Wednesday, February 25, 2015

परीक्षा के दिन

इन दिनों बच्चों की परीक्षा से ज्यादा अपनी परीक्षा चल रही है। घर पर परीक्षा का भूत सवार हो रखा है, जिसने पूरे परिवार की रातों की नींद, दिन की भूख गायब कर दी है। न टीवी सीरियल, कार्टून फिल्मों का हो-हल्ला न कम्प्यूटर में बच्चों के गेम्स की धूड़-धाड़ सुनाई दे रही है। शादी-ब्याह, पार्टियाँ, खेल-तमाशे सब बन्द हैं। बच्चे जब छोटी कक्षाओं में होते हैं तो उनकी परीक्षा की तैयारियाँ कराने में नानी याद आने लगती है। अब पहले जैसा समय तो रहा नहीं कि माँ-बाप और परीक्षा के डर से बच्चे चुपचाप हनुमान चालीसा की तरह "सभय हृदयं बिनवति जेहि तेही" की तर्ज पर घोटा लगाने बैठ गए। आजकल के बच्चों को न माँ-बाप न परीक्षा का भय लगता है, वे नहीं जानते कि परीक्षा और भय में चोली-दामन का साथ है। बिना भय के परीक्षा का अस्तित्व नहीं और बिना परीक्षा भय का निदान नहीं होता। इस प्रसंग में रामचन्द्र शुक्ल जी कहना है- "किसी आती हुई आपदा की भावना या दुःख के कारण के साक्षात्कार से जो एक प्रकार का आवेगपूर्ण अथवा स्तम्भकारक मनोविकार होता है, उसी को भय कहते हैं।"
        परीक्षा देते समय आत्मविश्वास बनाए रखना, जो कुछ पढ़ा, रट्टा, समझा है, उस पर भरोसा रखना, परीक्षा में बैठने से पहले मन को शांत रखना, प्रश्न पत्र को ध्यान से पढ़ना और जो प्रश्न अच्छे से आता हो, उसका उत्तर पहले लिखना और बाद में कठिन प्रश्नों पर विचार कर सोच समझकर लिखना आदि कई बातें  बच्चों को हर दिन समझाते-बुझाते मन में अजीब से उकताहट होने लगती है। यह जानते हुए भी कि परीक्षा मात्र संयोग है, प्रश्न-पत्र अनिश्चित और अविश्वसनीय लाटरी है। परीक्षक प्रश्न पत्र के माध्यम से उनके भाग्य के साथ कैसा क्रूर परिहास करेगा, कितना पढ़ा हुआ कंठस्थ किया हुआ परीक्षा में आयेगा, यह अनिश्चित है, फिर भी संभावित प्रश्नों के उत्तर बच्चों को मुगली घुट्टी की तरह पिलाने में जुटी हुई हूँ। 
       "हेम्नः संलक्ष्यते ह्यगनौ विशुद्धिः श्यामिकापि वा" अर्थात सोने की शुद्धि अग्नि में ही देखी जाती है। संभवजातक में कहा गया है- "जवेन वाजिं जानन्ति बलिवद्दं च वाहिए। दोहेन धेनुं जानन्ति भासमानं च पंडितम्।।" अर्थात वेग से अच्छे घोडे़ का, भार ढ़ोने के सामथ्र्य से अच्छे बैल का, दुहने से अच्छी गाय का और भाषण से पंडित के ज्ञान का पता लगता है।
       शिक्षक सबको एक समान पढ़ाता है लेकिन योग्यता क्रम निर्धारण करने के लिए परीक्षा माध्यम अपनाना पड़ता है। इसी आधार पर प्रथम, द्वितीय, तृतीय आदि स्थानों के निर्णय का निर्धारण होता है। जिन्दगी में मनुष्य को भी विभिन्न प्रकार की परीक्षाओं के दौर से गुजरना पड़ता है। जिस प्रकार हमारे शरीर की पांचों उंगलियां समान नहीं होती, उसी प्रकार गुण, योग्यता और सामर्थ्य की दृष्टि से हर मनुष्य में अंतर है। उसके ज्ञान, विवेक और कर्मठता में अंतर है। व्यक्ति विशेष में कार्य विशेष के गुण हैं या नहीं, पद की प्रामाणिकता और व्यवस्था का सामर्थ्य है या नहीं, इसकी जानकारी के लिए परीक्षा ही एक मात्र साधन है। परीक्षा से पद के अनुकूल उनकी योग्यता, विशेषता, शालीनता, शिष्टता की जांच करके क्रम निर्धारित होता है। कालिदास जी कहते हैं-
        "अनिर्वेदं च दाक्ष्यं च मनसश्चापराजयम्"  अर्थात् अभीष्ट सफलता के लिए उत्साह, सामर्थ्य और मन में हिम्मत जरूरी है। इसी सबक को याद कर आॅफिस-घर के बीच तालमेल बिठाते हुए घर से परीक्षा का भूत निकाल बाहर करने की जुगत में दिन-रात कैसे बीत रहे हैं, कुछ पता नहीं है।
       ...कविता रावत

Thursday, February 5, 2015

मेरा मतदान दिवस

हमारे देश में राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और गांधी जयंती के साथ ही वर्ष भर धार्मिक पर्व, त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाये जाने की प्रथा प्रचलित है। इन पर्व, त्यौहारों के अलावा पांच वर्ष के अंतराल में ‘मतदान दिवस’ के रूप में आम जनता का महोत्सव संसद, राज्य विधान सभा, नगरीय निकायों से लेकर ग्राम पंचायतों के चुनाव के रूप में हमारे सामने जब-तब आ धमकता है।  यह चुनाव रूपी पर्व घोषणा के बाद एक माह से लेकर 40 दिन तक शहर की सड़कों से लेकर गांवों की गलियों में हर दिन बारात जैसी रौनक लिए आम जनता के दिलो-दिमाग पर छाया रहता है।  
          यूँ तो मैंने शुरूआती दौर के मत पत्र के माध्यम से उम्मीदवार के चुनाव चिन्ह पर ठप्पा लगाने के जमाने से लेकर आज इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों "ईवीएम" के माध्यम से मतदाता के रूप में भाग लिया है, लेकिन इस बार 31 जनवरी 2015 को शनिवार का दिन मेरे लिए अहम रहा। क्योंकि इस दिन नगरपालिका के महापौर और पार्षद चुनाव में पहली बार मेरी मतदान अधिकारी के रूप में ड्यूटी लगी तो मुझे मतदान प्रक्रिया को प्रत्यक्ष रूप से समझने का अवसर मिला। यद्यपि मतदान का समय सुबह 7 बजे से लेकर सायं 5 बजे तक निर्धारित था, लेकिन इसके लिए एक दिन पूर्व से बहुत सी चुनाव पूर्व तैयारियों की भागदौड़ में कब सुबह से शाम हो गई पता ही नहीं चला। कड़ाके की ठण्ड में सुबह 8 बजे लाल परेड ग्राउंड में बजे पहुंची तो वहांँ मेला जैसा दृश्य नजर आया। कोई अपना वार्ड क्रमांक तो कोई मतदान केन्द्र की टेबल ढूंढ रहा था।  कोई मोबाइल पर अपने दल के सदस्यों की खोज-खबर ले रहा था। मैं घंटे भर की मशक्कत के बाद मतदान क्रमांक टेबल पर पहुंची। उसके एक घंटे बाद मतदान सामग्री का एक थैला मिलने के पश्चात महापौर की दो ईवीएम कंट्रोल यूनिट और एक पार्षद की ईवीएम कंट्रोल यूनिट सहित प्राप्त हुई, जिसकी पूरी तरह जांच पड़ताल करने बाद लगभग 3 बजे पुलिस सुरक्षा के साथ बस द्वारा हम अपने नियत मतदान केन्द्र पर पहुंचे, तो बड़ी राहत मिली। 
          मतदान दिवस के दिन सुबह 6 बजे ठण्ड में ठिठुरते हुए मतदान स्थल पर पहुंचना चुनौतीपूर्ण रहा, लेकिन नियत समय पर अपने कत्र्तव्य पर पहुंचने से मन को आत्मसंतुष्टि मिली। हमारा मतदान केन्द्र एक प्रायवेट स्कूल का एक छोटा से कमरा था, जिसमें पीठासीन अधिकारी के नेतृत्व में 4 मतदान अधिकारियों को सहयोगी भूमिका निभानी की जिम्मेदारी दी गई। मतदान प्रक्रिया संबंधी पूर्ण कार्यवाही के लिए पीठासन अधिकारी जिम्मेदार होता है। सुबह मतदान के 15 मिनट पूर्व सभी उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों के समक्ष पीठासीन अधिकारी ने डेमो के लिए ईवीएम में सभी उम्मीदवारों के चुनाव चिन्ह की पुष्टि एवं ईवीएम के सुचारू संचालन की जानकारी दी। पोलिंग एजेंटों की संतुष्टि के उपरांत पीठासीन अधिकारी द्वारा कंट्रोल यूनिट को सीलबंद कर अपने हस्ताक्षर के साथ उनके भी हस्ताक्षर कराए। तत्पश्चात् निर्धारित समय सुबह 7 बजे से ईवीएम के कंट्रोल यूनिट को मतदान के लिए चालू कर दिया गया।
          मतदान प्रक्रिया के अंतर्गत पहले अधिकारी के पास मतदाताओं की सूची रहती है, जिसके आधार पर वह मतदाता पर्ची के आधार पर सूची से मिलान करता है। दूसरा अधिकारी रजिस्ट्रर में मतदाता सूची क्रमांक और पहचान पत्र अंकित कर मतदाता के हस्ताक्षर लेता है। तीसरा अधिकारी मतदाता की बांयीं हाथ की उंगली पर अमिट स्याही लगाकर मतदान के लिए पर्ची देता है। इसके बाद चैथा अधिकारी मतदाता से पर्ची प्राप्त कर ईवीएम की कंट्रोल यूनिट से ईवीएम का बटन चालू कर देता है, जहां मतदाता “मतदान प्रकोष्ठ“ में जाकर ईवीएम में अंकित उम्मीदवार के चुनाव चिन्ह के सामने का बटन दबाकर अपना पसंदीदा उम्मीदवार चुनता है।
         मैं दूसरे मतदान अधिकारी के रूप में कार्यरत थी। हमारे मतदान केन्द्र पर लगभग 600 मतदाता थे, लेकिन सायं 5 बजे तक लगभग 450 ही मतदाताओं ने अपने मत का उपयोग किया। मतदान के दौरान जब-जब कुछ मतदाता “मतदान प्रकोष्ठ“ में जाकर कहते कि, “अब क्या करना है“ तो तब-तब पीठासीन अधिकारी को बार-बार उन्हें ईवीएम में अंकित अपने पंसदीदा महापौर और पार्षद उम्मीदवार के चुनाव चिन्ह के सामने वाले बटन दबाने के लिए कहना पड़ रहा था, तो वे खिसियाते हुए जाने कौन सा बटन दबाकर भाग खड़े होते, तो यह क्षण हमारे लिए एक गंभीरता का विषय बन पड़ता कि हमारे देश में आज भी अधिकांश मतदाताओं में मतदान के प्रति भारी अज्ञानता और जागरूकता की कमी है। इस विषय में मुझे अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी का कथन स्मरण हो उठाता  कि- “जनतंत्र में एक मतदाता का अज्ञान सबकी सुरक्षा को संकट में डाल देता है।“ लेकिन हमारे भारत का अधिकांश मतदाता तो आज भी वोट के महत्व को गंभीरता से नहीं समझता है। यही कारण है कि चुनाव में उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन देकर अथवा जाति, बिरादरी, क्षेत्रीयता के दबाव या शराब में मदमस्त किया जाकर भय और आतंक दिखाकर अपने पक्ष में मतदान के लिए तैयार करने की भरपूर कोशिश की जाती है। एक सर्वे के अनुसार आज भी हमारे देश में लगभग 40 प्रतिशत मतदाता अनपढ़ अथवा अशिक्षित हैं, जिनसे सोच-समझकर कर मतदान की अपेक्षा करना बेमानी है। इसके साथ ही 10 प्रतिशत मतदाता 18 से 20 वर्ष के आयुवर्ग के हैं, जिन्हें हमारी सरकारें विवाह के दायित्व वहन करने के लिए अयोग्य समझती है, लेकिन मतदान के लिए नहीं, यह स्थिति मतदान की उपयुक्तता पर पर एक प्रश्न चिन्ह है? लोकतंत्र में मतदाता का समझदार होना जरूरी है, क्योंकि इसके अभाव में सच्चे देशभक्त और त्यागी प्रतिनिधि का चुनाव संभव नहीं हो सकता। इस विषय में महान दार्शनिक प्लेटो का कहना साथक है कि- "जहां मतदाता मूर्ख होंगे, वहाँं उसके प्रतिनिधि धूर्त होंगे।" ऐसे धूर्त प्रतिनिधियों को देखकर ही बर्नाड शाॅ को कहना पड़ा कि- "सच्चा देशभक्त और त्यागी नेता चुनाव के रेगिस्तान में निरर्थकता की फसल बोते-बोते दम तोड़ देता है और धूर्त एवं छली व्यक्ति मैदान मार लेता है।" अज्ञेय जी का कहना था कि "जनतंत्र व्यवहारतः विश्वास या आस्था के ही सहारे चलता है।" लेकिन यह गंभीर दुःखद पहलू है कि आज ये दोनों शब्द ही बेमानी लगते हैं। क्योंकि जब-जब "व्यक्ति" तथा "पार्टी-स्वार्थ" से राष्ट्र का लोकतंत्र चलता है, तब-तब वहाँ लोकतंत्र की सार्थकता कई प्रश्न उठ खड़े होते हैं।
         जब चुनाव निष्पक्ष हों। धन, धमकी, जाति, सम्प्रदाय और धर्म के नाम पर मत डालने के लिए जनता को प्रेरित न करते हुए जनप्रतिनिधि सच्चाई और ईमानदारी से राष्ट्र की सेवा करने के लिए आगे आयेंगेे, तभी अब्राहम लिंकन द्वारा प्रतिपादित लोकतंत्र की परिभाषा "जनता के लिए, जनता द्वारा, जनता का शासन" की सार्थकता सिद्ध होगी।
...कविता रावत

Monday, February 2, 2015

संवेदनाओं का सामाजिक मंच : ब्लॉग चर्चा

31 जनवरी 2015 को समाचार पत्र पत्रिका के साप्ताहिक परिशिष्ट me.next के नियमित स्तंभ web blog में मेरे ब्लॉग के बारे में लिखा था, जिसे इसी दिन नगरपालिका के चुनाव में ड्यूटी लगने के कारण रात्रि 10 बजे पढ़ने का मौका मिला, जिसे पढ़कर मन को बहुत अच्छा लगा।  31 जनवरी 2015 को मुझे चुनाव ड्यूटी का पहला अनुभव प्राप्त हुआ, इस विषय में जल्दी ही अगली पोस्ट लिखूँगी तब तक के लिए पत्रिका द्वारा प्रकाशित लेख की कतरन सादर प्रस्तुत है .....
    


Monday, January 26, 2015

अन्धेरी राहों का चिराग (भाग-दो)

समय बीतता गया। रमा परिस्थितियों के अनुकूल ढल गई। इसी आस में सब कुछ सहन करती रही कि एक दिन उसके दिन फिरेंगे। जब उसका बेटा बड़ा हुआ तो घर में बहू आ गई तो उसे लगा उसके अच्छे दिन आ गये। लड़का शहर कमाने गया तो कुछ दिन बहू के साथ ठीक-ठाक चलता रहा। लेकिन यह बहुत समय तक नहीं चला, पति और ननद के हौसले से बहू बात-बात पर उससे झगड़ने लगी, उसे कामचोर कहने लगी तो उसका दिल बैठने लगा। उसे बहू से ऐसी उम्मीद कतई नहीं थी। एक बार रमा के सिर फिर दुःखों की गठरी लद गई। वह चुपचाप सब कुछ झेलती रही, इस आस में कि एक दिन जब उसका बेटा शहर से घर वापस आयेगा तो बहू को समझा-बुझाकर सब कुछ ठीक कर देगा। 
         रमा का बेटा शहर में एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था। उसे साल भर में एक बार ही बमुश्किल छुट्टी मिलती थी। जब वह गर्मियों के दिन छुट्टी लेकर घर आया तो रमा को बहुत खुशी हुई। उसने एक दिन अपनी आप-बीती उसे सुनाई, लेकिन उससे पहले ही घर के अन्य सदस्यों ने उसके कान भर दिए थे, इसलिए वह उल्टे अपनी मां को समझाने लगा कि सबके साथ अच्छा रहा कर, हर घर में थोड़ी बहुत कहासुनी चलती रहती है। तू किसी भी बात को राई का पहाड़ मत बनाया कर आदि-आदि। रमा समझ गई कि जब बेटा मां को समझाने लगे तो फिर वह अपना न रहकर किसी और का हो जाता है। अपने जिगर के टुकड़े की बातें सुनकर वह निराशा और दुःख में डूब गई। उसका दुःख यहीं खत्म नहीं हुआ। एक दिन पास के गांव में मेला लगा, जहां उसकी बहू जा रही थी, लेकिन उसे अपनी साड़ी नहीं मिल रही थी तो वह रमा के पास आकर बोली- “मेरी साड़ी कहांँ गई, क्या तुमने देखी उसमें मैंने रुपये भी रखे थे। कहीं तुमने तो नहीं चुरा ली?“
         अकस्मात् सरासर झूठे आरोप सुनकर रमा तिलमिला उठी-“ अब मेरे ये दिन आ गये कि मैं तेरी साड़ी चुराऊँ? पैसे चुराऊँ।“
हल्ला सुनकर यशोदा भी पास आ धमकी-“ जरूर इसने ही चुराई होगी और दूसरा कौन है यहांँ?“
          रमा से रहा नहीं गया वह दौड़कर अपने बेटे के पास गई। उसके मन में इतना विश्वास बाकी था कि उसका बेटा कम से कम इस झूठे आरोप में ननद और बहू का साथ नहीं देगा। वह बेटे से कुछ कह पाती इससे पहले ही शंकर बीच में आ धमका- “क्यों इतना चिल्ला चोट मचा है? क्या बात है? कोई मुझे भी बतायेगा कि नहीं?“ इस बीच उसका बेटा और यशोदा भी वहां पहुंच गई। यशोदा ने आते ही सुनाना शुरू कर दिया- “लो पूछ लो महारानी जी को। बहू के कपड़े और रुपये चुराकर भोली बन रही है।“ इतना सुनकर शंकर को बड़ा गुस्सा आया। बात-बात में दो-चार लात-घूसे जमाने का आदि होने से वह रमा को मारने लपका कि बीच में बेटा आ गया। बेटे ने पास जाकर पूछा -“क्या हुआ माँ! तू ही सच-सच बतला दें!् क्या तूने सचमुच चोरी की?“
“नहीं बेटा! चोरी जैसा घिनौना काम मैं सपने में भी नहीं कर सकती।“ यह सुनते ही यशोदा बड़बड़ाई-“बड़ी आयी सपने वाली, इसको तो आदत ही पड़ गई है चोरी करने की।“ शंकर ने भी हाँ में हाँ मिलाई तो वह जड़वत हो गई। “मां क्या ये सच है कि तू पहले भी चोरी करती आई है।“ बेटे ने उसे झिंझौड़ते हुए पूछा- “नहीं रे! तू भी इनकी बातों में आ गया, उन पर विश्वास करने लगा जो हमेशा मुझे इस घर से निकालने की फिराक में रहते हैं, जाने किस जन्म का बैर निकाल रहे हैं मुझसे।“ वह फूट-फूटकर रोने लगी। 
बेटा, बहू, ननद और पति की प्रताड़ना से दुःखी होकर वह चुपचाप दूर कहीं भाग जाने की सोच निकलने लगी तो बेटा चिल्लाया -“कहां जा रही है, बताती क्यों नहीं तू।“ बेटे की बौखलाहट से परेशान होकर उसके मुंह से बरवस ही बोल फूट पड़े- “हां मैंने चोरी की। तू भी अपने बाप जैसे ही निकला।“
         इतना सुनते ही बेटे ने उसका हाथ पकड़ा और उसे धक्का मारते हुए कहा-“चली जा, फिर कभी घर मत आना?“ यह सुनकर रमा तो घर आंगन में दहाड़े मार रोने लगी, जिसे देखकर यशोदा, बहू और शंकर खुश दिख रहे थे। आस-पास के लोग तमाशा देखने इकट्ठे हो गये। रमा का दिल बैठ गया। उसने सोचा भी नहीं था कि उसका जिस पर सहारा था वह इतना बेरहम और निर्लज्ज होगा कि उसे धक्के मारकर घर से बाहर कर देगा। बेटा बहू को लेकर मेला चला गया और घर वाले अपने कामकाज में लेकिन रमा वहीं सीढि़यों पर दिनभर रोती कलपती रही। उसकी ओर किसी ने ध्यान नहीं दिया। जैसे-तैसे दिन कटा और शाम हुई तो रमा भारी मन से उठी और अपनी सबसे अच्छी साड़ी पहनकर गौशाला की ओर निकल पड़ी। गौशाला पहुंचकर वह बहुत सारा बाहर पड़ा सूखा घास-फूस गौशाला के अंदर समेटने लगी तो पास के गौशाला वाली औरत को शंका हुई कि आज इसे क्या हो गया जो इतना घास गौशाला के अंदर भर रही है। पास जाकर उसके पूछने पर वह बड़ी लापरवाही से बोली-“रोज-रोज घास को बाहर से अंदर करो, तंग आ गई हूं यह सब करते-करते। यह रोज-रोज का झंझट.....अब बर्दाश्त नहीं होता।“
“रोज-रोज का झंझट“ पड़ोसी समझी नहीं।
“हाँ रोज-रोज का झंझट नहीं तो और क्या है?“ वह घूरते हुए बोली तो पड़ोसन ने सोचा आज इसका दिमाग खराब है, चुप रहने में ही भलाई है। वह शंकित मन अपने घर निकल पड़ी। रमा ने भी गौशाला को बंद किया और घर आ गई। आज न तो उससे किसी ने बात की और नहीं खाने को पूछा। बेटा-बहू मेले से बहुत सी चीजे खरीद कर लाये, लेकिन उसे किसी ने नहीं पूछा। एक बार भी उसे मां के कमरे में झांकने की जरूरत महसूस नहीं हुई। वह दुःखी मन से सबके सोने का इंतजार करने लगी। जैसे ही सब घरवाले सो गये, उसने भारी मन से चुपके-चुपके दबे पांव अपनी मां के घर की राह पकड़ी। कुछ ही देर में वह अपनी मां के घर पहुंच गई। उसने इधर-उधर झांकते हुए जैसे ही भराई आवाज में “मां! दरवाजा खोल।“ कहा।
उसकी बूढ़ी मां ने आशंकित होकर तुरन्त दरवाजा खोला-“इतनी रात गई, क्यों आई?“। “कहाँं से आऊंगी! भाग फूटे हैं मेरे! मैं तुझसे कहती थी न कि जैसे बाप वैसा ही बेटा भी निकलेगा तो मैं क्या करूंगी। लेकिन तू कहती रही ऐसा कुछ नहीं होगा। क्यों ब्याह दिया तूने मुझे उस घर में।“ एक सांस में कहते हुए रमा उससे लिपट गई। “क्या करती मैं बेटी, मैं भी तो मजबूर थी, गरीब की कौन सुनता है।“ 
        दोनों मां-बेटी यूं ही बहुत देर तक अपने दुःखों की सुनते-सुनाते रहे। रमा बोली- “मां अब मैं तेरे साथ ही रहूंगी। अब उस घर कभी नहीं जाऊँगी?“ यह सुनकर उसकी मां ने उसे समझाया- “देख बेटी, हम एक ही गांव में रहते हैं, अगर मैं दूसरे गांव रहती तो तुझे अपने घर रखने में मुझे कोई परेशानी नहीं होती, लेकिन एक ही गांव में रहकर गांव वालों के बीच रहकर किस-किस को जवाब देती फिरूंगी। हुक्का पानी बंद हो जायेगा तो हम तो पहले ही मर जायेंगे?“ “ठीक है तू क्यों मेरे लिए अब इस बुढ़ापे में दुःख झेल पायेगी। मैं ही चली जाती हूँ सबसे दूर.......हमेशा के लिए।“  यह कहते हुए उसने बाहर से दरवाजे पर सांकल डाली और वहीं बाहर दरवाजे पर अपने शरीर पर लिपटे कुछ जेवर उतारकर रख गई।
         माँ अंदर ही अंदर चिल्लाती रही लेकिन रमा कठोर मन से गौशाला की ओर निकल पड़ी। उसनेे बड़ी निष्ठुरता से यह कदम उठाया कि वह आज पहले गौशाला को जलाकर खाक कर देगी और फिर घर जाकर सारे घर को आग में झौंक कर फांस लगा लेगी। उसे अंधेरी राहों में कोई चिराग जल उठने की आस शेष न रही। पति, ननद और बहू को तो वह इसलिए झेलती रही क्योंकि उसे वे कभी भी अपने नहीं लगे, लेकिन जब उसके जिगर के टुकड़े ने उसे कटु वचन और उपेक्षा का दंश मारा तो उसकी सोचने-समझने की शक्ति कुंद हो गई और जीने की इच्छा जाती रही। उसने वहीं पहले से ही जमा घास-फूस पर आग लगा ली और छुपते-छुपते घर की ओर निकल गई। कुछ ही पल में गौशालाा धू-धू कर जल उठा। रमा के जाने के बाद उसकी मां ने जैसे-तैसे दरवाजे का सांकल खोला और सीधे प्रधान के घर पहुंची। उसके हाथ में रमा के जेवर की पोटली थी। उसने प्रधान का दरवाजा खटकाया तो आधी रात को किसी अनहोनी की आशंका के चलते प्रधान से फौरन दरवाजा खोला। सामने रमा की मां हड़बड़ाई खड़ी थी। रमा की बात चली तो दोनों आशंकित होकर शंकर की घर की ओर निकल पड़े। वे अभी बाहर आकर कुछ कदम ही होंगे कि प्रधान अंधेरी रात में उजाला दिखा तो उसकी नजर गौशाला की ओर गई जोे धू-धू कर जल रहा था। वह चिल्लाया- “अरे बाप रे! ये क्या हो रहा है!“ उसने गौशाला की ओर इशारा करते हुए कहा-“हो न हो ये आग रमा ने ही लगाई होगी।“ दोनों दौड़ते-दौड़ते, हांफते-हांफते शंकर के दरवाजे पर पहुंचे और जोर-जोर से दरवाजा खटकाते हुए -“शंकर! शंकर! जल्दी उठ, जल्दी उठ, देख! तेरे गौशाला में आग लग गई है।“ चिल्लाने लगे। शोरगुल सुनकर शंकर बदहवास उठा और जोर-जोर से दहाड़ मारते हुए गौशाला की ओर भागा। उसके चीखने-चिल्लाने से पूरा गांव जाग गया और उसके पीछे-पीछे बर्तन-भांडों में पानी भर-भर गौशाला की ओर भागने लगे। लोगों ने अंदर-बाहर धू-धू कर जलते गौशाला में पानी डालकर आग तो बुझा ली लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी, अंदर गाय, भैंस, बैल सभी जानवरों का तड़फ-तड़फकर दम निकल चुका था। सब खाक हो गया। शंकर की मां, यशोदा और बेटे-बहू बिलख-बिलख, दहाड़े मार सबको यकीन कोशिश दिलाने की कोशिश में थी कि रमा आग लगाकर भाग गई है। 
         सब लोग गौशाला में हुए नुकसान की बातें करते हुए अपने-अपने घरों की ओर निकल गये। क्या वाकई रमा आग लगाकर भाग गई? यह जानने को कोशिश किसी ने नहीं की और आपस में बातें  करते-करते एक-एक कर खिसकते चले गए।  बहुत से गांव वाले उसकी व्यथा समझते थे, लेकिन वे लाचार और बेवस थे। सब प्रधान व शंकर की दबंगई के चलते मौन रहने में ही अपनी भलाई समझते। बदहवास शंकर अपने मृत जानवरों के बीच रमा को तलाशने लगा, लेकिन वह न मिली तो वह उल्टे पांव घर की ओर भागा। घर आकर उसने रमा को मारने के इरादे से बाहर रखी कुल्हाड़ी उठाई और आग बबूला हो उसके कमरे की ओर लपका। इससे पहले कि वह अपने मंसूबों में सफल होता, उसने देखा कि रमा जमीन पर बेजान चिराग हाथ में लिए मृत पड़ी हुई है। चेहरे पर आत्मसंतुष्टि भरी स्मित् मुस्कान लिए मानो कह रही हो यही तो था मेरी अंधेरी राहों का चिराग

समाप्त !
......कविता रावत 

Monday, January 19, 2015

अन्धेरी राहों का चिराग

निष्ठुर सर्दी का मौसम। सुबह तड़के रमा घर की एक सुनसान अन्धेरी कोठरी में चिमनी के सहारे भारी दुःखी मन से चक्की पीसे जा रही थी। बाहर ठंड का प्रकोप बढ़ता जा रहा था। आसमान गरज-चमक दिखाकर ओले बरसा रहा था। सारा गांव ठंड से अपने घरौंदों में दुबका हुआ था। परिवार के अन्य सदस्य भी नींद के आगोश में थे। रमा सबसे बेखबर चुपचाप चक्की के साथ ही हुए अपनी उपेक्षित, तनाव व कडुवाहटभरी जिन्दगी के बारे में सोच-सोच पिसी जा रही थी। 
बाहर घोर अन्धकार छाया था। रमा सारा अनाज पीसकर गौशाला में जानवरों को चारा डालने और भैंस दुहने के लिए अंधेरा छंटने का इंतजार करने लगी। ओले गिरने बन्द हुए ही थे कि तेजी से बर्फ गिरनी लगी, जिससे ठंड और बढ़ती चली गई। रमा ने जैसे ही दरवाजा खोला उसे सीढि़याँ और आंगन के साथ-साथ पेड़-पौधे भी सफेद चादर ओढ़े मिले। बर्फ गिरना बंद हुआ तो रमा बाल्टी लेकर नंगे पैर उस भयानक ठण्ड में गौशाला की ओर चल पड़ी। वह जल्दी-जल्दी अपने कंपकपाते कदम गौशाला की ओर बढ़ाये जा रही थी। ठंड से उसका बदन सुन्न हुआ जा रहा था।  गौशाला में पहुंचते ही जब उसने आग जलाई तो उसे ठंड से कुछ राहत मिली। जानवरों को घास-पात देकर और भैंस दुहने के बाद उसने घर की राह पकड़ी। गौशाला से बाहर निकलते ही फिर वह ठंड की चपेट में थी। ठिठुरते हुए उसके दांत किटकिटा रहे थे। सारा बदन कंपकंपा रहा था। वह इस आस में घर की ओर तेजी से अपने कदम बढ़ा रही थी कि शायद जल्दी घर पहुंचकर उसे राहत मिल जाय। किन्तु ऊपर वाले ने उसका ऐसा भाग्य रचा ही न था। अभी उसने घर के आंगन में पांव धरे ही थे कि उसके कानों में जो कर्कश और चुभते शब्द सुनाई दिए, उन्हें सुनकर उसके पांव जहां की तहां ठिठक गये- ’अभी तक नहीं आई महारानी जी, न जाने क्या करती रहती है? जहाँं जायेगी वहीं चिपक जायेगी, मैं तो तंग आ चुकी हूँ इससे।’ और फिर ’अरे शंकर! देख के आना जरा अपनी देवी जी को। सुबह-सुबह मनहूस गई कहां? देख! कहीं मर तो नहीं गई।’
          ‘कहाँ गई होगी मां जी? अपनी मौसी के पास बैठी होगी अड्ड मारकर। अभी जाता हूँ। देखता हूं वहां क्या चुगली कर रही है?“ और इसी के साथ शंकर ने तेजी से गुस्से में जैसे ही बाहर कदम बढ़ाये तो सामने रमा को देखते ही बरस पड़ा- “कहां मर गई थी इतनी देर तक? तुझे फिकर है कि नहीं घर द्वार की?“ बेचारी रमा अवाक उसका मुंह ताकते रही, बोली कुछ नहीं। जानती थी कि कुछ बोलूंगी तो सुबह-सुबह बखेड़ा खड़ा हो जायेगा और जानवरों की तरह मार पडे़गी। उसने चुपचाप घर के अंदर घुसने में ही अपनी भलाई समझी। घर में उसकी ननद यशोदा जो कि अपने ससुराल से एक बार भागकर जो आई तो फिर यहां घर की मालकिन बन बैठी, चूल्हे के पास पसरकर आग सेंक रही थी। दो भाईयों की इकलौती बड़ी बहिन होने से उसका सारे घर में हुक्म चलता था। रमा बेचारी ठंड से कांपती हुई चूल्हे के पास खड़ी क्या हुई कि वह बरस पड़ी-“तो आ गई महारानी! आ बैठ जा? अपनी हड्डियां अच्छी से सेंक ले तू भी। ठंडा गई होगी न?“ रमा को यशोदा के कडुवे बोल चुभे तो वह बिफर पड़ी- “बाहर निकलकर काम करके देखो तब पता चले? अंदर ही अंदर बस हुकम भर चलाना है?   
        रमा का इतना क्या कहना था कि यशोदा ने सुबह-सुबह सारा घर आसमान पर चढ़ा लिया, लगी चिल्लाने- “अरे शंकर!“ सुनता है कि नहीं?
“क्या हुआ दीदी?“ शंकर भागता आ धमका।
“पूछता है; क्या हुआ?“ सुना तूने! ये चुडै़ल मुझे क्या कह रही है?“
“क्या कहा इस कमीनी ने तुझे?“ शंकर ने आवेश में आकर रमा के बाल झिंझोड़ते हुए पूछा।  “कहती है कि तू सिर्फ हुकम चलाना जानती है। काम-धाम कुछ नहीं करती।“ यशोदा ने आपत्ति दर्ज की।
“तेरी ये मजाल चाण्डाल कहीं की। निकल जा .... मेरे घर से। निकल अभी... अभी निकल ... तेरी इस घर को कोई जरूरत नहीं। तू क्या सोचती है तू नहीं रहेगी तो हम भूखों मर जायेंगे। निकल जा .... जा।“ शंकर उसके बाल बेदर्दी से झिंझोड़ते हुए उसे घसीट-घसीट कर बाहर ले आया और लगा पीटने।
बेचारी रमा बुरी तरह मार खाकर रोती कलपती रही लेकिन यशोदा का दिल बिल्कुल नहीं पसीजा। सुबह-सुबह चिल्ला चोट सुनकर आस-पडोस वाले इकट्ठा होकर तमाशबीन बन  खुसर-फुसर करने लगे तो यशोदा दौड़ी-दौड़ी शंकर के पास गई और रमा को बचाने का उपक्रम करते हुए बोली- “अरे क्यों मार रहा है? छोड़ दे.... इंसान रहती तो कुछ समझती। जानवर को कितना भी मारो वह फिर अपनी चाल पर आ जाता है?“ फिर लोगों को सुनाते हुई बोली- “देख! कैसा तमाशा देख रहे हैं लोग! कुछ तो ख्याल कर! कल को सभी यही कहेंगे कि बेचारी को मारते रहते हैं। लक्षण तो इसके किसी को देखने हैं नहीं?“ यशोदा की बात मानकर शंकर ने रमा को तो छोड़ दिया किन्तु रमा अपनी ननद के कटु वचन सुन सुबकते-सुबकते गुस्साई- “क्या लक्षण हैं मेरे? बता तो जरा सब लोगों को, वे भी तो देखे आज!“ घायल शेरनी की तरहवह एकाएक पास पड़ी दरांती की ओर लपकी और उसे लहराते हुए चीखी-“बता! नहीं तो तेरे अभी सारे गांव वालों के सामने टुकड़े-टुकड़े कर दूँगी।“ 
“है अपने बाप की बेटी“ यशोदा अपना सिर रमा की ओर झुकाकर बौरायी-“धौंस दिखाती है गांव वालों की .....कर मेरे टुकड़े?“ 
         रमा का दुस्साहस देखकर शंकर का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया। उसका चेहरा तमतमा उठा, आंखे बाहर निकल आयी। उसने रमा को कच्चा चबा डालने वाली निगाहों से तरेरा और दांत पीसते हुए उस पर बाज की तरह झपटा- “जरा हाथ तो बढ़ा, यहीं अभी तेरे हाथ काटकर कुकुरों को नहीं खिला दिया तो मैं अपने बाप की औलाद नहीं“ उसका रौद्र रूप देखकर पास खड़े लोगों ने चुपके से खिसकना ही उचित समझा। लोगों का  जाते देख रमा भी दरांती वहीं पटककर बड़बड़ाती हुई घर के दरवाजे पर निढाल होकर रोने लगी। शंकर पीछे-पीछे गाली-गलौच करता आया दरवाजे पर उसको बड़बड़ाते हुए दो-चार लात जमाकर घर के अंदर घुस गया। 
         रमा वहीं दरवाजे पर पड़ी-पड़ी अपने बीते दुर्दिनों की याद कर लम्बी-लम्बी सिसकियां भर रही थी। कितना नीरस जीवन है उसका, तनाव ही तनाव, दुःख ही दुःख, खुशी कभी देखी ही नहीं। बचपन में मां चल बसी तो घर के कामकाज में ही खप गई। बाप ने दूसरी शादी की लेकिन उसे कोई राहत नहीं मिली। कुछ साल बाद वह भी चल बसे। सौतेली माँ ने यद्यपि उसे अपनी बेटी जैसी पाला पोसा, फिर भी वह सोचती अगर आज उसकी मां जिन्दा होती तो वह कम से कम ऐसे घर में और उसी गांव में नहीं ब्याही होती। लेकिन अब जाऊँ भी तो कहाँ? वह सोच में डूबी ही थी कि उसने अपनी सौतेली माँ जो कि उसी गांव में अकेली दिन गुजार रही थी, जो लोगों से उनकी लड़ाई-झगड़े की बातें सुनकर दौड़ी-दौड़ी चली आयी थी, को सामने देखा तो उससे लिपट गई और बिलखते हुए बोली- “माँ मुझे इस नरक से बाहर निकाल ले चल, नहीं तो मैं फांस लगा लूंगी।“ उसके मुंह से फांस लगाने की बात सुन उसकी सौतेली माँ की रूह कांप उठी, क्योंकि इससे पहले भी गांव में दो-चार ऐसी दुर्घटनायें घट चुकी थी, जिस पर कभी किसी गांव वाले ने मुंह तक नहीं खोला।  यही सोच वह उसे समझाने लगी- “देख बेटी, मैं तेरी सौतेली माँ जरूर हूँं लेकिन मैंने कभी भी तेरे को सौतेला नहीं समझा। जरा सोच! अगर तूने कोई गलत कदम उठाया तो तेरा ये छोटा सा मासूम बच्चा तेरे बिना कैसे जियेगा। कौन देखभाल करेगा उसकी।“
“जब मैं ही नहीं रहूंँगी तो मेरी तरफ से कोई जिये या मरे। मुझे कुछ लेना-देना नहीं इससे। कल ये भी बड़ा होकर अपने बाप की तरह मारने दौड़ेगा तो तब क्या करूँगी मैं? कहाँ जाऊँगी मैं, बता? रमा रोते हुए बड़ी निराश होकर बोली।
         “नहीं बेटी, धीरज रख। मुझे विश्वास है ये तुझे जरूर सुख देगा।“ रमा की मां ने बच्चे की ओर देखते हुए कहा- “अब जा काम कर ले।“
          रमा को थोड़ी आत्मीय शांति मिली तो उसने पास ही सुबकते हुए मासूम बच्चे को अपनी सीने से चिपका लिया। सोचने लगी- सच ही कहती है माँ! जब वह मेरी मौसेरी मां होकर मेरा सगे बच्चों जैसा देखभाल कर सकती है तो मैं क्यों नहीं कर सकती। उसे अपने बेटे से आशा बंधी कि बड़े होकर जरूर वह उसका सहारा बनेगा, तब उसके जीवन में खुशी के फूल खिल उठेंगे। यह सोचकर वह जी उठी।“

शेष अगली पोस्ट में .....
.....कविता रावत  


Sunday, January 11, 2015

कालिंका देवी

सुदूर हिमालय की गोद में बसे पहाड़ी प्रदेश उत्तराखंड देवभूमि के नाम से जाना जाता है। यहाँ पौराणिक काल से ही विभिन्न देवी-देवताओं का पूजन भिन्न भिन्न स्थानों में भिन्न-भिन्न रूप में प्रचलित है। इनमें से एक शक्ति-पीठ ‘कालिंका देवी’ (काली माँ) पौड़ी और अल्मोड़ा जिले के चैंरीखाल में बूँखाल चोटी पर अवस्थित है। इस चोटी से देखने पर हिमालय के दृश्य का आनन्द बहुत ही अद्भुत और रोमांचकारी होता है। सामने वृक्ष, लता, पादपों की हरियाली ओढ़े ऊंची-नीची पहाडि़याँ दिखाई देती हैं और पीछे माँ कालिंका के मंदिर का भव्य दृश्य। 
माँ कालिंका के बारे में मान्यता है कि सन् 1857 ई. में जब गढ़वाल और कुमाऊँ में गोरखों का राज था, तब सारे लोग गोरखों के अत्याचार से परेशान थे। इनमें से एक वृद्ध व्यक्ति जो वडि़यारी परिवार का रहने वाला था, वह काली माँ का परम भक्त था। एक बार भादौ महीने की अंधेरी रात को  रिमझिम-रिमझिम बारिश में जब वह गहरी नींद में सोया था, तभी अचानक उसे बादलों की गड़गड़ाहट और बिजली चमकने के साथ ही एक गर्जना भरी आवाज सुनाई दी, जिससे वह भयभीत होकर हड़बड़ाकर उठ बैठा। जब उसने बाहर की ओर देखा तो माँ कालिंका छाया रूप में उसके सामने प्रगट हुई और उससे कार्तिक माह की एकादशी को पट्टी खाटली के बन्दरकोट गांव आकर उनका मंदिर बनवाने को कहकर अंतर्ध्यान हो गई। भक्त की भक्ति एवं माँ की शक्ति के प्रताप से देखते-देखते गांव में मन्दिर बन गया। दिन, महीने, साल बीते तो एक वडि़यारी परिवार का विस्तार तेरह गांव तक फैल गया। तब एक दिन मां कालिंका अपने भक्तों के सपनों में आकर बोली कि वे सभी मिलकर उनकी स्थायी स्थापना गढ़-कुमाऊँ में कर ममगांई परिवार को पूजा का भार सौंपे। माँ के आशीर्वाद से सभी गांव वालों ने मिलकर बूंँखाल की चोटी पर शक्तिपीठ कालिंका मंदिर की स्थापना की। जहाँ हर तीसरे वर्ष पौष कृष्ण पक्ष में शनि और मंगलवार के दिन मां कालिंका के मंदिर में मेला लगता है, जिसमें दूर-दूर गांवों में बसे लागों के अलावा हजारों-लाखों की संख्या में देश-विदेश के श्रद्धालुजन आकर फलदायिनी माता से मन्नत मांगते हैं।      
कोठा गांव में मां कालिंका की पहली पूजा के साथ ही शुरू होता है मां कालिंका की न्याजा (निशाण) का गांव-गांव भ्रमण। अपने भक्तों की रक्षा करती हुई माता अंत में मेले के दिन मंदिर में पहुंचती है। इसके बाद विभिन्न पूजा विधियों के साथ ही शुरू होता है माँ का अपने पार्षद, हीत, घडियाल और भैरों बाबा के साथ अद्भुत तांडव नृत्य। जैसे ही जागरी (माँ का पुजारी) ’दैत संघार’ के स्वरों ‘जलमते थलमते दैता धारिणी नरसिंगी नारायणी’ आदि के साथ ’जै बोला तेरो ध्यान जागलो! ऊँचा धौलां गढ़ तेरा, दैत चढ़ी गैन जोग माया’ का ढोल, दमाऊँ, नगाड़े की थाप पर जोर-शोर से उच्चारण करता है, पश्वा (जिस पर देवी आती है) अपने सिर पर लाल चुनरी बांधकर दैत्य संहार करने को उद्धत होकर रौद्र रूप धारण कर भयंकार रूप से किलकारियां मारता है। उसकी भुजायें और रक्त वर्ण नेत्र फड़कने लगते हैं। वह एक हाथ में खड्ग और दूसरे में खप्पर, माथे पर सिंदूर के साथ अग्याल के चावल लेकर हुंकार मारता है, तो दैत्य संहार के निमित्त भैंसे की बलि दे दी जाती है और इसी के साथ मनौतियों के लिए आये नर भेड़-बकरियों का सामूहिक बलि का सिलसिला चल पड़ता है। लेकिन इस बार 23 दिसम्बर को प्रशासन ने मंदिर की 2 किमी की सीमा में पुलिस बल तैनात कर सख्त रवैया अपनाया तो पशु बलि प्रथा को रोकने में अभूतपूर्व कामयाबी मिली, जिससे यह पावन मंदिर आस्था के नाम पर हजारों बेजुबान पशुओं के खून से रंगने से बचकर अन्य शक्तिपीठ कालीमठ, चन्द्रबंदनी, धारी देवी, ज्वाल्पा एवं देलचैरी आदि सात्विक पूजा स्थलों की श्रेणी में शामिल हो गया।
इस मेले का मुख्य आकर्षण यह है कि जो भी भक्तगण मां कालिंका के मंदिर में मन्नत मांगते हैं, उनकी मनोकामना पूर्ण होती है तथा अगले तीसरे वर्ष जब यह मेला लगता है, तब वे खुशी-खुशी से मां भगवती के दर्शन के लिए आते हैं।
"देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यषो देहि द्विषो जहि।।"
इस वर्ष मेले की सबसे अच्छी बात यह रही कि एक ओर जहाँ प्रशासन की चाक-चौबंद चौकसी और सख्त रवैये से पशु बलि पर रोक लगी तो दूसरी ओर श्रद्धालुजनों का भी पूरा सहयोग मिला। सात्विक पूजा में शामिल होने के लिए भारी बर्फबारी और कड़ाके की ठण्ड में श्रद्धालुजनों के जोश में कोई कमी नजर नहीं आयी। हजारों भक्तजनों ने माँ के दरबार में नारियल, चुनरी, घंटी और चांदी की छप्पर आदि भेंट कर माँ का आशीर्वाद लिया। इस दौरान शक्तिपीठ के पुजारियों के सघोष वेद ध्वनियों का उच्चारण “ऊँ जयन्ती मंगलाकाली भद्रकाली कपालिनी, दुर्गाक्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तुते। जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि, जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तुते।।“ के साथ-साथ “भेंट-सुभेंट यात्रा मांगन फल दे, पूजन वर दे, छत्र की छाया पित्र की माया, ज्योत जगाई, वंश बड़ाई“  आदि श्लोकों द्वारा माता का महिमामयी गुणगान कर प्रसाद वितरण का दृश्य मन को असीम शान्ति देते हुए सबके लिए यादगार बन गया ।
  जय माँ कालिंका!
.....कविता रावत 

Wednesday, December 31, 2014

नए साल के लिए कुछ जरूरी सबक


उठिए - जल्दी घर के सारे, घर में होंगे पौबारे
लगाइए - सवेरे मंजन, रात को अंजन
नहाइए - पहले सिर, हाथ-पैर फिर
पीजिए - दूध खड़े होकर, दवा-पानी बैठकर
खिलाइए - आए को रोटी, चाहे पतली हो या मोटी
पिलाइए  - प्यासे को पानी, चाहे कुछ होवे हानि
छोडि़ए    - अमूचर की खटाई, रोज की मिठाई
कीजिए - आये का मान, जाते का सम्मान
जाइए - दुःख में पहले, सुख में पीछे
बोलिए - कम से कम, दिखाओ ज्यादा दम
देखिए - माँ का ममत्व, पत्नी का धर्म
भगाइए   - मन के डर को, बूढे़ वर को
खाइए - दाल-रोटी-चटनी, कितनी भी कमाई हो अपनी
धोइए - दिल की कालिख को, कुटुम्ब के दाग को
सोचिए - एकांत में, करो सबके सामने
चलिए - अगाड़ी, ध्यान रहे पिछाड़ी
बोलिए   - जुबान संभालकर, थोड़ा बहुत पहचानकर
सुनिए  - पहले पराये की, फिर अपनों की
रखिए - याद कर्ज चुकाने की, मर्ज को मिटाने की
भूलिए     -  अपनी बड़ाई को, दूसरे की भलाई को
छिपाइए  - उम्र और कमाई, चाहे पूछे सगा भाई
लीजिए - जिम्मेदारी उतनी, संभाल सको जितनी
रखिए -  चीज़ जगह पर, जो मिले समय पर


Friday, December 26, 2014

बाबा आमटे के जन्मदिन पर एक कविता

नर्मदा घाटी के आदिवासी मछुआरों, किसानों की आवाज बुलन्द कर नर्मदा बचाओ आन्दोलन को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने वाले बाबा आमटे का जन्म 26 दिसम्बर 1914 को हिंगणापुर में हुआ। बाबा जीवन भर दुःखी और रोगी लोगों की सेवा में लगे रहे। वे कहते हैं, "जिन्हें वेदना का वरदान नहीं, वे शरीर से उन्मत हैं और जो यातनाहीन हैं, वे सपने नहीं देख सकते।" युवाओं के लिए वे हमेशा प्ररेणास्रोत बने रहे, जिनके लिए उनका मूल मंत्र था- "हाथ लगे निर्माण में, नहीं मांगने, मारने में।" वे एक संवेदनशील कवि और साहित्यकार भी हैं। सरकार द्वारा उपेक्षित आदिवासियों के दुःख-दर्द को उन्होंने करीब से जिया और उनके लिए जिन्दगी भर आखिरी सांस तक जूझते-लड़ते रहे, लेकिन हारे नहीं, यह बात उनकी कई कविताओं में साफ देखने को मिलती हैं। ऐसी ही एक कविता "एक  कुम्हलाते फूल का उच्छ्वास" में वे कहते हैं-

मैं सतासी का हूँ
एक रीढ़हीन व्यक्ति जो बैठ नहीं पाता
मुरझा  रहा हूँ मैं पंखुरी-ब-पंखुरी

लेकिन, क्या तुम नहीं देखते
मेरा रक्तास्रावी पराग?
मैं निश्चयी हूँ,
मगर ईश्वर मदद करे मेरी
कि रत रहूँ मैं गहरी हमदर्दी में
जो आदिवासियों की बेहाली से है।

वंचित विपन्न आदिवासियों की व्यथा का
किसी भी सत्ता द्वारा अपमान
अश्लील है और अमानवीय
सतासी पर
उम्र मुझे बांधे है दासता में
मैं पा चुका हूँ असह्य आमंत्रण अपने
आखिरी सफर का,
फिर भी मैं डटा हूँ

पाठको, मत लगाओ अवरोधक अपने
आवेग पर
कोई नहीं विजेता
सब के सब आहत हैं, आहत!
एक फूल की इस आह को कान दो!!

बाबा आमटे जी को सादर श्रद्धा सुमन!

Wednesday, December 24, 2014

मदन मोहन मालवीय और अटल बिहारी वाजपेयी जन्मदिवस पर एक परिचय

हमारे हिन्दू धर्म में जिस तरह होली, दीवाली, दशहरा आदि त्यौहार धूमधाम से मनाये जाते हैं, उसी तरह दुनिया भर के ईसाई धर्म को मानने वाले ईसा मसीह के जन्मदिवस 25 दिसम्बर को क्रिसमस के रूप में बड़े धूमधाम से मनाते हैं। इस दिन को बड़ा दिन भी कहते हैं। इस दिन सभी ईसाई लोग अपने घरों में क्रिममस का वृक्ष सजाते हैं। मान्यता है कि ईसा के जन्म पर देवताओं ने एक सदाबहार वृक्ष को सितारों से सजाकर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए उनके माता-पिता को बधाई दी। 25 दिसम्बर का दिन भारतीय जनमानस के लिए भी विशेष है। इसी दिन हमारे बीच दो महान विभूतियों ने जन्म लिया। एक महामना मदन मोहन मालवीय तो दूसरे पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ।
          महामना मदन मोहन मालवीय जी को एक समाज सुधारक, पत्रकारिता, वकालत, मातृ भाषा तथा भारत माता की सेवा में जीवन अर्पण करने वाले काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रणेता और इस युग के पहले और अंतिम ऐसे व्यक्ति के रूप में जाना जाता है, जिन्हें महामना के सम्मानजनक उपाधि से विभूषित किया गया। सत्यमेव जयते के नारे को बुलन्द करने वाले मालवीय जी को विभिन्न मत-मतांतरों के लोगों के बीच आपसी सांमजस्य बिठाने की अद्वितीय महारत हासिल थी। वे एक सच्चे देशभक्त के रूप याद किए जाते हैं। भारत निर्माण में उनका योगदान अमूल्य है। इसीलिए एनीबेसेंट ने उनके बारे मेें कहा कि “मैं दावे के साथ कह सकती हूं कि विभिन्न मतों के बीच, मालवीय जी भारतीय एकता की मूर्ति बने खड़े हुए हैं।" आजीवन देशसेवा करते हुए वे 12 नवम्बर 1946 को स्वर्ग सिधारे।       
          एक ओजस्वी और वाक्पटु के साथ सिद्ध हिन्दी कवि रूप में हमारे बीच 11वें प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी जी ने कुशल नेतृत्व के बलबूते 24 दलों के साथ गठबंधन कर पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार बनाकर पूरे पांच वर्ष पूरे करते हुए महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की। इसमें देश की सुरक्षा के लिए दो परमाणु परीक्षण महत्वपूर्ण रहे। 1998 में राजस्थान के पोखरण का परमाणु परीक्षण इतने गुप्त ढंग से किया गया कि इसकी भनक अमेरिका की सीआईए को भी नहीं लगने पायी।  
         अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रखर वक्ता के साथ सहृदय कवि के रूप में सुविख्यात हैं। उनकी कविताओं के मनन से स्पष्ट होता है कि वे एक राजनेता से पहले कवि हैं। एक ऐसे कवि जो काल्पनिक नहीं, बल्कि यथार्थवादी हैं। उन्होंने अपनी कविताओं में देशप्रेम का ढोंग नहीं रचा, बल्कि डंके की चोट पर यथार्थता सबके सम्मुख प्रस्तुत की। इसका एक छोटा सा उदाहरण  'पड़ोसी' कविता के रूप में देखिए, जिसमें वे दुश्मन को सिंह की तरह ललकारते हुए कहते हैं-

धमकी, जेहाद के नारों से, हथियारों से
कश्मीर कभी हथिया लोगे, यह मत समझो
हमला से, अत्याचारों से, संहारों से
भारत का भाल झुका लोगे यह मत समझो।

जब तक गंगा की धार, सिंधु में ज्वार
अग्नि में जलन, सूर्य में तपन शेष
स्वातंत्र्य समर की वेदी पर अर्पित होंगे
अगणित जीवन यौवन अशेष।
एक अन्य जगह उन्होंने लिखा …
एक हाथ में सृजन, दूसरे में हम प्रलय लिए चलते हैं
सभी कीर्ति में जलते, हम अंधियारे में जलते हैं।
आंखों में वैभव के सपने, पग में तूफानों की गति हो
राष्ट्रभक्ति का ज्वार न रुकता, आए जिस-जिस की हिम्मत हो।

          यह दुःखद है कि अस्वस्थता के चलते आज वे व्हीलचेयर में हैं और कुछ पढ़-लिख नहीं पा रहे हैं। जीवन की इस ढलती शाम को शायद उन्होंने बहुत पहले भांप लिया, तभी तो “जीवन की ढलने लगी सांझ“ कविता में वे लिखते हैं-
उमर घट गई
डगर कट गई
जीवन की ढलने लगी सांझ।
बदले हैं अर्थ
शब्द हुए व्यर्थ
शांति बिना खुशियां हैं बांझ।
सपनों से मीत
बिखरा संगीत
ठिठक रहे पाँ और झिझक रही झांझ।
जीवन की ढलने लगी सांझ।

          पदम विभूषण, कानपुर विश्वविद्यालय से डी.लिट उपाधि, लोकमान्य तिलक पुरस्कार, श्रेष्ठ सांसद पुरस्कार, भारत रत्न पंडित गोविन्द वल्लभ पंत पुरस्कार के बाद अटल जी और महामना मदन मोहन मालवीय जी को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान "भारत रत्न" से सम्मानित किए जाने की सुखद घोषणा की गई है। देश के इस सर्वोच्च नागरिक सम्मान "भारत रत्न" पाने के बाद वे क्रमशः 44वें और 45वें व्यक्ति होंगे। 

अटल जी को जन्मदिन पर हार्दिक मंगलकामना और महामना मालवीय जी को श्रद्धा सुमन! 

सबको क्रिममस की हार्दिक शुभकामनाओं सहित ....कविता रावत

Thursday, December 18, 2014

क्रांतिकारी कवि रूप में बिस्मिल की याद

वन्दे मातरम् का उद्घोष के साथ फाँसी के तख्ते से “मैं ब्रिटिश साम्राज्य का नाश चाहता हूँ। I wish the downfall of British Empire!" का सिंहनाद करने वाले महान क्रांतिकारी पं. रामप्रसाद बिस्मिल को 19 दिसम्बर, 1927 को फाँसी दी गई, जिसे शहादत दिवस के रूप में याद किया जाता है। 9 अगस्त को सहारनपुर-लखनऊ पैसेजर ट्रैन  से जाने वाले खजाने को ‘काकोरी’ नामक स्टेशन पर लूटकर दुनिया में पं. रामप्रसाद ‘बिस्मिल’ और उनके नौ साथियों ने तहलका मचा दिया। इसके लिए उन पर सभी पर मुकदमा चला, जिसमें से ‘बिस्मिल, रोशन, लहरी और अशफाक को फाँसी की सजा  सुनाई गई। बिस्मिल को बचाने के लिए 250 रईस, आनरेरी मजिस्ट्रेट तथा जमींदारों के अतिरिक्त विधान सभा तथा विधान परिषद् के 78 सदस्यों ने भी अलग-अलग अपीलें की, लेकिन वाइसराय सबकी अपीलें खारिज कर दी।
          11 जून 1897 को उत्तरप्रदेश में जन्में बिस्मिल ने अपनी  30 वर्ष की अल्पायु में पूरे 11 वर्ष क्रांतिकारी जीवन जिया और अंग्रेजों की गुलामी की बेड़ियों से जकड़ी भारत माता को आजाद कराने  के लिए सशस्त्र क्रांतिकारी अभियान के साथ ही अपनी कलम की तीखी धार से ‘बोलशेविक कार्यक्रम’, ‘अमेरिका ने आजादी कैसे प्राप्त की’ और ’स्वदेशी रंग’ आदि पुस्तकों का प्रकाशन कर हताशा और निराशा में डूबे जनमानस को स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए जगाया। एक क्रांतिकारी कवि के रूप में वे हमेशा युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत रहे हैं। तत्समय उनकी रचनाएं युवा क्रांतिकारी मंत्र की तरह जपा करते थे-
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है
रहबरे-राहे-मुहब्बत रह न जाना राह में
लज्जते-सहरा-नवर्दी दूरिए-मंजिल में है?
आज मक्तल में ये कातिल, कह रहा है बार-बार
अब भला शौके-शहादत भी किसी के दिल में है
वक्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है
ऐ शहीदे-मुल्को-मिल्लत हम तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत की चर्चा गैर की महफिल में है।
बिस्मिल को जेल की चारदीवारी में बंद कर उन पर जुल्म ढहाये गये, बेड़ियों में जकड़े गए, लेकिन जेल की चारदीवारी उनके क्रांतिकारी कदमों को आगे बढ़ने से रोक न पायी। उन्होंने जेल में कलम को अपना मारक हथियार बनाकर अग्रेजों  के इरादों का माकूल जवाब दिया-
तेरी इस जुल्म की हस्ती को ऐ जालिम मिटा देंगे
जुबां से जो निकालेंगे वो हम करके दिखा देंगे।
हमारे सामने सख्ती है क्या इन जेलखानों की
वतन के वास्ते सूली पे हम चढ़कर दिखा देंगे।
हमारी फांका-मस्ती कुछ न कुछ रंग लाके छोड़ेगी
निशां तेरा मिटा देंगे तुझे जब बद्दुआ देंगे।
जिन्दगी के आखिरी समय में ’बिस्मिल’ को भारत माता को आजाद न करा पाने का मलाल सालता रहा, लेकिन उन्हें इतना विश्वास जरूर था कि उनकी इन्कलाबी आग एक दिन रंग लायेगी।  वे दृढ़ता से कहते हैं कि भले ही उन्हें एक दिन मौत मिटा देगी लेकिन उनका नाम कभी नहीं मिटा पायेगी-
दुश्मन के आगे सर यह झुकाया न जायेगा
बारे अलम अब और उठाया न जायेगा
अब इससे ज्यादा और सितम क्या करेंगे वो
अब इससे ज्यादा उनसे सताया न जायेगा
यारो! अभी है वक्त हमें देखभाल लो
फिर कुछ पता हमारा लगाया न जायेगा
हमने लगायी आग है जो इन्कलाब की
उस आग को किसी से बुझाया न जायेगा
कहते हैं अलविदा अब अपने जहान को
जाकर के खुदा के घर से तो आया न जायेगा
अहले-वतन अगरचे हमें भूल जाएंगे
अहले-वतन को हमसे भुलाया न जायेगा
यह सच है मौत हमको मिटा देगी एक दिन
लेकिन हमारा नाम मिटाया न जायेगा
आजाद हम करा न सके अपने मुल्क को
‘बिस्मिल’ यह मुँह खुदा को दिखाया न जायेगा
स्वदेशी के प्रचार-प्रसार के लिए बिस्मिल किसी से पीछे नहीं रहे। स्वतंत्रता के लिए संघर्षों के ‘स्वदेशी रंग’ में रंगते हुए उन्होंने उसे आगे बढ़ाने के लिए जनमानस को प्रेरित करते हुए कहा-
तन में बसन स्वदेशी, मन में लगन स्वदेशी,
फिर से भवन-भवन में विस्तार हो स्वदेशी ......
सब हों स्वजन स्वदेशी, होवे चलन स्वदेशी,
मरते समय कफन भी, दरकार हो स्वदेशी।
‘बिस्मिल’ की भारत माता पर अपने प्राणों को एक बार नहीं सौ बार न्यौछावर करने की तीव्र उत्कंठा उनके द्वारा गोरखपुर जेल से फाँसी के एक घंटे पूर्व माँ को संबोधित एक पत्र में देखने को मिलती है, उन्होंने लिखा कि-
देश दृष्टि में माता के चरणों का मैं अनुरागी था,
देशद्रोहियों के विचार से मैं केवल दुर्भागी था।
माता पर मरने वालों की नजरों में मैं त्यागी था,
निरंकुशों के लिए अगर मैं कुछ था तो बस बागी था।
जाता हूँ, तो मातृ! यही वर, भारत में फिर जन्म धरूँ।
एक नहीं, तेरी स्वतंत्रता पर जननी! सौ बार मरूँ!
बिस्मिल अच्छी तरह जानते थे कि राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति युवा होते हैं। युवाओं के दम पर ही विश्व में बड़ी-बड़ी क्रांतियाँ हुई हैं। इतिहास गवाह है कि भारतीय युवा शक्ति भी इसमें किसी से पीछे नहीं रही है। समय-समय पर देश की सीमाओं का अतिक्रमण कर भीतर घुसने वाले मंगोल, कोल और हूण आक्रमणकारियों के साथ ही यूनान के महान कहा जाने वाले सिकन्दर का भी मुँहतोड़ जवाब देकर उनके दुस्साहस को युवाओं ने ही कुचला है। देशोपकार के लिए सैकड़ों बार मर मिटने को तैयार बिस्मिल को विश्वास था कि उनके मरने के बाद उनके लहू से सैकड़ों बिस्मिल, रोशन, लहरी और अशफाक जन्म लेंगे जो भारत माता को जंजीरों से मुक्त कराकर ही दम लेंगे-
यदि देश हित में मरना पड़े मुझको सहस्त्रों बार भी,
तो भी मैं इस कष्ट को निज ध्यान में न लाऊँ कभी
हे ईश! भारतवर्ष में शतबार मेरा जन्म हो
कारण सदा ही मृत्यु भी, देशोपकार कर्म हो
मरते ‘बिस्मिल’, रोशन, लहरी, अशफाक अत्याचार से
होंगे पैदा सैकड़ों, उनकी रुधिर की धार से
उनके प्रबल उद्योग से उद्धार होगा देश का
तब नाश होगा सर्वदा दुःख, शोक के लवलेश का।
गोरखपुर जिले में राप्ती नदी के किनारे बिस्मिल की अन्तिम इच्छानुसार बाबा राघवदास ने उनका अंतिम संस्कार कर उनके भस्मावशेष से बरहज देवरिया जिला में उनकी समाधि का वैदिक रीति से निर्माण करवाया, जहाँ उनकी अभिचित्रित रचना बड़ी ओजस्वी और सारगर्भित हो उठी-
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले
वतन पर मरने वालों का, यही बाकी निंशा होगा।
इलाही वो भी दिन होगा, जब अपना राज देखेंगे
तब अपनी भी जमीं होगी और अपना आसमां होगा।।

महान क्रांतिकारी पं. रामप्रसाद बिस्मिल को शहादत दिवस पर नमन!
जय हिन्द
.....कविता रावत 

Thursday, December 11, 2014

समझदार धन-दौलत से पहले जबान पर पहरा लगाते हैं

बैल  को  सींग और आदमी  को उसकी  जबान से  पकड़ा  जाता  है।
अक्सर रात को दिया वचन सुबह तक मक्खन सा पिघल जाता है।।

तूफान  के  समय की शपथें उसके थमने पर भुला दी जाती हैं।
वचन देकर नहीं मित्रता निभाने से कायम रखी जा सकती हैं।।

एक रुपये वचन की कीमत आधे रुपये के बराबर भी नहीं होती है।
वचन    और    पंख   को    अक्सर    हवा    उड़ा   ले   जाती   है।।

एक छोटा-सा उपहार बहुत बड़े वचन से बढ़कर होता है।
वचन    के  देश   में   मनुष्य   भूखा   मर   सकता   है।।

अंडे और कसमें तोड़ने में कोई देर नहीं लगती है।
तंगदिल इंसान की जबान बहुत लम्बी रहती है।।

दो बातूनी साथ-साथ बहुत दूर तक यात्रा नहीं कर पाते हैं।
समझदार धन-दौलन से पहले जबान पर पहरा लगाते हैं।।

   ....कविता रावत

Tuesday, December 2, 2014

गैस त्रासदी के तीस साल

देखते-देखते भोपाल गैस त्रासदी के तीस बरस बीत गए। हर वर्ष तीन दिसंबर गुजर जाता है और उस दिन मन में कई सवाल हैं और अनुत्तरित रह जाते हैं। हमारे देश में मानव जीवन कितना सस्ता और मृत्यु कितनी सहज है, इसका अनुमान उस विभीषिका से लगाया जा सकता है, जिसमें हजारोें लोग अकाल मौत के मुँह में चले गए और लाखों लोग प्रभावित हुए। वह त्रासदी जहाँ हजारों पीडि़तों का शेष जीवन घातक बीमारियों, अंधेपन एवं अपंगता का अभिशाप बना गई तो दूसरी ओर अनेक घरों के दीपक बुझ गए। न जाने कितने परिवार निराश्रित और बेघर हो गये, जिन्हें तत्काल जैसी सहायता व सहानुभूति मिलनी चाहिए थी, वह नहीं मिली।       
            विकासशील देशों को विकसित देश तकनीकी प्रगति एवं औद्योगिक विकास और सहायता के नाम पर वहाँ त्याज्य एवं निरूपयोगी सौगात देते हैं।  इसका सबसे बड़ा उदाहरण यूनियन कार्बाइड काॅरपोरेशन था, जिसके कारण हजारों लोग मारे गए, कई हजार कष्ट और पीड़ा से संत्रस्त हो गए लेकिन उनकी समुचित सहायता व सार-संभाल नहीं हुई। पीडितों को आखिरकार उचित क्षतिपूर्ति के लिए कानूनी कार्यवाही और नैतिक दबाव का सहारा लेना पड़ा। अगर अमेरिका में ऐसी दुर्घटना होती तो वहाँ की समूची व्यवस्था क्षतिग्रस्तों को हर संभव सहायता मुहैया कराकर ही दम लेती और उस कंपनी के खिलाफ कड़ी कार्यवाई होती। अमेरिका में ऐसे कई उदाहरण हैं, जिसमें जनजीवन को जोखिम में डालने और अनिष्ट के लिए जिम्मेदार कम्पनियों एवं संस्थानों ने करोड़ों डालरों की क्षतिपूर्ति दी।  लेकिन गरीब देशों के नागरिकों का जीवन मोल विकसित देशों के मुकाबले अतिशय सस्ता आंका जाना इस त्रासदी के नतीजों और उसके बाद सरकारी रुख से समझ में आता है।
        इस विभाीषिका से एक साथ कई मसले सामने आए, गंभीर सवाल उठे। अव्वल तो ऐसे जोखिम पैदा करने वाले कारखाने को घनी आबादी के बीच लगाने की अनुमति क्यों दी गई, जिसमें विषाक्त गैसों का भंडारण और उत्पादों में खतरनाक रसायन प्रयोग होता है। यह देश का सबसे विशाल कारखाना था, जिसमें हुई दुर्घटना ने सुरक्षा व्यवस्था और राजनीतिक सांठ-गांठ की पोल खोल दी। यह हादसा विश्व में अपने ढंग का पहला वाकया था। हालांकि तीन दिसंबर की  विभीषिका से पहले भी संयंत्र में कई बार गैस रिसाव की घटनायें घट चुकी थी, जिसमें कम से कम दस श्रमिक मारे गए थे। दो-तीन दिसम्बर 1984 की दुर्घटना मिथाइल आइसोसाइनेट नामक जहरीली गैस से हुई। कहते हैं कि इस गैस को बनाने के लिए फोस जेन नामक गैस का प्रयोग होता है। फोसजेन गैस भयावह रूप से विषाक्त और खतरनाक है। कहा जाता है कि हिटलर ने यहूदियों के सामूहिक संहार के लिए गैस चेम्बर बनाये थे,  उनमें वही गैस भरी हुई थी। ऐसे खतरनाक एवं प्राणघातक उत्पादनों के साथ संभावित खतरों का पूर्व आकलन और समुचित उपाय किए जाते हैं। मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अगर सुरक्षा उपाय के लिए ठोस कदम उठाए होते तो उस विभीषिका से बचा जा सकता था। पूर्व की दुर्घटनाओं के बाद कारखाने के प्रबंधन ने  उचित कदम नहीं उठाए और शासन प्रशासन भी कर्त्तव्यपालन से विमुख व उदासीन बना रहा। तीस बरस बीत जाने पर भी दुर्घटना स्थल पर पड़े रासायनिक कचरे को अब तक ठिकाने न लगा पाना और गैस पीडि़तों को समुचित न्याय न मिल पाना शासन प्रशासन की कई कमजोरियों को उजागर करता  है।
          ....कविता रावत

Wednesday, November 26, 2014

थकान दूर करती है योग निन्द्रा

निद्रा हमारे जीवन का एक बहुत आवश्यक कार्य है। निद्रा से हमारे शरीर तथा मन की थकावट दूर होती है, जिससे हम नये सिरे से कार्य करने के लिए फिर से सक्षम बन जाते हैं। एक दिन भी ठीक से नींद न आने से हमारे शरीर तथा मन की जो दशा होती है, उसका अनुभव सभी को है। इसी आधार पर निद्रा का महत्व समझा जा सकता है; लेकिन बहुत थोड़े लोग सोने की सही कला जानते हैं। सोने की जो लाभकारी कला है उसका जानना प्रत्येक व्यक्ति के लिए जरूरी है। योग निद्रा से थोड़े समय में ही शरीर तथा मन को अधिक आराम पहुँचता है। प्रायः लोग अपने दिनभर के अनुभवों पर सोच-विचार करते-करते सो जाते हैं। आज के समय में जीवन अत्यधिक संघर्षपूर्ण, तनावयुक्त तथा अनेक उलझनों से परिपूर्ण रहता है। तनाव, उलझन तथा चिन्ता के विचारों को लेकर उसमें डूब जाने से नींद देर से आती है। नींद में भी यही विचार स्वप्न के रूप में प्रकट होकर परेशान करते रहते हैं, जिससे अधिक देर तक सोने के बाद भी शरीर तथा मन को सही आराम नहीं मिल पाता और थकावट और सुस्ती का अनुभव होता है। अनेक लोग आज अनिद्रा रोग से ग्रस्त पाये जाते हैं। कुछ तो नींद की गोली खाये बिना सो ही नहीं सकते। योग निद्रा की यौगिक विधि से सोने का अभ्यास करने से बहुत शीघ्र नींद आती है। थोड़ी नींद में भी अधिक आराम का अनुभव होता है। सोकर उठने पर सुस्ती के बदले चुस्ती तथा फुर्ती का अनुभव होता है। योगनिद्रा को ही आगे चलकर अभ्यास द्वारा समाधि में भी बदला जा सकता है, जो यौगिक-साधनाओं का चरम लक्ष्य होता है।
योग निद्रा की अनेक विधियों में से कुछ निम्नानुसार प्रस्तुत हैं-
पहली विधि- बिस्तर पर चित्त होकर आराम के साथ लेट जाइये। बाजू को शरीर से कुछ अलग फैला लीजिये। हथेलियाँ ऊपर की ओर रहें। सिर तकिये पर रहे, लेकिन तकिया बहुत ऊँचा न हो। तन्दुपरांत नीचे बतलाये क्रम से शरीर के एक-एक अंग का मानसिक रूप से नाम बोलते हुए उन्हें शिथिल करते जाइये। शिथिल करने के लिए उन्हें बन्द आँखों से देखते चलिये तथा अपनी भावना करिये कि वह अंग शिथिल हो रहा है। सबसे पहले दाहिने हाथ का अंगूठा, दूसरी अंगुली, तीसरी अंगुली,  चौथी अंगुली, पांचवी अंगुली फिर दाहिनी हथेली, फिर कलाई, कोहुनी, कंधा, बगल, बाजू, कमर, नितम्ब का दाहिना भाग, जांघ, घुटना, पिंडली, टखना, एड़ी, तलुवा। फिर दाहिने पैर का अंगूठा, दूसरी अंगुली, तीसरी अंगुली, चौथी अंगुली, पाँचवी अंगुली। यही क्रम बांयी तरफ अपनायें। फिर दोनों भौंहों के बीच की जगह, दाहिनी भौंह, बांयीं भौंह, दाहिनी पलक, बांयी पलक, दाहिनी पुतली, बांयीं पुतली, दायां गाल, बाँयां गाल, दाहिना कान, बाँयां कान, नाक, ऊपर के ओंठ, नीचे के ओंठ, ठुड्डी, गर्दन, पूरी पीठ, छाती और पेट।  इतना हो जाने के बाद दाहिना हाथ, पूरा दाहिना पैर, पूरा बाँयां हाथ, पूरा बाँयां पैर, पूरी धड़, मस्तक, फिर पूरा शरीर।  अन्त में अपने पूरे शरीर को सिर से पैर तक शरीर से अलग देखिए- कहाँ हैं? क्या पहने हैं? कपड़ों का क्या रंग हैं? इत्यादि।
यह योगनिद्रा का एक चक्र हुआ। बहुत सम्भव है कि इतना करने से पहले ही नींद आ जाए तो कोई हानि नहीं। यदि इस समय तक नींद न आये तो फिर से अभ्यास का दूसरा चक्र नींद आने तक दुहराते जाएंँ। ध्यान रहे मन इधर-उधर न भटके। ऐसा होने पर मन को फिर एकाग्र कर वापस क्रिया में लगायें। कुछ दिन के अभ्यास के बाद अंगों का क्रम याद होने पर यह सरल व स्वाभाविक बन जाएगा।
यह अभ्यास दिन में भी किया जा सकता है। कठिन श्रम के बीच कुछ मिनट का भी समय मिलने  पर इसे कुर्सी में बैठे-बैठे भी किया जा सकता है। समय के अनुसार क्रिया अपने अनुकूल की जा सकती है।
दूसरी विधि-  बिस्तर पर चित्त लेटकर एक ही बार में पूरे शरीर को शिथिल कीजिए। ऐसा अनुभव करें कि शरीर बिस्तर पर पड़ा हुआ है और हम उससे एकदम अलग हैं। यह भी अनुभव करें कि हम अपने शरीर को दूर से देख रहे हैं, जो सोया हुआ है। 5 मिनट के लिए शरीर को एकदम ढीला तथा शिथिल करने के बाद 1, 2, 3, 4, 5 इस प्रकार सांस द्वारा लगातार गिनती करते जाएँ। अगर हमारा स्वास्थ्य ठीक है तो 100 की गिनती करते-करते नींद आ जाएगी।
तीसरी विधि-  शिथिलीकरण की एक और विधि यह है कि गिनती गिनने के बदले, दोनों भौंहों के बीच के स्थान में ’ऊँ’ या ‘सोऽहं’ का मानसिक जाप तब तक जारी रखें जब तक नींद न आ जाय। दोनों भौहों के बीच ध्यान केन्द्रित कर मानसिक जाप करने से बहुत शीघ्र गहरी नींद आती है।
चौथी विधि-  थोड़ी देर उपर्युक्त विधि द्वारा शरीर का शिथिलीकरण करने के बाद श्वास पर ध्यान ले जाकर मानसिक रूप से श्वासों को देखने का अभ्यास करें। थोड़े समय ऐसा करने के बाद इस विधि से श्वासों में ’ऊँ’ या ‘सोऽहं’ का जाप करते जायें। इस प्रकार सोते समय जाप का अभ्यास करने से मन एकाग्र होता है और बहुत ही शीघ्र नींद आ जाती है।
          योग निद्रा केवल नींद ही नहीं संकल्प शक्ति प्रयोग का भी साधन है। ऐसी माना जाता है कि योग निद्रा का अभ्यास शुरू करने से पहले मन ही मन पूरे आत्मविश्वास के साथ कोई भी शुभ संकल्प 5 बार और फिर समाप्ति से पहले 20 बार दुहराने से लिये गये संकल्प अवश्य ही पूर्ण होते हैं। शुभ संकल्प छोटे-छोटे वाक्यों में इस प्रकार हो सकते हैं- मैं प्रत्येक दिन सबेरे उठकर योग साधना करूँगा या मैं प्रातःकाल चार बजे अवश्य उठ जाऊँगा। मैं जो सोचूँगा वैसा कर सकूँगा। अपनी संकल्प शक्ति से मैं अपने आप को नीरोग कर लूँगा। मैं गुस्सा नहीं करूँगा। मैं बीड़ी-सिगरेट, शराब पीना एकदम छोड़ दूँगा। मैं किसी से लड़ाई नहीं करूँगा आदि-आदि। 

Wednesday, November 12, 2014

मधुमेह दिवस पर कुछ जरुरी सबक

भारतीय चिंतन सिर्फ उपदेशात्मक नहीं है। स्वस्थ जीवन के सूत्रों को व्यवहार में लाने के लिए सोलह संस्कारों की योजना की गई है, जो भारतीय समाज में आज भी प्रचलित है। आचार्य चरक ने कहा है कि दोषों को नष्ट कर और गुणों का संवर्धन करके नये गुणों को विकसित करना ही संस्कार है, "संस्कारों हि गुणान्तराधानमुच्यते।" स्वस्थ उत्तम संतान प्राप्ति के लिए गर्भिणी की सुरक्षा हेतु गर्भाधान संस्कार, पुंसवन कर्म, सीमननतोनयन ये संस्कार प्रसव पूर्व होते हैं। इस कला के विज्ञान को सामने लाने के लिए अध्ययन और अनुसंधान गुजरात में चल रहे हैं।  इतनी सुदृढ़ सामाजिक व्यवस्था के बावजूद भी मात्र मृत्यु दर एमएमआर चिन्ता का विषय बना हुआ है। प्रति लाख 212 महिलायें प्रसव के दौरान दम तोड़ देती हैं। इसका सबसे बड़ा कारण खून की कमी यानि एनीमिया है। डब्ल्यूएचओ और यूनिसेफ के रिपोर्ट के अनुसार 5.7 करोड़ महिलाओं में से 3.2 करोड़ महिलायें भारत में एनीमिया से ग्रसित हैं।  यदि रक्ताल्पता को नियंत्रित किया जाये तो मात्र मृत्युदर में सुधार संभव है।  भारतीय किशोरियों में रक्ताल्पता एक चिंतनीय समस्या है। 88 प्रतिशत से अधिक किशोरियां एनीमिया से पीडि़त हैं, जो कि विवाह के पश्चात् कमजोर शिशु को जन्म देती है जो कि बढ़ी हुई मातृ मृत्यु दर का एक बड़ा कारण भी है। 
            डायबिटीज सरीखे रोग बाल्यावस्था से ही देखे जा रहे हैं।  बदलती जीवन शैली सिमटते परिवार, नौकरी पेशा माता-पिता, स्पर्धात्मक शैक्षणिक व्यवस्था आधुनिक जीवन के गैजेट्स पर बढ़ती निर्भरता, खान-पान की बदलती शैली के कारण बाल एवं किशोरों का शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य तो प्रभावित हुआ ही है साथ ही भावनात्मक संवेगात्मक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ा है।
बाल्यावस्था जीवन विकास की प्रथम महत्वपूर्ण अवस्था है। इस आधारभूत सोपान में उन्हें पर्याप्त पोषक तत्व नहीं मिले या जरूरत से ज्यादा मिले तो विकास बाधित और असंतुलित होगा। यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्र में जहां कुपोषण एक विकराल समस्या है वहीं शहरी क्षेत्रों में जंक फूड, साॅफ्ट ड्रिंक आदि अत्यधिक कैलोरी के सेवन के कारण मोटापा, ब्लड प्रेशर और
           स्वास्थ्य के क्षेत्र में चुनौतियां अपार हैं। बदलती जीवन शैली के कारण डायबिटीज, मोटापा, हृदयरोग, ब्लडप्रेशर, अनिद्रा आदि रोगों का बढ़ना चिन्ता का विषय है। बढ़ते मधुमेह के प्रतिशत के कारण भारत वर्ल्ड डायबिटीज केपिटल (World Dibeties Calpital) बनने की ओर तेजी से बढ़ रहा है। अध्ययन, अनुसंधान से पुष्ट होता विज्ञान मानव को स्वस्थ और दीर्घायु बनाने हेतु निरन्तर प्रयत्नशील है। स्टेम सेल द्वारा ब्लड कैंसर, ट्यूमर, थैलेसीमिया, आॅस्टियोपोरेसिस कई वंशानुगत रोग, इम्युनिटी डिसआर्डर आदि रोगों के प्रभावी इलाज की संभावना जगी है। स्टेम सेल की सीमित संख्या को देखते हुए सामान्य वयस्क कोशिका से स्टेम सेल बनाने वाले जापान के शिन्या यामानाका को वर्ष 2012 का मेडिसीन का नोबल पुरस्कार भी मिला है। उन्होंने ईजाद की है Induced plury protent stem cell (IPS) इसे बनाने के लिए त्वचा या अन्य किसी दूसरे अंग की कोशिका को री प्रोग्राम किया जाता है। जापान की ही 30 वर्षीया ओबाकाता ने इस खोज को और आगे बढ़ाया। ‘नेचर’ में छपे उनके शोध पत्र ने कोशिकाओं पर साइट्रिक एसिड का हल्का घोल डालकर चूहे में कृत्रिम रूप से स्टेम सेल बनाने की संभावना उजागर की है। विज्ञान जीन थेरैपी द्वारा कई आनुवांशिक रोगों से बचाव की दिशा में उल्लेखनीय प्रयास हो रहे हैं। जहाँ एक ओर वैज्ञानिक अथक परिश्रम करके अनेक रोगों का प्रभावी इलाज ढूंढ़ने में लगे हैं, वहीं दूसरी ओर निहित स्वार्थ इस पुनीत क्षेत्र को बदनाम कर रहे हैं। हालीवुड अभिनेत्री एंजेलिना जोली का एक उदाहरण ही इस पराकाष्ठा को व्यक्त करने के लिए काफी है। नकली दवाओं का कारोबार 200 विलियन डाॅलर का आंकड़ा पार कर गया है। बाजार में मिलने वाली 12 से 25 प्रतिशत दवाईयों नकली होती है। एंटीबायोटिक के अंधाधुंध अविवेकपूर्ण प्रयोग के कारण इनका कम हो रहा असर Post Antibiotic युग की चेतावनी दे रहा है। मन को व्यथित करने वाले निहित स्वार्थ के विपरीत एक उजला उदाहरण भी है। मैडम क्यूरी को जब अपने आविष्कार के लिए नोबल पुरस्कार मिला तो उनके पास ढ़ंग के कपड़े भी पहनने को न थे। उस समारोह में मैडम क्यूरी से पूछा गया कि क्या वे इस खोज का पेटेंट करायेंगी? तो उनका जवाब था कि वैज्ञानिक आविष्कार अस्तित्व में आने के बाद से ही जनता की धरोहर हो जाती है, उन्हें उनकी भलाई में लगानी चाहिए ना कि उसका पेटेंट कराकर उसे कमाई का जरिया बनाना चाहिए। सत् और असत् शक्तियां तो हर युग में रहती है पर मंथन से अमृत निकलता है, यह शाश्वत है। जीवन शैली में हो रहे बदलाव पर नियंत्रण समाज जागरण, प्रबोधन, सहभागिता, समन्वय और चिन्तन से संभव है। आरोग्य का भारतीय चिन्तन अपने देश के नागरिकों की आवश्यकता के अनुरूप स्वास्थ्य सुविधायें उपलब्ध कराना चाहता है। आज हमारे देश में अनेक स्वास्थ्य कार्यक्रम पश्चिमी चिन्तन से प्रभावित हैं। हम मात्र उनके माॅडल का अनुकरण कर रहे हैं। इन राष्ट्रीय कार्यक्रमों की समीक्षा करते हुए सर्वसमावेशी स्वास्थ्य नीति बनाने की आवश्यकता है। 
            किसी भी देश के समग्र विकास का माॅडल स्वास्थ्य और शिक्षा के बिना अधूरा माना जाता है। ये दो ऐसे आधारभूत स्तम्भ हैं, जिन पर किसी भी देश के न केवल वर्तमान विकास के कारक देखे जाते हैं बल्कि उसमें भविष्य के विकास के बीज भी सन्निहित होते हैं। कैंसर, एड्स आदि जटिल रोगों में जहां अध्ययन, अनुसंधान के लिए भारी भरकम बजट की आवश्यकता है, वहीं संक्रामक रोग, अतिसार, मलेरिया, एनीमिया जैसे सामान्य रोगों में कम से कम खर्च में प्रभावी रूप से ठीक हो सकते हैं। इन पर त्वरित और सर्व सुलभ चिकित्सा की आवश्यकता है। बड़े-बड़े चिकित्सा संस्थान जटिल रोगों से उबार सकते हैं, पर छोटे-छोटे स्वास्थ्य केन्द्र जीवन की रक्षा के लिए निहायत जरूरी है। इसलिए समाज की आवश्यकता के अनुरूप ऐसी राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति कार्यक्रम बनानी चाहिए- जिसमें सामुदायिक स्वास्थ्य सेवायें सबकी पहुँच में हों, चिकित्सा कम खर्चीली, निरापद, गुणवत्ता रूप और विवेकपूर्ण हों, सामान्य रोगों का एक निश्चित प्रोटोकाॅल हों, संस्थागत सेवाओं में परस्पर तालमेल में हों, स्वास्थ्य सुरक्षा तंत्र विकसित हों, मानव हित में स्वास्थ्य पद्धतियों का समन्वय हों, विभिन्न स्तरों पर सरकार द्वारा नियमित स्वास्थ्य परीक्षण की योजना हों आदि-आदि। हमारे यहां स्वास्थ्य रक्षा तंत्र की अपेक्षा चिकित्सा व्यवस्था पर कई गुना खर्च किया जाता है। आज आवश्यकता हैं कि आयुर्वेद, यूनानी, होम्योपैथी, योग जैसी स्वास्थ्य पद्धतियों के साथ आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के समेकित कोर्स आयुर्जीनामिक्स शुरू किये जायें। कला और विज्ञान के तालमेल से स्वास्थ्य ठीक रहेगा और चिकित्सा व्यवस्थायें बेहतर बनेंगी। स्वास्थ्य के विषय को अस्पतालों से निकालकर जन-जन में ले जाना होगा। अस्पताल आधारित स्वास्थ्य सेवाओं की अपेक्षा जन स्वास्थ्य के प्रति जन चेतना विकसित करने की जरूरत है। 
           विश्व मधुमेह दिवस पर जन-जन के स्वस्थ, सुखद और सार्थक जीवन के लिए सेवा-संवेदना के मूल मंत्र के साथ समन्वय, सहयोग, सहभागिता के तीन सूत्रों के साथ आइये मिलकर प्रभावी कदम उठायें। पहले हम स्वयं स्वस्थ रहकर  अपने परिवार को स्वस्थ रखें फिर उसके बाद समाज के स्वास्थ्य के लिए सेवा कार्य करते हुए राष्ट्र को स्वस्थ करने की आदर्श कल्पना साकार करने की दिशा में कदम बढ़ायें।

डाॅ. मधुसूदन देशपांडे, आयुर्वेद चिकित्सक, ओजस पंचकर्म सेंटर भोपाल के सहयोग से ...........
........कविता रावत

Wednesday, November 5, 2014

गुरु नानक जयन्ती

मुगल साम्राज्य की स्थापना के बाद जब तलवार के जोर पर धर्म परिवर्तन का सिलसिला चल पड़ा तो भय और अज्ञान के कुहासे को समूचे हिन्दुस्तान से मिटाने के लिए सन् 1469 को लाहौर के तलवंडी गांव में सिक्ख धर्म के प्रवर्तक गुरु नानक ने जन्म लेकर सत्य की राह दिखायी। वे एक ऐसे धर्मगुरु हुए जिन्होंने तात्कालिक राजनीतिक आतंकवाद, अत्याचार, हिंसा और दमन को मुखर रूप से अभिव्यक्त किया, जिसके कारण उन्हें जगतारक सद्गुरु के रूप में विश्व ने स्वीकार किया। "सतिगुरु, नानक, प्रगटिया मिटी धुंधु जगि चानण होया।"
         कहते हैं पूत के पांव पालने में ही दिखाई देने लगते हैं। बाल्यकाल में ही गुरु नानक में महापुरूष होने के लक्षण दिखाई देने लगे। कहते हैं कि साल भर की उम्र में उनके सारे दांत निकल आयेे। पांच वर्ष के हुए तो खेलना-कूदना छोड़कर वे अपने साथियों को ईश्वर संबंधी बातें सुनाने बैठ जाया करते थे। 7 वर्ष की अवस्था में जब उन्हें पाठशाला भेजा गया तो पंडित (गुरुजी) ने उन्हें पहाड़ा रटने को दिया तो वे बोले- "संसार में जो व्यक्ति इस हिसाब-किताब के प्रपंच में पड़ा, वह कभी सुखी नहीं रहा। मैं तो ईश्वर-भजन करने आया हूँ। मुझे भगवान का पाठ पढ़ाओ। वही सच्ची शिक्षा है।" इतना ही नहीं जब पंडित ब्रजनाथ के पास संस्कृत पढ़ने गये तो उन्होंने उन्हें पट्टी पर नमः सिद्धम् का मंत्र लिखकर उसे कंठस्थ करने को कहा तो वे  तब तक जिद्द पर अड़े रहे जब तक उन्हें इसका अर्थ नहीं बता दिया गया।  
            "हिन्दू और मुसलमान दोनों एक ही पिता के पुत्र हैं। खुदा, प्रभु या ईश्वर सभी एक ही हैं; केवल नाम का भेद है।" यह बात जब काजी और कुछ धर्मान्ध मुसलमानों ने नवाब को बतायी तो उन्होंने नानक से क्रोध में कहा- "तो तुम्हारा और हमारा ईश्वर एक ही है। अगर तुम उसी को मानते हो तो मस्जिद चलो और हमारे साथ नमाज पढ़ो।“ नानक और नवाब मस्जिद में नमाज पढ़ने लगे। नमाज के समय काजी मोटी आवाज में बंदगी करने लगा और सब नमाजी सिर झुकाकर नमाज पढ़ने लगे, किन्तु नानक का सिर नहीं झुका। नमाज पूरी हुई तो नमाज न पढ़ता देख नवाब का पारा चढ़ गया वे लाल-पीले होकर उन पर बरसे- "अरे नानक, तू पक्का ढोंगी है, झूठा और पाखंडी है। हम सबने सिर झुकाकर खुदा की बंदगी की किन्तु तू ठूंठ की तरह सीधा खड़ा रहा। तू हिन्दू और मुसलमान सभी को उलटे रास्ते पर ले जा रहा है, तुझे सजा मिलनी चाहिए" पास में काजी खड़े थे, वे भी क्रोध में हां में हां मिलाने लगे। अंत में नानक गंभीर होकर बोले, "नवाब साहब, मैं उसी के साथ बंदगी करता हूं जो मन से खुदा की बंदगी करता है। आपका सिर जमीन को छू रहा था किन्तु मन कंधार में घोड़े खरीदने गया था। काजी साहब सिर्फ नमाज की रस्म अदा कर रहे थे। वे सोच रहे थे- आज जो घोड़ी ब्याई है, उसकी हालत कैसी होगी? कहीं बछेरा कूद कर पास वाले कुएं में न जा गिरे। इसी कारण मैंने आप लोगों के साथ नमाज नहीं पढ़ी।" काजी और नवाब को अपने बारे में सच्ची बात सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने तुरन्त उन्हें अपना गुरु माना और उनके आगे आशीर्वाद के लिए अपना सिर लिया।
गुरु नानक देव धार्मिकता एकता के पुजारी थे। उन्होंने अपने नीति के दोहों में एकत्व, भ्रातृत्व, सेवा, सादगी, आत्मसंयम, आत्मालोचन एवं अन्तर्मुखता की प्रबल प्रेरणा दी है जो आज भी प्रासंगिक है।  उनके जीवन के कई प्रेरक प्रसंग हैं। कहते हैं कि जब वे उपदेश देते थे तो हिन्दू और मुसलमान दोनों बड़े मनोवेग से सुनने बैठ जाया करते थे, जो कई धर्माधिकारियों को फूटी आंख नहीं सुहाता था। ऐसे ही एक दिन वे उपदेश दे रहे थे कि -
           ईर्ष्या-द्वेष, वैर-विरोध, लोभ-मोह के जाल में फँसे लोगों को शांति का संदेश देने के लिए गुरु नानक ने 25 वर्ष तक विश्व भ्रमण किया। उन्होंने अपनी यात्रा का प्रारम्भ ऐमनाबाद, हरिद्वार, दिल्ली, काशी, गया और तथा श्री जगन्नाथपुरी से शुरू किया। तत्पश्चात् वे अर्बुदागिरि, रामेश्वर, सिंहलद्वीप होते हुए सरमौर, टिहरी गढ़वाल, हेमकूट, गोरखपुर, सिक्किम, भूटान, तिब्बत पहुंचे। वहां से वे ब्लुचिस्तान होते हुए मक्का गए। इस यात्रा में उन्होंने रूस, बगदाद, ईरान, कंधार, काबुल आदि की यात्रा की। 25 वर्ष की लम्बी यात्रा के बाद वे सन् 1522 से अपनी अंतिम परमधाम की यात्रा 22 सितम्बर, सन् 1539 तक करतारपुर रहे। यहाँ उन्होंने लोगों को उपदेशामृत के साथ ही अन्न भी वितरित किया और इसके साथ ही जातिगत भेदभाव को मिटाने के लिए लंगर की परम्परा आरम्भ की, जहाँ सभी जाति वर्ग के लोग एक पंक्ति में बैठकर आपसी भेदभाव भुलाकर सामूहिक भोज किया करते थे। गुरु नानक देव ने स्वयं अपनी यात्राओं के दौरान हर उस व्यक्ति का आतिथ्य स्वीकार किया जिसने उनका प्रेमपूर्वक स्वागत किया। निम्न जाति के समझे जाने वाले मरदाना को हमेशा अपने साथ रखा, जिसे वे भाई कहकर संबोधित किया करते थे। 
           आज गुरु नानक देव की पुण्य स्मृति को प्रकाश पर्व के रूप में मनाया जाता है। गुरुद्वारों में गुरु पर्व के आयोजन के साथ ही दीवान, सबद, कीर्तन, प्रवचन आदि का आयोजन किया जाता है। नगर के प्रमुख मार्गों में शोभा यात्रा निकाली जाती है। इसके साथ ही साथ गुरुद्वारों और विभिन्न स्थानों पर गुरुनानक देव द्वारा चलायी गई सांप्रदायिक सद्भाव की परम्परा लंगर भोज का आयोजन किया जाता है जहां सभी धर्मावलंबियों को जात-पात और भेद-भाव भुलाकर मिल-बैठ भोजन करते देख कोई भी गुरु नानक देव के प्रति नतमस्तक हुए बिना नहीं रह सकता।

गुरुपरब दियां सभ नूं लख लख बधाईयाँ.... .. कविता रावत


Thursday, October 30, 2014

लौह पुरुष जन्मदिवस बनाम राष्ट्रीय एकता दिवस

31 अक्टूबर 1875 ईं. को गुजरात के खेड़ा जिला के करमसद गांव में हमारे स्वतंत्रता-संग्राम के वीर सेना नायक सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म हुआ। इसी दिन पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की पुण्यतिथि भी है, जिसे अभी तक तुलनात्मक रूप से बड़ा महत्व दिया जाता रहा है। लेकिन इस बार मोदी सरकार ने लौह पुरुष  सरदार वल्लभभाई पटेल के जन्मदिवस को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने की अपील की है, जिसके तहत् देश भर में विभिन्न आयोजन किये जायेंगे। दिल्ली में पटेल चौक स्थित सरदार पटेल की प्रतिमा पर माल्यार्पण के साथ ही स्वयं प्रधानमंत्री मोदी विजय चौक से इंडिया गेट तक एकता दौड़ में शामिल होकर कार्यक्रम का शुभारम्भ करेंगे। इस अवसर पर दूरदर्शन द्वारा भी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान और आजादी के बाद पटेल के भाषणों को दिखाये जाने के साथ ही पूरे दिन कार्यक्रम प्रसारित किये जायेंगे। यह  निश्चित ही एक सराहनीय व उल्लेखनीय पहल है।
          सरदार वल्लभभाई पटेल फौजदारी के प्रसिद्ध वकील थे, जिससे उनकी खूब आमदनी थी। वे चाहते तो आराम की जिंदगी बिता सकते थे, लेकिन देश की सेवा उनके जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य था। सार्वजनिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने के कारण उन्हें यह समझते देर न लगी कि वकालत करके धन कमाने का जीवन और देश सेवा का जीवन साथ-साथ नहीं चल सकता। इसलिए वे वकालत को ठोकर मारकर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। उन्होंने 1916 से 1945 ई. तक के प्रत्येक आंदोलन में सक्रिय भाग लिया, जिससे वे शीघ्र ही देश के राष्ट्रीय नेताओं में गिने जाने लगे। बारडोल आंदोलन, खेड़ा सत्याग्रह, दाण्डी यात्रा, सविनय अवज्ञा आंदोलन, व्यक्तिगत सत्याग्रह और अंत में भारत छोड़ो राष्ट्रीय संघर्ष में सरदार वल्लभभाई पटेल अग्रणी पंक्ति में रहे।
          यह हम सभी जानते हैं कि भारत सन् 1947 ईं को स्वतंत्र हुआ। लेकिन इसके साथ ही अंग्रेज जाते-जाते जिस तरह से 562 देशी रियासतों को आजाद बने रहने की छूट दे गये, यदि समय रहते सरदार वल्लभभाई पटेल ने उन्हें एक सूत्र में अपनी सूझ-बूझ से संगठित न किया होता तो आज देश एक राष्ट्र के रूप में नहीं अपितु खण्ड-खण्ड रूप में बिखरा मिलता। जिस तरह जर्मनी के एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण ओटो वान बिस्मार्क ‘आयरन चांसलर’ नाम से प्रसिद्ध हुए उसी तरह देशी राज्यों को स्वतंत्र भारत में मिलाने के अपने महान कार्य के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल लौह पुरुष नाम से विश्वविख्यात हैं।  
          सरदार वल्लभभाई पटेल के स्वभाव में असाधारण दृढ़ता थी। वे जो एक बार निश्चय कर लेते, उसे पूरा करके ही छोड़ते थे। गुजरात के बारडोली क्षेत्र में बिना कारण जब किसानों के ऊपर लगान की दर बढ़ा दी गई तो उन्होंने किसानों के साथ जन आन्दोलन किया। उन्होंने अपनी दृढ़ निश्चयी व ओजस्वी वाणी में किसानों को संबोधित करते हुए कहा- "आप तो किसान हैं, किसान कभी दूसरे की ओर हाथ नहीं पसारता। आप सब काम करने वाले हैं, फिर डर किसका? आप किसी से न डरे। न्याय और प्रतिष्ठा के लिए बराबर लडि़ए। आवश्यकता पड़े तो सारे देश के किसानों के लिए लड़कर दिखा दीजिए। देश के लिए अपने को मिटाकर संसार में अपनी अमर कीर्ति फैला दीजिए। पटेल की इसी ललकार के परिणामस्वरूप सरकार को घुटने टेकने पड़े और समझौता करने के लिए बाध्य होना पड़ा। इस आंदोलन के मुख्य सूत्रधार होने से वे  सरदार उपाधि से जनप्रिय हुए।
          देश स्वतंत्र हुआ पर साथ ही विभाजित भी हो गया। ऐसे समय में शांति स्थापित करने और लाखों विस्थापितों को बसाने की और देशी राज्यों को देश की मुख्य धारा में मिलाने की समस्या भारत के प्रथम गृहमंत्री के रूप में सरदार पटेल के सामने आयी तो वे न हतप्रभ हुए नहीं विचलित। बड़ी दृढ़ता और सूझ-बूझ से उन्होंनें शीघ्र ही समस्याओं पर विजय प्राप्त की। 15 दिसम्बर, 1950 को उनके निधन पर पं. जवाहरलाल नेहरू ने कहा-"इतिहास उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता और भारत का एकीकरण करने वाले के रूप में याद करेगा। स्वतंत्रता-युद्ध के वे एक महान सेनापति थे। वे ऐसे मित्र, सहयोगी और साथी थे, जिनके ऊपर निर्विवाद रूप से भरोसा किया जा सकता था"
          ...कविता रावत

Tuesday, October 21, 2014

दीप पर्वोत्सव

कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी को धनतेरस से शुरू होकर भाई दूज तक मनाया जाने वाला पांच दिवसीय सुख, समृद्धि का खुशियों भरा दीपपर्व ’तमसो मा ज्योतिर्गमय’ अर्थात् 'अंधेरे से प्रकाश की ओर चलो' का संदेश लेकर आता है। अंधकार पर प्रकाश का विजय का यह पर्व समाज में उल्लास, भाईचारे व प्रेमभाव का संदेश फैलाता है। त्यौहार, पर्वादि हमारी भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग हैं, जिनके बिना हमारे भारतीय जनमानस की खुशियाँ अधूरी व जिन्दगी बेरौनक है। त्यौहार हो या कोई भी पर्व ये सिर्फ ईश्वरीय पूजा या जमाने के साथ चलने का माध्यम मात्र नहीं है, अपितु इनके मूल में ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयः, सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चित् दुःख भागभवेत, के साथ ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना निहित है।
धनतेरस: दीपावली के दो दिन पहले धनतेरस मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान धन्वन्तरि समुद्र में से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, अतः इस दिन आरोग्य एवं दीर्घायु की कामना के लिए इनकी पूजा की जाती है। धनतेरस के दिन बाजारों में बड़ी रौनक रहती है। इस दिन बरतन खरीदना सबसे शुभ माना जाता है। प्रत्येक परिवार अपनी-अपनी आवश्यकता और सामथ्र्य अनुसार बरतन खरीदता है। इसी दिन सायंकाल प्रदोष काल में आटे का दीपक बनाकर घर के बाहर तुलसी या मुख्यद्वार पर एक पात्र में अनाज रखकर आयु की रक्षा के लिए वैदिक देवता यमराज के निमित्त दक्षिण की ओर मुह करके ‘मृत्युना पाश्हस्तेन कालेन भार्यया सह। त्रयोदश्यां दीपदानात्सूर्यजः प्रीतयामिति’ मंत्र का उच्चारण कर दीपदान किए जाने का विधान है।
नरक चतुर्दशी:  नरक चतुर्दशी को रूप चतुर्दशी और छोटी दीपावली के नाम से भी मनाया जाता है। माना जाता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण से देव तथा मानवों को यातना देने वाले दैत्य नरकासुर का वध कर उसके बंदीगृह की 16 सहस्त्र राजकन्याओं को मुक्त किया। अतः यह पर्व दुष्ट लोगों से रक्षा तथा उनके संहार के उद्देश्य से मनाया जाता है। इस दिन श्रीकृष्ण की पूजा कर इसे रूप चतुर्दशी के रूप में मनाया जाता है।  मान्यता है कि इस दिन पितृश्वरों का आगमन हमारे घरों में होता है, अतः उनकी आत्मा की शांति के लिए यमराज के निमित्त घर के बाहर तेल का चैमुख दीपक और सोलह छोटे दीए जलाकर अपने ईष्ट देव की पूजा की जाती है।
दीपावली: धनतेरस और नरक चतुर्दशी के बाद दीपावली आती है। दीपावली को मनाने का सबसे प्रचलित जनश्रुति भगवान श्रीराम से जुड़ी है, जिसमें माना जाता है कि भगवान श्रीराम जब लंका विजय के बाद माता सीता सहित अयोध्या लोटे तो अयोध्यावासियों ने उनके स्वागत के लिए अपने-अपने घरों की साफ-सफाई कर अमावस्या की रात्रि में दीपों की पंक्ति जलाकर उसे पूर्णिमा बना दिया। इसलिए यह परम्परा दीपों के पर्व के रूप में मनाया जाने लगा। इस दिन घरों में सुबह से ही तरह-तरह के पाकवान बनाये जाते हैं। बाजार तरह-तरह की मिठाईयों, खील-बताशे, खांड के खिलौने, लक्ष्मी गणेश आदि की मूर्तियों से सजे नजर आते हें। जगह-जगह आतिशबाजी और पटाखों की दुकाने सज जाती हैं।
रात्रि को सभी लोग घरों की साफ-सफाई और साज-सज्जा में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ना चाहते क्योंकि मान्यता है कि दीपावली कीरात लक्ष्मी जी सर्वत्र विचरण करते हुए अपने स्वयं के निवास योग्य स्थान ढूंढ़ती है, ऐसा स्थान जहाँ अंधेरा और अंधेरे की ही भांति गंदा न दिखाई दे। वह केवल बाह्य स्वच्छता ही नहीं अपितु पूरे परिवार के अंतःकरण की पवित्रता एवं शुचिता पर ध्यान देती है। इस संबंध में पुराणों के माध्यम से में लक्ष्मी जी का संदेश दिया गया है कि “वसामि नित्यं सुभगे प्रगल्भे दक्षे नरे कर्मणि वर्तमाने। अक्रोधने देवपरे कृतज्ञे जितेन्द्रिये नित्यमुदीर्णसत्तवे।। स्वधर्मशीलेषु च धर्मवित्सु वृद्वोपसेवानिरते च दान्ते। कृतात्मनि क्षान्तिपरे समर्थे क्षान्तासु दान्तासु तथाऽबलासु।।“
गोवर्धन पूजा:  दीपावली के अगले दिन गोवर्धन पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने इन्द्र के कोप से डूबते ब्रजवासियों को बचाने के लिए गोवर्धन की पूजा कर अपने अंगुली उठाया। यह कृषक वर्ग के लिए विशेष पर्व है। इस दिन लोग अपने गाय-बैलों को सजाकर तथा गोबर का पर्वत बनाकर ’ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय“ मंत्र का जाप कर पूजा करते हैं। मान्यता है कि इस दिन गौमाता की पूजा करने से सभी पा उतर जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
भाई दूज: गोवर्धन पूजा के अगले दिन बहने अपने भाई के माथे पर तिलक लगाकर उसके दीर्घायु की कामना के लिए हाथ जोड़कर यमराज से प्रार्थना करती हैं।  भैयादूज भाई-बहन के प्रेम के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। भाई दूज को यम द्वितीया भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसी दिन मत्यु के देवता यम की बहन यमी (सूर्य पुत्री यमुना) ने अपने भाई यमराज को तिलक लगाकर भोजन कराया था तथा भगवान से प्रार्थना की थी कि उसका भाई सकुशल रहे। इसलिए इसे यम द्वितीया कहते हैं।  
दीपावली में साफ-सफाई का विशेष महत्व है। क्योंकि इसका सीधा सम्बन्ध हमारे शरीर को आरोग्य बनाए रखने से जुड़ा होता है। शरीर को सत्कर्म का सबसे पहला साधन माना गया है (शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्) और यह तभी सम्भव हो सकता है जब हम स्वस्थ रहेंगे। क्योंकि पूर्ण स्वास्थ्य संपदा से बढ़कर है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास होता है। इसके लिए जरूरी है वर्षा ऋतु समाप्त होने पर घरों में छिपे मच्छरों, खटमलों, पिस्सुओं और अन्य दूसरे विषैले कीटाओं को मार-भगाने का यचोचित उपचार जिससे मलेरिया, टाइफाइड जैसी घातक बीमारियों को फलने-फलने को अवसर न मिले। सभी लोग अपनी सामर्थ्य के अनुसार घरों की लिपाई-पुताई, रंग-रोगन कर घर की गन्दगी दूर करने के साथ ही आस-पड़ोस की भी साफ़- सफाई का पर विशेष  ध्यान रखकर खुशियों की दीप जलाएं, यही शुभ कामना है।
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दीपावली की हार्दिक शुभकामनाओं सहित ........कविता रावत



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