Friday, August 28, 2015

कच्चे धागों में बहनों का प्यार है

कच्चे धागों में बहनों का प्यार है 
देखो राखी का आया त्यौहार है   



सभी को राष्ट्रव्यापी पारिवारिक पर्व रक्षाबंधन की हार्दिक मंगलकामनाएं!

Friday, August 14, 2015

हिन्द देश का प्यारा झंडा

हिन्द देश का प्यारा झंडा ऊँचा सदा रहेगा
तूफान और बादलों से भी नहीं झुकेगा
नहीं झुकेगा, नहीं झुकेगा, झंडा नहीं झुकेगा
हिन्द देश का प्यारा ..........................

केसरिया बल भरने वाला सदा है सच्चाई
हरा रंग है हरी हमारी धरती है अँगड़ाई
कहता है यह चक्र हमारा कदम कभी नहीं रुकेगा
हिहिन्द देश का प्यारा ..........................

शान नहीं ये झंडा है ये अरमान हमारा
ये बल पौरुष है सदियों का ये बलिदान हमारा
आसमान में फहराए या सागर में लहराए
जहाँ-जहाँ ये झंडा जाए यह सन्देश सुनाए
है आज़ाद हिन्द ये दुनिया को आज़ाद करेगा
हिन्द देश का प्यारा ..........................

नहीं चाहते हम दुनिया को अपना दास बनाना
नहीं चाहते हम औरों के मुँह की रोटी खा जाना
सत्य न्याय के लिए हमारा लहू सदा बहेगा
हिन्द देश का प्यारा ..........................

हम कितने सुख सपने लेकर इसको फहराते हैं
इस झंडे पर मर मिटने की कसम सभी खाते हैं
हिन्द देश का यह झंडा घर-घर में लहराएगा
हिन्द देश का प्यारा ..........................
                                                       - अज्ञात 

Monday, August 10, 2015

उद्यानिकी स्वर्ण क्रान्ति अभियान


हमारा भोपाल शहर बहुत खूबसूरत है और अब इस खूबसूरती को घर-घर तक पहुंचाकर उस पर चार चांद लगाने का शुभारम्भ गुलाब उद्यान भोपाल द्वारा गार्डन एट काॅल और फल, सब्जी परिरक्षण, प्रसंस्करण एवं प्रशिक्षण केन्द्र की सुविधा देकर करने जा रहा है। जिसमें कोई भी व्यक्ति टेलीफोन कर गार्डन एट काॅल की सुविधा के तहत् अपने निवास पर शोभायमान पौधे, लाॅन लगाने के साथ-साथ अपने बगीचे के रख-रखाव की सुविधा का लाभ उठाने के साथ ही प्रशिक्षण केन्द्र में फलों एवं सब्जियों का परिरक्षण करा सकेंगे। इस हेतु प्रशिक्षण केन्द्र में प्रत्येक माह में 2 सात दिवसीय प्रशिक्षण शिविर में फल, सब्जी परिरक्षण एवं प्रसंस्करण की उन्नत तकनीकी जानकारी दी जायेगी।           
प्रदेश में उद्यान के समग्र विकास हेतु मध्यप्रदेश उद्यानिकी स्वर्ण क्रान्ति अभियान प्रारम्भ किया जा रहा है, जिसके प्रथम चरण में प्रदेश के सभी जिलों में 10 अगस्त 2015 को उद्यान महोत्सव एवं पुष्प महोत्सव का आयोजन कर लगभग 15 लाख फलदार वृक्ष एवं 1 करोड़ फूलों के पौधे दिसम्बर तक रोपित किए जाने के लक्ष्य के साथ ही 20 लाख नैनो आॅर्चर्ड स्थापना सह-वाड़ी विकास कार्यक्रम निर्धारित किया गया है। उद्यानिकी स्वर्ण क्रांति अभियान के तहत उद्यान विभाग द्वारा विद्यालय, महाविद्यालय चिकित्सालय, शासकीय कार्यालय एवं रिक्त शासकीय भूमि पर विभिन्न प्रकार के फलदार पौधे जैसे आम, अमरूद, बैर, जामून, सीताफल आदि की आवश्यकता अनुसार पौधो का वितरण निःशुल्क किया जावेगा। इस कार्यक्रम के तहत् कृषक अपने वाड़ी में फलदार वृक्ष एवं सब्जी उत्पादन कर पौष्टिक आहार की पूर्ति कर अतिशेष का विक्रय कर आय भी प्राप्त कर सकेंगे। उद्यानिकी स्वर्ण क्रांति अभियान के तहत् उद्यानिकी फसलों में उत्पादन, उत्पादकता एवं क्षेत्रफल वृद्धि के साथ-साथ तकनीकी हस्तक्षेप, डिजिटाईजेशन के कार्य के साथ ही प्रसंस्करण, विपणन एवं बाण्ड इक्विटी पर विशेष ध्यान देते हुए कृषकों की एवं प्रदेश की आर्थिक स्थिति को सुधारने का लक्ष्य निर्धारण किया गया है।           
आज शहरों में बढ़ती पर्यावरण प्रदूषण की समस्या शहरवासियों से प्राकृतिक वायु और शुद्ध जल छीनकर उन्हें नई-नई असाध्य बीमारियों की ओर धकेल रही है। शुद्ध हवा जीवन जीने का अनिवार्य तत्व है, जिसके स्रोत हैं-वन, हरे-भरे बाग-बगीचे और लहलहाते पेड़-पौधे। इनके संरक्षण में ही मानव जीवन का हित समाहित है। पेड़-पौधों से मिलने वाले आॅक्सीजन से ही पर्यावरण स्वस्थ और शुद्ध रहता है। इसके लिए हमें अपने घर के आस-पास, छत, बाग-बगीचों में फल-फूल के पेड़-पौधों का रोपण कर शहर में बढ़ते प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए हर संभव प्रयास करते रहने की सख्त जरूरत है। इसके लिए सरकारी/गैर सरकारी संस्थाओं द्वारा आयोजित आयोजनों का लाभ उठाते हुए निरंतर जन-जन तक पर्यावरण की शुद्धि के लिए तथा प्रदूषण से मानवों की रक्षा के लिए प्रचार-प्रचार कर लोगों को प्रोत्साहित करने के लिए संकल्पित होना होगा। 
इस दिशा में हमारे भोपाल में मध्यप्रदेश रोज सोसायटी और संचालनालय उद्यानिकी की ओर से जनवरी के प्रथम सप्ताह में २ दिवसीय अखिल भारतीय गुलाब प्रदर्शनी का आयोजन अनुकरणीय व उल्लेखनीय पहल है, जिसमें शहरवासियों को गुलाब की वर्तमान प्रचलित किस्मों जिसमें हाइब्रिड गुलाब, देशी गुलाब एवं कटिंग-बडिंग से निर्मित गुलाबों के साथ वर्गीकृत पांच किस्म एच.टी.गुलाब, फ्लोरीबन्डा, मिनीएचर (बटन गुलाब), पोलीयेन्था और लता गुलाब समूह के अंतर्गत आने वाले लगभग 500 किस्मों को एक साथ देखने-समझने का सुनहरा अवसर मिलता है। इस प्रदर्शनी में गुलाबों के लगभग ३०-३५  स्टॉल्स पर पिटोनिया, लिबोनिका, पैंजी, फलॉक्स,  डायम्पस, गुलदाउदी, डहेलिया, लिफोरिया, सालविया, पंसेटिया और सकीलैंड्स जैसे पौधों के बहुत से प्रकार  सतरंगी गुलाबी खुशबुओं की महक चारों ओर बिखेरते हैं।  इसके साथ ही दिल्ली, कोलकाता, हैदराबाद, महाराष्ट्र, जमशेदपुर, नागपुर, इन्दौर, पचमढ़ी, जयपुर आदि शहरों से लाए गए गुलाब की विभिन्न किस्में जैसे- कबाना, ब्लैक बकारा, डकोलेंडी, डायना प्रिंसिंस ऑफ  द वॉल, डीप सीक्रेट, जस जॉय, रोज ओ बिन, हैडलाइनर अपनी खूबसूरती और खूबियों से लोगों का मन मोह लेते हैं और उन्हें अपने घरों में लगाने के लिए उत्साहित करते हैं। गुलाब प्रदर्शनी के साथ सैकड़ों किस्म के बोनसाई क्लबों की विशिष्ट बोन्साई कला का सार्थक प्रदर्शन भी मुख्य आकर्षण का केंद्र बना रहता हैं। सुन्दर सजावट के साथ रखे बोनसाई पेड़-पौधे जिसमें बरगद, पीपल, साइकस पाम, आम, नीबू, अमरूद, शहतूत, नारंगी, लोलिना पाम, टी साइकस आदि  लोगों को पर्यावरण संतुलन बनाये रखने के लिए प्रेरित करते हैं।

Saturday, July 25, 2015

व्यापमं और डीमेट घोटाले का डरावना सच

वर्ष 2009 में जब मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित एमपी नगर थाने में व्यापमं ने बुंदेलखंड सागर मेडिकल काॅलेज से प्राप्त प्रतिवेदन के आधार पर 9 छात्रों के खिलाफ एफआईआर क्रमांक 728/9 दर्ज कराई तो किसी को भनक तक नहीं थी कि यह विश्व के सबसे बड़े शिक्षा घोटाले का पर्दाफाश कर देगा। उस वक्त दयाल सिंह, जाहर सिंह, दिलीप सिंह, कुमारी इन्द्रा वारिया, भारत सिंह, कमलेश झावर, रौनक जायसवाल, अश्विन जाॅयसेस, पंकज धु्रर्वे और प्रदीप खरे नामक 9 छात्रों के खिलाफ व्यापमं की मेडिकल परीक्षा में मुन्नाभाई की तर्ज पर स्कोरर के माध्यम से पास होने का आरोप लगाते हुए यह एफआईआर दर्ज की गई थी। दरअसल इन नौ छात्रों को उस प्रवेश समिति के सदस्यों ने पकड़ा था जिसने चेहरों के मिलान करने के बाद यह पाया कि जिन छात्रों ने परीक्षा दी थी उनके और प्रवेश लेने वाले छात्रों के चेहरे अलग-अलग थे। इन 9 छात्रों को गिरफ्तार कर लिया गया और वे जमानत पर छूट भी गए। लेकिन इनते बड़े कांड को उस वक्त मध्यप्रदेश सीआईडी, इंटेलीजेंस से लेकर तमाम एजेंसियों ने नजर अंदाज क्यों किया। उस एफआईआर को कागज समझकर वहीं के वहीं दफन कर दिया। नतीजा यह रहा कि वर्ष 2011 में जब यह मामला ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा तब जाकर इसमें बड़े-बड़े नाम उजागर हुए और गिरफ्तारियों का सिलसिला शुरू हुआ।
इस बीच 2009 से 2011 तक मुन्ना भाईयों की खेप पर खेप निकाली जाती रही। लेकिन तब भी सरकार की नींद नहीं खुली। वर्ष 2009-10 से वर्ष 2013-14 में निजी काॅलेजों ने व्रूापमं घोटाले के परत दर परत खुलने के बावजूद डीमेट के नाम पर जमकर मनमानी की। स्टेट कोटे की सीटों को भी निजी काॅलेजों ने नहीं छोड़ा। इस मामले में जब चिकित्सा शिक्षा विभाग ने फीस रेग्यूलेटरी कमेटी को लिखा तो उन्होंने आज तक इन वर्षों में जो सीटें निजी कालेजों ने बेची थी उनका हिसाब नहीं दिया। मात्र 2013 की सीटों के बारे में फीस रेग्यूलेटरी कमेटी ने अपना निर्णय दिया। एफआरसी ने इस अनियमितता को सच पाते हुए चिरायु मेडिकल काॅलेज पर 225 लाख, अरविंदों मेडिकल काॅलेज पर 40 लाख, इंडेक्स मेडिकल काॅलेज पर 550 लाख, पीपुल्स मेडिकली काॅलेज पर 215 लाख, एलएन मेडिकल काॅलेज पर 245 लाख और आरडीगार्डी पर 35 लाख की पैनल्टी लगाई है। निजी काॅलेज वाले पैनल्टी न देने के बहाने पर अपीलीय प्राधिकरण के पास चले गए। गड़बड़ी पाई गई तभी तो पैनल्टी लगाई गई थी। यदि एफआरसी इन चार-पांच वर्षों का निर्णय एक ही साथ दे देती तो इन काॅलेजों के ऊपर करोड़ों की पैनल्टी निकलती और सरकारी सीट को खाने वाले काॅलेजों के संचालकों को जेल की हवा खानी पड़ती। परन्तु मामला कानूनी पेंचीदगियों में उलझकर रह गया। सरकारी कोटे की सीटें बेच दी गई और सरकार हाथ पर हाथ धरकर बैठी रही। वे बच्चे जिन्होंने मेडिकल में आने का सपना देखा था उनके मंसूबों पर पानी इन्हीं गफलतों के कारण फिर गया। ठीक वैसे ही जैसे वर्ष 2009 में एफआईआर के बावजूद सरकारी सोती रही। सरकार की कुम्भकरणी नींद तब भी नहीं टूटी जब 150 से अधिक मुन्नाभाईयों का पर्दापाश हो चुका था। मध्यप्रदेश मुन्नाभाईयों की जन्नत बन चुका था। विधानसभा में कईयों बार यह प्रश्न उठा। व्यापमं घोटाले पर जमकर हंगामा भी हुआ। लेकिन निष्कर्ष नहीं निकल पाया। निजी तौर पर भी कई लोगों ने सूचना के अधिकार के तहत् मुन्नाभाईयों की मार्कशीट, जाति प्रमाण पत्र, फोटो समेत तमाम दस्तावेज मांगे लेकिन नतीजा सिफर रहा। इसीलिए घोटालेबाजों का हौंसला बढ़ता गया और उन्होंने डीमेट में भी पूरा 100 प्रतिशत फर्जीवाड़ा कर दिखाया।  व्यापमं घोटाले की आंच में सुलग रहे मध्यप्रदेश और उसकी तपिश से परेशान शिवराज सरकार के सामने एक नई मुसीबत आन खड़ी हुई है। प्राइवेट मेडिकल काॅलेजों में प्रवेश के लिए जिम्मेदार डीमेट परीक्षा के डायरेक्टर उपरीत ने जो खुलासे किए हैं उससे प्रदेशभर के नौकरशाहों, मंत्रियों, अधिकारियों की सांसे ऊपर-नीचे हो रही हैं। डीमेट घोटाले से जुड़े लोग उच्च पदों पर पदस्थ हैं। यह एक संयोग ही है कि डीमेट के पेरे सेटअप की नींच भी नितिन महिन्द्रा ने ही वर्ष 2006 में रखी थी। व्यापमं और डीमेट में एक समानता यह भी है कि दोनों महाघोटालों के किरदार मिलते-जुलते हैं। नितिन महिन्द्रा और उनके करीबी दोस्त अजय मेहता जिनके तार मुख्यमंत्री निवास से भी जुड़े हुए हैं। इन्हीं का जुड़ाव एटीएस टेक्नोलाॅजी से जुड़ा हुआ है, जो डीमेट घोटाले में सक्रिय थी। अरविन्दो मेडिकल काॅलेज और पीपुल्स मेडिकल काॅलेज सबसे पुराने मेडकल काॅलेजों में से एक हैं। यदि इनसे पास आउट बच्चों की लिस्ट निकाली जाए और उनके माता-पिता की पूरी जानकारी पता की जाए तो ऐसे चैंकाने वाले नाम सामने आएंगे जिससे प्रदेश के प्रशासनिक, राजनीतिक और न्यायिक गलियारों में भूचाल आ जाएगा। डीमेट एक ऐसा हमाम है जिसमें प्रदेश की न्यायपालिका, कार्यपालिका और व्यवस्थापिका नग्न नजर आती है। इस मामले में मेडिकल काउंसिल आॅफ इंडिया ने भी आंख बंद कर रखी थी। यह भी पता लगाने का प्रयास नहीं किया कि जिन बच्चों को एडमीशन दिया जा रहा है वे एडमीशन की पात्रता रखते हैं या नहीं।
मध्यप्रदेश के प्राइवेट मेडिकल काॅलेज में दो ही तरीके से प्रवेश हो सकता है। या तो बच्चा पीएमटी से पास हुआ हो जो राज्य कोटे में भर्ती होता है या डीमेट से पास हुआ हो। एनआरआई कोटे के बाद बची सीटों में से आधी डीमेट और आधी पीएमटी से भरी जाती हैं। लेकिन ऐसे भी कई उदाहरण हैं जिनमें उन बच्चों को प्रवेश दे दिया गया जिन्होंने न तो डीमेट किया और न ही पीएमटी की परीक्षा दी। उदाहरणस्वरूप इन्डेक्स काॅलेज में गुजरात से परीक्षा पास छात्र को एडमीशन दे दिया गया, जिनके पीएमटी में 50 प्रतिशत अंक भी नहीं थे। अगर कायदे से देखा जाए तो इतने कम अंकों में प्रवेश की पात्रता भी नहीं थी। ऐसे न जाने कितने उदाहरण हैं। जैसे भोपाल के लोकायुक्त में डीएसपी के पद पर पदस्थ अधिकारी के बेटे अजय रघुवंशी, इंदौर की विधायक और वर्तमान में मेयर मालनी गौड़ के सुपुत्र कर्मवीर गौड़ और कांग्रेस के पूर्व मंत्री के खास लक्ष्मण ढोली के सुपुत्र तन्मय ढोली को परीक्षाओं में 50 प्रतिशत भी नहीं मिले, लेकिन वे अरविन्दो मेडिकल काॅलेज से डाॅक्टर बन गए, जो कि एमसीआई के नियमों का सरासर उल्लंघन है। मध्यप्रदेश के चिकित्सा शिक्षा विभाग, एमसीआई और निजी काॅलेज संचालकों की मिलीभगत का इससे बड़ा उदाहरण और क्या होगा कि हाईकोर्ट जबलपुर बेंच ने इन तीन छात्रों के प्रवेश का तो नामजद गलत ठहराया था। चिकित्सा शिक्षा विभाग को कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। लेकिन वे डाॅक्टरों की डिग्री लेकर समाज में दुकानें खोलकर बैठे हैं। ये तो एक बानगी मात्र है। ऐसे किस्सों से डीमेट का इतिहास भरा पड़ा हुआ है। वर्ष 2006-07 में भी एक आईएएस अधिकारी का साला 12 लाख रुपए के साथ गिरफ्तार हुआ था। यह मामला दबा दिया गया। वर्तमान एसआईटी के चेयरमैन ने भी इस मामले में जांच पड़ताल की थी। उन्होंने कई अनियमितताओं की तरफ इशारा किया था, लेकिन उनकी जांच भी दबा दी गई। इसके बाद जब सुप्रीम कोर्ट में 23 सितम्बर 2011 को न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी और दीपक वर्मा की बेंच ने डीमेट तथा पीएमटी में 50-50 प्रतिशत सीटें भरने का निर्णय दिया था। उस समय यह साफ कहा था कि डीमेट की परीक्षा में पारदर्शिता होनी चाहिए पर यह परीक्षा पारदर्शिता के लिए बनी ही नहीं थी। यहीं से उपरीत और तमाम गड़बड़ी करने वालों की भूमिका शुरू होती है। डीमेट की परीक्षा का विधान इस प्रकार बनाया गया है कि फर्जीवाड़े की पूरी गुंजाइश रखी गई है। न्यायिक हिरासत में जेल जाने से पहले डीमेट के कोआॅर्डिनेटर एवं कोषाध्यक्ष योगेश उपरीत ने एसटीएफ व एसआईटी को बताया था कि डीमेट का रिकार्ड तीन महीने तक ही सुरक्षित रखा जाता है और उसके बाद नष्ट कर दिया जाता है। इस परीक्षा में 100 प्रतिशत छात्रों की उत्तर पुस्तिका पर गोले काले किए जाते हैं। क्योंकि निजी मेडिकल काॅलेजों के संचालक परीक्षा से पहले डीमेट को उन छात्रों की सूची थमा देते हैं, जिनके सिलेक्शन होने होते हैं।  इसी सूची के आधार पर डीमेट की रेवड़ी बांटी जाती है। भोपाल के एक नामी डाॅक्टर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया है कि जिन छात्रों को लाखों रुपए लेकर डीमेट के द्वारा भर्ती करवाया गया वे सब पूरी की पूरी उत्तर पुस्तिका खाली छोड़कर आए थे। यह फर्जीवाड़ा वर्ष 2006 में डीमेट के गठन के बाद से ही चल रहा है। जब रिकार्ड नहीं है तो सबूत कहां से मिलेंगे। पिछले 9 साल में डीमेट के द्वारा कितने छात्रों का हक मारा गया है और कितने अयोग्य लोगों को डिग्रियां थमा दी गईं इसकी जानकारी उपरीत जैसे मोहरों को ही हो सकती है। जिन्हें आगे रखकर बिसात बिछाने वाले सफेद पोश अभी भी बंकरों मे दुबके हुए हैं। उपरीत बहुत कुछ जानते हैं लेकिन वे निजी मेडिकल काॅलेज की इस करतूत का खुलासा करेंगे इसमें संदेह ही है। फिलहाल एसआईटी ने जबलपुर के न्यूरोलाॅजिस्ट एम एस जौहरी की बेटी डाॅ. रिचा जौहरी को गिरफ्तार करने के लिए जाल बिछाया है। डाॅ. एमएस जौहरी पहले से ही गिरफ्तार हैं। उपरीत ने स्वीकार किया था कि जौहरी ने अपनी बेटी के प्रीपीजी में एडमिशन के लिए 25 लाख रुपए की रिश्वत दी थी। जौहरी के बंगले में पुरानी फाइलों में इस रिश्वतखोरी का हिसाब-किताब मिल गया। अभी गिरफ्तारियों का सिलसिला जारी है। यदि उपरीत ने पूरा सच बता दिया तो न जाने कितने चेहरे बेनकाब हो जाएंगे। देखा जाए तो मध्यप्रदेश के सभी मेडिकल काॅलेज इस जांच के दायरे में आ सकते हैं। डीमेट के सारे पदाधिकारी इस घोटाले में शामिल बताए जा रहे हैं। पिछले 9 वर्ष के दौरान गलत तरीके से प्रवेश देने वाले 5 हजार 500 छात्र जांच के दायरे में आ सकते हैं। लेकिन जो रिकार्ड नष्ट हुआ है उसे कैसे रिकवर किया जाएगा। यह एक अहम सवाल है।

इससे भी बड़ा सवाल सरकार के समक्ष उपस्थित हुआ है क्योंकि डीमेट के नियम बनाकर उसको संचालित करने की जिम्मेदारी तो सरकार की ही थी। सभी चिकित्सा शिक्षा मंत्रियों ने मेडिकल काॅलेजों की लाॅबी के दबाव के आगे आत्मसमर्पण कर दिया। परीक्षा संचालन के नियम भी आज तक नहीं बन पाए हैं। परीक्षा मेें सुधार के कई सुझाव दिए गए। चाहे वह उत्तर पुस्तिका स्केन करने का मामला हो या फिर अंक सूची पर नजर रखने की बात। जब उत्तर पुस्तिका जांचने वाले कुछ परीक्षकों ने खाली उत्तर पुस्तिका को काट कर उस पर हस्ताक्षर करने शुरू कर दिए तो उसके लिए भी रास्ता निकाल लिया गया। तू डाल-डाल मैं पात-पात वाली स्थिति है। प्रीपीजी के रेट आज भी डेढ़ करोड़ से लेकर 90 लाख तक तय हैं। कुछ बदला नहीं है। बस पैसे खर्च करने हैं। यह पैसा बड़े-बड़े निजी अस्पतालों के संचालक हँसते-हँसते दे देते हैं। क्योंकि उन्हें अपना पुस्तैनी धंधा चलाना है। अगली पीढ़ी को डाॅक्टर बनाना उनकी मजबूरी है। इसीलिए जिनमें कम्पाउंडर बनने की अक्ल नहीं है वे आज की तारीख में निजी अस्पतालों के विख्यात डाॅक्टर बन बैठे हैं। दिक्कत यह है कि वर्ष 2008 में ही इस फर्जीवाड़े का पता लगने के बाद नितिन महिन्द्रा, अमित मिश्रा, पंकज त्रिवेदी, योगेश उपरीत जैसे कई महाघोटालेबाजों को पनपने का मौका दिया गया। डाॅ. जगदीश सागर ने तो निजी काॅलेजों में डीेमेट के नाम पर पैसा लेकर फर्जी जाति प्रमाण पत्र के सहारे पीएमटी में सेलेक्शन करवा दिया। त्रिवेदी बंधुओं, पंकज और पीयूष की हर जगह प्रोफेशनल शिक्षा में दखलअंदाजी है।    
पाक्षिक पत्रिका अक्स  के प्रकाशक एवं संपादक श्री राजेंद्र आगाल जी द्वारा 'अक्स' में लिखित आवरण कथा से साभार।  






Tuesday, July 14, 2015

वर्षा ऋतु में स्वस्थ रहने के जरुरी सबक

वर्षा ऋतु को ‘चौमासा‘ कहा जाता है। आयुर्वेदज्ञों ने इस ऋतु में स्वास्थ्य रक्षा  के लिए 'ऋतुचर्या' के कुछ नियम बनाये हैं। उनका पालन करने पर इस ऋतु में स्वस्थ रहा जा सकता है। वर्षा ऋतु में वात दोष कुपित होता है, अतः बुजुर्गों और वातजन्य रोगों के मरीजों को विशेष रूप से वातवर्धक खानपान और रहन-सहन से बचना चाहिए।
सम्भावित रोग
पाचन शक्ति का कम होना, शारीरिक कमजोरी, रक्तविकार, वायुदोष, जोड़ों का दर्द, सूजन, त्वचाविकार, दाद कृमिरोग, ज्वर, मलेरिया, पेचिस तथा अन्य वायरस एवं जीवाणुजन्य रोग होने की सम्भावना रहती है।
प्रयोग करें
  • अम्ल, नमक, चिकनाई वाला भोजन करना हितकर है।
  • पुराने चावल, जौ, गेहूँ आदि का सेवन करना चाहिए।
  • घी व दूघ का प्रयोग भोजन के साथ करना चाहिए।
  • कद्दू, परवल, करेला, लौकी, तुरई, अदरक, जीरा, मैथी, लहसुन का सेवन हितकर है।
  • छिलके वाली मूंग की दाल का सेवन करना चाहिए।
  • बाहर से घर में वर्षा से भीगकर लौटने पर स्वच्छ जल से स्नान अवश्य करें।
  • वर्षा ऋतु में भोजन बनाते समय आहार में थोड़ा सा मधु (शहद) मिला देने से मंदाग्नि दूर होती है व भूख खुलकर लगती है। अल्प मात्रा में मधु के नियमित सेवन से अजीर्ण, थकान और वायुजन्य रोगों से भी बचाव होता है।
  • तेलों में तिल का सेवन उत्तम है। यह वात रोगों का शमन करता है।
  • भोजन में नींबू का प्रयोग प्रतिदिन करना चाहिए।
  • नींबू वर्षा ऋतु में होने वाली बीमारियों में बहुत ही लाभदायक है।
  • फलों में आम तथा जामुन सर्वोत्तम माने गए हैं। आम आंतों को शक्तिशाली बनाता है। चूसकर खाया हुआ आम पचने में हल्का, वायु तथा पित्तविकारों का शमन करने वाला होता है।
  • वर्षाकाल में रसायन के रूप में बड़ी हरड़ का चूर्ण व चुटकी भर सेंधा नमक मिलाकर ताजे जल के साथ सेवन करना चाहिए।
  • मच्छरों के काटने पर उत्पन्न मलेरिया आदि रोगों से बचने के लिए मच्छरदानी लगाकर सोएं। चर्मरोग से बचने के लिए शरीर की साफ सफाई का भी ध्यान रखें।
  • वर्षा ऋतु में सूती व हल्के वस्त्र पहनें।
प्रयोग न करें
  • आलू, अरबी जैसे कन्दशाक, चावल, भिन्डी, मटर, पत्ता गोभी, फूलगोभी आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • गरिष्ठ बासी, अधिक मसालेदार व ठंडी तासीर वाले भोजन का सेवन न करें।
  • दही, मांस, मछली का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • अधिक तरल पदार्थ व मदिरा का सेवन नहीं करना चाहिए।
  • दिन में सोना व रात्रि जागरण नहीं करना चाहिए।
  • ओंस में खुले स्थान में नहीं सोना चाहिए।
  • अत्यधिक ठंडा पानी, कोल्ड ड्रिंक व आइस्क्रीम के सेवन से बचना चाहिए।
  • अधिक व्यायाम, अधिक शारीरिक श्रम व अधिक धूप का सेवन न करें।
  • स्नान के तुरन्त बाद गीले शरीर पंखे की हवा में नहीं जाना चाहिए।
  • भोजन निश्चित समय पर ही करना चाहिए, अधिक देर तक भूखे नहीं रहना चाहिए।
  • पित्तवर्द्धक पदार्थों का सेवन नहीं करें। गाय, भैंस कच्ची घास खाती है। इसकी वजह से उनका दूध दूषित रहता है। अतः श्रावण मास में दूध एवं पत्तेदार हरी सब्जियां तथा भादों में छाछ का सेवन करना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना गया है।
  • सीलन भरे, बदबूदार, अन्धेरे और गन्दे स्थान पर रहना या ज्यादा देर ठहरना इन दिनों में उचित नहीं होता।
           वर्षाकाल में सबसे जरूरी काम है, जल की शुद्धता पर ध्यान देना क्योंकि इन दिनों नदी तालाब आदि में जल दूषित, मटमैला और गन्दा हो जाता है। यदि जल दूषित और मैला हो तो इसे उबाल कर और ठंडा करके पीना चाहिए। बाहर का पानी देख कर ही पीना चाहिए। अगर पानी गन्दा हो तो पीना ही नहीं चाहिए। 

Wednesday, July 1, 2015

पहाड़ी वादियों में

शहर के आपाधापी के बीच जब भी गर्मियों में बच्चों को ग्रीष्मावकाश मिलता है तो सांय-सांय करती लू के थपेड़ों, ऊपर से भगवान भास्कर का प्रचंड प्रकोप, नीचे से भट्टी समान आग उगलती पृथ्वी माता, पसीने और प्यास से अकुलाता तन, अपनी ही दुर्गन्ध से नाक-भौं सिकोड़ता मन पहाड़ी वादियों की गोद में बसे  गांव जाकर तरोताजा होने को मचल उठता है। गर्मियों में गांव पहुंचकर प्रकृति के अपार सुख प्राप्ति से पहले वहां तक की यात्रा के खट्टे-मीठे अनुभव बड़े ही रोमांचकारी होते हैं। यह सब जानते हैं कि गर्मियों में शहर से गांव तक का सफर बच्चों का खेल नहीं है। बस या रेल की ठसमठस्स के बीच कई लोग चक्कर खाकर गिरते-पड़ते रहते हैं तो कई उल्टी कर खाया-पीया बाहर निकालते रहते हैं। कोई थक हार आराम करना चाहता है लेकिन उसे जगह न बस में, न रेल में मिलती है। बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने कमजोर शरीर को देखकर दुःखी तो होते हैं, लेकिन प्रकृति का आनन्द लूटने के लिए सबकुछ सहते हुए कोई न कोई जतन करने में लगे रहते हैं। इसके लिए कोई नीबू में नमक-काली मिर्च डालकर चूसता है, कोई काबुली चना खाकर उल्टी को सीधा करना चाहता है। कोई चूर्ण चाटता है। जो समझदार लोग होते हैं वे पहले ही घर से दवा की एक खुराक लेकर रास्ता आराम से काट लेते हैं, लेकिन नासमझ उल्टी के बारे में सोचकर नहीं चलते, जिसका परिणाम यह होता है कि वे बस को खराब करते हैं, रेल में गंदगी फैलाते हैं। थके हारे सहयात्रियों के ऊपर उल्टी कर उनके कपड़े, सामान गंदा तो करते ही हैं, उल्टे लड़ाई-झगड़ा करने पर भी उतारू होकर नाक में दम किये रहते हैं।
        बावजूद इसके जब बस शहर की सड़क से निकलकर पहाड़ की वादियों में सांप की गति के समान बलखाती आगे बढ़ती है तो मन छोटी-बड़ी हरी-भरी पहाडि़यों की श्रंखलाओं, सड़क किनारे छोटे-छोटे गांव, गांवों की गरीबी, कच्चे मकानों के छोटे-छोटे समूहों से होता हुआ सीढ़ीनुमा कम लम्बे, कम चौड़े खेतों में डूबने-उतरने लगता है। बीच-बीच में जब भी बस का पड़ाव आता है तो नाश्ता-पानी के साथ-साथ यहां की कुछ अधकच्ची तो कुछ पक्की दुकानों के साथ ही कुछ शानदार ढंग से बनाए वातानुकूलित होटल और रेस्टोरेंट अमीरी-गरीबी के विचित्र संगम का पाठ पढ़ा जाते हैं।
यात्रा पहाड़ की हो और यदि प्रकृति की हरियाली का आनन्द न लूटा तो सबकुछ बेकार है। पहाड़ी घुमावदार सड़कों पर जगह-जगह प्रकृति का कलात्मक नृत्य रूप देखिए। कहीं चीड़ और देवदार के गगनचुम्बी पेड़ हैं तो कहीं हरे-भरे बांज, बुरांस के छोटे-छोटे झबरीले पेडों के झुरमुट से़ बह रही शीतल जलधारा, जिसे देख मन पहाड़ी उत्तराखंडी गीत गा उठेगा-       
" पी जाओ म्यॉर पहाड़ को ठंडो पाणी   
खै जाओ जंगलू हवा ठंडो ठंडो पाणी 
घाम की यो काली मुखड़ी है जाली गुलाबी 
देखो रे देखो फुल बुरुसी फूली रै छो 
ठंडो पाणी --ठंडो पाणी --ठंडो पाणी 
रसीला काफल खाओ, रसीला किलमोड़ी 
सेब,अनारा, आड़ू, मेहला, दाणिमा 
खुबानी देखो रे बैणा माठ मादिरा चम चमकिनी 
रंगीलो मुलुक देखो कुमु गढ़्वाला 
देबों की जनमभुमि बैकुंठी हिमाला 
आओ रे आओ म्यॉर पहाड़ा धात लगूनी  
ठंडो पाणी --ठंडो पाणी --ठंडो पाणी "
          इस बीच जब कभी आकाश में कोई उमड़ता-घुमड़ता बादल का टुकड़ा पहाड़ की चोटी को छूता और कभी उससे बचकर हवा में स्वच्छंद भाव से तैरता-फिरता नजर आता है तो मन आवारा होकर उसके साथ उडान भरने को आतुर हो उठता है।
          मैं अनुभव करती हूं कि हमारे पहाड़ हमें प्रकृति के करीब से दर्शनों का, प्रकृति के रूप पर मोहित होने का, प्रकृति के भिन्न-भिन्न रूपों को देखने का, रंग बदलते, हास-परिहास और उल्लास का न्यौता तो देते ही हैं साथ ही थोड़ा पैसा खर्च कर तन और मन को प्राकृतिक रूप में स्वस्थ रखने का गूढ़ मंत्र बताते हुए अपनी सस्य-श्यामल गोद में आहार-विहार करने का सुअवसर भी देते हैं।
.... कविता रावत 

Tuesday, June 2, 2015

जल प्रदूषण पर चिंतन

आज पूरा विश्व पर्यावरण प्रदूषण की समस्या से जूझ रहा है। जहाँ तक पीने के स्वच्छ पानी का सवाल है, तो बीते दिनों विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट में  कहा गया कि यदि लोगों को स्वच्छ जल और सैनिटेशन की स्तरीय सुविधाए मुहैया करा दी जाये तो दुनिया में बीमारियों से पड़ने वाले बोझ को 9 फीसदी और भारत समेत दुनिया के 32 सबसे ज्यादा प्रभावित देशोें में 15 फीसदी बोझ को काफी हद तक कम किया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र का आकलन है कि दुनिया में एक अरब से ज्यादा लोगों को पीने का पानी उपलब्ध नहीं है। यह अध्ययन इस बात का प्रमाण  है कि पीने के पानी की व्यवस्था के बाद हर साल प्रदूषित पानी से होने वाली बीमारियों से हुई एक अरब साठ लाख मौतों को टाला जा सकता है। इसके लिए उक्त एजेसियां भ्रष्टाचार, नौकरशाही के संवेदनशील रवैये, संसाधनों की अनुपलब्धता और बुनियादी सुविधाओं का अभाव व इन समस्याओं पर सरकार का अंकुश न होना अहम मानती है। 
            दुनिया के 123 देशों में अपने नागरिकों को दूषित जल पिलाने वाले देशों में भारत 121वें  स्थान पर है। जबकि हमारा पड़ोसी देश बांग्लादेश हमसे 80वें व श्रीलंका और पाकिस्तान 40वें स्थान ऊपर है। पानी के भारी संकट से भारत और चीन की 40 फीसदी आबादी को इसका सामना करना पड़ रहा है। असल में दुनिया में 2.6 अरब आबादी को साफ सफाई स्वच्छ पेयजल और गंदे नाले के निकासी जैसी बुनियादी सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की हालिया रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश में हर साल मरने वाले 1.03 करोड़ लोगों में करीब 7.8 लाख लोग प्रदूषित पानी पीने व गंदगी से पैदा होने वाली बीमारियों से मरते हैं। रिपोर्ट के अनुसार साफ-सफाई और पानी की उचित व्यवस्था करने पर पूरी दुनिया में तकरीबन 7 अरब 34 करोड़ डाॅलर बचाए जा सकते हैं। इसके साथ ही 10 अरब डाॅलर की सालाना उत्पादकता बढ़ेगी और इन मौतों से होने वाले नुकसान की भरपाई कर सालाना 3.6 अरब डाॅलर के बराबर अतिरिक्त आय अलग से की जा सकेगी। 
           इसमें दो राय नहीं है कि भारत में भूजल के अतिशय दोहन एवं प्रदूषण के कारण नाइट्रेट, अमोनिया, क्लोराइड, व फ्लोराइड का भूजल पर अत्यधिक दबाव है, नतीजतन घुलन आॅक्सीजन की मात्रा दिन-ब-दिन कम होती जा रहीं है। सभी वैज्ञानिक इस पर एकमत हैं कि भूमिगत जल कृषि कार्यों में रासायनिक खादों या उद्योगों में रसायानों  का बेतहाशा इस्तेमाल से बुरी तरह प्रदूषित हो गया है। लंदन के शोधकर्ताओं ने यह साबित कर दिया है कि जहां पेयजल में लिंडेन, मालिथयोेन, डीडीटी और क्लोपाइरियोफोस जैसे कीटनाशक तत्व मौजूद रहते हैं वहाँ कैंसर, स्तन कैंसर, मधुमेह, रक्तचाप, कब्ज और गुर्दें सम्बन्धी रोग बहुतायत में होते हैं। इसका सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ता है। भूजल स्त्रोतों की हालत इससे भी ज्यादा खराब है। सर्वेक्षण इस बात का प्रमाण है कि  उत्तरप्रदेश बिहार, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश व पश्चिम बंगाल के भूमिगत जल में नाइट्रोजन, फास्फेट, पोटेशियम के अलावा सीसा, मैगनीज, जस्ता, निकिल और लौह जैसे रेडियोधर्मी पदार्थ व जहरीले तत्व सामान्य स्तर से काफी ज्यादा मात्रा में मौजूद हैं।          
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार कृषि कार्य में इस्तेमाल की गई रासायनिक खाद 50 फीसदी फसल में समा जाता है। 25 फीसदी मिट्टी में मिल जाता है और शेष 25 फीसदी भूमिगत जल में मिलकर उसे प्रदूषित करता है। रसायन, कूड़े व प्रदूषित पानी ने जहांँ भूमि जल व नदियों को प्रदूषित करने में अहम भूमिका निभाई है। वहीं नदियों का प्रदूषित पानी पीने योग्य न रहकर भयंकर जानलेवा बीमारियों को न्योता दे रहा है। हमारे यहां प्रदूषित पानी पीने से हर साल 16 लाख बच्चे अकाल मौत के मुंह में चले जाते हैं। देश में कुल बीमारियों में से 80 फीसदी प्रदूषित पानी पीने के कारण होती है। अतः जल की प्रत्येक बूंद के संरक्षण और इसके विवेकपूर्ण उपयोग का प्रण लेना चाहिए। असलीयत यह है कि ठीक इसके उल्टा हो रहा है क्योंकि जल सबसे ज्यादा शुद्ध और पवित्र माना गया है उसको सरकार द्वारा ही स्वीकृत औद्योगिक संस्थान और कारखानें प्रदूषित कर रहे हैं। विडंबना यह है कि उसकी शुद्धता के बाबत् सरकार सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी और दिशा निर्देशों को अनसुना कर रही है। यही एक प्रमुख कारण है कि यहां के लोग विवशता में प्रदूषित पानी पीकर मौत के मुख में जा रहे हैं । वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते समुचित उपाय नहीं किये गये तो आने वाले वर्षो में पीने के पानी के भीषण संकट का सामना करना पडेगा।
           पर्यावरण सम्बन्धी तमाम अध्ययन देश में जल प्रदूषण के दिनोदिन भयावह होते जाने के बारे में चेताते रहते हैं। अब सीएजी यानी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने भी इस बारे में आगाह किया है। पर्यावरणविदों की चेतावनियों की बराबर अनदेखी की गई है। इसलिए स्वाभाविक ही सवाल उठता है कि क्या सीएजी की इस रिपोर्ट को हमारी सरकारें गंभीरता से लेंगी? संसद में पेश सीएजी की ताजा रपट देश में जल प्रदूषण की भयावह स्थिति के लिये सरकार को फटकार लगाते हुए बताती है कि हमारे घरों में जिस पानी की आपूर्ति की जाती हैं, वह आमतौर पर प्रदूषित और कई बीमारियों को पैदा करने वाले जीवाणुओं से भरा होता है। मुश्किल केवल घरेलू उपयोग या पेयजल तक सीमित नहीं है। 
           विभिन्न प्रकार के रासायनिक खादों और कीटनाशकों के व्यापक इस्तेमाल ने खेतों को इस हालत में पहुंचा दिया है कि उनसे होकर रिसने वाला बरसात का पानी जहरीले रसायनों को नदियों में पहुंचा देता है। भूजल के गिरते स्तर और उसकी गुणवत्ता में कमीं को लेकर कई अध्ययन सामने आ चुके हैं। इसके अलावा शहरों से गुजरने वाले मल-जल और औद्योगिक इकाईयों से निकलने वाले कचरे के चलते पहले चिंताजनक स्तर तक प्रदूषित हो चुकी है, इसे सीएजी ने भी अपनी रपट में दर्ज किया है। देश में 14 बड़ी, 55 लघु और कई 100 छोटी नदियों में मल जल और औद्योगिक कचरा लाखों लीटर पानी के साथ छोडे़ जाते है। विडंबना यह है कि बाकी पानी को उसी रूप में विभिन्न जल स्त्रोतों में छोड़ दिया जाता है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि नदियों, तालाबों, झीलों को प्रदूषण मुक्त बनाने के नाम पर अरबों रूपये खर्च से जो कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं, उनकी असलियत क्या है? 
           पिछले दो दशक के दौरान केन्द्र सरकार देश में विभिन्न जल प्रदूषण नियंत्रण परियोजनाओं, मसलन गंगा और यमुना कार्य योजनाओं पर अब तक लगभग बीस हजार करोड़ रूपये खर्च कर चुकी है। लेकिन अब तक इसके कोई खास नतीजे नहीं आये हैं। उल्टे दिल्ली से गुजरने वाली यमुना की जो हालत हो गई है उसे देखते हुए सीएजी ने अपनी रपट में इसे एक ‘मृदा‘ नदी कहा है तो शायद इसमें अतिश्योक्ति नहीं है। कहने को केन्द्र और राज्यों के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड एक दूसरे के सहयोगी हैं। लेकिन उनके नियंत्रण क्षेत्रों को लेकर ऐसी स्थिति हो गई है कि सीएजी के मुताबिक राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे पर एजेंसी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं हुई है। एक अध्ययन के मुताबिक बीस राज्यों की सात करोड़ आबादी फ्लोराईड और एक करोड़ लोग सतह के जल में आर्सेनिक की अधिक मात्रा घुल जाने के खतरे से जूझ रहे हैं। इसके अलावा सुरक्षित पेयजल कार्यक्रम के तहत सतह के जल में क्लोराइड, टीडीसी, नाइट्रेट की अधिकता भी बाधा बनी हुई है। 
विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में करीब साठ फीसदी बीमारियों की मूल वजह जल प्रदूषण है। जाहिर है, अगर समय रहते बेहतर जल प्रबंधन की दिशा में ठोस पहल नहीं की गई तो इसका परिणाम समूचे समाज को भुगतना पडेगा। जल प्रदूषण नियंत्रण परियोजनाओं पर अरबों खरबों रूपये बहाने के बजाय जरूरत इस बात की है कि कृषि और औद्योगिक क्षत्रों में जल शोधन संयत्रों की स्थापना और संचालन को बढ़ावा दिया जाय। 

पर्यावरण संतुलन के लिये कुछ उपयोगी बिन्दु   

  • पृथ्वी के तापमान में वृद्धि के लिये जिम्मेदार कारणों में से एक पर्यावरण प्रदूषण को दूर करने के लिये ग्रीन कंज्यूमर की अवधारणा बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। इससे न केवल पारिस्थितिकी में बल्कि अर्थव्यवस्था मेें भी सुधार होगा। 
  • वर्तमान समय को उत्पादक दौर कहा जा सकता है लेकिन इसकी सार्थकता तब होगी जब गांवों में निर्मित उत्पादों का व्यापक स्तर पर उपयोग हो। ये उत्पाद पूरी तरह शुद्ध होते हैं, जबकि शहरों के उत्पादों में मिलावट की समस्या होती है। ग्रीन कंज्यूमर की अवधारणा गांवों की अर्थव्यवस्था और पारिस्थितिकी को संतुलित बनाने के साथ-साथ अमीर-गरीब की खाई पाटने में मददगार होगी। 
  • गांवों मे तैयार किए गए उत्पाद मिलावट रहित होने की वजह से सेहत के लिये भी उपयोगी होते हैं, जबकि पर्यावरण प्रदूषण के संकट से दो चार हो रहे शहरों में बड़ी बीमारियों का खतरा हैं। उद्योगपतियों को चाहिए कि वे गांवों में तैयार उत्पादों का उपयोग करें ताकि इन उत्पादों के निर्माताओं को बढ़ावा मिल सके। बेहतर भविष्य के लिये वैसे भी इकाॅनामी और इकोलाॅजी में संतुलन और इनका साथ-साथ विकास जरूरी है। 
  • पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले एक गैर सरकारी संगठन से जुड़े शिवकेश गुप्ता कहते हैं कि कई प्रदेशों में पाॅलीथिन पूरी तरह प्रतिबंधित हैं, लेकिन इनका उपयोग हो रहा है। पाॅलीथिन का उपयोग कर सड़के बनाने का प्रयास किया जाना चाहिए। ऐसी सड़के बारिश में जल्दी खराब भी नहीं होती है। सड़कों पर पड़े पत्तों की सफाई कर उन्हें जला दिया जाता है, जबकि इन्हीं पत्तों को जमीन में मिट्टी मे दबाने से अच्छी खाद बन सकती हैं। 
  • इन दिनों कई प्रकार के इकोफ्रेेन्डली उत्पाद मिल रहें हैं। कई कम्पनियां ऐसे बैग में अपने उत्पाद उपलब्ध करा रहीं है जो ऐसे पदार्थ से बनी है जिन्हें दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है। सौंदर्य से जुडे़ हर्बल उत्पाद, जूट कागज और कपडे़ के थैले और घरों को ठण्डा रखने के लिये खस से बनी पट्टियाँ भी लोकप्रिय हो रहीं है, लेकिन यह दर बहुत धीमी हैं। इकोफ्रेेन्डली उत्पादों का ज्यादा से ज्यादा उपयोग धीरे-धीरे कम्पनियों को भी प्रेरित करेेगा और वे मांग के अनुरूप ऐसे उत्पाद बनाएंगी। इसके लिये स्वदेशी कम्पनियों को आगे आना चाहिए।                           
मासिक पत्रिका आरोग्य सम्पदा से संकलित

Wednesday, May 27, 2015

जल संरक्षण: जल ही जीवन है

यह सार्वभौमिक सत्य है कि प्राणिमात्र के लिए जिस तरह से प्राणवायु के लिये आॅक्सीजन जरूरी है उसी तरह जल भी। कहना गलत नहीं होगा कि जल के बिना न तो मनुष्यों का काम चलता है और न ही इसके इतर पृथ्वी पर पलने वाले अन्य प्राणियों का यानि जल ही जीवन है, जिसकी महत्ता को समझते हुए नदियों के किनारे कई सभ्यताएँ विकसित हुईं। हमारे यहाँ नदियों के किनारे बसे प्राचीन शहर बनारस, पाटलीपुत्र, हरिद्वार, मथुरा व हस्तिनापुर भी यही कहानी कहते हैं। नदियों से किनारे बसे प्राचीन शहरों में आज भी हमें जल संरक्षण के स्त्रोत तालाब देखने को मिल जाते हैं, जिनमें साल-दर-साल वर्षा जल को इस तरह सहेजा जाता था कि सभी की जल जरूरतें आसानी से पूरी हो सके, तो फिर अब ऐसा क्या हो गया कि इस परम्परा वाले देश में जैसे ही गर्मी की आहट शुरू होती है वैसे ही कई शहरी क्षेत्रों में पेयजल का लेकर धरने, प्रदर्शन होने लगते है, तो कहीं पर पेयजल आपूर्ति की जिम्मेदारी संभालने वाले अफसरों को जनाक्रोश का सामना करना पडता है। इतना ही नहीं जल संरक्षण व इसकी बर्बादी को रोकने के लिये राज्य सरकारों के लम्बे चौड़े विज्ञापन भी शुरू हो जाते हैं। 
     पिछले कुछ सालों के वर्षा औसत पर नजर डालते हैं तो इसमें थोड़ा- बहुत अन्तर जरूर आया है, लेकिन यह इतना भी कम नहीं हुआ है कि हम इन्द्रदेव को कोसने लगे। अब सवाल यह है कि आखिर गर्मी के मौसम में ही देश के लगभग सभी राज्यों में जल संकट खड़ा क्यों होता है? दरअसल इस स्थिति के लिये हम ही जिम्मेदार हैं जो नलों में पानी कम आने पर आक्रोश तो जता देते हैं, लेकिन हममें से कितने लोग ऐसे हैं जो मानसून के दौरान वर्षा जल को संरक्षित करने पर ध्यान देते हैं? कितनी राज्य सरकारें हैं जो पाँंच हजार की आबादी वाले शहरों में वर्षा जल को वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम के जरिए भूजल में पहुंचाने के लिये कदम उठा पाती हैं? 
           सच्चाई यह है कि जब गर्मी में पेयजल संकट पैदा होता है तो सरकारें हुंकार भरती हैं कि वर्षा जल संरक्षण के लिये वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम हर शहर व कस्बे में लागू किया जायेगा, लेकिन जैसे ही मानसून शुरू होने पर जल की मांग कम होती हैं सभी बीती ताही बिसार दे कहकर लंबी तान सो जाते हैं। क्या नीतियां लागू करने वाली सरकारों के इस रवैए, बढ़ती जनसंख्या, बेतरतीब बढ़ते शहरों व भूजल के अनियंत्रित अंधाधुन्ध दोहन से जल संकट पर काबू किया जा सकता है? बेहद आसान सा तरीका है कि मानसून के दौरान शहरी क्षेत्रों में हर छत पर गिरने वाले जल को भूजल में पहुंचाने के लिए प्रत्येक नागरिक प्रभावी भूमिका निभाएं। इसके अलावा सभी राज्य सरकारों को चाहिए कि वे जल संरक्षण के लिये वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाने वाले प्रत्येक नागरिक की आर्थिक सहायता करें। जल संरक्षण के बडे स्त्रोत जैसे- बांध, तालाब व सरोवर में जल लेकर आने वाली नदियों तथा बरसाती नदी-नालोें के मार्ग में खड़े हो चुके अवरोधों को जन सहयोग से हटाएं। 
      इस दिशा में वाजपेयी सरकार की उस नदी जोड़ परियोजना पर भी अमल किया जा सकता है, जिसके तहत हर साल मानसून के दौरान बाढ़ का सामना करने वाले बिहार जैसे राज्यों को जल सूखा प्रभावित राजस्थान, मध्यप्रदेश जैसे राज्यों में नहरों के माध्यम से लाने की योजना पर कदम बढ़ाये गये थे, जिसे सत्ता परिवर्तन के बाद ठण्डे बस्ते में डाल दिया गया। सच में यदि हम इस दिशा में कदम बढ़ाए तो कोई कारण नजर नहीं आता कि हमारे द्वारा पैदा किए गए जल संकट पर काबू नहीं पाया जा सके। 
पानी बचाने का संदेश देती नानी   
           ज्यादातर परिवारों में पवित्र गंगाजल को अनमोल बताकर पानी की फिजूलखर्ची नहीं करने का संस्कार देने वाले हमारे बुजुर्ग ही होते हैं। लेकिन हम कहाँ समझ पाए थे गंगाजल की तरह पानी भी कंजूसी से उपयोग करने का संदेश। कोई गाय मौत के लिये छटपटा रही हो या मोहल्ले में किसी के यहाँ अंतिम सांसे गिन रहे किसी परिजन को गीता का अठारहवाँ अध्याय सुनाने के हालात बन रहे हों, उस परिवार का सदस्य जब कटोरी या भगौनी लेकर चला आता तब  दरवाजा खटखटाने के साथ ही कौशल्या नानी कहकर आवाज लगाता और सारे हालात बताकर गंगाजल और तुलसी के पत्ते देने का अनुरोध करता। वे चुपचाप पूजाघर में जाती चंदन कुंकु के छींटे से रंगबिरंगी कांच की बोतल, चम्मच गमले के आसपास गिरे तुलसी के पत्ते लेकर उतरतीं, कटोरी में दो चम्मच गंगाजल डालकर तुलसी के पत्ते थमाकर दरवाजा बंद कर लेती। कटोरी में रखा गंगाजल वह अपने हाथों से गाय के मुँह में डालते हुए सीख देती कि तुम्हें गंगाजल की कीमत पता नहीं है, नीचे गिरा दोगे। 
            बचपन में जब कभी कोई रात-बिरात गंगाजल मांगने आता तो नानी की खटर-पटर से हमारी आंख खुल जाया करती।  हम ऑंखें मींचकर देखते कि नानी के दो चम्मच गंगाजल देने के नियम में कोई बदलाव नहीं आता। हम कहते गंगाजल देने में कंजूसी तो उनके उपदेश शुरू हो जाते। तुम्हें पानी की कद्र ही नहीं पता है, गंगाजल का मोल क्या समझोगे? तुम्हें कंजूसी तो नजर आई, पर यह थोड़ी पता है कि 20-25 साल पहले संकट उठाकर लाई हूँ हरिद्वार से। ज्यादातर परिवारों में गंगाजल को अनमोल बताकर पानी की फिजूलखर्ची नहीं करने का संस्कार देने वाले बुजुर्ग ही होते हैं, लेकिन हम कहां समझ पाये गंगाजल की तरह पानी का भी कंजूसी से उपयोग करने का संदेश। दशकों पूर्व तब हर घर में निजी नल कनेक्शन भी नहीं होते थे। पूरे प्रेशर के साथ जब सरकारी नल सुबह-शाम आधे घंटे चलते तो सभी लोग अपने प्लास्टिक, पीतल, स्टील आदि के खाली बर्तन-भांडे या घड़े लेकर पहुँच जाते। पानी का मोल न समझने को लेकर फिर नानी के उपदेश शुरू हो जाते। पहले ज्यादातर परिवार कुएं से मिट्टी के कलश भरकर उनमें थोड़ा-थोड़ा गंगाजल इस आस्था के साथ मिलाते थे कि सारे कलशों का पानी गंगाजल हो गया है। 
           अक्सर यह सोचकर आश्चर्य होता है कि गंगाजल के प्रति इतनी आस्था के बाद भी हम पानी का मोल क्यों नहीं समझ पा रहे हैं? पानी बचाने की अपेक्षा पड़ोसी से ही क्यों करते हैं? 
मासिक पत्रिका आरोग्य सम्पदा से संकलित

Monday, May 18, 2015

Sunday, May 10, 2015

Happy Mothers Day

नन्हें हाथों का प्यारा उपहार। 
छुपा है जिसमें माँ का प्यार । 

आज मेरे बेटे ने मुझे यह प्यारी ग्रीटिंग बनाकर दी ..    ..... .कविता रावत 

Monday, April 20, 2015

भगवान परशुराम

बचपन में हम रामलीला देखने के लिए बड़े उत्सुक रहते थे। जब-जब जहाँ-कहीं भी रामलीला के बारे में सुनते वहाँ पहुंचते देर नहीं लगती। रामलीला में सीता स्वयंवर  के दिन बहुत ज्यादा भीड़ रहती, इसलिए रात को जल्दी से खाना खाकर बहुत पहले ही हम बच्चे पांडाल में चुपचाप सीता स्वयंवर के दृश्य का इंतजार करने बैठ जाते। सीता स्वयंवर में विभिन्न प्रकार के भेषभूषा में उपस्थित अलग-अलग राज्यों से आये राजा-महाराजाओं के संवाद सुनने में बहुत आनंद आता था। सीता स्वयंवर में राम जी द्वारा जैसे ही धनुष भंग किया जाता तो ‘बोल सियापति रामचन्द्र जी की जय’ के साथ ही पांडाल तालियों की गूंज उठता और हम बच्चे भी खुशी से तब तक जय-जयकार करते जब तक कोई बड़ा हमें टोक नहीं देता। इस बीच जब पांडाल के बीच से गुस्से से दौड़ते हुए परशुराम मंच पर धमकते तो वहां उपस्थित राजा-महाराज भाग खड़े होने लगते तो हम बच्चों की भी सिट्टी-पिट्टी गुल हो जाती। 
         सीता स्वयंवर में राम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद को याद कर आज भी मन रोमांचित हो उठता है। तब हम नहीं जानते थे कि भगवान राम की तरह ही भगवान परशुराम भी विष्णु भगवान के ही अवतार हैं।  सीता स्वयंवर में राम-लक्ष्मण और परशुराम संवाद में जहाँ भगवान राम ने परशुराम जी के बल, शक्ति और पौरुष के साथ ही भगवान होने के विकारात्मक वृक्ष को समूल नष्ट कर उनके अंतर्मन को शुद्ध किया वहीं दूसरी ओर शेषावतारी  लक्ष्मण ने उनके धनुष के प्रति उत्पन्न मोह को उनकी वाणी में ही समझाते हुए त्यागने पर विवश कर दिया। शिव धनु भंग हुआ देख जब भगवान परशुराम अत्यंत क्रोध में थे, तब भगवान राम ने उनसे बड़ी विनम्रता से विनती की - 
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥
इस पर भगवान परशुराम और क्रोधित होते हुए उनसे बोले-
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥
सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥
यह सुनते हूँ शेषवतारी लक्ष्मण उन्हें याद दिलाकर कहते हैं कि - 
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥
एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥
का छति लाभु जून धनु तोरें। देखा राम नयन के भोरें॥
छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू॥
          इस प्रसंग पर शेषावतारी लक्ष्मण का कहना कि-
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥
          अर्थात बचपन में ऐसे धनुष तो हमने बहुत तोड़े लेकिन आपने कभी क्रोध नहीं किया, के संदर्भ में रोचक कथा जुड़ी है-  हैहय वंशी राजा सहस्त्रबाहु ने परशुराम जी के पिता महर्षि जमदग्नि का वध इसलिए कर दिया था क्योंकि महर्षि ने राजा को अपनी कामधेनु देने से मना कर दिया था। जब परशुराम जी ने अपनी मां रेणुका को 21 बार अपनी छाती पीटकर करुण क्रन्दन करते देखा तो वे ये देखकर इतने द्रवित हुए कि उन्होंने प्रण किया कि मैं पृथ्वी को क्षत्रिय रहित कर दूंगा। इसी कारण उन्होंने सहस्त्रबाहु के साथ ही 21 बार अपने फरसे से पृथ्वी को क्षत्रिय रहित कर दिया। माना जाता कि इन क्षत्रियों से प्राप्त अस्त्र.शस्त्रए धनुष.बाणए आयुध आदि का कोई दुरूपयोग न हो इसके लिए धरती ने मां का तथा शेषनाग ने पुत्र का रूप धारण किया और वे परशुराम जी के आश्रम में गए। जहां धरती मां ने अपने पुत्र को उनके पास कुछ दिन रख छोड़ने की विनती की  जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया  जिस पर धरती मां ने यह वचन लिया कि यदि मेरा बच्चा कोई अनुचित काम कर बैठे तो आप स्वभाववश कोई क्रोध नहीं करेंगेए जिसे परशुराम जी ने मान लिया। एक दिन उनकी अनुपस्थिति में धरती पुत्र बने शेषनाग ने सभी अस्त्र.शस्त्रए धनुष.बाणए आयुध आदि सब नष्ट कर दिए। जिसे देख परशुराम जी को पहले तो क्रोध आया लेकिन  वचनबद्ध होने से उन्होंने उन्हें आशीर्वाद दिया और शेषावतारी लक्ष्मण ने भी उन्हें अपना असली रूप दिखाकर शिव धनुष भंग होने पर पुनः संवाद का इशारा किया और अन्तध्र्यान हो गए।
          जब विश्वमित्र ने परशुराम से कहा कि लक्ष्मण को बच्चा समझ कर क्षमा कर दीजिए तो परशुराम जी बोले कि आपके प्रेमभाव से मैं इसे छोड़ रहा हूँ-  “न त एहि काटि कुठार कठोरें। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें॥ जिसे सुनकर शेषवतारी लक्ष्मण हंसकर कहते हैं कि- माता पितहि उरिन भए नीकें। गुर रिनु रहा सोचु बड़ जीकें॥ सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा। दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा।। इस संवाद से संबंधित परशुराम जी के गुरु ऋण से जुड़ी रोचक कथा प्रचलित है- भगवान शिव कुमार कार्तिकेय के साथ ही परशुराम जी के भी गुरु हैं। उन्होंने ने ही दोनों को अस्त्र विद्या सिखाई। एक बार शिव ने कुमार कार्तिकेय को कैलाश पर्वत के सर्वोच्च शिखर को बेधकर मानसरोवर तक हंसों के जाने हेतु मार्ग बनवाने का काम सौंपा, लेकिन वे बहुत प्रयास करने के बाद भी सफल नहीं हुए। तब भगवान परशुराम ने अपने तीव्र वाणों से  कैलाश पर्वत के शिखर को बेधकर एक बड़ा छिद्र हंसों के आने-जाने हेतु बना दिया। परशुराम की वीरता से संतुष्ट होकर शिव ने उन्हें घर जाने की अनुमति दी, लेकिन वे गुरुदक्षिणा देने की हठ करने लगे। तब शिव ने कहा कि यदि तुम्हारा हठ है तो मेरे कंठ में पड़ी हुई मुंडों की माला, जिसमें एक मुण्ड कम है, उसके लिए एक सिर काट लाओ तो तुम्हारी गुरु दक्षिणा पूरी हो जायेगी। यह सुनकर परशुराम दंग रह गये। वे बोले- भगवान भला कौन अपना सिर काटकर देगा। तब शिवजी ने कहा कि शेषनाग के 1000 सिर हैं, उन्हीं का एक सिर काट ले आओ तो गुरुदक्षिणा पूरी हो जायेगी। गुरु दक्षिणा के लिए परशुराम ने शेषनाग का एक सिर काटने के लिए अपना पूरा बल लगा दिया लेकिन सफल नहीं हुए। इसलिए शेषावतारी लक्ष्मण स्वयंवर में उन्हें याद दिलाते हैं।  

भगवान परशुराम जयंती की हार्दिक शुभकामनाओं सहित … कविता रावत 

Monday, April 13, 2015

डाॅ. भीमराव आम्बेडकर : दलितों के मसीहा

डाॅ. भीमराव आम्बेडकर का जन्म 14 अप्रैल, 1891 को महाराष्ट्र के रत्नागिरि जिले के अम्बावड़े गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम श्रीरामजी सकवाल तथा माता का नाम भीमाबाई था। उनके  "आम्बेडकर" नाम के मूल में एक रोचक प्रसंग है। जब उन्होंने स्कूल में दाखिला लिया तो अपने नाम भीमराव के आगे  ‘अम्बावडेकर’ लिखवाया। इस पर गुरु ने इसका रहस्य जानना चाहा तो उन्होंने बतलाया कि वे अम्बावड़े गांव का निवासी है, इसलिए अपने नाम के आगे अम्बावडे़कर लिख दिया है। गुरु जी अपने नाम के आगे "आम्बेडकर" लिखते थे, अतः उन्होंने भी भीमराव के आगे ‘आम्बेडकर’ उपनाम जोड़ दिया। उन्हें गुरु की यह बात अजीब लगी क्योंकि वे जानते थे कि नाम बदलने से उनकी जाति नहीं बदल सकती है। लेकिन वे यह सोचकर चुप रहे कि निश्चित ही गुरुजी ने कुछ सोच विचार कर ही ऐसा किया होगा। गुरु ने उन्हें  "अम्बावड़ेकर" से "आम्बेडकर" बनाकर उनके विचारों में क्रांति ला दी। उन्होंने सिद्ध कर दिखलाया कि- "जन्मना जायते शूद्रोकर्मणा द्विज उच्यते।"  
          बाबा आम्बेडकर को उनके बचपन में दलित और अछूत समझे जाने वाले समाज में जन्म लेने के कारण कई घटनाएं कुरेदती रहती थी। स्कूल में पढ़ने में तेज होने के बावजूद भी सहपाठी उन्हें अछूत समझकर उनसे दूर रहते थे, उनका तिरस्कार करते थे, घृणा करते थे। ऐसे ही एक बार बैलगाड़ी में बैठने के बाद जब उन्होंने स्वयं को महार जाति का बताया तो गाड़ीवान ने उन्हें गाड़ी से उतार दिया और कहा कि उसके बैठने से गाड़ी अपवित्र हो गई है जिससे धोना पड़ेगा और बैलों को भी नहलाना पड़ेगा। उनके पानी मांगने पर गाड़ीवान ने उन्हें पानी तक नहीं पिलाया। बचपन में उन्हें अनेक कटु अनुभव हुए जिनके कारण उनके मन में उच्च समझे जाने सवर्णों के प्रति घृणा उत्पन्न हो गई। वस्तुतः वह समय ही कुछ ऐसा था जब अछूतों के प्रति सवर्ण वर्ग की कोई सहानुभूति न थी। गंदे नालियों की सफाई करना, सिर पर मैला ढ़ोना तथा मरे जानवरों को फेंकना, उनकी चमड़ी निकालना जैसे कार्य अछूतों के अधिकार माने जाते थे। उन्हें जानवरों से भी हीन श्रेणी का दर्जा दिया जाता था। दलित जाति की यह दुर्गति देखकर ही वे दलितों के उधार के लिए दृढ़ संकल्पित हुए।  शिक्षा समाप्ति के पश्चात् वे बड़ौदा महाराजा के रियासत में सैनिक सचिव पद पर नियुक्त हुए लेकिन अपने अधीनस्थ सवर्णों द्वारा छुआछूत बरते जाने के कारण उन्होंने वह पद त्याग दिया। दलितों की उपेक्षा, उत्पीड़न और छुआछूत से क्षुब्ध होकर उन्होंने दलित वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हुए राष्टव्यापी आंदोलन चलाया। उन्होंने जातीय व्यवस्था की मान्यताओं को उखाड़ फेंकने के लिए एक साहसी क्रांतिकारी भूमिका निभाई। उन्होंने  धर्म के प्रति अपना दृष्टिकोण प्रकट करते हुए कहा- “जो धर्म विषमता का समर्थन करता है, उसका हम विरोध करते हैं। अगर हिन्दू धर्म अस्पृश्यता का धर्म है तो उसे समानता का धर्म बनना चाहिए। हिन्दू धर्म को चातुर्वण्य निर्मूलन की आवश्यकता है। चातुर्वण्य व्यवस्था ही अस्पृश्यता की जननी है। जाति भेद और अस्पृश्यता ही विषमता के रूप हैं। यदि इन्हें जड़ से नष्ट नहीं किया गया तो अस्पृश्य वर्ग इस धर्म को निश्चित रूप से त्याग देगा।“  
          डाॅ. आम्बेडकर दलितों के मसीहा के साथ ही ऐतिहासिक महापुरुष भी हैं। उन्होंने अपने आदर्शों और सिद्धांतों के लिए आजीवन संघर्ष किया जिसका सुखद परिणाम आज हम दलितों में आई हुई जागृति अथवा नवचेतना के रूप में देख रहे हैं। वे न केवल दलित वर्ग के प्रतिनिधि और पुरोधा थे, अपितु अखिल मानव समाज के शुभचिंतक महामानव थे। भारतीय संविधान के निर्माण में उनका योगदान सर्वोपरि है। उन्हें जब संविधान लेखन समिति के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी सौंपी गई तो उन्होंने कहा- "राष्ट्र ने एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी मुझे सौंपी है। अपनी पूरी शक्ति केन्द्रीभूत कर मुझे यह काम करना चाहिए।"  इस दायित्व को निभाने के लिए उनके अथक परिश्रम को लेखन समिति के एक वरिष्ठ सदस्य श्री टी.टी.कृष्णामाचारी ने रेखांकित करते हुए कहा कि-"लेखन समिति के सात सदस्य थे, किन्तु संविधान तैयार करने की सारी जिम्मेदारी अकेले आम्बेडकर जी को ही संभालनी पड़ी। उन्होंने जिस पद्धति  और परिश्रम से काम किया, उस कारण वे सभागृह के आदर के पात्र हैं। राष्ट्र उनका सदैव ऋणी रहेगा।" 
          आज लोकसभा का कक्ष उनकी प्रतिमा से अलंकृत है जिस पर प्रतिवर्ष उनकी जयंती पर देश के बड़े-बड़े नेता और सांसद अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व महान् है। वे सच्चे अर्थों में भारतरत्न हैं। उनकी जयंती संपूर्ण राष्ट्र के लिए महाशक्ति का अपूर्व प्रेरणा स्रोत है। इस अवसर पर उनके जीवन और कार्यों का स्मरण करना हम सबके लिए अपनी भीतरी आत्मशक्ति को जगाना है। आइए, हम उनकी जयंती के अवसर पर संकल्प लें कि हम उनके विचारों और आदर्शों केा अपनाकर अपने जीवन को देश-प्रेम और मानव-सेवा में समर्पित करने का प्रयास करेंगे, जो हमारी उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।  

Saturday, April 4, 2015

हनुमान जयंती

चैत्रेमासि सिते मक्षे हरिदिन्यां मघाभिधे।
नक्षत्रे स समुत्पन्नो हनुमान रिपुसूदनः।।
महाचैत्री पूर्णिमायां समुत्पन्नोऽञ्जनीसुतः।
वदन्ति कल्पभेदेन बुधा इत्यादि केचन।।
अर्थात्-चैत्र शुक्ल एकादशी के दिन  मघा नक्षत्र में भक्त शिरोमणि, भगवान राम के अनन्य स्नेही शत्रुओं का विनाश करने वाले हनुमान जी का जन्म हुआ। कुछ विद्वान कल्पभेद से चैत्र की पूर्णिमा के दिन हनुमान जी का शुभ जन्म होना बताते हैं।
वायुपुराण के अनुसार- “आश्विनस्यासिते पक्षे स्वात्यां भौमे चतुर्दशी। मेषलग्नेऽञ्जनी गर्भात् स्वयं जातो हरः शिवः।।“ अर्थात्- आश्विन शुक्ल पक्ष में स्वाति नक्षत्र, मंगलवार, चतुर्दशी को मेष लग्न में अंजनी के गर्भ से स्वयं भगवान शिव ने जन्म लिया। हनुमान जी को भगवान शिव के ग्यारहवें अवतार ’महान’ के रूप में माना जाता है। इससे पूर्व मन्यु, मनु, महिनस, शिव, ऋतध्वज, उग्ररेता, भव, काल, वामदेव और धृतव्रत दस अवतार बताये गये हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने भी दोहावली में हनुमान जी को साक्षात् शिव होना सिद्ध किया है-
जेहि सरीर रति राम सों, सोइ आदरहिं सुजान।
रुद्र देह तजि नेह बस, संकर भे हनुमान।।
जानि राम सेवा सरस, समुझि करब अनुमान।
पुरुषा ते सेवक भए, हर ते भे हनुमान।।
हनुमान जी के जन्म के बारे में एक कथा आनन्द रामायण में उल्लेखित है, जिसमें हनुमान जी  को राम का सगा भाई बताया गया है। इस कथा के अनुसार ब्रह्म लोक की सुर्वचना नामक अप्सरा ब्रह्मा के शाप से गृध्री हुई थी। राजा दशरथ ने पुत्रेष्टि यज्ञ में जो हव्य कैकेयी को खाने को दिया था उसे यह गृध्री कैकेई के हाथ से लेकर उड़ गई। यह हव्यांशा ही अंजना की गोद में गृध्री की चोंच से छूटकर गिरा, जिसे खाने से वानरराज कुंजर की पुत्री अर्थात् केसरी की पत्नी अंजनी के गर्भ से हनुमान जी का प्राकट्य हुआ। इस गृध्री की याचना पर ब्रह्मा ने यह कहा था कि दशरथ के हव्य वितरण करते समय जब तू कैकेई के हाथ से हव्य छीनकर उड़ जायेगी तो तू उस हव्य को नहीं खा सकेगी लेकिन उससे तेरी मुक्ति हो जायेगी। ब्रह्मा के वरदान के अनुसार यह गृध्री शाप से मुक्त होकर पुनः अप्सरा बन गई। 
हनुमान जी अपार बलशाली होने के साथ ही वीर साहसी, विद्वान, सेवाभावी, स्वामीभक्त, विनम्रता, कृतज्ञता, नेतृत्व और निर्णय क्षमता के धनी भी थे। हनुमान जी को भक्ति और शक्ति का बेजोड़ संगम माना गया है। वे अपनी निष्काम सेवाभक्ति के बलबूते ही पूजे जाते हैं। उनके समान भक्ति सेवा का उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है। आइए! हनुमान जयंती के शुभ अवसर पर हनुमान चालीसा का गुणगान कर उनकी कृपा के पात्र बने- 
दोहा -श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुरु सुधारि। बरनऊं रघुबर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि।। बुद्धिहीन तनु जानिके, सुमिरौं पवन कुमार। बल बुद्धि विद्या देहु मोहिं, हरहु कलेश विकार।।
चौपाई - जय हनुमान ज्ञान गुण सागर। जय कपीस तिहुं लोक उजागर।। रामदूत अतुलित बल धामा। अंजनि पुत्र पवनसुत नामा।।
महावीर विक्रम बजरंगी। कुमति निवार सुमति के संगी।। कंचन बरन विराज सुवेसा। कानन कुण्डल कुंचित केसा।। हाथ बज्र और ध्वजा बिराजै। कांधे मूंज जनेऊ साजै।।
शंकर सुवन केसरी नन्दन। तेज प्रताप महा जगबन्दन।। विद्यावान गुनी अति चातुर। राम काज करिबे को आतुर।।
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया। राम लखन सीता मन बसिया।। सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा। विकट रूप धरि लंक जरावा।।
भीम रूप धरि असुर संहारे। रामचंद्रजी के काज संवारे।। लाय संजीवन लखन जियाए। श्री रघुबीर हरषि लाए।।
रघुपति कीन्हीं बहुत बड़ाई। तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई।। सहस बदन तुम्हरो यश गावैं। अस कहि श्रीपति कंठ लगावैं।।
सनकादिक ब्रह्मदि मुनीसा। नारद सारद सहित अहीसा।। जम कुबेर दिक्पाल जहां ते। कवि कोविद कहि सके कहां ते।।
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा। राम मिलाय राजपद दीन्हा।। तुम्हरो मंत्र विभीषन माना। लंकेश्वर भए सब जग जाना।।
जुग सहस्त्र योजन पर भानू। लील्यो ताहि मधुर फल जानू।। प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं। जलधि लांघि गए अचरज नाहीं।।
दुर्गम काज जगत के जेते। सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।। राम दुआरे तुम रखवारे। होत न आज्ञा बिनु पैसारे।।
सब सुख लहै तुम्हारी सरना। तुम रक्षक काहू को डरना।। आपन तेज सम्हारो आपै। तीों लोक हांक ते कांपै।।
भूत पिचाश निकट नहिं आवै। महावीर जब नाम सुनावै।। नासै रोग हरै सब पीरा। जपत निरंतर हनुमत बीरा।।
संकट ते हनुमान छुड़ावै। मन-कर्म-वचन ध्यान जो लावै।। सब पर राम तपस्वी राजा। तिनके काम सकल तुम साजा।।
और मनोरथ जो कोई लावै। सोई अमित जीवन फल पावै।। चारों जुग परताप तुम्हारा। है परसिद्ध जगत उजियारा।।
साधु सन्त के तुम रखवारे। असुर निकंदन राम दुलारे।। अष्ट सिद्वि नव निधि के दाता। अस वर दीन जानकी माता।।
राम रसायन तुम्हरे पासा। सदा रहो रघुपति के दासा।। तुम्हरे भजन राम को पावै। जनम जनम के दुःख बिसरावै।।
अंतकाल रघुबर पुर जाई। जहां जनम हरि भक्त कहाई।। और देवता चित्त न धरई। हनुमत सेई सर्व सुख करई।।
संकट कटै मिटै सब पीरा। जो सुमिरै हनुमत बलबीरा।। जय जय जय हनुमान गुसाईं। कृपा करहु गुरुदेव की नाईं।।
जो शत बार पाठ कर कोई। छूटहि बंदि महासुख होई।। जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा। होय सिद्धि साखी गौरीसा।।
तुलसीदास सदा हरि चेरा। कीजै नाथ हृदय महं डेरा।।
दोहा-  पवन तनय संकट हरण, मंगल मूरति रूप।
         राम लखन सीता सहित, हृदय बसहु सुर भूप।।
                        इति श्री हनुमान चालीसा।

अतुलितबलघामं हेमशैलाभदेहं, दनुजवनकृशानुं शानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं, रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि।।

हनुमान जयंती की हार्दिक मंगलकामनाएं!
                                    ... कविता रावत

Thursday, April 2, 2015

महावीर जयंती

महावीर स्वामी का जन्म 599 ई.पू. वृजिगण के क्षत्रिय कुल में वर्तमान बिहार राज्य के कुण्ड ग्राम में हुआ। इनकी माता त्रिशला वैशाली राज्य के पराक्रमी लिच्छवी नरेश की पुत्री थी। महावीर का बचपन का नाम वर्धमान था। "आचारांग सूत्र" के अनुसार महावीर की पत्नी का नाम यशोधरा और पुत्री का नाम प्रियदर्शनी था। अपने उदासीन प्रकृति के कारण लगभग तीस वर्ष की आयु में वे अपने बड़े भाई नन्दीवर्धन से आज्ञा लेकर सांसारिक वैभव से विरक्त होकर वन को चल दिए। गृह त्याग कर इन्होंने बारह वर्ष की कठोर और कष्ट-साध्य तपस्या के उपरांत श्रीम्भीक नामक गांव के बाहर ऋजुपालिका नदी के उत्तरी तट पर "कैवल्य" अर्थात मोक्ष प्राप्त किया और तब से वे अर्हंत अर्थात् पूज्य, जिन, विजेता, बंधनमुक्त महावीर कहलाये।  
          जैन धर्म का साहित्य में बहुत बड़ा योगदान है। जैन धर्म ने प्राकृत भाषा में 84 ग्रन्थों की रचना की है, जिसमें 41 सूत्र, अनेक प्रकीर्णक, 12 निर्युक्ति और एक महाभाष्य है। सूत्रों में 11 अंग, 12 उपांश, 5 छेद, 5 मूल और 8 प्रकीर्णक रचनाएं हैं, जिनकी भाषा अर्ध मागधी है। प्रकाण्ड विद्वान हेमचन्द्र भी जैन थे। द्वादश अंग के अंतर्गत “आचारांग सूत्र“ अन्यन्त महत्वपूर्ण है। यह ग्रन्थ जैन साधु और साध्वियों की आचार संहिता है। भगवतीसूत्र में जैन धर्म के सिद्धान्तों के अतिरिक्त स्वर्ग व नरक का विशद् विवरण मिलता है। जैन धर्म ग्रन्थों पर लिखित हरिभद्र स्वामी, शान्ति सूरी, देवेन्द्र गणी तथा अभयदेव की टीकाओं का बहुत महत्व है। 
         जनश्रुति के अनुसार ऋषभदेव से लेकर महावीर तक चौबीस तीर्थंकर हुए, जिनमें अन्तिम दो पार्श्वनाथ और महावीर की ऐतिहासिकता को पाश्चात्य विद्वान  भी स्वीकार करते हैं। महावीर ने अपने पूर्वगामी तेईस तीर्थंकरों के ही मत का प्रतिपादन किया। वे अहिंसा, सत्य, अपरिग्रह और अस्तेय नामक चार नियमों के साथ ही ब्रह्मचर्य पर भी जोर देते हुए मोक्ष मार्ग की शिक्षा देते थे। महावीर स्वामी जी देशाटन को ज्ञानार्जन का सर्वश्रेष्ठ साधन मानते थे। इसलिए उनका कहना था कि मनुष्य को अपने जीवनकाल में देशाटन अवश्य करना चाहिए। महावीर स्वामी हमें जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मार्गदर्शन कराते हैं। उनकी दी गई शिक्षाओं में से यदि हम एक भी शिक्षा अंगीकार कर लें तो जीवन धन्य हो जायेगा। उनकी जयंती के अवसर प्रस्तुत हैं उनके उपदेश के कुछ अंश-
  • अपनी आत्मा को जीतना सब कुछ जीतना है।
  • क्रोध प्रेम का नाश करता है, माया मित्रता का नाश करती है, लोभ सभी गुणों का। 
  • जिस प्रकार कमल जल में पैदा होकर जल में लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार जो संसार में रहकर काम-भोगों से अलिप्त रहता है, उसे साधक कहते हैं।
  • शरीर को नाव कहा है, जीव को नाविक और संसार को समुद्र। इसी संसार समुद्र को महर्षि लोग पार करते हैं।
  • स्त्री, पुत्र, मित्र और बंधुजन सब जीते-जी के ही साथी है, मरने पर कोई भी साथ नहीं जाता है।
  • जो मनुष्य अपना भला चाहता है, उसे पाप को बढ़ाने वाले क्रोध, मान, माया, लोभ इन दोषों को छोड़ देना चाहिए।
  •  ज्ञानी होने का सार  यही है कि वह किसी भी प्राणी की हिंसा न करे।
  • जिस मनुष्य का मन अहिंसा, संयम, तप, धर्म में सदा लगा रहता है, उसे देवता नमस्कार करते हैं।
  • प्रत्येक साधक प्रतिदिन चिन्तन करे- मैने क्या कर लिया है और क्या करना शेष है, कौन सा ऐसा कार्य है, जिसको मैं नहीं कर पा रहा हूँ, इस पर विचार करें।
  • आत्मा ही अपने दुःख-सुख का कर्त्ता तथा भोक्ता है।
  • सिर काटने वाला शत्रु भी उतना अपकार नहीं करता, जितना की दुराचार में आसक्त आत्मा करती है।
  •  हे जीव! तू अजर-अमर है, महाशक्तिशाली है और सम्पूर्ण है, लेकिन दिखने वाला जगत् क्षणिक है, असमर्थ और निःसार है। तू इससे न्यारा है और यह तुझसे न्यारा है। 
  • तू शरीर को स्व आत्मा और विषयभोग का सुख, परिग्रह को सम्पदा, नाम को वैभव, रूप को सुन्दरता, पशुबल को वीरता मानता है। यह गलत है।

                                                     महावीर जयंती की हार्दिक शुभकामनायें!

Friday, March 27, 2015

रामनवमी : श्रीराम जन्मोत्सव

जब मंद-मंद शीतल सुगंधित वायु प्रवाहित हो रही थी, साधुजन प्रसन्नचित्त उत्साहित हो रहे थे, वन प्रफुल्लित हो उठे, पर्वतों में मणि की खदानें उत्पन्न हो गई और नदियों में अमृत तुल्य जल बहने लगा तब-
नवमी तिथि मधुमास पुनीता सुक्ल पक्ष अभिजित हरि प्रीता।
मध्यदिवस अति सीत न घामा पावन काल लोक विश्रामा।।
          अर्थात- चैत्र के पवित्र माह की अभिजित शुभ तिथि शुक्ल पक्ष की नवमी को जब न बहुत शीत थी न धूप थी, सब लोक को विश्राम देने वाला समय था, ऐसे में विश्वकर्मा द्वारा रचित स्वर्ग सम अयोध्या पुरी में रघुवंशमणि परम धर्मात्मा, सर्वगुण विधान, ज्ञान हृदय में भगवान की पूर्ण भक्ति रखने वाले महाराज दशरथ के महल में-
भये प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी।
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी
भूषन वनमाला नयन बिसाला सोभासिन्धु खरारी
         ईश्वर जन्म नहीं अपितु अवतरित होते हैं, इसका मानस में बहुत सुन्दर वर्णन मिलता है। जब माता कौशल्या के सम्मुख भगवान विष्णु चतुर्भुज रूप में अवतरित हुए तो उन्होंने अपने दोनों हाथ जोड़कर कहा कि हे तात! मैं आपकी स्तुति किस प्रकार से करूं! आपका अन्त नहीं है, आप माया-मोह, मान-अपमान से परे हैं, ऐसा वेद और पुराण कहते हैं। आप करूणा और गुण के सागर हैं, भक्त वत्सल हैं। मेरी आपसे यही विनती है कि अपने चतुर्भुज रूप को त्याग हृदय को अत्यन्त सुख देने वाली बाल लीला कर मुझे लोक के हंसी-ठट्ठा से बचाकर जग में आपकी माँ कहलाने का सौभाग्य प्रदान करो
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा।।
         भगवान विष्णु ने मानव रूप में अवतार लेकर असुरों का संहार किया। उनके आदर्श राष्ट्रीयता और क्षेत्रीयता की सीमाओं को लांघकर विश्वव्यापी बन गये, जिससे वे मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाए। मनुष्य की श्रेष्ठता उसके शील, विवेक, दया, दान, परोपकार धर्मादि सदगुणों के कारण होती है, इसलिये जीवन का मात्र पावन ध्येय "बहुजन हिताय बहुजन सुखाय" होता है।  मानव की कीर्ति उनके श्रेष्ठ गुणों और आदर्श के कार्यान्वयन एवं उद्देश्य के सफल होने पर समाज में  ठीक उसी तरह स्वतः प्रस्फुटित होती है जैसे- मकरंद सुवासित सुमनों की सुरभि!  यही कारण है कि मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम सा लोकरंजक राजा कीर्तिशाली होकर जनपूजित होता है, जबकि परनारी अपहर्ता, साधु-संतों को पीड़ित करने वाला वेद शास्त्र ज्ञाता रावण सा प्रतापी नरेश अपकीर्ति पाकर लोकनिन्दित बनता है। इसलिए कहा गया है कि - "रामवत वर्तितव्यं न रावणदिव" अर्थात राम के समान आचरण करो, रावण के समान नहीं।  
       
श्रीराम के आदर्श शाश्वत  हैं उनके जीवन मूल्य कालजयी होने के कारण आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने त्रेतायुग में भावी शासकों को यह सन्देश दिया है-
"भूयो भूयो भाविनो भूमिपाला: नत्वान्नत्वा याच्तेरारामचंद्र
सामान्योग्य्म धर्म सेतुर्नराणा काले-काले पालनियों भवदभि:"
        अर्थात-  हे! भारत के भावी पालो! मैं तुमसे अपने उत्तराधिकार के रूप में यही चाहता हूँ की वेदशास्त्रों के सिद्धांतों की रक्षा हेतु जिस मर्यादा को मैंने स्थापित किया, उसका तुम निरंतर पालन करना। वस्तुत: नीतिभ्रष्टता के समकालीन बवंडर में समाज को स्वामित्व प्रदान करने के लिए सनातन धर्म के चिरंतन आदर्शों के प्रतीक श्रीराम के चरित्र से ही प्रेरणा प्राप्त करना चाहिए।

सबको रामनवमी की हार्दिक मंगलकामनाएं!
              .        .....कविता रावत 

Friday, March 20, 2015

गुड़ी पड़वा- चैत्र शुक्ल प्रतिपदा

चैत्र मास का प्रथम दिवस हिन्दू नववर्ष जो चैत्र नवरात्रि का प्रारंभ सूचक भी है। भारतीय समाज के आध्यात्म, जीवन दर्शन, अन्नोपार्जन, व स्वास्थ्य समृद्धि का महत्वपूर्ण पर्व है। विजय ध्वज स्वरूप गुड़ी पड़वा व घटस्थापना इस महापर्व के प्रतीकात्मक सूचक है। पडवा, प्रथमा नवचन्द्र के उत्थान का सूचक है और यह विदित है कि सृष्टि निर्माता ब्रह्मा ने इस दिन सृष्टि का निर्माण का शंखनाद किया। भारत वर्ष के प्रत्येक भाग में यह त्यौहार एक महापर्व के रूप में मनाया जाता है। 
          पड़वा शब्द मूलतः देवनगरी लिपी से उत्पन्न हुआ है एवं संस्कृत, कन्नड, तेलगू, कोंकणी, आदिभाषाओं में इसको इन्हीं नाम से जाना जाता है। कर्नाटक व आन्ध्रप्रदेश मेें उगादि नाम से यह दिवस नववर्ष के रूप में मनाया जाता है।  महाराष्ट्र में इस पर्व का विशेष महत्व है। नवरेह नाम से कश्मीर में और चेती चाँद नाम से सिंधी समाज में इस पर्व का महत्व सर्वमान्य है। नव रोज नाम से यह दिन पारसी, बहोई समाज के नव वर्ष आगमन का आनन्दोत्सव दिवस है।  मूल रूप से कृषि आधारित भारतीय जीवनशैली का यह महत्वपूर्ण त्यौहार है। इस दिन भारत की मूल दो फसलों मेें से एक रबी की पूर्णता मानी जाती है और नवीन फसल की शुरूआत की जाती है। इतिहास बताता है कि यह दिवस शक संवत के प्रारंभ का सूचक भी है। इस दिन सूर्य एक अद्भूत स्थान पर उदित होता है, जहाँ भू-मध्य रेखा और यामयोत्तर रेखाएँ मिलते हैं; ठीक उस बिन्दु के ऊपर सूर्य अवतरित होता है और हम बसंत ऋतु में प्रवेश करते हैं । 
         गुड़ी को गृह प्रवेश द्वार के दाहिने ओर एक ऊँचें स्थान पर स्थापित किया जाता है। यह एक विजय सूचक है और अनेक ऐतिहासिक प्रसंगों में इसका उल्लेख है। एक लंबी सीधी छड़ी पर लाल, हरे, पीले, मोटेदार कपड़े के साथ एक छोर पर मोटा नीम पत्र, आम्र पत्र व पुष्प हार बांधा जाता है। एक ताम्र या रजत कलश को उलटा कर इस पर रखा जाता है। ब्रह्मध्वज, इन्द्रध्वज छत्रपति शिवाजी के विषय सूचक राजा शालीवाहन एवं भगवान राम की सत्य विजय के सूचक स्वरूप में गुड़ी प्रसिद्ध है। भारतवासी अपने घर को साफ कर आंगन में रंगोली डाल सूर्य की प्रथम किरण को देखकर गुड़ी की स्थापना करते हैं। इस दिन पूजा के उपरांत नीम की पत्तियों को खाया जाता है। नीम की पत्तियों के अर्क में गुड़ व इमली मिलाकर भी इसका प्रसाद बनाया जाता है। यह एक रक्तशोधक एवं शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति बढाने वाला सत्व है, जिसको प्रसाद के रूप में देकर पूरे समाज को रोगमुक्त करने की भारतीय परम्परा का बोध होता है। 
         इस दिवस से सूर्य की किरणों का ग्रीष्म प्रभाव भी हमें महसूस होने लगता है। बाजार नई फसल से सराबोर हो जाते हैं। आम, कटहल और फल-फूल वातावरण को पुनर्जीवित करते हंै। दक्षिण भारत में इस त्यौहार का एक विशेष महत्व है। कन्नड भाषा में बेवू बेला का अर्थ है जीवन के 6 भाव- दुःख, खुशी, डर, आश्चर्य, क्रोध, व विरक्ति। इस दिन छः पदार्थों के खाद्य पदार्थों से तैयार प्रसाद खाया जाता है। नीम, इमली, गुड़, केरी, मिर्च व नमक से बने इस प्रसाद भोग का अर्थ है कि हमें अपने जीवन में सभी भावों को एक साथ खुशी-खुशी ग्रहण करना चाहिए और जीवन को स्वस्थ व संतुलित रूप से व्यतीत करना चाहिए। "युगादि पछडी" के नाम से प्रचलित यह प्रसाद विशेष रूप से वर्ष में एक बार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर ही बनाया जाता है। सुस्वाद पौष्टिक आहार पूरण पोली, ओबट्टू, पोलेलू इस दिन खाया जाता है। इनके नाम भले ही भिन्न है, परन्तु वह लगभग एक ही प्रकार से बनाया गया संतुलित पौष्टिक आहार है। भारतीय जीवन दर्शन व आयुर्वेद पर आधारित यह समस्त भोज्य पदार्थ वातारण व मौसम के बदलाव के साथ हमारे शरीर को स्वस्थ रखते हैं। यज्ञ व मंत्रोच्चारण के साथ चन्द्र की परिवर्तित मार्ग दशा का समस्त प्राणिजगत पर प्रभाव ‘‘पंचांगश्रवणम्‘‘ के रूप में समाज के विद्वानों व पण्डितों द्वारा किया जाता है। शुभ स्वास्थ्य व उपज के सूचक आम्र पत्र तोरण व नीम पत्र से सिंचित मधुर पवन पूरे प्रांगण को मधुर व रोगमुक्त करती है। 
         वास्तव में एक वैज्ञानिक दृष्टि वाले समृद्ध समाज के सूचक इस महापर्व से हमें पुनः बोध होता है कि हम ब्रह्म सृजित इस सृष्टि के महान सनातन धर्मी भारतवर्ष की संताने बनकर अनुग्रहित हुए हैं । 
गुड़ी पड़वा की मंगलमय कामनाएं। 
आरोग्य सम्पदा मासिक पत्रिका से संकलित  

Monday, March 16, 2015

मानव के लिए आत्मसम्मान की रोटी जरुरी

एक बूढ़े कोढ़ी, लंगड़े को देखकर भला कौन काम देता। लेकिन पेट की आग जो लगातार धधकती रहती है, उसे बुझाने के लिए दो वक्त की रोटी तो जरूरी है। अब दो वक्त की रोटी के लिए पैसे और पैसे के लिए कुछ काम, पर बूढ़े, लंगड़े और कोढ़ी आदमी को कौन काम देगा! अगर दे भी दिया तो क्या वह काम कर पाएगा? लेकिन पेट की आग के सामने ये सारे प्रश्न बेवकूफाना लगते हैं और लगने भी चाहिए। यूं तो वह चाहता तो किसी ट्राॅफिक सिग्नल पर अपनी लाचारी जताकर भीख मांगकर अपनी बची-खुची जिन्दगी काट लेता, पर नहीं; वह बेशक बूढ़ा, कोढ़ी व लंगड़ा था, लेकिन लाचार नहीं। पेट की भूख के साथ आत्मसम्मान की चिन्गारी हरपल उसे काम ढूढ़ने को उकसाती।
आज वह फिर काम की तलाश में बस अड्डे गया और हमेशा की तरह निराश होकर लौटा।  उसने सोचा कहीं तो कुछ गड़बड़ है जो सफलता हाथ नहीं आ रही। फिर यह जानने की जद्दोजहद शुरू हुई कि आखिर कमी क्या है? पता चलाना लक्ष्य है, न योजना और न ही उस योजना को पूरा करने के लिए उपयुक्त साधन। इस सबके संयोजन के लिए बहुत सा साहस चाहिए जो इस उमर में उस बूढ़े के पास कम ही था, पर वही भूख, बेगारी, आत्मसम्मान की तलवार उसे काम की तलाश के लिए उकसा जाती।
एक बार फिर वह काम की तलाश में बस अड्डा पहुंचा। अब उसके सामने लक्ष्य, योजना और साधन भी था। उसे ग्राहकों से खचाखच भरी वह दुकान दिखी जो शहर में अपनी लजीज जलेबी, समोसे और कचौड़ियों के लिए जानी जाती थी। उसका मन यह सब रोज खाने को करने लगा पर उसके लिए पैसे, पैसों के लिए काम और काम के लिए स्वस्थ शरीर कहाँ से लाता वह बूढ़ा। लेकिन आज वह हिम्मत कर दुकानदार से बोला-, "सेठ जी मुझे काम पर रख लो"। लेकिन सेठ ने एक ही नजर से उसे लताड कर भगा दिया। अगले दिन फिर वह उसी दुकान पर पहुंचा लेकिन सेठ के नौकर ने डंडा दिखा दिया तो वह सोचने लगा कि अब क्या करुँ? लेकिन उस बूढ़े को तो जैसे हार स्वीकार न थी। वह तुरन्त उठा और कहीं से एक टूटी कुर्सी जुगाड़ लाया और अगली सुबह उस दुकान के सामने डेरा जमा कर बैठ गया। आज उसने न सेठ से कुछ मांगा न उसकी ओर देखा। बस जो तकलीफ सेठ के ग्राहकों को उस दुकान के सामने खड़ी बेतरतीब गाडि़यों से होती थी, उन्हें तरतीबी से लगाने लगा। अपनी बैशाखी से अख्खड़ बूढ़ा लोगों से यूं सलीके से गाडि़याँ लगवाता मानो वही सेठ हो। लोग भी यह सोचकर उसकी बात मान लेते कि असहाय, बूढ़ा कोढ़ी, बाबा कुछ बोल रहा है तो सुन लो। अब वह हर दिन सुबह शाम बड़ी तत्परता से  उस दुकान के सामने गाडि़यों को सलीका सिखाता रहा। सेठ की दुकान के ग्राहक अब आराम से खुली जगह में बिना किसी धक्का-मुक्की के नाश्ता, जलपान आदि करते । गाडि़यों तो यूं पंक्तिबद्ध लगी रहती मानो किसी शोरूम में खड़ी हों। एक दिन वह भी आया जब सेठ ने बूढ़े को बुलाकर कहा- "तुमने इस हालत में भी मेरी बहुत बड़ी समस्या का समाधान किया है, इसलिए मैं आज से तुम्हें दोनों वक्त की रोटी और चायपानी के साथ 1200 रुपये मासिक की दर से काम पर रखता हूँ।"
 मिडलाइन इंडिया पत्रिका से संकलित


Wednesday, February 25, 2015

परीक्षा के दिन

इन दिनों बच्चों की परीक्षा से ज्यादा अपनी परीक्षा चल रही है। घर पर परीक्षा का भूत सवार हो रखा है, जिसने पूरे परिवार की रातों की नींद, दिन की भूख गायब कर दी है। न टीवी सीरियल, कार्टून फिल्मों का हो-हल्ला न कम्प्यूटर में बच्चों के गेम्स की धूड़-धाड़ सुनाई दे रही है। शादी-ब्याह, पार्टियाँ, खेल-तमाशे सब बन्द हैं। बच्चे जब छोटी कक्षाओं में होते हैं तो उनकी परीक्षा की तैयारियाँ कराने में नानी याद आने लगती है। अब पहले जैसा समय तो रहा नहीं कि माँ-बाप और परीक्षा के डर से बच्चे चुपचाप हनुमान चालीसा की तरह "सभय हृदयं बिनवति जेहि तेही" की तर्ज पर घोटा लगाने बैठ गए। आजकल के बच्चों को न माँ-बाप न परीक्षा का भय लगता है, वे नहीं जानते कि परीक्षा और भय में चोली-दामन का साथ है। बिना भय के परीक्षा का अस्तित्व नहीं और बिना परीक्षा भय का निदान नहीं होता। इस प्रसंग में रामचन्द्र शुक्ल जी कहना है- "किसी आती हुई आपदा की भावना या दुःख के कारण के साक्षात्कार से जो एक प्रकार का आवेगपूर्ण अथवा स्तम्भकारक मनोविकार होता है, उसी को भय कहते हैं।"
        परीक्षा देते समय आत्मविश्वास बनाए रखना, जो कुछ पढ़ा, रट्टा, समझा है, उस पर भरोसा रखना, परीक्षा में बैठने से पहले मन को शांत रखना, प्रश्न पत्र को ध्यान से पढ़ना और जो प्रश्न अच्छे से आता हो, उसका उत्तर पहले लिखना और बाद में कठिन प्रश्नों पर विचार कर सोच समझकर लिखना आदि कई बातें  बच्चों को हर दिन समझाते-बुझाते मन में अजीब से उकताहट होने लगती है। यह जानते हुए भी कि परीक्षा मात्र संयोग है, प्रश्न-पत्र अनिश्चित और अविश्वसनीय लाटरी है। परीक्षक प्रश्न पत्र के माध्यम से उनके भाग्य के साथ कैसा क्रूर परिहास करेगा, कितना पढ़ा हुआ कंठस्थ किया हुआ परीक्षा में आयेगा, यह अनिश्चित है, फिर भी संभावित प्रश्नों के उत्तर बच्चों को मुगली घुट्टी की तरह पिलाने में जुटी हुई हूँ। 
       "हेम्नः संलक्ष्यते ह्यगनौ विशुद्धिः श्यामिकापि वा" अर्थात सोने की शुद्धि अग्नि में ही देखी जाती है। संभवजातक में कहा गया है- "जवेन वाजिं जानन्ति बलिवद्दं च वाहिए। दोहेन धेनुं जानन्ति भासमानं च पंडितम्।।" अर्थात वेग से अच्छे घोडे़ का, भार ढ़ोने के सामथ्र्य से अच्छे बैल का, दुहने से अच्छी गाय का और भाषण से पंडित के ज्ञान का पता लगता है।
       शिक्षक सबको एक समान पढ़ाता है लेकिन योग्यता क्रम निर्धारण करने के लिए परीक्षा माध्यम अपनाना पड़ता है। इसी आधार पर प्रथम, द्वितीय, तृतीय आदि स्थानों के निर्णय का निर्धारण होता है। जिन्दगी में मनुष्य को भी विभिन्न प्रकार की परीक्षाओं के दौर से गुजरना पड़ता है। जिस प्रकार हमारे शरीर की पांचों उंगलियां समान नहीं होती, उसी प्रकार गुण, योग्यता और सामर्थ्य की दृष्टि से हर मनुष्य में अंतर है। उसके ज्ञान, विवेक और कर्मठता में अंतर है। व्यक्ति विशेष में कार्य विशेष के गुण हैं या नहीं, पद की प्रामाणिकता और व्यवस्था का सामर्थ्य है या नहीं, इसकी जानकारी के लिए परीक्षा ही एक मात्र साधन है। परीक्षा से पद के अनुकूल उनकी योग्यता, विशेषता, शालीनता, शिष्टता की जांच करके क्रम निर्धारित होता है। कालिदास जी कहते हैं-
        "अनिर्वेदं च दाक्ष्यं च मनसश्चापराजयम्"  अर्थात् अभीष्ट सफलता के लिए उत्साह, सामर्थ्य और मन में हिम्मत जरूरी है। इसी सबक को याद कर आॅफिस-घर के बीच तालमेल बिठाते हुए घर से परीक्षा का भूत निकाल बाहर करने की जुगत में दिन-रात कैसे बीत रहे हैं, कुछ पता नहीं है।
       ...कविता रावत

Thursday, February 5, 2015

मेरा मतदान दिवस

हमारे देश में राष्ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस, स्वतंत्रता दिवस और गांधी जयंती के साथ ही वर्ष भर धार्मिक पर्व, त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाये जाने की प्रथा प्रचलित है। इन पर्व, त्यौहारों के अलावा पांच वर्ष के अंतराल में ‘मतदान दिवस’ के रूप में आम जनता का महोत्सव संसद, राज्य विधान सभा, नगरीय निकायों से लेकर ग्राम पंचायतों के चुनाव के रूप में हमारे सामने जब-तब आ धमकता है।  यह चुनाव रूपी पर्व घोषणा के बाद एक माह से लेकर 40 दिन तक शहर की सड़कों से लेकर गांवों की गलियों में हर दिन बारात जैसी रौनक लिए आम जनता के दिलो-दिमाग पर छाया रहता है।  
          यूँ तो मैंने शुरूआती दौर के मत पत्र के माध्यम से उम्मीदवार के चुनाव चिन्ह पर ठप्पा लगाने के जमाने से लेकर आज इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों "ईवीएम" के माध्यम से मतदाता के रूप में भाग लिया है, लेकिन इस बार 31 जनवरी 2015 को शनिवार का दिन मेरे लिए अहम रहा। क्योंकि इस दिन नगरपालिका के महापौर और पार्षद चुनाव में पहली बार मेरी मतदान अधिकारी के रूप में ड्यूटी लगी तो मुझे मतदान प्रक्रिया को प्रत्यक्ष रूप से समझने का अवसर मिला। यद्यपि मतदान का समय सुबह 7 बजे से लेकर सायं 5 बजे तक निर्धारित था, लेकिन इसके लिए एक दिन पूर्व से बहुत सी चुनाव पूर्व तैयारियों की भागदौड़ में कब सुबह से शाम हो गई पता ही नहीं चला। कड़ाके की ठण्ड में सुबह 8 बजे लाल परेड ग्राउंड में बजे पहुंची तो वहांँ मेला जैसा दृश्य नजर आया। कोई अपना वार्ड क्रमांक तो कोई मतदान केन्द्र की टेबल ढूंढ रहा था।  कोई मोबाइल पर अपने दल के सदस्यों की खोज-खबर ले रहा था। मैं घंटे भर की मशक्कत के बाद मतदान क्रमांक टेबल पर पहुंची। उसके एक घंटे बाद मतदान सामग्री का एक थैला मिलने के पश्चात महापौर की दो ईवीएम कंट्रोल यूनिट और एक पार्षद की ईवीएम कंट्रोल यूनिट सहित प्राप्त हुई, जिसकी पूरी तरह जांच पड़ताल करने बाद लगभग 3 बजे पुलिस सुरक्षा के साथ बस द्वारा हम अपने नियत मतदान केन्द्र पर पहुंचे, तो बड़ी राहत मिली। 
          मतदान दिवस के दिन सुबह 6 बजे ठण्ड में ठिठुरते हुए मतदान स्थल पर पहुंचना चुनौतीपूर्ण रहा, लेकिन नियत समय पर अपने कत्र्तव्य पर पहुंचने से मन को आत्मसंतुष्टि मिली। हमारा मतदान केन्द्र एक प्रायवेट स्कूल का एक छोटा से कमरा था, जिसमें पीठासीन अधिकारी के नेतृत्व में 4 मतदान अधिकारियों को सहयोगी भूमिका निभानी की जिम्मेदारी दी गई। मतदान प्रक्रिया संबंधी पूर्ण कार्यवाही के लिए पीठासन अधिकारी जिम्मेदार होता है। सुबह मतदान के 15 मिनट पूर्व सभी उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों के समक्ष पीठासीन अधिकारी ने डेमो के लिए ईवीएम में सभी उम्मीदवारों के चुनाव चिन्ह की पुष्टि एवं ईवीएम के सुचारू संचालन की जानकारी दी। पोलिंग एजेंटों की संतुष्टि के उपरांत पीठासीन अधिकारी द्वारा कंट्रोल यूनिट को सीलबंद कर अपने हस्ताक्षर के साथ उनके भी हस्ताक्षर कराए। तत्पश्चात् निर्धारित समय सुबह 7 बजे से ईवीएम के कंट्रोल यूनिट को मतदान के लिए चालू कर दिया गया।
          मतदान प्रक्रिया के अंतर्गत पहले अधिकारी के पास मतदाताओं की सूची रहती है, जिसके आधार पर वह मतदाता पर्ची के आधार पर सूची से मिलान करता है। दूसरा अधिकारी रजिस्ट्रर में मतदाता सूची क्रमांक और पहचान पत्र अंकित कर मतदाता के हस्ताक्षर लेता है। तीसरा अधिकारी मतदाता की बांयीं हाथ की उंगली पर अमिट स्याही लगाकर मतदान के लिए पर्ची देता है। इसके बाद चैथा अधिकारी मतदाता से पर्ची प्राप्त कर ईवीएम की कंट्रोल यूनिट से ईवीएम का बटन चालू कर देता है, जहां मतदाता “मतदान प्रकोष्ठ“ में जाकर ईवीएम में अंकित उम्मीदवार के चुनाव चिन्ह के सामने का बटन दबाकर अपना पसंदीदा उम्मीदवार चुनता है।
         मैं दूसरे मतदान अधिकारी के रूप में कार्यरत थी। हमारे मतदान केन्द्र पर लगभग 600 मतदाता थे, लेकिन सायं 5 बजे तक लगभग 450 ही मतदाताओं ने अपने मत का उपयोग किया। मतदान के दौरान जब-जब कुछ मतदाता “मतदान प्रकोष्ठ“ में जाकर कहते कि, “अब क्या करना है“ तो तब-तब पीठासीन अधिकारी को बार-बार उन्हें ईवीएम में अंकित अपने पंसदीदा महापौर और पार्षद उम्मीदवार के चुनाव चिन्ह के सामने वाले बटन दबाने के लिए कहना पड़ रहा था, तो वे खिसियाते हुए जाने कौन सा बटन दबाकर भाग खड़े होते, तो यह क्षण हमारे लिए एक गंभीरता का विषय बन पड़ता कि हमारे देश में आज भी अधिकांश मतदाताओं में मतदान के प्रति भारी अज्ञानता और जागरूकता की कमी है। इस विषय में मुझे अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी का कथन स्मरण हो उठाता  कि- “जनतंत्र में एक मतदाता का अज्ञान सबकी सुरक्षा को संकट में डाल देता है।“ लेकिन हमारे भारत का अधिकांश मतदाता तो आज भी वोट के महत्व को गंभीरता से नहीं समझता है। यही कारण है कि चुनाव में उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन देकर अथवा जाति, बिरादरी, क्षेत्रीयता के दबाव या शराब में मदमस्त किया जाकर भय और आतंक दिखाकर अपने पक्ष में मतदान के लिए तैयार करने की भरपूर कोशिश की जाती है। एक सर्वे के अनुसार आज भी हमारे देश में लगभग 40 प्रतिशत मतदाता अनपढ़ अथवा अशिक्षित हैं, जिनसे सोच-समझकर कर मतदान की अपेक्षा करना बेमानी है। इसके साथ ही 10 प्रतिशत मतदाता 18 से 20 वर्ष के आयुवर्ग के हैं, जिन्हें हमारी सरकारें विवाह के दायित्व वहन करने के लिए अयोग्य समझती है, लेकिन मतदान के लिए नहीं, यह स्थिति मतदान की उपयुक्तता पर पर एक प्रश्न चिन्ह है? लोकतंत्र में मतदाता का समझदार होना जरूरी है, क्योंकि इसके अभाव में सच्चे देशभक्त और त्यागी प्रतिनिधि का चुनाव संभव नहीं हो सकता। इस विषय में महान दार्शनिक प्लेटो का कहना साथक है कि- "जहां मतदाता मूर्ख होंगे, वहाँं उसके प्रतिनिधि धूर्त होंगे।" ऐसे धूर्त प्रतिनिधियों को देखकर ही बर्नाड शाॅ को कहना पड़ा कि- "सच्चा देशभक्त और त्यागी नेता चुनाव के रेगिस्तान में निरर्थकता की फसल बोते-बोते दम तोड़ देता है और धूर्त एवं छली व्यक्ति मैदान मार लेता है।" अज्ञेय जी का कहना था कि "जनतंत्र व्यवहारतः विश्वास या आस्था के ही सहारे चलता है।" लेकिन यह गंभीर दुःखद पहलू है कि आज ये दोनों शब्द ही बेमानी लगते हैं। क्योंकि जब-जब "व्यक्ति" तथा "पार्टी-स्वार्थ" से राष्ट्र का लोकतंत्र चलता है, तब-तब वहाँ लोकतंत्र की सार्थकता कई प्रश्न उठ खड़े होते हैं।
         जब चुनाव निष्पक्ष हों। धन, धमकी, जाति, सम्प्रदाय और धर्म के नाम पर मत डालने के लिए जनता को प्रेरित न करते हुए जनप्रतिनिधि सच्चाई और ईमानदारी से राष्ट्र की सेवा करने के लिए आगे आयेंगेे, तभी अब्राहम लिंकन द्वारा प्रतिपादित लोकतंत्र की परिभाषा "जनता के लिए, जनता द्वारा, जनता का शासन" की सार्थकता सिद्ध होगी।
...कविता रावत
www.hamarivani.com
 halchal
रफ़्तार www.blogvarta.com
 I.A.S.I.H
ब्लॉग - चिठ्ठा
 I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़

Install Codes


CG Blog रफ़्तार

CG Blog