलाकृतियाँ उकेरने लगते तो हम मंत्रमुग्ध होकर यह खेल देखते दंग रह जाते। तब उनका यह करतब हमारे लिए किसी जादूगर के जादू से कम न था।

बचपन के दिन बीते और बड़े हुए। समझ में आया कि बचपन में हम तो मासूम थे ही, लेकिन बीड़ी का धुंआ उड़ाने वाले हमारे बड़े बुजुर्ग भी कम मासूम न थे, जो खांसते-खांसते बेदम होकर भी हमें धुंए की जादूगरी दिखाना कभी न भूले, पर कभी यह न जान सके कि यह धुंआ सबके लिए कितना घातक है। आज भी गांव से लेकर शहर तक जब किसी को बेफ्रिक होकर धुंआ उड़ाते, मुंह में गुटखा ठूसें देखती हूँ तो यही लगता कि हम पहले से भी ज्यादा मासूम हो चुके हैं, जो लाख चेतावनी और जागरूकता के बावजूद भी तम्बाकू को गले लगाकर खुश हुए जा रहे हैं।
           हाल ही में तम्बाकू से बचने के तमाम उपदेशों के प्रचार के साथ विश्व तम्बाकू निषेध दिवस गुजर गया। माना जाता है कि धूम्रपान सर्वप्रथम अमेरिका में 'रेड इंडियंस' ने शुरू किया। सन् 1600 के प्रारम्भ में यह यूरोप के देशों में फैला।   मौजूदा समय में विश्व जनसंख्या का एक बड़ा भाग धूम्रपान  के रूप में तम्बाकू का उपयोग करता है, बहुत सारे लोग इसे चबाते हैं।  जबकि  लगभग सभी वैज्ञानिक शोध तम्बाकू के नतीजों में तम्बाकू के सेवन को हानिकारक बताया गया है। निकोटीन सिगरेट में प्रयोग होने वाली तम्बाकू का एक व्यापक उत्तेेजना पैदा करने वाला घातक होता है। यह अधिक विषैला होता है और शरीर पर कई तरह के घातक असर डालता है।  धूम्रपान से बढ़ा हुआ रक्त हृदय रोग की संभावनाओं को बढ़ा देता है। गर्भवती महिलाओं में निकोटिन से भ्रूण की वृद्धि कम होती है। निकोटीन के अलावा तम्बाकू के धुंए में कार्बनमोनोआॅक्साइड बहुचक्रीय ऐरोमेटिक हाइड्रोकार्बन एवं टार पाये जाते हैं।  यह टार कैंसर पैदा करने में किस तरह की भूमिका निभाता है, यह अब छिपा नहीं है। यह ध्यान रखना चाहिए कि  फेफड़ों के कैंसर से पीड़ित पंचानबे फीसद मरीज धूम्रपान या तम्बाकू चबाने के कारण इस स्थिति में पहुंचते हैं। इसके अलावा, भारत में सबसे ज्यादा टीबी या तपेदिक के रोगी मिलते हैं, जिसकी एक सबसे बड़ी वजह धूम्रपान ही है। साथ ही, खांसी या  ब्रोंकाइटिस,  हृदय संवहनी रोग, फेफड़ों की बीमारी का नतीजा यह होता है की इससे शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर हो जाता है।
दरअसल, तम्बाकू सेवन रोगों को खुला निमंत्रण तो देता ही है, साथ ही यह धूम्रपान न करने वालों को चिड़चिड़ा बनाता है। बल्कि सच कहा जाय तो धूम्रपान न करने वाले इसकी आदत रखने वालों से परेशान ही रहते हैं, भले ही वे सार्थक विरोध नहीं जता पाएं।
 धूम्रपान से होने वाले कुछ प्रमुख रोगों के बारे में एक नजर
1. कैंसर:  तम्बाकू के  धुएं से उपस्थित बेंजपाएरीन कैंसर जनित रोग होता है। लगभग 95 प्रतिशत फेफड़ों के कैंसर के मरीज धूम्रपान के कारण होते हैं। विपरीत धूम्रपान मुख कैंसर का कारण होता है। विपरीत धूम्रपान में सिगार का जलता हुआ सिरा मुख में रखा जाता है। विपरीत धूम्रपान आंध्रप्रदेश के गांवों में सामान्य होता है। बीड़ी के धूम्रपान के कारण जीभ, फैरिंग्स (गला), लैरिंग्स, टांन्सिल एवं ग्रासनली के कैंसर हो जाता है। होंठ कैंसर सिगार एवं पाइप के द्वारा होता है। तम्बाकू चबाने से मुख कैंसर होता हैं
2. टी.बी. (तपेदिक):  धूम्रपान से हमारे भारत में सबसे ज्यादा टीबी या तपेदिक के रोगी मिलते हैं। तपेदिक के जीवाणु संक्रमति व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्ति में फैल सकते हैं।
3. खांसी एवं ब्रोंकाइटिस : तम्बाकू के धूम्रपान से फैरिंग्स और ब्रोंकाई की म्यूकस झिल्ली उत्तेजित होने के कारण खांसी एवं ब्रोंकाइटिस हो जाता है।
4. हृदय संवहनी रोग : तम्बाकू के धूम्रपान के कारण एड्रीनील का स्त्रावण बढ़ जाता है जिससे धमनियों के संकुचन द्वारा रक्त दाब, हृदय स्पंदन की दर में वृद्धि हो जाती है। उच्च रक्त दाब हृदय संबंधी रोगों की संभावनाओं को बढ़ाता है। निकोटीन हृदय के द्विपट कपाट को नष्ट करता हैं
5. एम्फाइसिमा- तम्बाकू का धुआं फेफड़ों की एल्वियोलाई की भित्ति तोड़ सकता है। गैसीय विनिमय के लिए सतही क्षेत्रफल को कम कर देता है, जिससे एम्फाइसिमा हो जाता है।
6. प्रतिरक्षा तंत्र पर प्रभाव :  यह प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर करता है।
7. आॅक्सीजन वहन क्षमता में कमी :  तम्बाकू के धुंए की कार्बनमोनोआॅक्साइड शीघ्रता से आरबीसी की होमोग्लोबिन को बांधती है एवं सह विषाक्तता का कारण होती है, जो हीमोग्लोबिन की आॅक्सीजन वहन क्षमता को कम करता है।
         एक दिन विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर ही नहीं बल्कि इस बुरी लत को जड़मूल से नष्ट करने के अभियान में सबको हर दिन अपने आस पड़ोस, घर-दफ्तर और गांव-शहर से दूर भगाने के लिए संकल्पित होना होगा और ईश्वर ने हमें जो निःशुल्क उपहार दिए हैं- स्वस्थ शरीर, पौष्टिक भोजन, स्वच्छ हवा, निर्मल जल, उर्वरा शक्ति संपन्न भूमि व विविध वनस्पतियां, जीव-जन्तु व मानसिक बौद्धिक क्षमता जिनसे हमें  निरन्तर आगे बढ़ने को प्रेरणा मिलती हैं, उसे सुरक्षित, संरक्षित कर अपनाना होगा।

....कविता रावत




Wednesday, May 14, 2014

हम भोपाली


हम कहलाते हैं भोपाली
मिनीबस की है कुछ बात निराली
हम कुछ भी बकें इधर-उधर
हर बात हमारी है निराली
         हमसे बढ़ती शान
हम कहलाते हैं भोपाली।

हम ड्रायवर सबको ढ़ोते-फिरते
चाहे चपरासी हो या अफसर
पर जब आते टेंशन में भैया
तब दिखता न घर न दफ्तर
पान-गुटका-बीड़ी साथ हमारे
जुबां पर रहती हरदम गाली
         हमसे बढ़ती शान
हम कहलाते हैं भोपाली।

खाऊ किस्म के जीव नहीं हम
चाय कट पूरे गुटके से काम चलाते
रीढ़ की हड्डी हम सरकार की भैया
हम तो सबके प्यारे बाबू कहलाते
कुछ आये न आये हमको
पर आती है प्यार भरी गाली
        हमसे बढ़ती शान
हम कहलाते हैं भोपाली।

सरकार का बोझ उठाते हम
सरक-सरक कर चलते रहते
हम सरकारी अफसर कहलाते
अगर कोई काम बिगाड़ दे भैया
तो करते ठीक देकर दो-चार गाली
         हमसे बढ़ती शान
हम कहलाते हैं भोपाली।

..कविता रावत

Friday, April 25, 2014

लोकतंत्र का महोत्सव

जब से चुनाव आयोग ने लोकतंत्र का चुनावी बिगुल बजाया, तब से कविवर पदमाकर के वसंत ऋतु की तरह ‘कूलन में केलि में कछारन में कुंजन में, क्यारिन में कलिन में कलीन किलकंत है, कहे पद्माकर परागन में पौनहू में, पानन में पीक में पलासन पगंत है, द्वार में दिसान में दुनी में देस.देसन में, देखो दीप.दीपन में दीपत दिगंत है, बीथिन में ब्रज में नवेलिन में बेलिन में, बनन में बागन में बगरयो बसंत है' की तर्ज पर इन दिनों गाँव की चौपाल, खेत-खलियान से लेकर शहर की गली-कूचों में, घर-परिवार में, हाट-बाजार में, पान-गुटके की गुमठियों में, चाय की दुकान-ठेलों में, होटल-रेस्टोरेन्ट में, स्कूल-कालेज में, बस में, हवाई जहाज में, ट्रेन में, पार्क में, पिकनिक में, शादी-ब्याह में, सरकारी-गैर सरकारी दफ्तरों में, रेडियो-टीवी में, समाचार पत्र-पत्रिकाओं में, टेलीफोन-मोबाइल में, इंटरनेट में, धार्मिक अनुष्ठानों में, पढ़े-लिखे हो या अनपढ़, गरीब हो या अमीर, व्यापारी हो या किसान, नौकरीपेशा हो या बेरोजगार, जवान हो या बुजुर्ग हर किसी पर लोकतंत्र के महोत्सव का रंग सिर चढ़कर बोल रहा है।
पाँच वर्ष में एक बार लगने वाले इस महोत्सव में लोकतंत्र के बड़े-बड़े जादूगर अपनी-अपनी जादुई छडि़यों से देश में व्याप्त बेरोजगारी, भुखमरी, महंगाई, भ्रष्टाचार को दूर भगाने के लिए ऐसे करतब दिखा रहे है, जिसे देखते ही अच्छे से अच्छा जादूगर भाग खड़ा हो जाय। जनता जनार्दन को राजनीति के अभिनय का ऐसा जौहर देखने को मिल रहा है, जिसे कोई बड़े से बड़ा अभिनेता भी नहीं निभा सकता है। नौटंकियों का सुन्दर अभूतपूर्व दुर्लभ समागम एक साथ देखने का आनन्द भी जनता को मिल रहा है।  इस महोत्सव में लोकतंत्र के महारथी जो सुनहरे सपने दिखा रहे हैं, उनमें जनता का मन खूब रमा हुआ है।
इधर महोत्सव में समुद्र मंथन जारी है, जिसके भाग्य में लक्ष्मी होगी उनके दिन सुदामा की तरह कुछ इस तरह फिरने में देर नहीं लगनी वाली-
“कै वह टूटी सी छानि हुती कहँ। कंचन के सब धाम सुहावत।
कै पग में पनही न हती कहँ। लै गजराजहु ठाडे महावत।।
भूमि कठोर पै रात कटै कहँ। कोमल सेज पै नींद न आवत।
कै जुरतो नहिं कोदों सवाँ, प्रभु के परताप ते दाख न भावत।।“
  उधर जिनके भाग्य में विषपान लिखा होगा, वे या तो “सदा न फूले तोरई, सदा न सावन होय। सदा न जीवन थिर रहे, सदा न जीवै कोय"की तर्ज पर 5 साल तक चुप रहेंगे या फिर कविवर बिहारी की ग्रीष्म ऋतु की कल्पना की तरह 'जब ग्रीष्म का प्रकोप प्राणियों को व्याकुल कर देता है तो वे सुध-बुध खोकर पारस्परिक राग-द्वेष भी भूल जाते हैं। परस्पर विरोधी स्वभाव वाले जीव एक दूसरे के समीप पड़े रहते हैं, किन्तु उन्हें कोई खबर नहीं रहती।’ इस तरह की तपोवन जैसी स्थिति में मिलेंगे-“कहलाने एकत बसत, अहि, मयूर, मृग बाघ, जगत तपोवन सो कियो, दीरघ दाघ निदाघ“।
लोकत्रंत के महारथी राजनेता "जो डूबे सो ऊबरे, गहरे पानी पैठ" की तरह लगे हुये हैं तो हम आम जनता की तरह अपने मतदान फर्ज निभाकर "मैं बपूरा बू़ड़न डरा, रहा किनारे बैठ" की तर्ज पर लोकतंत्र के इस महोत्सव में तमाशबीन बनकर एक तरफ मिथ्याओं पर धर्म का मुलम्मा चढ़ते तो दूसरी तरफ सच्चाई से ईमान को निचुड़ते देख अकबर इलाहाबादी को याद कर रहे हैं-
 "नयी तहजीब में दिक्कत, ज्यादा तो नहीं होती
मजहब रहते हैं, कायम, फकत ईमान जाता है।"

..... कविता रावत

Friday, April 4, 2014

वैष्णों देवी यात्रा

बच्चों के परीक्षा परिणाम आने के बाद एक सप्ताह की छुट्टी मिली तो मन में माँ वैष्णों देवी दर्शन की लालसा जाग उठी। भोपाल से दिल्ली और फिर वहाँ से देवर-देवरानी, जेठ-जेठानी के परिवार और बड़ी ननद के साथ हम 12 पारिवारिक सदस्य रात्रि को बस से सोते-जागते माँ के दर्शन के लिए निकल पड़े। दिल्ली से 10-11 घंटे के सफर के बाद हम सुबह 6 बजे जम्मू पहुँचे। यहाँ से पहाड़ी मार्ग से कटरा की यात्रा शुरु हुई तो मन खुशी से झूमने लगा। पहाड़ देखते ही मेरा मन उसमें डूब जाता है। आखिर यह परमात्मा की सबसे अनुपम रचना जो ठहरी! एक ओर घुमावदार ऊँची-नीची सड़क पर सरपट भागती बस की खिड़की से पहाडि़यों की तलहटी में बहती नदी और सुदूर हिमपूरित तराइयों में हिमावृत्त चोटियों पर सूर्य किरणों के पड़ने से बनते अद्भुत रंग के नीले, पीले, कुमकुम जैसी चित्ताकर्षक दृश्यों के इन्द्रधनुषी रंगों में डूबना बड़ा सुखकारी बन पड़ा। वहीं दूसरी ओर ऊँचे-ऊँचे अपार अनगिनत वृक्ष समूहों से आती शीतल मंद पवन के झोंखों से मन झूम उठा। प्रकृति के पल-पल परिवर्तित रूप बडे उल्लासमय और हृदयाकर्षक होते हैं। वह मुस्कराती रहती है; सर्वस्व लुटाकर भी हँसती है। सूर्याेदय हो या सूर्यास्त का समय प्राकृतिक छटा अनुपम और मनोमुग्धकारी होती है। ऐसी ही कश्मीर की प्राकृतिक छटा से मुग्ध होकर श्रीधर पाठक गा उठे-
प्रकृति यहाँ एकान्त बैठि, निज रूप संवारति,
पल-पल पलटति भेष, छनिक छवि छिनछिन धारति।
विहरित विविध विलासमयी, जीवन के मद सनी,
ललकती, किलकति पुलकति, निरखति थिरकति बनि ठनी।“  
जम्मू की पहाड़ी वादियों में डेढ़-दो घंटे डूबते-उतरते हुए हम कब कटरा पहुँच गए, इसका भान न हुआ। कटरा पहुँच कर वहाँ दो कमरे किराये पर लेने के बाद सभी नहा-धो और खाने-पीने के बाद शाम 5 बजे वैष्णों देवी दर्शन के लिए चल पड़े।
आते-जाते भक्तों के साथ हमने बड़े उत्साहपूर्वक ‘जय माता दी’ के स्वर में स्वर मिलाया और बाण गंगा होते हुए धीरे-धीरे चरण पादुका और आदिकुमारी की चढ़ाई चढ़नी आरम्भ की। कभी घुमावदार तो कभी सीढ़ीनुमा रास्ते से हम धीरे-धीरे आगे बढ़ते चले। हम शहर में रच-बस चुके बड़े सदस्य तो थोड़ी चढ़ाई चढ़ते ही थककर बार-बार जहाँ-कहीं आराम करने बैठ जाते, लेकिन बच्चों का उत्साह देखकर मन को बड़ी राहत मिली। वे ‘जय माता दी’ का उद्घोष करते हुए हरदम हमसे चार कदम आगे बढ़ते रहे। उनका जोश बरकरार रखने के लिए उनकी मनपंसद चीजें जैसे- चाकलेट, चिप्स, बिस्कुट आदि खिलाना-पिलाना थोड़ा महंगा जरूर लग रहा था लेकिन कुल जमा यह पिट्ठू, घोड़े-खच्चर, पालकी, हेलिकाॅप्टर के खर्च के आगे नगण्य रहा। हमारे शरीर में एक तरफ चाय-काॅफी पीने से फुर्ती आ रही थी तो दूसरी तरफ अपने परिवार के भरण-पोषण के वास्ते अपने कंधों पर पालकी उठाये बिना विश्राम किए तेजी से कदमताल करते हुए चुपचाप श्रद्धालुओं को उनके गंतव्य तक पहुंचाने वाले मजदूरों, घोड़े-खच्चरों में लदे लोगों को तेजी से हाँककर ले जाने वालों, तेल मालिश करने वालों और एक आध किलोमीटर की दूरी पर ढोल बजाने वालों को सोच-विचारने पर थके-हारे पैरों में जान आ रही थी।  इसके साथ मैं समझती हूँ कि पारिवारिक सदस्यों के साथ पैदल मिलजुल कर, एक दूसरे को सहारा देते हुए माँ वैष्णों देवी की यात्रा करने में जो आनंद है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।
रात्रि लगभग 9 बजे आदिकुमारी पहुंचकर गुफा मंदिर दर्शन कर होटल में खाने-पीने और थोड़ा सुस्ताने के बाद हमने लगभग 11 बजे 'भवन' की यात्रा आरम्भ की। दुर्गम पहाड़ी रास्ते में अभूतपूर्व जन सुविधाओं जैसे- जगह-जगह यात्रियों की सुविधा के लिए शेड, पीने के लिए स्वच्छ पानी, टायलेट, बिजली की चौबीस घंटे निर्बाध आपूर्ति देखकर 12-13 वर्ष पहले और आज के समय में बहुत बड़ा सुनहरा परिवर्तन देखने को मिला तो यह मन खुशी से खिल उठा। चलते-चलते एक बारगी भी नहीं लगा कि हम जिस समतल राह पर आसानी से चल रहे हैं, वह कोई दुर्गम पहाड़ी है। हम धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए बीच-बीच में जितनी बार विश्राम करतेे, उतनी बार पहाड़ों के झुरमुट से तलहटी स्थित लाखों सितारों जैसे जगमगाते कटरा की खूबसूरती को देखना नहीं भूलते। यह सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक वह हमारी आँखों से ओझल न हुआ।
माँ के दरबार के करीब पहुंचते ही ‘जय माता दीकी सुमधुर गूंज कानों में पड़ी तो माँ के दर्शनों की तीव्र उत्कण्ठा के चलते हमारे कदम तेजी से उस ओर बढ़ चले। यहाँ यात्रियों का परस्पर प्रेम देखकर लगा जैसे यही स्वर्ग है। सुगमतापूर्वक माँ के दर्शन हुए तो मन को असीम शांति मिली।  धर्मशाला में 3-4 घंटे आराम करने के उपरांत हमने सुबह-सवेरे एक बार फिर भैरवनाथ के दर्शनों के लिए चढ़ाई चढ़कर उस पर फतह पायी। माँ के सुनहरे भवन और प्राकृतिक सौंदर्य में गोते लगाते हुए जब हमने भैरोनाथ के दर्शन किए तो यात्रा पूरी होने पर मन को बड़ा सुकून मिला। थोड़ी देर चहलकदमी करने के बाद हम आदिकुमारी होते हुए कटरा के लिए निकल पड़े। आदिकुमारी पहुंचकर थोड़ा खा-पीकर और सुस्ताने के बाद हमने कटरा की राह पकड़ी।
सीढि़याँ उतरते समय हमारी आपस में घर पहुंचकर सबसे पहले कन्या भोज करवाने की बातें चल रही थी। लेकिन मुझे घर आकर कन्या भोज करवाने से अच्छा पेट की खातिर सीढि़यों पर माँ की चुनरी ओढ़े, दो पैसे की आस लगाई बैठी कन्याओं को दान-दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद लेना ज्यादा उचित और फलदायी लगा।  मोबाइल बैटरी खत्म होने से मन में माँ के दरबार, भैरवनाथ और आस-पास की फोटो न उतार पाने का बड़ा मलाल था, लेकिन जब कटरा पहुंचकर सबने नहा-धोकर फोटो स्टूडियों में माता रानी के सजे दरबार में सामूहिक फोटो खिंचवा ली, तो मन का मलाल जाता रहा। रात्रि 8 बजे हमने दिल्ली के लिए बस पकड़ी और माँ वैष्णो देवी का स्मरण करते हुए हम सुबह लगभग 8 बजे वापस अपनी दुनिया में लौटकर उसमें खो गए।

'जय माता दी'

 ...कविता रावत


Thursday, March 13, 2014

झुमरी के बच्चे

जब से पड़ोसियों के घर विदेशी कुत्ता 'पग' (Pug) आया है, तब से जब-तब झुमरी के दोनों बच्चे उसके इधर-उधर चक्कर काट-काट कर हैरान-परेशान घूमते नजर आ रहे हैं। कुर्सी पर शाही अंदाज में आराम फरमाता लंगूर जैसे काले मुँह वाला प्राणी उन्हें फूटी आँख नहीं सुहा रहा है। उसका अजीबोगरीब थोबड़ा देखकर वे यह अंदाज नहीं लगा पा रहे हैं कि वह उनकी जात-बिरादरी का है भी कि नहीं!  वे कई दिन से अपनी भूख-प्यास भूलकर उसे घूरने, घुड़कने, आँख दिखाने और एक साथ भौंक-भांक कर डरा-धमकाकर अपने इलाके से बाहर खदेड़ने की पुरजोर लेकिन नाकाम कोशिश में लगे हुए हैं। क्योंकि वे बेचारे यह नहीं जानते कि कुर्सी पर बैठा 'रईसजादा' उनकी तरह आम नहीं खास है, जिसकी पूछ-परख करने वालों की लम्बी फेहरिस्त है। फिर भी इससे बेखबर वे आश्वस्त दिखते हैं कि जिस प्रकार उन्होंने बहादुरी से आज तक हर छोटे-बड़े कुत्ते हो या सुअर या फिर कोई दूसरा जानवर अपने इलाके से बाहर खदेड़ कर ही दम लिया है, एक बार फिर ऐसा कारनामा दिखा रहेंगे।  इंसानों की तरह ही बहुत से जानवर भी अपने इलाके के शेर कहलाना पसन्द करते हैं। हाँ यह बात जरूर अलग है कि इसके लिए उन्होंने कभी 'महाभारत' नहीं रचा। लेकिन उन्हें देख एक बात तो समझ आती है कि वे गीता के असली मर्म को बेहतर समझते हैं, तभी तो एक बार लड़ने के बाद कभी दुश्मनी नहीं पालते, कुछ पल बीतने के बाद ही अपने स्वजातीय बंधु-बांधवों में इस तरह घुल-मिल जाते हैं, जैसे कुछ देर पहले कुछ हुआ ही न था। 
अभी कुछ माह पूर्व ही झुमरी से मैं परिचित हुई। जब भी मै सुबह-सवेरे कभी घूमने या दूध लेने सांची कार्नर तक जाती तो वह मेरे साथ-साथ हो लेती और वापस घर लौटने पर आंगन में थकी-हारी  इस तरह पसर जाती जैसा उसी का आंगन हो और उससे मेरा कोई पूर्व जन्म को नाता हो। वह बच्चों को जन्म देने वाली थी, इसलिए उसकी स्थिति समझकर मुझे उससे हमदर्दी हो गई। वह बड़ी सुस्त रहती। खाना भी वह बड़े आराम-आराम से खा पाती। इस दौरान उसकी आम कुत्तों से एक बात मुझे बड़ी अजीब लगी कि वह सूखी रोटी खाना बिल्कुल भी पंसद नहीं करती थी। बहुत से लोग कहते हैं कि कुत्तों को घी हजम नहीं होता, लेकिन उसे घी या तेल लगी चुपड़ी रोटी या फिर दूध-रोटी-ब्रेड-बिस्कुट खाना ही अच्छा लगता। झुमरी को कोई परेशानी न हो इसके लिए मैंने जब उसके लिए बगीचे में रहने की व्यवस्था की तो उसकी आंखों में मुझे कृतज्ञता के भाव दिखे। बहुत से लोग आवारा कुत्तों को बड़ी हिकारत से देखकर दुत्कारते हुए उन पर राशन-पानी लेकर चढ़ बैठते हैं। अपने घर-आंगन में देखते ही झाडू, डंडा, चप्पल या पत्थर जो भी मौकाए हाथ में आया, उठाकर दे मारा। वे भूल जाते हैं कि हमारी तरह ही जानवर भी प्यार के भूखे होते हैं। तभी तो वे हम इंसानों के करीब रहना पसंद करते हैं। झुमरी ने छः पिल्लों को जन्म दिया, तो नए मेहमानों को देखकर मन को खुशी हुई। किन्तु दो दिन के अंतराल में जब 3 बहुत कमजोर पिल्ले एक के बाद एक चल बसे तो मन को गहरी पीड़ा पहुँची। झुमरी की बेवस दुःखियारी आँखों को देख मेरी आँखे भी नम हुई। लेकिन जल्दी ही झुमरी अपने तीनों बच्चों में रम गई। दो माह तक बच्चों को बड़ा होते और सबकुछ ठीक-ठाक चलता देख मन को बड़ी तसल्ली हुई। लेकिन एक दिन जब मैं ऑफिस से घर लौटी तो घर के पास झुमरी का एक बच्चा सड़क पर बुरी तरह कुचला मिला तो दिल धक से रह गया। आँगन में झुमरी के दो बच्चे खेल रहे थे लेकिन झुमरी नदारद थी। किसी अप्रिय आशंका के चलते मैं फ़ौरन उसकी खोजबीन में जुट गई, लेकिन अफसोस उसका कोई अता-पता नहीं चला। भले ही झुमरी के जाने के बाद उसके बच्चों की  देखरेख की जिम्मेदारी उठानी पड़ रही है, लेकिन जब भी घर-आँगन में बच्चों की चहल-कदमी देखती हूँ तो दिन भर का थका-हारा मन तरोताजगी से भर उठता है। 
          झुमरी के बच्चे भी अपनी माँ पर ही गये हैं। उन्हें भी दूध-रोटी-ब्रेड-बिस्कुट या फिर घी-तेल लगी रोटी खाने को चाहिए। जब कोई पास-पड़ोसी उनके आगे बची-खुची सूखी रोटी पटक देते हैं तो वे उसे सूंघने के जहमत तक नहीं उठाते, ऐसी उपेक्षा देख वे यही कहते-फिरते हैं कि हमने उनके भाव बढ़ा रखे हैं। कई बार ऑफिस से आते ही उनकी कई शिकायतें भी सुननी पड़ती है। जैसे- आज वे छत में पहुंच कर धमा-चौकड़ी मचा रहे थे, कल हमारी कार या स्कूटर में चढ़कर आराम फरमा रहे थे, हमारे घर में बेधड़क घुसे चले आते हैं आदि चलता रहता है। इतना होने के बावजूद भी यह देखकर मन को बड़ी राहत है कि आजकल आस-पड़ोस वाले मेरे ऑफिस जाने के बाद उनका पूरा ख्याल रखने लगे हैं।
          आजकल जब भी सुबह-सुबह घूमने निकलती हूँ तो झुमरी के बच्चे भी उछलते-कूदते साथ-साथ निकल पड़ते हैं। रास्ते भर उनकी शरारत बराबर चलती रहती है। कभी किसी जानवर को देखा नहीं कि लगे उसे आंख दिखाने, गुर्राने, सामने वाला उनसे कितना ताकतवर है, इसका भी ख्याल नहीं रखते। वे मेरा दम भरते हैं। सुबह-सवेरे कई लोग अपने पालतू कुत्तों के साथ घूमते नजर आते हैं, जिनसे घर-परिवार से लेकर देश-दुनिया भर की अंतहीन बातें होती रहती हैं। ऐसे ही एक बुजुर्ग दम्पत्ति जो भरे-पूरे परिवार के बावजूद अपनी पत्नी और पालतू कुत्ते के साथ अकेले रहते हैं। उन्होंने एक निराशाभरी बात कही-“बुढ़ापे में अपने पास का पैसा, जीवन साथी और पालतू कुत्ता ही साथ देता है। बाकी सब छोड़कर चले जाते हैं" उनकी यह बात हमारी आज की पारिवारिक विघटन व्यथा बयान कर मन में एक गहरी टीस पैदा कर जाती है। 

 ....कविता रावत



Friday, February 7, 2014

भारतीय प्रजातंत्र में नोटा की उपयोगिता

अण्णा हजारे ने अनशन तोड़ने के साथ चुनाव सुधारों को लेकर संघर्ष छेड़ने की बात की थी। अण्णा के अनुसार मतदाता को मतपत्र पर दर्ज उम्मीदवारों को खारिज करने का भी हक मिलना चाहिए। अगर दस प्रत्याशी मतपत्र में दर्ज हैं तो ग्यारहवाँ या अन्तिम खाना प्रत्याशी को नकारने का हो। 
प्रतिनिधि को खारिज करने और वापस बुलाने का मुद्दा नया नहीं है।  1974 के बिहार आंदोलन में यह एक प्रमुख मुद्दा था। बिडम्बना यह है कि इस आन्दोलन के सहारे सत्ता में आयी पार्टियों ने जयप्रकाश नारायण के मुद्दे को भुला दिया। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत कुछ राज्यों में पहले से ही पंचायती राजव्यवस्था में प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार जनता को मिला हुआ है। किसी भी राज्य में जवाबदेही सुनिश्चित करने के नजरिए से जनप्रतिनिधियों को खारिज करने के जनाधिकार का भय व्याप्त होना जरूरी है। अमेरिका में किसी हद तक यह अधिकार 1903 से लागू है। वहाँ दो गवर्नरों को इस अधिकार के चलते पदमुक्त होना पड़ा। कनाडा में तो प्रधानमंत्री को भी वापस बुलाने का हक जनता को मिला हुआ है।
अम्बेडकर जी ने कहा था कि हमें कम से कम दो शर्तें पूरी करनी चाहिए- एक तो स्थिर सरकार हो, दूसरी वह उत्तरदायी सरकार हो। भारतीय लोकतन्त्र की दो बड़ी समस्याएँ हैं- एक तो यह है कि जनप्रतिनिधि पर मतदाताओं के अंकुश का कोई प्रावधान नहीं है। हमारे लोकतंत्र की एक बड़ी विकृति यह है कि मताधिकार एक तरह की विवशता में बदल गया है। उम्मीदवारों में से किसी एक को चुनने को मतदाता अभिशप्त होते हैं। संविधान के अनुच्छेद 19 के भाग ‘क’ में नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। लेकिन निर्वाचन के समय मतदाता के पास जो मतपत्र होता है उसमें केवल मौजूदा उम्मीदवारों में से किसी एक को चुनने का प्रावधान है, न चुनने का नहीं? अगर मतदाता उनमें से किसी को भी नहीं चुनना चाहता तो इसे जाहिर करने और इसे नापंसदगी के वोट के तौर पर गिने जाने का कोई प्रावधान नहीं है।
"नन ऑफ द अबॅव" नोटा बटन को लेकर जबलपुर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई। रिटायर आईपीएस अधिकारी विजय वाते द्वारा दायर इस याचिका में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन के मुताबिक नोटा बटन का प्रावधान किया गया है लेकिन लोगों को शिक्षित करने के लिहाज से इसका प्रचार-प्रसार नहीं किया जा रहा है। याचिका में भारत निर्वाचन आयोग, मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी और कलेक्टर भोपाल को भी पार्टी बनाया गया। वाते "राइट टू रिजेक्ट ग्रुप" के संयोजक हैं।
राजस्थान विधान सभा की सभी दो सौ सीटों के लिए चुनाव हुए थे, नोटा का उपयोग लगभग प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में किया गया। इनमें 11 ऐसे क्षेत्र थे जहाँ नोटा मतों की संख्या जीत की संख्या से अधिक थी। मध्यप्रदेश में 230 में से 25 और छत्तीसगढ़ में 90 में से 15 विधानसभा क्षेत्र ऐसे रहे जहाँ हार-जीत का अन्तर नोटा मतों से कम रहा।
          नोटा का प्रयोग देश में पहली बार था इसलिए लोगों के मन में इस बटन के प्रभावों के प्रति जिज्ञासा भी थी। कुछ यूँ ही प्रयोग कर देखना चाहते थे। कुछ बागियों, प्रतिबागियों तथा अवसरवादियों ने इसे कमाई का जरिया बना लिया।  राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों को ध्यान में रखते हुए उनकी कथनी और करनी को जानना जरूरी है। घोषणापत्रों में दलों, उम्मीदवारों और बुनियादी मुद्दों के अलावा भी बहुत कुछ देखने-समझने को होता है। उनमें किए गए वादे अक्सर भरमाने के लिए ही होते हैं। सत्ता में रहे दल के पिछले घोषणा पत्र से उसके वादों की गम्भीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। 
नागरिक को नकारात्मक मत का अधिकार दिए जाने की व्यवस्था चुनाव सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण निर्णय है। इससे जन कल्याण के कामों के लिए होड़ चलेगी। प्रतिनिधि अपने दायित्वों के प्रति सचेत और क्षेत्र के विकास के लिए प्रयत्नशील रहेंगे। राष्ट्र के समग्र विकास की दिशा में यह एक शुभ शुरूवात है। वरना मतदाताओं और प्रतिनिधियों के बीच दूरी और बढ़ती जाएगी। लोकतंत्र सुधार का सबसे अनिवार्य तकाजा मतदाताओं का सशक्तीकरण है।
भारतीय प्रजातंत्र में नोटा की उपयोगिता यही वह स्वप्न है जिसे देखकर अशफाक उल्ला खाँ जैसे शहीद ने कहा था-
"कभी वो दिन भी आएगा
जब अपना राज देखेंगे
जब अपनी ही जमीं होगी
जब अपना आसमाँ होगा।"

डॉ. अनीता देशपांडे, प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष, राजनीति विज्ञान-लोक प्रशासन, उच्च शिक्षा उत्कृष्टता संस्थान, भोपाल के सहयोग से.....

....कविता रावत

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ब्लॉग - चिठ्ठा
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