Monday, July 18, 2016

प्रेम नगर की हसीन वादियों में

बच्चों ने स्कूल की किताब में ताजमहल के बारे में क्या पढ़ा कि इस बार गर्मियों की छुट्टियों में उसे देखने की जिद्द पकड़ ली। गर्मी के तीखे तेवर देखकर घर से बाहर निकलने का मन नहीं कर रहा था, इसलिए आजकल-आजकल करते-करते जब बच्चों की छुट्टियां खत्म होने को आयी तो वे बहुत गुस्सियाने लगे, हड़काने लगे, तो हमने भी सोचा चलो इसी बहाने हम भी ताजमहल के दीदार कर लेंगे, क्योंकि अभी तक हमने भी ताजमहल को स्कूल की किताब और इंटरनेट में ही देखा-पढ़ा था।  आॅफिस से चार दिन की छुट्टी लेकर हम आगरा के साथ ही मथुरा और फिर दिल्ली घूमने का कार्यक्रम निर्धारित कर सबसे पहले आगरा पहुंचे। आगरा पहुंचकर एक होटल में सामान रखकर सुबह-सुबह जब हम ताजमहल पहुंचे तो एक पल तो यकीन नहीं हुआ कि जिस ताजमहल को हमने स्कूल की किताब और इंटरनेट में देखा-पढ़ा और लोगों की जुबानी सुना है, वह सचमुच हमारी आंखों के सामने है। ताजमहल देखना वास्तव में किसी सुनहरे सपने का साकार होने जैसा लगा। 
ताजमहल के आस-पास फोटो खींचते-खांचते, घूमते-घामते कब तीन घंटे बीत गए, इसका तब अहसास हुआ जब बच्चों ने भोजन करने का प्रस्ताव रखा। ताजमहल से बाहर निकलकर वहीं पास के एक होटल में हल्का-फुल्का नाश्ता करने के बाद हम भारत के सबसे महत्वपूर्ण किला देखने पहुंचे। आगरा के लालकिले की भव्यता देखकर यह सहज रूप में समझ आया कि विलासितापूर्ण सुरक्षित जीवन जीने के लिए ही अधिकाशं राजा-महाराजा इस तरह के अभेद किलों का निर्माण कराते रहे होंगे।
आगरा का लालकिला देखने के बाद हमने सीधे होटल की राह पकड़ी और दोपहर में थोड़ा आराम के करने के बाद बस द्वारा योगीश्वर आनन्दकंद भगवान श्रीकृष्ण की जन्मस्थली मथुरा पहुंचे। मथुरा बस अड्डे से एक आॅटो वाले के माध्यम से होटल पहुंचे और वहां सामान रखकर जल्दी से हाथ मुंह धोकर उसी आॅटोरिक्शा से रात्रि आठ बजे के लगभग गोकुलधाम पहुंचे। वहीं ऑटो वाले ने हमें एक पंडित जी मिलवाया जिनसे हमें गोकुल के बारे में बहुत सी बातों की जानकारी मिली। एक ख़ास बात तो उन्होंने हमें बताया कि आज भी गोकुलवासियों की लड़कियां गोकुल से बाहर नहीं ब्याही जाती है, उनका ब्याह गोकुल में ही होता है और इसी तरह वहां की कोई गाय गोकुल से बाहर नहीं भेजी जाती है, सुनकर थोड़ा अचरज हुआ कि आज के समय में भी यह सब कैसे संभव होता होगा। लगभग आधे-पौने घंटे बाद भगवान् श्रीकृष्ण और बलराम जी दर्शन कर हम वापस होटल लौट आये।
मथुरा नगरी को को यूं ही “तीन लोक से मथुरा न्यारी, यामें जन्में कृष्णमुरारी“ नहीं कहा जाता है। यहाँ आसपास भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी के अनगिनत मंदिर है, जिन्हें देखने के लिए एक सप्ताह का समय भी कम है। इसलिए हमने समयाभाव के कारण मुख्य-मुख्य मंदिर देखने का कार्यक्रम निर्धारित किया और सुबह-सुबह श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर दर्शन को निकल पड़े। यह मंदिर भले ही अत्यन्त प्राचीन है लेकिन इसकी सुन्दरता अनुपम है। इसके बाद द्वारकाधीश मंदिर सहित और कई मंदिरों के चलते-चलते दर्शन करते हुए हम सीधे वृन्दावन स्थित वास्तुकला के माध्यम जगद्गुरु कृपालुजी महाराज द्वारा बनवाये गये दिव्य प्रेम को साकार करते प्रेम मंदिर पहुंचे। यहाँ एक ओर जहाँ राधा-कृष्ण की मनोहर झांकियां, गोवर्धन लीला, कालिया नाग दमन लीला, उद्यान में झूलन लीला की झांकियां देखकर मन अभिभूत हुआ वहीं दूसरी ओर मंदिर के भीतरी दीवारों पर राधाकृष्ण और कृपालु महाराज की विविध झांकियों के अंकन के साथ अधिकांश स्तम्भों पर गोपियों की सजीव जान पड़ती मूर्तियां देखकर सुखद अनुभूति हुई। 
प्रेम मंदिर से निकलकर हम गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा के लिए निकले। वृन्दावन स्थित गोवर्धन पर्वत के बारे में बहुत पढ़ा-सुना था, इसलिए इसका करीब से सुखद अनुभव प्राप्ति हेतु मन पुलकिल हो उठा। गोवर्धन पर्वत की 21 किलोमीटर की परिक्रमा बहुत से श्रद्धालु जन  पैदल चलकर पूरी करते हैं, जिसमें बहुत समय लगता है, समयाभाव के कारण भले ही हमने परिक्रमा आॅटोरिक्शा से पूरी की, लेकिन ऐसा करने पर भी मन को असीम शांति मिली।   
रात्रि वृन्दावन से वापस मथुरा लौटकर सुबह-सुबह हमने अपने अगले पड़ाव दिल्ली के लिए बस द्वारा कूच किया। गर्मी की अधिकता और समयभाव के कारण हमने दिल्ली भ्रमण का स्थगित किया। वैसे भी दिल्ली मेरी ससुराल है, जहाँ अक्सर आना-जाना और घूमना-फिरना लगा ही रहता है। इसलिए दिल्ली छोड़ बस में बैठे-ठाले दिल्ली पहुंचने तक ब्रजभूमि की यादों में मन डूबता-उतरता रहा। भले ही भौगोलिक संरचना में यद्यपि ब्रज नाम का कोई प्रदेश या स्थल नहीं है तथापि ब्रज का अपना विशिष्ट अस्तित्व है। इसकी अपनी विशेष संस्कृति है। अपनी भाषा है, अपना अनुपम साहित्य है। इसी आधार पर कदाचित समय-समय पर यहां के रहवासियों की मांग ब्रज प्रदेश के निर्माण हेतु उठाई जाती रही है। प्राचीन ब्रज में 12 वन, 24 उपवन तथा 5 पर्वतों का समावेश बताया गया है। इस विषय में सूरदास जी ने भी- ’चौरासी ब्रज कोस निरंतर खेलत है वन मोहन’ कहते हुए ब्रजधाम का विस्तार चौरासी कोस बताया है। हालांकि ब्रज से संबंधित भूमि तथा संस्कृति का विस्तार मथुरा को केन्द्र मानकर आगरा, ग्वालियर, भरतपुर, अलीगढ़, एटा, गुड़गांव, मेरठ आदि जिलों तक जहां-जहां ब्रजभाषा बोली व समझी जाती है, माना जाता है। यह भी माना जाता है कि महाप्रभु बल्लभाचार्य, श्री चैतन्य महाप्रभु आदि ने संपूर्ण ब्रज चौरासी कोस की यात्राएं की थी। इस तरह ब्रज के गौरव का इतिहास बहुत प्राचीन है।  स्कंद पुराण में भी भगवान श्रीकृष्ण के प्रपौत्र श्री ब्रजनाभ ने महाराज परीक्षत के सहयोग से श्रीकृष्ण लीला स्थलियों का प्राकट्य करने, अनेक मंदिरों, कुण्ड, बावड़ियों आदि का निर्माण कराने का उल्लेख होना बताया जाता है। 
ब्रज के महात्म्य को कहां तक कहा जाय? सभी संप्रदायों के आचार्यों ने ब्रज की महिमा का गुणगान किया है। इसकी समता का कोई अन्य भूखण्ड नहीं है। यहां स्वयं परमात्मा परमेश्वर नर रूप धारण कर “नन्द-नन्दन“ के रूप में निराकार से साकार हो गये हैं। ब्रज को ऐसी ही विचित्र महिमा है कि यहाँ जितने भी स्थान हैं वे प्रायः सभी श्रीकृष्ण की लीला स्थली हैं। इन सभी में भगवदीय पुनीत भाव व्याप्त है। यहां ब्रजराज कहलाए जाने वाले सर्वेश्वर प्रभु को गोप-ग्वालों और गोपिकाओं के साथ मनोहारी अदभुत लीलाएं करते देखकर स्वयं ब्रह्मा जी को भी शंका उत्पन्न हुई थी कि यह कैसा भगवत् अवतार बताया जा रहा है। लेकिन अंत में वे भी हार मानकर कहते हैं- अहो भाग्यम्! अहो भाग्यम्!! नन्दगोप ब्रजो कसाम।“ कहा जाता है इसी ब्रज भूमि पर चरण रखते ही ब्रह्मज्ञानी उद्धव का सब ज्ञान लुप्त हो गया तो उन्हें कहना पड़ा-
“ब्रज समुद्र मथुरा कमल, वृंदावन मकरन्द। 
ब्रज-बनिता से पुष्प हैं, मधुकर गोकुल चन्द।“ 
ब्रज को भुलाना आसान नहीं है,स्वयं ब्रज छोड़कर द्वारिका पहुंचकर द्वारिकाधीश बनने वाले भगवान श्रीकृष्ण ब्रज से आए अपने मित्र उद्धव से कुशलक्षेम पूछते समय भावविभोर होकर अश्रु ढुलकाते कहते हैं-
’उधौ मोहि ब्रज बिसरत नाहीं, 
वृंदावन गोकुल की स्मृति, सघन तृनन की छाही। 
हंस सुता की सुन्दर कगरी अरु कुंजन की छाही, 
वे सुरभि वे बच्छ दोहिनी खरिक दुहावन जाही। 
ग्वाल बाल सब करत कुलाहल 
नाचत गहि गहि बाही, 
जबही सुरति आवति वा सुख की 
जिय में उमगत तन माही।“ 


Tuesday, July 12, 2016

अच्छाई और सद्‌गुण इंसान की असली दौलत होती है

अच्छाई सीखने का मतलब बुराई को भूल जाना होता है।
प्रत्येक सद्‌गुण किन्हीं दो अवगुणों के मध्य पाया जाता है।।

बहुत बेशर्म बुराई को भी देर तक अपना चेहरा छुपाने में शर्म आती है।
जिस बुराई को छिपाकर नहीं रखा जाता वह कम खतरनाक होती है।।

धन-सम्पदा, घर और सद्‌गुण मनुष्य की शोभा बढ़ाता है।
सद्‌गुण प्राप्ति का कोई बना-बनाया रास्ता नहीं होता है।।

बड़ी-बड़ी योग्यताएँ बड़े-बड़े सद्‌गुण मनुष्य की शोभा बढ़ाता है।
बुराई बदसूरत है वह मुखौटे से अपना चेहरा ढककर रखता है।।

नेक इंसान नेकी कर उसका ढोल नहीं पीटता है।
अवगुण की उपस्थिति में सद्‌गुण निखर उठता है।।

कोई बुराई अपनी सीमा के भीतर नहीं रह पाती है।
अच्छाई और सद्‌गुण इंसान की असली दौलत होती है।।




Tuesday, June 21, 2016

वर्तमान परिदृश्य में योग की आवश्यकता

आज के भौतिकवादी युग में एक ओर जहां हम विज्ञान द्वारा विकास की दृष्टि से उन्नति के शिखर पर पहुंच रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आध्यात्मिक रूप से हमारा पतन परिलक्षित हो रहा है। आज  मनुष्य के खान-पान, आचार-व्यवहार सभी में परिवर्तन होने से उसका स्वास्थ्य दिन -ब-दिन गिरता जा रहा है। यही कारण है कि आज हमें ऋषि-मुनियों की शिक्षा को जानने के लिए, उनके द्वारा बनाये उत्तम स्वास्थ्य के रास्ते पर चलने के लिए योग की परम आवश्यकता है, जिससे हम “बहुजन हिताय बहुजन सुखाय“ की सुखद कल्पना को साकार कर सकें।    
         प्राचीनकाल में योगी समाज से बहुत दूर पर्वतों और जंगलों की गुफा-कंदराओं के एकांत में तपस्या किया करते थे। वे प्रकृति पर आश्रित सादा व सरल जीवन व्यतीत किया करते थे। जीव-जन्तु ही उनके महान शिक्षक थे, क्योंकि जीव-जन्तु सांसारिक समस्याओं और रोगों से मुक्त जीवन व्यतीत करते हैं। प्रकृति उनकी सहायक है। योगी, ऋषि और मुनियों ने पशु-पक्षियों की गतिविधियों पर बड़े ध्यान से विचार कर उनका अनुकरण किया। इस प्रकार वन के जीव-जन्तुओं के अध्ययन से योग की अनेक विधियों का विकास हुआ। इसीलिए अधिकांश योगासनों के नाम जीव-जन्तुओं के नाम पर आधारित हैं। 
           कहा जाता है कि जब योग का प्रचार दुनिया में शुरू हुआ तो इसका पहला प्रचार पश्चिमी देशों में उन लोगों में हुआ जो लोग वैज्ञानिक और ईसाई धर्म को मानने वाले थे। शुरूआत में जब भारत में रहकर ये लोग विदेश वापस गए तो अपने साथ आसन, प्राणायाम लेकर गए। प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जब ये लोग कैदी हो जाते थे तब इनकी कैदखाने में हालत खस्ता रहती थी। भोजन, पानी, दूषित हवा के कारण किसी को कोलाइटिस, किसी को पेचिश तो किसी को खड़े-खड़े सोने के कारण पीठ की हड्डी में दर्द हो जाया करता था। जब उन्हें वहाँ डाॅक्टरी इलाज से फायदा नहीं मिलता था तो वे उन कैदियों के शरण में जाते थे जो योग जानते थे।  ऐसे में योग के जानकार अपने साथ ही अन्य कैदियों को भी शीर्षासन, सूर्य नमस्कार और उड्डियान बंध अादि द्वारा स्वस्थ रखने का काम करते थे।   कहा जाता है कि दूसरे महायुद्ध में कई लोग ऐसे थे, जिन्होंने जेल खाने में बंदी कैम्पों में योग द्वारा अपने शरीर को सुधारा। इनमें एक डाॅक्टर पोल्डर मैन हाॅलैंड के रहने वाले और दूसरी अॉस्ट्रेलिया की एक महिला रोमाब्लेयर भी थी। यह महिला 15 महीने से अधिक युद्ध बंदियों के बीच रही, जब उसको वहां पीलिया हुअा, तब उसने वहां एक अफ्रीकन व्यक्ति से कुछ आसनों को सीखा और उनका अभ्यास करने से रोगमुक्त  हुई। इस प्रकार अनेक लोगों ने योगाभ्यास द्वारा स्वास्थ्य लाभ प्राप्त किया।
          ऐसे ही अनेक लोगों के द्वारा जब योग का पता चला तो पश्चिम के लोग चौकें और उन्होंने इस पर अनुसंधान करना शुरू किया। सबसे पहला अनुसंधान बंगाल के प्रख्यात डाॅक्टर दास ने फ्रांस में किया। वे वहां अस्थि रोग विशेषज्ञ थे। उन्होंने लोगों को अनुसंधान करके बताया कि योग की क्रिया करने से उसका असर न केवल मांसपेशियों पर, बल्कि इसका असर हड्डियों पर भी पड़ता है। इसका सीधा अर्थ हुआ कि योग में आसन केवल शारीरिक व्यायाम भर नहीं है।  आज विज्ञान ने मनुष्य को व्यावहारिक जीवन में अनेक तरह की सुख-सुविधाएं प्रदान की हैं, जिससे आज मनुष्य सुविधा भोगी होने से निष्क्रिय और आलसी बनता जा रहा है।  परिणामस्वरूप मनुष्य की जीवन-शैली अप्राकृतिक होने से वह प्रकृति से बहुत दूर चला गया है। इस कारण वह अनेक तरह के कष्टों, दुःखों, कठिनाईयों से घिरता जा रहा है। इन शारीरिक व्याधियों  के अलावा वह मानसिक और आत्मिक रूप से भी रूग्ण होता जा रहा है। उसे शांति नहीं है। अत्यन्त अशांति एवं तनाव में रहने के कारण वह मानसिक रूप से कमजोर होता जा रहा है। कमोवेश यह स्थिति युवाओं और वृद्धों की ही नहीं बल्कि बच्चों की भी है। बच्चों के ऊपर टेलीविजन और कम्प्यूटर, मोबाईल आदि इलेक्ट्राॅनिक उपकरणों का जबरदस्त प्रभाव है। इस कारण मुख्य रूप से उनकी दृष्टि प्रभावित होने से अनेक तरह के आंखों की व्याधियों से बच्चे ग्रस्त हो जा रहे हैं। 
          मनुष्य कितना ही महत्वाकांक्षी क्यों न हो मगर स्वस्थ मन व शरीर के अभाव में कुछ भी नहीं कर सकता। चाहे खेल का मैदान हो या नौकरी में तरक्की, कुछ कर दिखाने के लिए स्वस्थ रहना पहली प्राथमिकता है। सिद्ध योगियों ने इसका अनुभव किया और आसनों के महत्व पर प्रकाश डाला। पूर्व के मानव मस्तिष्क तथा आधुनिक मानव मस्तिष्क में भले ही थोड़ा-बहुत अंतर क्यों न हो, लेकिन आसन आज भी उतने ही उपयोगी हैं जितने हजारों वर्ष पूर्व, उनके जानने वालों के लिए थे। आज इसकी जागृति हो रही है, क्योंकि थोड़े ही समय में आधुनिक मस्तिष्क भी अपने आधुनिक उपकरणों के प्रयोग को असफल होते देख रहे हैं, जिससे वे योग को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए उचित माध्यम मानने लगे हैं। 
           योग का मुख्य लक्ष्य हमें परम चेतना मार्ग पर ले जाना है, जिससे हमेें अपने अस्तिस्व का ज्ञान हो सके। यदि शरीर रोग ग्रस्त है तो हमें परम चेतना की ओर जाने की इच्छा भी नहीं होगी, क्योंकि शरीर रोग होने से मन पर असर पड़ता है। शरीर में खुजली-दर्द हो तो बेचैन शरीर से बेचैन मन पकड़ में नहीं आता। इसलिए योग द्वारा शरीर को रोग मुक्त करना अत्यन्त आवश्यक है। भारत में योग दर्शन के द्वारा शारीरिक और मानसिक रोगों का निदान बताया गया है। इसमें शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए योग दर्शन को अपनाने पर बहुत बल दिया गया है। योग दर्शन दैहिक, मानसिक और आत्मिक दुःखों को दूर कर मनुष्य को अरोग्यता प्रदान करता है। सच्चे अर्थ में योगशास्त्र को देह, मन तथा आत्मा का चिकित्सा शास्त्र कहा जाना अधिक उपयुक्त होगा, क्योंकि इसके माध्यम से व्यक्ति अपने समस्त दुःखों पर विजय पा सकता है।
          प्रायः देखा गया है कि बहुत हिम्मत वाले व्यक्ति भी रोगग्रस्त होने पर हिम्मत हार जाते हैं, क्योंकि शारीरिक स्वास्थ्य की गिरावट से मन कमजोर हो जाता है, लेकिन वही व्यक्ति स्वास्थ्य प्राप्त करने पर पुनः मजबूत बन जाता है।  योग शरीर को चुस्त, स्वस्थ रखने का सबसे आसान माध्यम है। शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक संस्कृति के रूप में योगासनों का इतिहास समय की अनंत गहराईयों में छिपा है। मानव जाति के प्राचीनतम साहित्य वेदों में इनका उल्लेख मिलता है। वेद आध्यात्मिक ज्ञान के भंडार हैं। उनके रचयिता अपने समय के महान आध्यात्मिक व्यक्ति थे। कुछ लोगों का ऐसा भी विश्वास है कि योग विज्ञान वेदों से भी प्राचीन हैं।
         आधुनिक युग में योग सारे संसार में जिस तीव्र गति से फैल रहा है वह प्रशंसनीय व स्वागत योग्य है। योग का ज्ञान हर एक की संपत्ति बनता जा रहा है। आज डाॅक्टर और वैज्ञानिक भी योग के माध्यम से स्वस्थ रहने की सलाह दे रहे हैं। यही कारण है कि भारत ही नहीं, अपितु दुनिया भर के लोग यह अनुभव कर रहे हैं कि स्वस्थ जीवन और निरोग रहने के लिए योग सर्वोत्तम माध्यम है।

Monday, June 13, 2016

गाँव में शादी-ब्याह की रंगत

दो चार दिन ही सही लेकिन जब भी शहर की दौड़-भाग भरी जिन्दगी से दूर पहाड़ी हरे-भरे पेड़-पौधों, गाँव की टेढ़ी-मेढ़ी बलखाती पगडंडियों, खेत-खलियानों, मिट्टी-पत्थरों से बने घरों के बीच गाँव की सरल, सौम्य मिलनसार लोगों से मिलती हूँ तो मन खुशी से झूम तरोताजगी से भर उठता है।
गर्मियों में जब बच्चों की स्कूल की छुट्टियाँ होती हैं, तब मेरी तरह ही भले ही दो-चार दिन के लिए ही सही लेकिन हर प्रवासी की प्राथमिकता मेरे पहाड़ के गाँव ही होते हैं। गर्मियों में पहाड़ के गाँव बहुत याद आते हैं। हम प्रवासी पंछियों को शहर में आग उगलते सूरज से घबराकर पहाड़ों की गोद में बड़ा सुकून मिलता है। शहरी भीड़-भाड़ से उकताया मन पहाड़ का नाम सुनते ही शांति और ठण्डक से भर उठता है।
पहाड़ों के नैसर्गिक सौन्दर्य का अनुभव किसी के सुनाने-सुनने से नहीं अपितु वास्तविक आनन्द तो वहाँ पहुंचने पर ही मिलता है। पहाड़ों की बात निकले और उसमें हमारे उत्तराखंड का जिक्र न हो, ऐसे कैसे हो सकता है। यहाँ जब भी कोई सैलानी आता है, उसे यहाँ के मंदिर, मठ, साधु-संतों से ही नहीं अपितु सदियों से किसी संत की तरह तपस्या में लीन पहाड़ों को देखकर इसके देवभूमि कहे जाने का आशय स्वयं ही समझ में आ जाता है।      
अभी हाल ही में अपने एक रिश्तेदार की लड़की के विवाह समारोह में सम्मिलित होकर गाँव की कई खट्टी-मीठी यादें लेकर लौटी हूँ। प्रायः गर्मियों के दिनों में मेरी तरह ही जब अधिकांश प्रवासी गर्मी से राहत पाने, अपने घर-द्वार की सुध लेने, शादी-ब्याह या पूजन आदि समारोह में सम्मिलित होने के लिए गांव की ओर कूच करते हैं, तो हम प्रवासियों की तरह उजाड़ होते गाँवों की रौनक लौट आती है। शहर में घर-दफ्तर की चार-दीवारी से बाहर जब भी गाँव की खुली हवा में एक अलग दुनिया देखने, नाच-गाने, हंसी-मजाक एवं मेलमिलाप कर मौज-मस्ती का सुनहरा अवसर मिलता है, तो इसके लिए मैं बहुत ज्यादा सोच-विचार न करते हुए अपने पहाड़ के गाँव की ओर निकल पड़ती हूँ।           
गर्मियों के दिनों में गांव में शादी-ब्याह की खूब चहल-पहल रहती है। कई लोग तो बकायदा शहर से गाँव शादी करने जाते हैं। वे बखूबी जानते हैं कि गाँव में शादी कराने के फायदे ही फायदे  हैं। एक तो शादी-ब्याह का खर्चा भी कम होता है ऊपर से नाते-रिश्तेदारों से मिलने-जुलने के साथ ही शहर की गर्मी से कुछ दिन दूर पहाड़ की ठंडी-ठंडी हवा-पानी और अपनी जड़ों से मिलने का सुनहरा अवसर भी हाथ लग जाता है। इसके अलावा शादी में दिखावा से दूर अपनों का छोटी-छोटी खुशियों में घुल-मिल जाने का हुनर मन को बड़ा सुकून पहुंचाता है। यही बात  है कि मुझे आज भी शहर की चकाचौंध भरी शादी-समारोह के बजाय गांव की सादगी भरी शादियाँ बहुत भली लगती हैं। गांव की शादी में सबके चेहरे पर जो रौनक देखने को मिलती है, वह शहर की चकाचौंध भरी शादी-समारोह के ताम-झाम से हैरान-परेशान लोगों के चेहरों पर कहीं नज़र नहीं आती है।

हम शहर की बारात में कुछ देर के लिए भले ही बम-फटाखों और कनफोडू डीजे की धक-धक पर एक-दूसरे को देख-देख कितना भी उछल-कूद कर लें, लेकिन जो बात गांव की बारात में देखने को मिलती है, वह शहर से कोसों दूर हैं। गाँव की बारात में जब  ढोल-दमाऊ और बैंड-बाजे के साथ पहाड़ी धुन पर गाने बजते हैं तो फिर जो सुरीली झंकार घर-आंगन से लेकर सुदूर घाटियों तक गूंज उठती है, वह और कहीं सुनने-देखने को नहीं मिल पाती है। 
गाँव की एक झलक भर देखने से बचपन के दिनों की ढेर सारी यादें एक-एक कर ताजी हो उठती हैं।  बचपन में जब कभी किसी की शादी-ब्याह का न्यौता मिलता तो मन खुशी के मारे उछल पड़ता, लगता जैसे कोई शाही भोज का न्यौता दे गया हो। तब आज की तरह रंग-बिरंगे शादी के कार्ड बांटने का चलन नहीं था।
मौखिक रूप से ही घर-घर जाकर बड़े विनम्र आग्रह से न्यौता दिया जाता था। जैसे ही घर को न्यौता मिलता बाल मन में खुशी के मारे हिलोरें उठने लगती। नए-नए कपड़े पहनने को मिलेंगे, खूब नाच-गाना होगा और साथ ही अच्छा खाने-पीने को भी मिलेगा। यही सब ख्याल मन में उमड़ते-घुमड़ते। किसकी-किससे शादी होगी, कहाँ होगी, उसमें कौन बराती, कौन घराती होगा, सिर्फ खाना-पीना, नाचना-गाना ही चलेगा या कुछ लेना-देना भी पड़ेगा, किससे कैसा बात-व्यवहार निभाना पड़ेगा, इन तमाम बातों से कोसों दूर हम बच्चों को तो केवल अपनी मस्ती और धूम-धमाल मचाने से मतलब रहता। उस समय शादी में बैण्ड बाजे की जगह ढोल-दमाऊ, मुसक बाजा, रणसिंघा (तुरी) और नगाड़े की ताल व स्वरों पर सरांव (ऐसे 2 या 4 नर्तक जो एक हाथ में ढ़ाल और दूसरे में तलवार लिए विभिन्न मुद्राओं में मनमोहक नृत्य पेश करते हैं) बारात के आगे-आगे नृत्य करते हुए गांव के चौपाल तक जब पहुंचते थे तब वहां नृत्य का जो समा बंध जाता था, उसे देखने आस-पास के गांव वाले भी सब काम धाम छोड़ सरपट दौड़े चले आते थे।
हम बच्चे तो घंटों तक उनके समानांतर अपनी धमा-चौकड़ी मचाते हुए अपनी मस्ती में  डूबे नाचते-गाते रहते। घराती और बारातियों को खाने-पीने से ज्यादा शौक नाच-गाने का रहता। उन्हें खाने की चिन्ता हो न हो लेकिन हम बच्चों के पेट में तो जल्दी ही उछल-कूद मचाने से चूहे कूदने लगते, इसलिए जैसे ही खाने की पुकार होती हम फ़ौरन अपनी-अपनी पत्तल संभाल कर पंगत में बैठ जाते और बेसब्री से अपनी बारी का इंतजार करने लगते। पत्तल में गरमा-गरम दाल-भात परोसते ही हम उस पर भूखे बाघ के तरह टूट पड़ते। तब हंसी-मजाक और अपनेपन से परोसे जाने वाला वह दाल-भात आज की धक्का-मुक्की के बीच छप्पन प्रकार के व्यंजनों से कहीं ज्यादा स्वादिष्ट लगता था। 
......कविता रावत

Wednesday, June 8, 2016

जन्मदिन की खुशियाँ

आमतौर पर बच्चे रात को 10:30 बजे तक सो जाया करते हैं।  लेकिन कल वे 12 बजे तक खेलते रहे, नींद उनसे कोसों दूर थी।  मैंने सोने को कहा तो कहने लगे नींद नहीं आ रही हैं, जब आएगी सो जायेंगे। मैंने भी सोचा दिल्ली से उनकी बुआ और भतीजा आये हुए हैं, इसलिए मस्ती कर रहे हैं।  यही सोचकर मैं चुपचाप अपने कमरे में बैठकर टीवी देख रही थी कि ठीक 12 बजे सभी दूसरे कमरे से निकलकर मेरे कमरे में घुसते ही एक साथ जोर-जोर से "हैप्पी बर्थडे टु यू " चिल्लाए तो मैं अचानक चौंक पड़ी।  सबने आकर मेरे आगे केक और खुद का बनाया ग्रीटिंग कार्ड रख दिया, तो माजरा समझ में आया। 
मेरे ऑफिस जाने का बाद बच्चों ने इस तरह बुआ  के साथ मिलकर मुझे सरप्राइज़ देने का प्लान बनाया था। यह मुझे तभी मालूम हुआ। अपने जन्मदिन पर केक और बच्चों के हाथ से बना ग्रीटिंग पाकर मुझे बहुत ख़ुशी हुई।  सोचती हूँ इस तरह के अपनेपन से भरे क्षण पाकर मेरी तरह ही सबको भी ख़ुशी मिलती होगी, है न   ....................  






















Saturday, June 4, 2016

बचाना होगा हिमालय को

हिमालय एक पूरी पर्वत श्रंखला है। यह श्रृंखला पूर्व से पश्चिम तक 2500 किमी क्षेत्र में फैली हुई है, जिसका आच्छादन लगभग 5 लाख 95 हजार कि.मी. क्षेत्र है। हिमालय भारत के उत्तर पूर्वी क्षेत्र में विस्तार लिये हुए है। यह पर्वत श्रृंखला भारतीय उपमहाद्वीप और तिब्बत को अलग करती है। हिमालय पांच देशों भारत, भूटान, नेपाल, चीन और पाकिस्तान से सटा हुआ है। यद्यपि हिमालय के अधिकांश हिस्सों पर भारत भूटान और नेपाल का प्रभुत्व है, तथापि चीन और पाकिस्तान इसके कुछ हिस्सों पर शासन करते है।
           हिमालय पर्वत श्रृंखला का निर्माण आज से लगभग सात करोड़ साल पहले इण्डियन टेक्टोनिक प्लेट और यूरेशियन टेक्टोनिक के टकराने से हुआ था। वैज्ञानिकों के अनुसार यह दोनों प्लेट्स अभी भी घूम कर रहीं है। यही कारण है कि हिमालय क्षेत्र के पहाडों की ऊंचाई बढ़ रही है। दिलचस्प बांत यह है कि हिमालय इतना पुराना होने के बाद भी अन्य पर्वत श्रंखलाओं की तुलना में युवा है। 
वैज्ञानिकों के मुताबिक हिमालय पर्वत जियोलाॅजिकली लिविंग है। इसका दक्षिणी भाग हर साल लगभग 20 मिलीमीटर आगे बढ जाता है। एक अनुमान लगाया गया है कि एक करोड़ साल में हिमालय एशिया में 1500 किमी तक आगे खिसक आयेगा। 
सोचो अगर हिमालय नहीं होता
         हिमालय भारत के लिये यह कितना महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा इस एक तथ्य से लगाया जा सकता है कि अगर यह नहीं होता तो आज पूरा क्षेत्र मौसमी कहर से नहीं बच पाता। यह मध्य एशिया से आने वाली ठण्डी हवाओं को रोक देता है, जिससे भारत कड़ाके की ठण्ड से बचा रहता है। हिमालय मानसूनी हवाओं को भी रोकता है, जिसके कारण पूरे क्षेत्र में तमाम हिस्सों में बारिश होती है। इसकी ऊंचाई और मानसूनी हवाओं के रास्ते में स्थित होने के कारण ऐसा होता है। 
         हिमालय भारत के लिये लम्बे समय से उत्तर का प्रहरी रहा है। यह हमारे देश के लिये एक प्रकार की नैचुरल बाउन्ड्री है। हिमालय के दर्रे काफी ऊंचे हैं और ठण्ड के मौसम में तो पूरी तरह बर्फ से ढके रहते हैं। इतिहास में कभी कोई आर्मी इसे पार नहीं कर सकी है। यह ट्रान्सपोर्ट और कम्यूनिकेशन के लिये भी एक अच्छा बैरियर है।        
गंगा, यमूना, ब्रह्मपुत्र समेत कई विशालकाय नदियों के लिये हिमालय पानी के विशाल भण्डार के रूप में कार्य करता है। देश की लगभग सभी बड़ी और बारहमासी नदियां हिमालय के पहाड़ों या ग्लेशियर से उत्पन्न होती है। हिमालय की नदियां उत्तर भारत के लिये जीवन रेखा जैसी है। यह भारी बारिश, बर्फ और ग्लेशियर के कारण गर्मियों में भी नदियां सदाबहार बनीं रहती है। 
        हिमालय से उत्पन्न होने वाली नदियां अपने साथ पहाड़ों पर से उपजाऊ मिट्टी मैदानों तक लाती है। एक अनुमान के अनुसार गंगा प्रतिदिन अपने साथ 19 लाख टन गाद और सिंधु नदी अपने साथ 10 लाख टन गाद लाती है। यही कारण है कि उत्तर भारत के मैदान हिमालयांे का तोहफा कहा जाता है। इसके अलावा इस क्षेत्र में कई प्रकार के बहुमूल्य खनिज भी पाये जाते है। 
        हिमालय की गहरी घाटी बांधों के निर्माण के लिये सबसे बढि़या जगह है। यहां पर कई जगह ऐसे प्राकृतिक झरने है जिसके कारण हाइड्रोइलेक्ट्रीसिटी जनरेशन में और आसानी होती है। यद्यपि बांधों को लेकर हाल के वर्षाें में विवाद भी हुआ है। इतना ही नहीं यहां पर कई तरह की मूल्यवान जड़ी बूटियां और काष्ठ सम्पदा पाई जाती है। यहां वनस्पतियों की ऐसी कई प्रजातियां पाई जाती हैं, जो दुनियां के किसी कोने में नहीं पाई जाती है। 
क्या-क्या समाया है हिमालय में 
नदियाँ -हिमालय में 19 मुख्य नदियां है। इनमें सिंधु और ब्रह्मपुत्र सबसे बड़ी है। इन दोनों ही नदियांे का कैचमैंट बैसिन 2,60,000 वर्ग किमी का है। अन्य नदियों में पांच नदी झेलम, चेनाब, रावी, व्यास और सतलज सिंधु सिस्टम की हैं। गंगा सिस्टम की नदियों में गंगा यमुना, रामगंगा, काली, करनाली, राप्ती, बाघमती और कोसी है। 
पहाड़ -  हिमालय में 100 से भी ज्यादा पहाड़ 7200 मीटर से भी उंचे है। इसमें माउंट एवरेस्ट भी शामिल है। जो दुनिया का सबसे उंचा पहाड़ हैं। इतना ही नहीं हिमालय आज लाखों लोगों का घर है और जीव जन्तुओं की सैकडों युनिक प्रजातियां यहां रहती हैं। पूर्वी हिमालय में अकेले 10 हजार किस्म के पौधंे, 750 प्रकार की चिडियां और 300 प्रजातियों के प्राणी रहते हंै। 
ग्लेशियर्स - अंटार्कटिका और आर्कटिक के बाद हिमालय दुनिया का तीसरा सबसे अधिक बर्फ वाला स्थान है। पूरे हिमालय में लगभग 15 हजार ग्लेशियर्स हैं। इन ग्लेशियर्स में सियाचिन ग्लेशियर्स सबसे प्रमुख है। करीब 70 किमी लंबा यह ग्लेशियर नाॅन पोलर एशिया का सबसे लंबा ग्लेशियर है। इसके अलावा बाल्टारोे, बिआफों, नुब्रा और हिसपुर अन्य मुख्य ग्लेशियर है। 
मिट्टी - हिमालय के नाॅर्थ फेसिंग स्लोप्स (उत्तर मुखी ढलानों) पर मिट्टी की मोटी परत है। यह मिट्टी कम ऊंचाईयों पर घने जंगलों तथा अधिक ऊंचाईयों पर घास का पोषण करती है। जंगल की मिट्टी गहरे भूरे रंग की तथा इसकी बनावट चिकनी दोमट है। 

        हम कई दशकों से हिमालय का लगातार दोहन करते आ रहे हैं। हमने नदियों से बिजली बनाने, वनों से लकड़ी लेने और पहाडों से खनन करने की होड़ में इसका प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ना शुरू कर दिया है। हिमालय के एक हिस्सेे से छेड़छाड़ का असर दूसरे हिस्से पर भी पड़ता है। जुलाई 2012 में नेचर क्लाइमेंट चंेज में छपी स्टडी में कहा था कि हिमालय के ग्लेशियर तेजी से कम हो रहे हैैं। इसी तरह हाल ही में आई अन्य स्टडी में दावा किया गया है कि हिमालय में बढ़ती गर्मी के कारण यहां सैकडों की तादाद में झीलें बन गई है, जो कभी भी घातक हो सकती हैं। 

Monday, May 30, 2016

तम्बाकू ऐसी मोहिनी जिसके लम्बे-चौड़े पात

कभी गांव में जब रामलीला होती और उसमें राम वनवास प्रसंग के दौरान केवट और उसके साथी रात में नदी के किनारे ठंड से ठिठुरते हुए आपस में हुक्का गुड़गुड़ाकर बारी-बारी से एक-एक करके-
“ तम्बाकू नहीं हमारे पास भैया कैसे कटेगी रात, 
भैया कैसे कटेगी रात, भैया............ 
तम्बाकू ऐसी मोहिनी जिसके लम्बे-चौड़े पात, 
भैया जिसके लम्बे चौड़े पात....
भैया कैसे कटेगी रात। 
हुक्का करे गुड़-गुड़ चिलम करे चतुराई, 
भैया चिलम करे चतुराई, 
तम्बाकू ऐसा चाहिए भैया 
जिससे रात कट जाई, 
भैया जिससे रात कट जाई" 
सुनाते तो हम बच्चों को बड़ा आनंद आता और हम भी उनके साथ-साथ गुनागुनाते हुए किसी सबक की तरह याद कर लेते। जब कभी हमें शरारत सूझती तो किसी के घर से हुक्का-चिलम उठाकर ले आते और बड़े जोर-जोर से चिल्ला-चिल्ला कर बारी-बारी गाना सुनाया करते। हम बखूबी जानते कि गांव में तम्बाकू और बीड़ी पीना आम बात है और कोई रोकने-टोकने वाला नहीं है। इसलिए हम तब तक हुक्का-चिलम लेकर एक खिलाने की तरह उससे खेलते रहते, जब तक कि कोई बड़ा-सयाना आकर हमसे हुक्का-चिलम छीनकर, डांट-डपटकर वहाँ से भगा नहीं लेता।  डांट-डपट से भी हम बच्चों की शरारत यहीं खत्म नहीं हो जाती। कभी हम सभी अलग-अलग घरों में दबे पांव, लुक-छिपकर घुसते हुए वहाँ पड़ी बीड़ी के छोटे-छोटे अधजले टुकड़े बटोर ले आते और फिर उन्हें एक-एक कर जोड़ते हुए एक लम्बी बीड़ी तैयार कर लेते, फिर उसे माचिस से जलाकर बड़े-सयानों की नकल करते हुए बारी-बारी से कस मारने लगे। यदि कोई बच्चा धुंए से परेशान होकर खूं-खूं कर खांसने लगता तो उसे पारी से बाहर कर देते, वह बेचारा मुंह फुलाकर चुपचाप बैठकर करतब देखता रहता। हमारे लिए यह एक सुलभ खेल था, जिसमें हमें  बारी-बारी से अपनी कला प्रदर्शन का सुनहरा अवसर मिलता। कोई नाक से, कोई आंख से तो कोई आकाश में बादलों के छल्ले बनाकर धुएं-धुएं का खेल खेलकर खुश हो लेते।  
          हमारे देश में आज भी हम बच्चों की तरह ही बहुत से बच्चे इसी तरह बचपन में बीड़ी, हुक्का-चिलम का खेल खेलते हुए बड़े तो हो जाते हैं, लेकिन वे इस मासूम खेल से अपने को दूर नहीं कर पाते हैं। आज गांव और शहर दोनों जगह नशे का कारोबार खूब फल-फूल रहा है। गाँव में भले ही आज हुक्का-चिलम का प्रचलन लगभग खत्म होने की कगार पर है, लेकिन शहरों में बकायदा इसके संरक्षण की तैयारी जोर-शोर से चल रही है, जिसके लिए हुक्का लाउंज खुल गए हैं, जहाँ हमारे नौनिहाल खुलेआम धुआँ-धुएं का खेल खेलकर धुआँ हुए जा रहे हैं। गांव में पहले जहांँ सिर्फ बीड़ी और हुक्का-चिलम पीने वाले हुआ करते थे, वहीं आज वे शहरी रंग में रंगकर गुटखा, सुपारी, पान-मसाला, खैनी, मिश्री, गुल, बज्जर, क्रीमदार तम्बाकू पाउडर, और तम्बाकू युक्त पानी खा-पीकर मस्त हुए जा रहे हैं।
हर वर्ष विश्व तम्बाकू निषेध दिवस आकर गुजर जाता है। इस दौरान विभिन्न  संस्थाएं कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को तम्बाकू से होने वाली तमाम बीमारियों के बारे में समझाईश देते है, जिसे कुछ लोग उस समय गंभीर होकर छोड़ने की कसमें खा भी लेते है, लेकिन कुछ लोग हर फिक्र को धुंए में उड़ाने की बात कहकर उल्टा ज्ञान बघार कर- “कुछ नहीं होता है भैया, हम तो वर्षों से खाते आ रहे हैं, एक दिन तो सबको ही मरना ही है, अब चाहे ऐसे मरे या वैसे, क्या फर्क पड़ता है“  हवा निकाल देते हैं। कुछ ज्ञानी-ध्यानी ज्यादा पढ़े-लिखे लोग तो दो कदम आगे बढ़कर “सकल पदारथ एही जग माही, कर्महीन नर पावत नाही“ कहते हुए खाने-पीने वालों को श्रेष्ठ और इन चीजों से दूर रहने वालो को कर्महीन नर घोषित करने में पीछे नहीं रहते। उनका मानना है कि-
बीडी-सिगरेट, दारू, गुटका-पान 
आज इससे बढ़ता मान-सम्मान 
 दाल-रोटी की चिंता बाद में करना भैया 
 पहले रखना इनका पूरा ध्यान! 
मल-मल कर गुटका मुंह में डालकर 
 हुए हम चिंता मुक्त हाथ झाड़कर 
 जब सर्वसुलभ वस्तु अनमोल बनी यह 
 फिर क्यों छोड़े? क्या घर, क्या दफ्तर!        
          एक दिन विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर ही नहीं बल्कि इस बुरी लत को जड़मूल से नष्ट करने के अभियान में सबको हर दिन अपने आस पड़ोस, घर-दफ्तर और गांव-शहर से दूर भगाने के लिए संकल्पित होना होगा और ईश्वर ने हमें जो निःशुल्क उपहार दिए हैं- स्वस्थ शरीर, पौष्टिक भोजन, स्वच्छ हवा, निर्मल जल, उर्वरा शक्ति संपन्न भूमि व विविध वनस्पतियां, जीव-जन्तु व मानसिक बौद्धिक क्षमता जिनसे हमें  निरन्तर आगे बढ़ने को प्रेरणा मिलती हैं, उसे सुरक्षित, संरक्षित कर अपनाना होगा।
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धूम्रपान से होने वाले कुछ प्रमुख रोगों के बारे में जानिए 
और आज ही छोड़ने का संकल्प कीजिये  
  • कैंसर:  तम्बाकू के  धुएं से उपस्थित बेंजपाएरीन कैंसर जनित रोग होता है। लगभग 95 प्रतिशत फेफड़ों के कैंसर के मरीज धूम्रपान के कारण होते हैं। विपरीत धूम्रपान मुख कैंसर का कारण होता है। विपरीत धूम्रपान में सिगार का जलता हुआ सिरा मुख में रखा जाता है। विपरीत धूम्रपान आंध्रप्रदेश के गांवों में सामान्य होता है। बीड़ी के धूम्रपान के कारण जीभ, फैरिंग्स (गला), लैरिंग्स, टांन्सिल एवं ग्रासनली के कैंसर हो जाता है। होंठ कैंसर सिगार एवं पाइप के द्वारा होता है। तम्बाकू चबाने से मुख कैंसर होता हैं
  • टी.बी. (तपेदिक):  धूम्रपान से हमारे भारत में सबसे ज्यादा टीबी या तपेदिक के रोगी मिलते हैं। तपेदिक के जीवाणु संक्रमति व्यक्ति से स्वस्थ व्यक्ति में फैल सकते हैं।
  • खांसी एवं ब्रोंकाइटिस : तम्बाकू के धूम्रपान से फैरिंग्स और ब्रोंकाई की म्यूकस झिल्ली उत्तेजित होने के कारण खांसी एवं ब्रोंकाइटिस हो जाता है।
  • हृदय संवहनी रोग : तम्बाकू के धूम्रपान के कारण एड्रीनील का स्त्रावण बढ़ जाता है जिससे धमनियों के संकुचन द्वारा रक्त दाब, हृदय स्पंदन की दर में वृद्धि हो जाती है। उच्च रक्त दाब हृदय संबंधी रोगों की संभावनाओं को बढ़ाता है। निकोटीन हृदय के द्विपट कपाट को नष्ट करता हैं
  • एम्फाइसिमा- तम्बाकू का धुआं फेफड़ों की एल्वियोलाई की भित्ति तोड़ सकता है। गैसीय विनिमय के लिए सतही क्षेत्रफल को कम कर देता है, जिससे एम्फाइसिमा हो जाता है।
  • प्रतिरक्षा तंत्र पर प्रभाव :  यह प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर करता है।
  • आॅक्सीजन वहन क्षमता में कमी :  तम्बाकू के धुंए की कार्बनमोनोआॅक्साइड शीघ्रता से आरबीसी की होमोग्लोबिन को बांधती है एवं सह विषाक्तता का कारण होती है, जो हीमोग्लोबिन की आॅक्सीजन वहन क्षमता को कम करता है

...कविता रावत 




        
     

Friday, May 13, 2016

उज्जयिनी का सिंहस्थ कुम्भ महापर्व

कुंभ का शाब्दिक अर्थ 'कलश' है। प्रारंभ से ही प्रत्येक शुभ कार्य में कलश पूजन का अपना अलग महत्व होता है। 'कलश' कला और संस्कृति का ही प्रतिनिधित्व ही नहीं करता अपितु यह सृष्टि तथा पूर्ण व्यक्तित्व का भी प्रतीक माना जाता है।
वेदों में कलश को 'ऋतसदन' पुराणों में 'अमृत घट' कहा गया है, जो सागर मंथन से प्राप्त अमृत को रखने के लिए हुआ था। अर्थात् इन बातों से इतना तो स्पष्ट हो गया कि इस महत्वपूर्ण पर्व का यह नाम इसकी पवित्रता एवं इसके महत्व पर प्रकाश डालने वाला नाम है।
वेद शास्त्रों के उल्लेख से स्पष्ट है कि कुंभ पर्व प्राचीन काल से चला आ रहा है। श्रीमद् भागवत पुराण के अनुसार जब देवताओं एवं दानवों के युद्ध में देवताओं का पक्ष कमजोर पड़ गया और वे इस युद्ध में हार गए, तब भगवान विष्णु की दोनों पक्षों में समझौते की राय मान ली गई। यह निर्णय लिया गया कि दानव और देव एक साथ समुद्र मंथन आरंभ करें और दोनों पक्षों ने समुद्र मंथन किया, जिसके फलस्वरूप समुद्र के गर्भस्थल से अनेक महत्व के रत्न प्राप्त होने के बाद चौदहवां रत्न 'अमृत' प्राप्त हुआ।
अमृत को लेकर देवता और दानवों में पुनः मतभेद हो गया और उनके बीच 12 दिनों तक युद्ध हुआ लेकिन जिस कुंभ में यह अमृत भरा पड़ा था, उसे कोई भी दल प्राप्त नहीं कर सका। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया और वे नाचती-नाचती संघर्ष स्थल पर पहुंची और उन्होंने अपनी युक्ति से कुंभ में रखे अमृत का वितरण किया।
अमृत कुंभ को प्राप्त करने के लिए देवताओं व दानवों के 12 दिन के युद्ध के फलस्वरूप अब 'कुंभ' रखा गया। लेकिन शास्त्रों के अनुसार पृथ्वी पर केवल 4 स्थानों पर कुंभ रखा गया- हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक। यही कारण है कि सिर्फ इन चार स्थानों पर कुंभ मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि मानव जितने समय को एक वर्ष की अवधि मानता है, उतना ही समय देवताओं के लिए केवल एक दिन के बराबर होता है। इस अनुपात से युद्ध के 12 दिनों को मानव समाज 12 वर्ष गिनता है और यही कारण है कुंभ का पर्व चारों जगह 12-12 वर्षों के बाद आता है।
'मेष के सूर्य और सिंह के गुरू के समावेश का ये पर्व महापर्व का रूप लिए उज्जयिनी में आता है। सिंह का गुरू के साथ ये बारह संयोग 'सिंहस्थ' महापर्व कहलाता है, इसलिए इस कुंभ का विशेष महत्व है। इसी समय सूर्य भी मेष राशि पर होता है। बारह वर्षों के इस चक्र को हम पूरी भावना से बांध देते है। उज्जयिनी के लिए अनेक प्रकार की संभावनाओं और उपलब्धियों का अमृत कलश लेकर ये पर्व शनैः-शनैः द्वार पर दस्तक देने आ पहुंचा है।
मालवा की गंगा शिप्रा नदी के इर्द-गिर्द चार क्षेत्रों में विभाजित यह 'सिंहस्थ' मेला देश-विदेश से समागत जनता, गृहस्थ और विरक्त का आकर्षण केन्द्र बन जाता है। इन चारों क्षेत्रों में से अंकपात वैष्णव महात्माओं रामनंदी के लिए, दत्त अखाड़ा दशनामियों के लिए, रूद्रसागर वैदिक मतावलंबियों व सनातन धर्मी शंकर दंडी सन्यासियों के लिए तथा नृसिंह घाट में रामानुज संप्रदाय के संत महात्मा एवं आचार्यों के पड़ाव रहते हैं। इसी प्रकार लालपुल के समीप परमहंस साधुगण कल्पवास करते हैं तथा विरक्त साधु संत भी इसी स्थान पर रहते हैं। इसी प्रकार नाथ संप्रदाय के साधुओं का पड़ाव ऋणमुक्तेश्वरी, भर्तृहरि की गुफा और पीर मछन्दरनाथ की समाधि पर होता है। लेकिन शासन तंत्र, आध्यात्म एवं जनता का जब समन्वय होता है तो शासन तंत्र अपने से जुड़े हुए शब्द-तंत्र की विद्या से जनता एवं आध्यात्म के किसी भी रूप को अपने अनुरूप बना लेता है।
साधुओं के विभिन्न स्वरूप कहीं-कहीं अदम्य मानवता से ओतप्रोत और निराकार तथा वैदुष्य संपन्न तो कहीं इसके बिलकुल विपरीत, लेकिन उज्जयिनी की पवित्र माटी तो समदर्शिनी है। उसका तो नाम ही क्षमा है। उसकी छाती तो बारह वर्षों के इस पवित्र पर्व पर सभी के लिए समान रूप से बिछी है। साधुओं का एक लक्ष्य होते हुए भी अनेक मठों और मठाधीशों के मतों में आवान्तर भेद है। वैष्णवी धारा इस जीवन दर्शन में आस्था रखती है जो राग के दमन पर नहीं शोधन पर आधारित है। ये लोग मुक्ति से भी आगे भक्ति को आधार बताते है, तो दंडी संन्यासी वेद विहित मार्ग पर चलना अपनी लकीर मानते है। समाविष्ट सन्यासी वर्ग जो दशनामी से विभूषित हैं, चारों वेदों के आधार पर चार पीठ में विभाीजित है। योगतंत्र को अपनी साधना मानना इस वर्ग का रूप है।
इनके विभिन्न स्वरूपों के बावजूद भारतीय आध्यात्मिक जीवन में जल और स्नान ध्यान आदि का बड़ा महत्व है। पर्व के समय समीपवर्ती सरोवर, कुण्ड नदी या समुद्र में स्नान करना अधिक पुण्यदायी माना जाता है। गृहों की विशेष स्थिति पर कुंभ और सिंहस्थ के स्नान की प्रथा इसी परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। पौराणिक गाथा के अनुसार वैशाख मास में जो श्रेष्ठ मनुष्य पावन सलिला शिप्रा नदी में स्नान करते है, उन्हें किसी भी प्रकार के नर्क का भय नहीं रहता है। इसी अवधि में पंचक्रोशी यात्रा में लाखों यात्री नागेश्वर  सहित चारों दिशाओं में स्थित शिवालय के दर्शन करते हुए संपूर्ण नगर की 118 कि.मी. लंबाई की प्रदक्षिणा पूरी करते नागेश्वर हैं। अंत में शिप्रा तट के 28 तीर्थों की यात्रा अष्टारट विशांति यात्रा, जो अब 'अष्टतीर्थी' यात्रा करते हुए मंगलनाथ पर पांच दिवसीय यात्रा पूर्ण करते हैं। सिंह राशि के गुरू के साथ मेष के सूर्य का संयोग विशेष महत्वपूर्ण होने से संक्रमण स्नान पर्व वैशाखी अमावस्या, पितरों का पर्व है। पिण्डदान, तर्पण, जलांजलि, श्रद्धांजलि के रूप में अर्पित करते हैं। इसी श्रृंखला में अक्षय तृतीया पुण्य को क्षय से बचाती है। वैशाखी शुक्ल पंचमी शंकराचार्य के प्रति श्रद्धांजलि अर्पण पर्व है।
वैशाख मास के अंतिम पांच दिन अथवा एक दिन के तीर्थ वास और स्नान का विशेष पुण्य काशी के लंबे निवासी की अपेक्षा वैशाख मास के पांच दिन उज्जयिनी वास करने से प्राप्त है। क्षिप्रा में वैशाखी पूर्णिमा के स्नान का महत्व विशेष तौर से इसलिए भी है क्योंकि इसमें सिंहस्थ और कुंभ दोनों पर्व मिलते हैं। उज्जैन के कुंभ में ये योग मुख्य है-वैशाख मास, शुक्ल पक्ष पूर्णिमा, मेष राशि का सूर्य, सिंह राशि का बृहस्पति, चंद्र का तुला राशि पर होना, स्वाति नक्षत्र व्यतिपात, स्कंद पुराण के अनुसार अत्रि नामक एक ऋषि ने अपने एक हाथ को उठा कर तीन हजार वर्ष तक कठोर तपस्या की थी। तत्पश्चात् उनके शरीर से दो स्त्रोतों का प्रवाह हुआ। एक आकाश की ओर चला गया, जो बाद में चंद्र बन गया और दूसरा धरती की ओर जिसने बाद में क्षिप्रा नदी का रूप धारण किया। क्षिप्रा के शाही स्नान का अपना एक विशेष महत्व है। जब इस शाही स्नान में साधु संतों के सभी अखाड़े पावन क्षिप्रा के दत्त अखाड़ा एवं रामघाट पर स्नान करते हैं। सभी अखाड़े अपने पवित्र ध्वज (अणी) की पूजा करते हैं और बाद में स्नान के पूर्व अणी को पवित्र जल से स्पर्श करते हैं। सन्यासियों के भस्म की छाल को शिप्रा अपने में समा लेती है और उस समय ऐसा प्रतीत होता है जैसे क्षिप्रा में भस्म का रंग घुल गया हो। इस अवसर पर सभी को मालवा की ये गंगा अपने सीने से लगा लेती है।
शास्त्रों के अनुसार देवराज इंद्र का पुत्र जयंत जब अमृत कलश लेकर भागा तो उसके साथ चंद्रमा ने अमृत छलकाने, सूर्य देव ने कलश फटने से और बृहस्पति ने कलश को दैत्यों के हाथों से जाने से रोकने में काफी योगदान किया था। इसलिए इन्हीं गृहों के संयोग से सिंहस्थ (कुंभ पर्व) की तिथि निश्चित की जाती है। बताया जाता है कि जिस दिन सुध कुंभ गिरने की राशि पर सूर्य, चंद्रमा व बृहस्पति का संयोग हो, उसी समय पृथ्वी पर कुंभ का योग पड़ता है। उज्जयिनी का सिंहस्थ पर्व योगियों एवं जोगियों दोनों का ही अद्भुत समागम सम्मेलन है। इस शुभ अवसर पर योगी योनि की संत महापुरूष एवं जोगी यानि जिज्ञासु गृहस्थ गण को सूक्ष्म रूप से ज्ञान प्रदान करके उनकी जिज्ञासा शांत करते हैं। साथ ही उनके सामने अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत करके उन्हें अंधकार से प्रकाश की ओर आकृष्ट करते हैं। ऐसी प्रेरणा लेकर यहां पहुंचने वाला प्रत्येक भक्त भविष्य के लिए नई प्रेरणा लेकर लौटता है।
...द्वारकाधीश चौधरी