Friday, May 13, 2016

उज्जयिनी का सिंहस्थ कुम्भ महापर्व

कुंभ का शाब्दिक अर्थ 'कलश' है। प्रारंभ से ही प्रत्येक शुभ कार्य में कलश पूजन का अपना अलग महत्व होता है। 'कलश' कला और संस्कृति का ही प्रतिनिधित्व ही नहीं करता अपितु यह सृष्टि तथा पूर्ण व्यक्तित्व का भी प्रतीक माना जाता है।
वेदों में कलश को 'ऋतसदन' पुराणों में 'अमृत घट' कहा गया है, जो सागर मंथन से प्राप्त अमृत को रखने के लिए हुआ था। अर्थात् इन बातों से इतना तो स्पष्ट हो गया कि इस महत्वपूर्ण पर्व का यह नाम इसकी पवित्रता एवं इसके महत्व पर प्रकाश डालने वाला नाम है।
वेद शास्त्रों के उल्लेख से स्पष्ट है कि कुंभ पर्व प्राचीन काल से चला आ रहा है। श्रीमद् भागवत पुराण के अनुसार जब देवताओं एवं दानवों के युद्ध में देवताओं का पक्ष कमजोर पड़ गया और वे इस युद्ध में हार गए, तब भगवान विष्णु की दोनों पक्षों में समझौते की राय मान ली गई। यह निर्णय लिया गया कि दानव और देव एक साथ समुद्र मंथन आरंभ करें और दोनों पक्षों ने समुद्र मंथन किया, जिसके फलस्वरूप समुद्र के गर्भस्थल से अनेक महत्व के रत्न प्राप्त होने के बाद चौदहवां रत्न 'अमृत' प्राप्त हुआ।
अमृत को लेकर देवता और दानवों में पुनः मतभेद हो गया और उनके बीच 12 दिनों तक युद्ध हुआ लेकिन जिस कुंभ में यह अमृत भरा पड़ा था, उसे कोई भी दल प्राप्त नहीं कर सका। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया और वे नाचती-नाचती संघर्ष स्थल पर पहुंची और उन्होंने अपनी युक्ति से कुंभ में रखे अमृत का वितरण किया।
अमृत कुंभ को प्राप्त करने के लिए देवताओं व दानवों के 12 दिन के युद्ध के फलस्वरूप अब 'कुंभ' रखा गया। लेकिन शास्त्रों के अनुसार पृथ्वी पर केवल 4 स्थानों पर कुंभ रखा गया- हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक। यही कारण है कि सिर्फ इन चार स्थानों पर कुंभ मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि मानव जितने समय को एक वर्ष की अवधि मानता है, उतना ही समय देवताओं के लिए केवल एक दिन के बराबर होता है। इस अनुपात से युद्ध के 12 दिनों को मानव समाज 12 वर्ष गिनता है और यही कारण है कुंभ का पर्व चारों जगह 12-12 वर्षों के बाद आता है।
'मेष के सूर्य और सिंह के गुरू के समावेश का ये पर्व महापर्व का रूप लिए उज्जयिनी में आता है। सिंह का गुरू के साथ ये बारह संयोग 'सिंहस्थ' महापर्व कहलाता है, इसलिए इस कुंभ का विशेष महत्व है। इसी समय सूर्य भी मेष राशि पर होता है। बारह वर्षों के इस चक्र को हम पूरी भावना से बांध देते है। उज्जयिनी के लिए अनेक प्रकार की संभावनाओं और उपलब्धियों का अमृत कलश लेकर ये पर्व शनैः-शनैः द्वार पर दस्तक देने आ पहुंचा है।
मालवा की गंगा शिप्रा नदी के इर्द-गिर्द चार क्षेत्रों में विभाजित यह 'सिंहस्थ' मेला देश-विदेश से समागत जनता, गृहस्थ और विरक्त का आकर्षण केन्द्र बन जाता है। इन चारों क्षेत्रों में से अंकपात वैष्णव महात्माओं रामनंदी के लिए, दत्त अखाड़ा दशनामियों के लिए, रूद्रसागर वैदिक मतावलंबियों व सनातन धर्मी शंकर दंडी सन्यासियों के लिए तथा नृसिंह घाट में रामानुज संप्रदाय के संत महात्मा एवं आचार्यों के पड़ाव रहते हैं। इसी प्रकार लालपुल के समीप परमहंस साधुगण कल्पवास करते हैं तथा विरक्त साधु संत भी इसी स्थान पर रहते हैं। इसी प्रकार नाथ संप्रदाय के साधुओं का पड़ाव ऋणमुक्तेश्वरी, भर्तृहरि की गुफा और पीर मछन्दरनाथ की समाधि पर होता है। लेकिन शासन तंत्र, आध्यात्म एवं जनता का जब समन्वय होता है तो शासन तंत्र अपने से जुड़े हुए शब्द-तंत्र की विद्या से जनता एवं आध्यात्म के किसी भी रूप को अपने अनुरूप बना लेता है।
साधुओं के विभिन्न स्वरूप कहीं-कहीं अदम्य मानवता से ओतप्रोत और निराकार तथा वैदुष्य संपन्न तो कहीं इसके बिलकुल विपरीत, लेकिन उज्जयिनी की पवित्र माटी तो समदर्शिनी है। उसका तो नाम ही क्षमा है। उसकी छाती तो बारह वर्षों के इस पवित्र पर्व पर सभी के लिए समान रूप से बिछी है। साधुओं का एक लक्ष्य होते हुए भी अनेक मठों और मठाधीशों के मतों में आवान्तर भेद है। वैष्णवी धारा इस जीवन दर्शन में आस्था रखती है जो राग के दमन पर नहीं शोधन पर आधारित है। ये लोग मुक्ति से भी आगे भक्ति को आधार बताते है, तो दंडी संन्यासी वेद विहित मार्ग पर चलना अपनी लकीर मानते है। समाविष्ट सन्यासी वर्ग जो दशनामी से विभूषित हैं, चारों वेदों के आधार पर चार पीठ में विभाीजित है। योगतंत्र को अपनी साधना मानना इस वर्ग का रूप है।
इनके विभिन्न स्वरूपों के बावजूद भारतीय आध्यात्मिक जीवन में जल और स्नान ध्यान आदि का बड़ा महत्व है। पर्व के समय समीपवर्ती सरोवर, कुण्ड नदी या समुद्र में स्नान करना अधिक पुण्यदायी माना जाता है। गृहों की विशेष स्थिति पर कुंभ और सिंहस्थ के स्नान की प्रथा इसी परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। पौराणिक गाथा के अनुसार वैशाख मास में जो श्रेष्ठ मनुष्य पावन सलिला शिप्रा नदी में स्नान करते है, उन्हें किसी भी प्रकार के नर्क का भय नहीं रहता है। इसी अवधि में पंचक्रोशी यात्रा में लाखों यात्री नागेश्वर  सहित चारों दिशाओं में स्थित शिवालय के दर्शन करते हुए संपूर्ण नगर की 118 कि.मी. लंबाई की प्रदक्षिणा पूरी करते नागेश्वर हैं। अंत में शिप्रा तट के 28 तीर्थों की यात्रा अष्टारट विशांति यात्रा, जो अब 'अष्टतीर्थी' यात्रा करते हुए मंगलनाथ पर पांच दिवसीय यात्रा पूर्ण करते हैं। सिंह राशि के गुरू के साथ मेष के सूर्य का संयोग विशेष महत्वपूर्ण होने से संक्रमण स्नान पर्व वैशाखी अमावस्या, पितरों का पर्व है। पिण्डदान, तर्पण, जलांजलि, श्रद्धांजलि के रूप में अर्पित करते हैं। इसी श्रृंखला में अक्षय तृतीया पुण्य को क्षय से बचाती है। वैशाखी शुक्ल पंचमी शंकराचार्य के प्रति श्रद्धांजलि अर्पण पर्व है।
वैशाख मास के अंतिम पांच दिन अथवा एक दिन के तीर्थ वास और स्नान का विशेष पुण्य काशी के लंबे निवासी की अपेक्षा वैशाख मास के पांच दिन उज्जयिनी वास करने से प्राप्त है। क्षिप्रा में वैशाखी पूर्णिमा के स्नान का महत्व विशेष तौर से इसलिए भी है क्योंकि इसमें सिंहस्थ और कुंभ दोनों पर्व मिलते हैं। उज्जैन के कुंभ में ये योग मुख्य है-वैशाख मास, शुक्ल पक्ष पूर्णिमा, मेष राशि का सूर्य, सिंह राशि का बृहस्पति, चंद्र का तुला राशि पर होना, स्वाति नक्षत्र व्यतिपात, स्कंद पुराण के अनुसार अत्रि नामक एक ऋषि ने अपने एक हाथ को उठा कर तीन हजार वर्ष तक कठोर तपस्या की थी। तत्पश्चात् उनके शरीर से दो स्त्रोतों का प्रवाह हुआ। एक आकाश की ओर चला गया, जो बाद में चंद्र बन गया और दूसरा धरती की ओर जिसने बाद में क्षिप्रा नदी का रूप धारण किया। क्षिप्रा के शाही स्नान का अपना एक विशेष महत्व है। जब इस शाही स्नान में साधु संतों के सभी अखाड़े पावन क्षिप्रा के दत्त अखाड़ा एवं रामघाट पर स्नान करते हैं। सभी अखाड़े अपने पवित्र ध्वज (अणी) की पूजा करते हैं और बाद में स्नान के पूर्व अणी को पवित्र जल से स्पर्श करते हैं। सन्यासियों के भस्म की छाल को शिप्रा अपने में समा लेती है और उस समय ऐसा प्रतीत होता है जैसे क्षिप्रा में भस्म का रंग घुल गया हो। इस अवसर पर सभी को मालवा की ये गंगा अपने सीने से लगा लेती है।
शास्त्रों के अनुसार देवराज इंद्र का पुत्र जयंत जब अमृत कलश लेकर भागा तो उसके साथ चंद्रमा ने अमृत छलकाने, सूर्य देव ने कलश फटने से और बृहस्पति ने कलश को दैत्यों के हाथों से जाने से रोकने में काफी योगदान किया था। इसलिए इन्हीं गृहों के संयोग से सिंहस्थ (कुंभ पर्व) की तिथि निश्चित की जाती है। बताया जाता है कि जिस दिन सुध कुंभ गिरने की राशि पर सूर्य, चंद्रमा व बृहस्पति का संयोग हो, उसी समय पृथ्वी पर कुंभ का योग पड़ता है। उज्जयिनी का सिंहस्थ पर्व योगियों एवं जोगियों दोनों का ही अद्भुत समागम सम्मेलन है। इस शुभ अवसर पर योगी योनि की संत महापुरूष एवं जोगी यानि जिज्ञासु गृहस्थ गण को सूक्ष्म रूप से ज्ञान प्रदान करके उनकी जिज्ञासा शांत करते हैं। साथ ही उनके सामने अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत करके उन्हें अंधकार से प्रकाश की ओर आकृष्ट करते हैं। ऐसी प्रेरणा लेकर यहां पहुंचने वाला प्रत्येक भक्त भविष्य के लिए नई प्रेरणा लेकर लौटता है।
...द्वारकाधीश चौधरी



Sunday, May 1, 2016

पेट की खातिर

video
कुछ लोग भले ही शौक के लिए गाते हों, लेकिन बहुत से लोग पेट की खातिर दुनिया भर में गाते फिरते हैं।   ऐसे ही एक दिन दुर्गेलाल और उसका भाई गाते - भटकते हुए घर के द्वार पर आये तो, उनका गाना अच्छा लगा तो घर पर बिठाकर मैंने रिकॉर्डिंग की, जो आज मई दिवस पर प्रस्तुत है।     ..




Friday, April 8, 2016

नव संवत्सर 2073

नव संवत्सर
  नव धरा, नव विहान
   बीता अतीत अब नव भविष्य
    नव कल्पना, नव विचार
     नव संवेदना, नव संरचना
      संवारे गाँव गरीब
       यह संकल्पना साकार करें
        गढ़े संवारे नवराष्ट्र
         आप सुखमय होवे
          यह समाज सुखमय होवे
           यही शुभेच्छा हमारी  
            नव प्रकाश से आलोकित
             हो जगती सारी

'चैत्रे मासि जगद् ब्रह्मा ससर्ज प्रथमेऽहनि।
शुक्लपक्षे समग्रे तु तदा सूर्योदये सति।।
- ब्रह्म पुराण में वर्णित इस श्लोक के अनुसार चैत्र मास के प्रथम सूर्योदय पर ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना की थी। इसी दिन से संवत्सर की शुरूआत होती है।


हिन्दू नव वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा एवं चै़त्र नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाएं!  


Monday, April 4, 2016

भारत में अंग्रेजी परस्तों की साजिश

हमारा देश लगभग 1000 वर्ष तक विदेशियों का गुलाम रहा है। भारत को गुलाम बनाने में विदेशियों से कहीं अधिक भारतीय लोगों का भी हाथ रहा। हमारे एक मित्र ने एक कविता लिखी जिसका शीर्षक था- “यह देश है वीर गद्दारों का“ इस देश के वीरों ने पराक्रम कम और परिक्रमा के द्वारा सभी कुछ प्राप्त कर लिया और हमारे ऊपर, विदेशियों से हाथ मिलाकर शासन करते रहे और हमें गुलाम बनाकर रखे रहे। जब हम स्वतंत्र होने की दिशा में आगे बढ़ रहे थे, सुविधा भोगी भारतीय लोग हमारे ऊपर शासन तथा हमें गुलाम बनाये रखने के लिए भारतीय स्वतंत्रता सेनानियों की परिक्रमा करने लगे और मुखौटा बदल कर इस ओर हो लिए। वैसे तो हमारा संविधान ही अंग्रेजी के संविधान की नकल और उनके हस्तक्षेप के नीचे बना है और देश के वीर गद्दार लोग, भाषा के मामले में भी दबाव बनाने लगे कि भारत की राजभाषा अंग्रेजी बने, किन्तु महात्मा गांधी और उनके जैसे अनेक राष्ट्रीयता से ओत-प्रोत नेताओं ने इसका तीव्र विरोध किया और भारतीय भाषा विशेषकर हिन्दी को ही राष्ट्रभाषा/राजभाषा बनाने की वकालत की। जब संविधान बनने लगा तो अंग्रेजी परस्तों ने फूट डालो और राज करो की नीति के तहत् अहिन्दी भाषियों को उकसाया व दावेदारी खड़ी करवा दी। किन्तु संविधान सभा के अध्यक्ष डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद जी ने तीन अहिन्दी भाषी संविधान सभा के सदस्यों की समिति बनाकर राजभाषा सम्बन्धी सुझाओं और उन्हीं के प्रयासों और विचारों को महत्ता देकर संविधान के अनुच्छेद 343 से लेकर 351 तक के राजभाषा खण्ड को सर्वसम्मति से पारित कराया, जिसमें अनुच्छेद 343(1) के अनुसार देवनागरी में लिखी हिन्दी को भारत संघ की राजभाषा एवं अनुच्छेद 345 के अनुसार भारत की प्रादेशिक भाषाओं को भी प्रदेशों की राजभाषा बनाने की व्यवस्था की गई। 
हमारे संविधान निर्माताओं एवं राजभाषा समिति के अहिन्दी भाषी सदस्यों ने बड़ी सूझ-बूझ एवं ईमानदारी से तत्कालीन परिस्थितियों से ताल-मेल/समन्वय कर जो व्यवस्था प्रस्तुत की, उसकी सराहना ही की जानी चाहिए। किन्तु भारतीय अंग्रेजी परस्तों को चैन नहीं था और वे दक्षिण भारतीयों के नेताओं को उकसा कर और पं. जवाहर लाल नेहरू को उल्टा सीधा पढ़ाकर अहिन्दी भाषियों के हितों के नाम पर वर्ष 1963 में राजभाषा अधिनियम में देश में कुछ कार्यों के लिए द्विभाषिक स्थिति (अंग्रेजी परस्ती को बढ़ावा) और पुनः आन्दोलन करवा कर वर्ष 1967 में अधिनियम में संशोधन कर धारा 3 में एक उपधारा 5 जोड़कर पुनः कुछ कार्यों के लिए अंग्रेजी के काम काज को जारी रखने की व्यवस्था (अंग्रेजी परस्तों को बढ़ावा) करवा लिया। सच तो यह है कि यह सब कुछ हिन्दी भाषी/उत्तर भारतीय अभिजात्य वर्ग के अंग्रेजी परस्तों के द्वारा कुचक्र रचा गया था। इस व्यवस्था से देश के अहिन्दी भाषा-भाषियों को कोई लाभ नहीं दिया गया और आगे भी अंग्रेजी परस्त अहिन्दी भाषियों के नाम की आड़ में सारा कुचक्र चला रहे हैं और देश पर जबरदस्ती गैर कानूनी तरीके से अंगे्रजी को लादकर देश की सामान्य जनता को लूट व ठग रहे हैं, जिसका बहुत लम्बा चौड़ा  इतिहास है। अभी हाल ही में इन अभिजात्य वर्ग के अंग्रेजी परस्तों ने वर्ष 2011 में भारतीय प्रशासनिक सेवा में चुपके से सी-सेट लागू कर 22.5 अंकों की अंग्रेजी को, प्रतिभागियों पर लाद दिया, ताकि हिन्दी तथा अन्य भाषा-भाषी पीछे चले जाये। वर्ष 2013 में तो इन लोगों ने 100 अंकों का एक और अंग्रेजी का पर्चा थोप दिया, जिसके अंक मेरिट में जुड़ना था, किन्तु संसद में तीव्र विरोध के कारण अंग्रेजी परस्त सरकार को अध्यादेश वापस लेना पड़ा था।
इस संबंध में मुझे एक कहानी याद आ रही है कि काफी समय पहले भारत का एक पहलवान इंग्लैण्ड गया और उसने घोषणा किया और प्रसारित किया कि यहां को कोई पहलवान हमसे कुश्ती लड़ सकता है। यह बात जब इंग्लैण्ड के पहलवानों को पता चली तो वे आपस में जुटकर विचार किये कि कुश्ती में भारत के पहलवान को हराने की क्षमता किसी में नहीं है, लेकिन कुछ तिकड़म करके उसे परास्त किया जा सकता है। इंग्लैण्ड के पहलवान, वेट लिफ्टिंग (भार उठाने) में माहिर थे। उन लोगों ने भारत के पहलवान के सामने शर्त रखी कि यदि आप इस 10 मन (लगभग 400 किलो बराबर) की नाल उठा लेंगे तो, तभी हम लोग आपसे कुश्ती लड़ेंगे। भारत का पहलवान चालाक था। दूसरे दिन जब वह अखाड़े में गया तो उसने इंग्लैण्ड से पहलवानों से कहा कि जो पहलवान इसको उठाते हैं, उनसे कहिए कि वे उसे उठाकर दिखायें। इंग्लैण्ड का पहलवान चूंकि 10 मन की नाल (भार) उठाने में अभ्यस्त था, तुरन्त मिनट भर में उसे उठा लिया। ठीक उसी समय भारत के पहलवान ने फुर्ती के साथ नाल उठाने वाले पहलवान के पीछे से पैरों के बीच एक हाथ डालकर और एक हाथ गर्दन में डालकर उस पहलवान को उठा लिया, क्योंकि वह 10 मन से अधिक वहन के पहलवानों को उठाने का अभ्यस्त था। फिर इसके बाद इंग्लैण्ड के पहलवानों ने उसके समक्ष हार मान ली। इसी तरह देश का उच्च सरकारी तंत्र/अभिजात्य वर्ग इसी प्रकार से अंग्रेजी की दीवाल खड़ी कर देश की सामान्य जनता के युवाओं को परास्त करने की जुगत/कुचक्र रचता रहता है। अतः इस देश की सामान्य जनता, गरीब तथा पिछड़े वर्गों के युवाों को भाषा, विशेष कर देश की राजभाषा की स्थिति को जानना चाहिए और उसे प्रतिष्ठापित कराने के लिए संघर्ष करना चाहिए, ताकि इस देश में सामाजिक आर्थिक न्याय व जनतांत्रिक व्यवस्थाएं पुष्पित व पल्लवित होती रहें। यह भी ध्यान में रखना होगा कि वर्ष 2011 में जारी संघ लोग सेवा आयोग का आदेश अभी लागू है, जिसके लिए संघर्ष करने की जरूरत है। 
अंग्रेजी परस्तों का आतंक जारी है। नई सरकार कुछ हिन्दी के लिए करना तो चाहती है किन्तु सरकारी अमला देश की वर्तमान सरकार की राजभाषा नीति को विफल करने के लिए तमाम कुचक्र चला रहे हैं। 
- जगदीश नारायण राय

Tuesday, March 29, 2016

ईर्ष्या और लालसा कभी शांत नहीं होती है

मूर्ख लोग ईर्ष्यावश दुःख मोल ले लेते हैं।
द्वेष फैलाने वाले के दांत छिपे रहते हैं।।

ईर्ष्यालु व्यक्ति दूसरों की सुख सम्पत्ति देख दुबला होता है।
कीचड़ में फँसा इंसान दूसरे को भी उसी में खींचता है।।

ईर्ष्या  के दफ्तर में कभी छुट्टी नहीं मिलती है।
ईर्ष्या खाली घर में कभी पाँव नहीं रखती है।।

जैसे लोहे को जंग वैसे ही ईर्ष्या मनुष्य को भ्रष्ट करती है।
भले ही ईर्ष्यालु मर जाय लेकिन ईर्ष्या कभी नहीं मरती है।।

ईर्ष्या के बल पर कभी कोई धनवान नहीं बनता है।
ईर्ष्या के डंक को कोई भी शांत नहीं कर सकता है।।

ईर्ष्या लोभ से भी चार कदम आगे रहती है।
ईर्ष्या और लालसा कभी शांत नहीं होती है।।


....कविता रावत

Friday, March 11, 2016

आवाजों को नजरअंदाज न करें

हमारे शरीर में नाक से लेकर घुटनों तक समय-समय पर कुछ आवाजें आती हैं। ये आवाजें शरीर का हाल बयां करती हैं। इन्हें नजरअंदाज न करें। इस बारे में प्रस्तुत है मासिक पत्रिका आरोग्य सम्पदा से संकलित उपयोगी जानकारी। 
1. खर्राटों की आवाज
सोते समय खर्राटे लेने की आवाज सांस लेते हुए  मुँह और गले के मुलायम टिश्यू के वाइब्रेट होने के कारण आती हैं। नैसेल स्प्रे से यह ठीक हो जाती है। आप अपने वजन को कम करके भी इस परेशानी से निजात पा सकते हैं।
यदि खर्राटे की समस्या अधिक हो और सोते समय आपकी सांस फूलती हो या जगने के बाद आप पसीने से भीगे हुए होते हों तो तुरन्त डाॅक्टर से संपर्क करें। यह स्लीप एप्निया के लक्षण है। इस बीमारी में एयरफ्लो रूक जाता है और डाॅयबिटीज तथा स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।
2. घुटने और टखने की आवाज
घुटने और टखने से आवाज आना सामान्य बात है। यह जोड़ों के फ्लूइड शिफ्ट होते समय एयर बबल आने, नसों के जोड़ों पर चढ़ जाने अथवा जोड़ों के खिसकने के कारण होता है। इससे घबराने की जरूरत नहीं है।
        यदि घुटने और टखनों से चटकने के साथ ही दर्द भी होता हो तो डाॅक्टर से जरूर मिलें। इसके अलावा सूजन आना और जोड़ों का बहुत अधिक न खुलना भी परेशानी का संकेत है। यह मेनिस्कस (जोड़ों के पास की हड्डी का कुशन) के फटने व आस्टिमेंट आर्थराइटिस का लक्षण हो सकता है।
3. कान की आवाज
कान में झनझनाहट या घंटी बजने की आवाज भी हमेें अक्सर सुनाई देती है। यह बजती है और तुरन्त खत्म हो जाती है, इसे टिनीटस कहते हैं। यह इसलिए होता है क्योंकि कई बार दिमाग कुछ इलेक्ट्रिकल सिग्नल्स को शोर समझ लेता है।
यदि यह समस्या बार-बार और एक ही कान में होती है तो यह कान का इंफेक्शन हो सकता है। इसलिए डाॅक्टर से परामर्श जरूरी है। हालांकि अधिकांश मामलों में डाॅक्टर्स को इसकी कोई ठोस वजह नहीं मिलती है। इसलिए इस बीमारी का कोई ठोस इलाज भी नहीं है।
4. पेट की आवाज
पेट से गुड़गुड़ाने की आवाजें भूख लगने पर भी आती हैं और कई बार खाना खाते समय भी आती हैं। यह आंतों के मरोड़ के कारण होता है। यह डाइजेशन की ही प्रक्रिया है। यह समस्या कई लोगों के साथ होती है।
पेट से आवाज आना तो कुछ हद तक ठीक है, लेकिन यदि इन आवाजों का आना बढ़ जाए तो खतरा हो सकता है। साथ ही यदि आंतों में सूजन हो और आवाज के साथ दर्द भी हो तो तुरन्त डाॅक्टर से संपर्क करें। कई मामलों में आंतों के अधिक सिकुड़ने के कारण भी ऐसा होता है।
5. नाक की आवाज
कई बार नाक से हल्की सीटी बजने की आवाज आती है। यह नाक में स्पेस की कमी के कारण होता है। कम स्पेस में जब सांस लेते समय एयर पास होती है तो सीटी बजने की आवाज आती है। यह रात को अधिक परेशान करती है।
यदि नाक से आवाज आनी किसी इंजुरी के बाद शुरू हुई है तो तुरन्त डाॅक्टर से मिलें। इसके अलावा यदि यह आवाज लम्बे समय तक आती है तो भी डाॅक्टर से संपर्क करें। ऐसा नथुनों के कार्टीलेज में छेद होने के कारण भी होता है। इसे ठीक करने के लिए सर्जरी करानी पड़ती है।

Tuesday, March 1, 2016

परीक्षा का भूत

           इन दिनों बच्चों की परीक्षा हो  रही है, जिसके कारण घर में एक अधोषित कर्फ्यू लगा हुआ है। बच्चे खेल-खिलौने, टी.वी., कम्प्यूटर, मोबाईल और संगी-साथियों से दूर संभावित प्रश्नों को कंठस्थ करने में लगे हुए हैं। ये दिन उनके लिए परीक्षा-देवी को मनाने के लिए अनुष्ठान करने के दिन हैं। परीक्षा रूपी भूत ने उनके साथ ही पूरे घर भर की रातों की नींद और दिन का चैन हर लिया है। बच्चों को रट्टा लगाते देख अपने बचपन के दिन याद आने लगे हैं, जब हम भी खूब रट्टा मारते तो, हमारे गुरूजी कहने लगते- “रटंती विद्या घटंती पानी, रट्टी विद्या कभी न आनी।“ लेकिन तब इतनी समझ कहाँ? दिमाग में तो बस एक ही बात घुसी रहती कि कैसे भी करके जो भी गलत-सलत मिले, उसे देवता समझकर पूज लो, विष को भी अमृत समझकर पी लो और पवनसुत हनुमान की भाँति एक ही उड़ान में परीक्षा रूपी समुद्र लांघ लो। परीक्षा करीब हों तो न चाहते हुए भी तनाव शुरू हो जाता है। जब हम कॉलेज में पढ़ते तो  मेरी एक सहेली अक्सर कहती- यार आम के पेड़ों पर बौर देखकर मुझे बड़ा टेंशन  होने लगता है क्योंकि इससे पता चलता है परीक्षा आने वाली है।
             घर में परीक्षा का भूत सबको डरा रहा है। बच्चे परीक्षा के भूत को भगाने के लिए दिन-रात घोटे लगाने में लगे हुए हैं, लेकिन परीक्षा का भूत है कि जाता ही नहीं! उनके मन-मस्तिष्क में कई सवाल आकर उन्हें जब-तब आशंकित किए जा रहे हैं। यदि कंठस्थ किए प्रश्न नहीं आए तो? प्रश्न पत्र की शैली में परिवर्तन कर दिया तो? यदि प्रश्न पाठ्यक्रम से बाहर से पूछ लिए तो? यदि कठिन और लम्बे-लम्बे प्रश्न पूछ लिए तो?
           जानती हूँ बच्चों को समझाना दुनिया का सबसे कठिन काम है, फिर भी समझा-बुझा रही हूँ कि आत्मविश्वास बनाए रखना। जो कुछ पढ़ा है, समझा है, कंठस्थ किया है, उस पर भरोसा करना।  परीक्षा देने से पहले मन को शांत रखना। परीक्षा देने से पहले पढ़ने के लिए न कोई किताब-कापी साथ नहीं ले जाना और नहीं कहीं से पढ़ने-देखने की कोशिश करना। उन प्रश्नों पर चिन्ह लगाना जिन्हें कर सकते हो और जो प्रश्न सबसे अच्छा लिख सकते हो, उन्हें सबसे पहले करना। जो प्रश्न बहुत कठिन लगे उसे सबसे बाद में सोच-विचार कर जो समझ में आता हो, उसे लिखना। हर तरह से प्रत्येक परीक्षा के दिन समझाने की माथा-पच्ची करती हूँ, लेकिन बच्चे यह कहते हवा निकाल देते हैं कि प्रश्न पत्र देखते ही उन्हें यह सब भाषणबाजी याद नहीं रहती? अब उन्हें कैसे समझायें कि यह सब भाषणबाजी नहीं है! 
         बच्चों की परीक्षा जल्दी से खत्म हो, इसका मुझे ही नहीं बल्कि बच्चों के प्यारे राॅकी को भी बेसब्री से इंतजार है। जब से परीक्षा के दिन आये हैं, बच्चों के साथ उसका खेलना-कूदना क्या छूटा कि वह बेचारा उछलना-कूदना भूलकर मायूस नजरों से टुकुर-टुकुर माजरे को समझने की कोशिश में लगा रहता है। 
           बच्चों को पढ़ाने का काम बोझिल जरूर लगता है, लेकिन यदि उनके रंग में  रम जाओ तो कभी-कभी रोचक प्रसंग देखकर मन गुदगुदा उठता है। ऐसा ही एक प्रसंग मुझे मेरे बेटे जो कि चौथी कक्षा की परीक्षा दे रहा है, देखने को मिला।  मैं जब उसकी हिन्दी विषय की कॉपी देख रही थी तो मुझे उसमें उसके द्वारा लिखे मुहावरों का वाक्यों में प्रयोग देखकर बहुत हँसी आई, जिसे देखकर वह नाराज होकर रोने लगा कि शायद उसने गलत लिखा है। बहुत समझाने के बाद कि उसने बहुत अच्छा लिखा है, चुप हुआ। आप भी पढ़िए आपको भी मेरी तरह जरूर हँसी आएगी।   

...कविता रावत 

Thursday, February 11, 2016

प्रकृति के आनन्द का अतिरेक है वसंत

व्रत ग्रंथों और पुराणों में असंख्य उत्सवों का उल्लेख मिलता है। ‘उत्सव’ का अभिप्राय है आनन्द का अतिरेक। ’उत्सव’ शब्द का प्रयोग साधारणतः त्यौहार के लिए किया जाता है। उत्सव में आनन्द का सामूहिक रूप समाहित है। इसलिए उत्सव के दिन साज-श्रृंगार, श्रेष्ठ व्यंजन, आपसी मिलन के साथ ही उदारता से दान-पुण्य किये जाने का प्रचलन भी है। वसंत इसी श्रेणी में आता है।
        ’वसन्त्यस्मिन् सुखानि।’ अर्थात् जिस ऋतु में प्राणियों को ही नहीं, अपितु वृक्ष, लता आदि का भी आह्लादित करने वाला मधुरस प्रकृति से प्राप्त होता है, उसको वसन्त कहते हैं। वसंत प्रकृति का उत्सव है, अलंकरण है। इसीलिए इसे कालिदास ने इसका अभिनंदन ’सर्वप्रिये चारुतरं वसन्ते’ कहकर किया है।
          माघ शुक्ल पंचमी को मनाये जाने वाले इस त्यौहार को ‘श्री’ पंचमी भी कहते हैं, क्योंकि मान्यता है कि इसी दिन समुद्र मंथन के समय श्री (लक्ष्मी) का अवतरण हुआ। यह दिन श्रावणी से आरम्भ होने वाले वैदिक शिक्षा के सत्र का समापन तथा नए शिक्षा का प्रारम्भ दिन माना गया है। एक कथानुसार यह सरस्वती का प्रकट होने का दिन भी है। इस दिन सरस्वती का पूजन किया जाता है। इस प्रकार वसंत पंचमी शक्ति के दो माधुर्यपूर्ण रूपों-लक्ष्मी तथा सरस्वती की जयंती है।
वसंत न केवल भारत, अपितु समूचे विश्व को पुलकित करता है। इस समय धरती से लेकर आसमान का वातावरण उल्लासपूर्ण हो जाता है। प्रकृति की विचित्र देन है कि वसंत में बिना वर्षा के ही वृक्ष, लता आदि पुष्पित होते हैं। कचनार, चम्पा, फरथई, कांकर, कवड़, महुआ आम और अत्रे के फूल धरा के आंचल को ढ़क लेते हैं। पलाश तो ऐसा फूलता है मानों धरती माता के चरणों में कोटि-कोटि सुमनांजलि अर्पित करने को आतुर हो। सरसों वासन्ती रंग के फूलों से लदकर मानों वासन्ती परिधान धारण कर लेती है। घने रूप में उगने वाले कमल के फूल जब वसंत ऋतु में अपने पूर्ण यौवन के साथ खिलते है, तब जलाशय के जल को छिपाकर वसन्त के ’कुसुमाकार’ नाम को सार्थक करते हैं। आमों पर बौर आने लगते हैं। गुलाब, हारसिंगार, गंधराज, कनेर, कुन्द, नेवारी, मालती, कामिनी, कर्माफूल के गुल्म महकते हैं तो रंजनीगंधा, रातरानी, अनार, नीबू, करौंदों के खेत ऐसे लहरा उठते हैं, मानों किसी ने हरी और पीली मखमल बिछा दी हो। ’मादक महकती वासंती बयार’ में मोहक रस पगे फूलों की बहार में, भौरों का गंुजन और कोयल की कूक मानव हृदय को उल्लास से भर देती है।         
वसंत में नृत्य-संगीत, खेलकूद प्रतियोगिताएं तथा पतंगबाजी का विशेष आकर्षण होता है। ‘हुचका, ठुमका, खैंच और ढ़ील के चतुर्नियमों में जब पेंच बढ़ाये जाते हैं तो देखने वाले रोमांचित हो उठते हैं। ऐसे में अकबर इलाहाबादी की उक्ति “करता है याद दिल को उड़ाना पंतग का।“ सार्थक हो उठती है। वसंत पंचमी के दिन जब आम जनमानस पीले वस्त्र धारण कर, वसन्ती हलुआ, पीले चावल और केसरिया खीर का आनंद लेकर उल्लास से भरी होती है, तब सुभद्राकुमारी चैहान देशभक्तों से पूछती है- 
वीरों का कैसा हो वसन्त?
फूली सरसों ने दिया रंग
मधु लेकर आ पहुंचा अनंग
वधु-वसुधा पुलकित अंग-अंग
है वीर देश में किन्तु कंत
वीरों का कैसा हो वसन्त?

Monday, January 25, 2016

हम भाँति-भाँति के पंछी हैं

हम भाँति-भाँति के पंछी हैं पर बाग़ तो एक हमारा है
वो बाग़ है हिन्दोस्तान हमें जो प्राणों से भी प्यारा है
हम  हम भाँति-भाँति के पंछी ………………………

बाग़ वही है बाग़ जिसमें तरह-तरह की कलियाँ हों
कहीं पे रस्ते चंपा के हों कहीं गुलाबी गलियाँ हों
कोई पहेली कहीं नहीं है, सीधा साफ़ इशारा है
हम  हम भाँति-भाँति के पंछी ………………………

बड़ी ख़ुशी से ऐसे-वैसे इकड़े तिकड़े बोलो जी
लेकिन दिल में गिरह जो बाँधी  है वो पहले खोलो जी
सुर में चाहे फर्क हो फिर भी इक  तारा इक तारा
पंजाबी या बंगाली मद्रासी या गुजराती हो
प्रीत की इक बारात है यह हम सबके साथी हो
भेद या बोली कुछ भी हो हम एक शमां  के परवाने
आपस में तकरार करें हम ऐसे तो नहीं दीवाने
मंदिर मस्जिद गिरजा अपना, अपना ही गुरुद्वारा है
हम  हम भाँति-भाँति के पंछी ……………………… 
                                                      …राजेन्द्र कृष्ण

सभी ब्लोग्गर्स एवं पाठकों को गणत्रंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!

Saturday, January 23, 2016

नेताजी सुभाषचंद्र बोस जयंती

उड़ीसा की राजधानी और महानदी के तट पर बसे कटक नगर में रायबहादुर जानकीनाथ बोस के यहाँ 23 जनवरी, 1897 को सुभाष बाबू का जन्म उस समय हुआ जब देश पराधीनता की बेडि़यों में जकड़ा हुआ था। भारतीय राष्ट्रीय कांगे्रेस की स्थापना हो चुकी थी। देश में राजनैतिक चेतना आ रही थी। उनकी माता प्रभावती बोस पुराने कट्टर धार्मिक विचारों में विश्वास रखनी वाली महिला होने के बावजूद भी सरल हृदय, अच्छे स्वभाव वाली सीधी-साधी महिला थी। नेताजी सुभाषचंद्र बोस की पांच बहनें और छः भाई थे। संपन्न परिवार के होने के बावजूद नेताजी स्वार्थ और लालच जैसी बुराई से कोसों दूर थे। 
नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने जाति-पांति के भेदभाव को कभी भी महत्व नहीं दिया। वे हिन्दू-मुसलमानों में भेद नहीं रखते थे। दोनों को भाई मानते थे। इसका एक उदाहरण है- एक दिन उनकेे मोहल्ले में छोटी जाति के एक व्यक्ति ने  उनके घर वालों को खाने पर बुलाया। सबने न जाने का निश्चय किया, लेकिन सुभाष बाबू ने अपने माता-पिता की आज्ञा का उल्लंघन कर उनके यहां जाकर खाना खाया। एक अन्य प्रसंग पर कटक में हैजे के दौरान उन्होंने रोगियों की घर-घर जाकर सेवा की। इस रोग से पीडि़त एक गुण्डे हैदर के घर जब कोई डाॅक्टर, वैद्य उनके बुलावे पर नहीं आये तो उन्होंने स्वयं उसके घर जाकर अपने साथियों के साथ मिलकर उसके घर की साफ सफाई की, जिसे देखकर वह कठोर हृदय वाला गुण्डा द्रवित होकर एक कोने में जाकर रोने लगा। उसे बड़ी आत्मग्लानि हुई। तब नेता सुभाषचंद जी ने उसे सिर पर हाथ फेरते कहा-“ भाई तुम्हारा घर गंदा था, इसलिए इस रोग ने तुम्हें घेर लिया। अब हम उसकी सफाई कर रहे हैं। दूसरों के सुख-दुःख में जाना तो मनुष्य का कर्तव्य है।“ यह सुनकर हैदर से उनके पांव पकड़ कर बोला-“ नहीं, नहीं मेरा घर तो गंदा था ही, मेरा मन उससे भी ज्यादा गंदा था। आपकी सेवा ने मेरी गंदगी को निकाल दिया। मैं किस मुंह से आपको धन्यवाद दूं। परमात्मा करें आपकी कीर्ति संसार के कोने-कोने में फैले।“   
          नेताजी के भारत की स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु अमूल्य योगदान के लिए हम सभी सदैव ऋणी रहेंगे। उनके जैसे ओजस्वी वाणी, दृढ़ता, स्पष्टवादिता और चमत्कारी व्यक्तित्व वाले लोकप्रिय नेता की आज सर्वथा कमी महसूस होती है। स्वतंत्रता प्राप्ति हेतु उनका भारतवासियों का उद्बोधन भला कौन भुला सकता है-“ अब आपका जीवन और आपकी सम्पत्ति आपकी नहीं है, वह भारत की है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि यदि आप इस सरल सत्य को समझते हैं कि हमें किसी भी उपाय से स्वतंत्रता प्राप्त करनी है और अब हम एक ऐसे स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में हैं जो युद्ध की स्थिति में है तब आप सहज ही समझ जायेंगे कि कुछ भी आपका नहीं है। और आपका जीवन, धन, सम्पत्ति कोई भी चीज आपकी नहीं है। आपके लिए स्पष्टतः दूसरा रास्ता खुला हुआ है। वही रास्ता जो अंग्रेजों द्वारा अपनाया गया था। स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए कोई मध्य स्थिति नहीं हो सकती। तुम सभी को स्वतंत्रता के लिए पागल बनना होगा। तुम में से किसी को भारत की स्वतंत्रता के लिए लड़े जाने वाले इस युद्ध में केवल अपनी सम्पत्ति का पांच प्रतिशत और दस प्रतिशत देने के अर्थों में सोचने का अधिकार नहीं है। हजारों संख्या मंे जो वीर सैनिक भारत को स्वतंत्र करने के लिए सेना में भर्ती हुए हैं, वे इस बात का भाव-ताव नहीं करते कि हम रणभूमि में केवत पांच प्रतिशत ही अपना खून बहायेंगे। सच्चे देशभक्त सैनिक का अमूल्य जीवन एक करोड़ रुपये से भी अधिक कीमती है। तब आप लोग जो धनवान हैं, उन्हें क्या अधिकार है कि वे मोल-भाव करें और कहंे कि हम अपनी सम्पत्ति का केवल अमुक प्रतिशत ही देंगे। ’करो सब निछार-बनो सब फकीर।’ मैं आप सभी लोगों से यही चाहता हूं। भारत की स्वतंत्रता के लिए सर्वस्व दे डालो और फकीर बन जाओ। वह बहुत त्याग नहीं है। मुझे अपना खून दो और मैं तुम्हें स्वतंत्रता देने का वचन देता हूँ।“
 सुभाषचन्द्र जयंती पर सादर श्रद्धा सुमन अर्पण सहित..



Monday, January 18, 2016

जिन्दगी गुलाब सी बनाओ साथियो

किसी ने गुलाब के बारे में खूब कहा है- “गीत प्रेम-प्यार के ही गाओ साथियो, जिन्दगी गुलाब सी बनाओ साथियो।" फूलों के बारे में अनेक कवियों, गीतकारो और शायरो ने अपने मन के विचारों को व्यक्त किया है, जैसे-  “फूल-फूल से फूला उपवन, फूल गया मेरा नन्दन वन“। “फूल तुम्हे भेजा है खत में, फूल में ही मेरा दिल है“ और “बाहरो फूल बरसाओ, मेरा महबूब आया है।“ आदि।  यह सर्वविदित है कि जब भी हम किसी सामाजिक, पारिवारिक या अन्य खुशी के प्रसंग पर अपने प्रियजन से मिलने जाते हैं, तो उन्हें केवल फूल ही भेंट करते हैं, कोई भी व्यक्ति कांटे भेंट नहीं करता। इसीलिए कहा गया है कि अपने दयालु हृदय का ही सुन्दर परिचय देते हुए फूल बोना हमें सीखना चाहिए। फूलों से ही हमें प्यार करना सीखना चाहिए। जब हम फूलों को प्यार करेंगे, स्वीकार करेंगे तो हमारा जीवन भी फूलों की कोमलता, सुन्दरता के साथ ही उनके रंग, सौंदर्य और खुशबू की तरह महकता रहेगा।
बात फूलों की हो और उसमें अगर उनके राजा गुलाब की बात न हो, तो समझो वह बात अधूरी है। संसार में शायद ही कोई व्यक्ति हो, जिसके चेहरे पर इस बेजोड़ फूल को देखकर गुलाबी रंगत न छाये। प्रकृति के इस खूबसूरत रचना को करीब से देखने-समझने के अवसरों की मैं अक्सर तलाश में रहती हूँ। ऐसा ही एक सुअवसर मुझे नये वर्ष के प्रारम्भ में जनवरी माह के दूसरे और कभी-कभी तीसरे सप्ताह के शनिवार और रविवार को मिलता है, जब शासकीय गुलाब उद्यान में मध्यप्रदेश रोज सोसायटी और संचालनालय उद्यानिकी की ओर से दो दिवसीय अखिल भारतीय गुलाब प्रदर्शनी का आयोजन किया जाता है, जिसमें हजारों किस्म के गुलाब देखने और समझने का अवसर मिलता है।
इस वर्ष 16-17 जनवरी को 35वीं अखिल भारतीय गुलाब प्रदर्शनी देखने के साथ ही यह बताते हुए खुशी है कि आज गुलाब का फूल सिर्फ घर के बाग-बगीचों और किसी को भेंट करने का माध्यम भर नहीं है, बल्कि आज कृषक गुलाब की खेती कर बड़े पैमाने पर अपनी आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ कर रहे हैं। हमारे मध्यप्रदेश में गुलाब आधारित सुंगन्धित उद्योग एवं खेती संगठित क्षेत्र में पूर्व वर्षों में नहीं की जाती थी, जिसके फलस्वरूप कृषकों को सीमित क्षेत्र में अधिक आमदानी नहीं होती थी। प्रारम्भिक वर्षों में आवश्यक खाद्य पदार्थ जैसे-फल, सब्जी एवं मसाले के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हेतु विशेष प्रयास किये गये, जिसमें आशातीत सफलता नहीं मिली, लेकिन आज कृषक सीमित क्षेत्र में नवीनतम तकनीकी से फूलों की खेती कर अधिक आय प्राप्त कर रहे हैं, जिससे उनका रूझान फूलों की खेती की ओर बढ़ा है।
भारत में गुलाब की खेती का इतिहास लगभग 5000 वर्ष पुराना है। मोहन जोदड़ो-हड़प्पा आदि जिनका इतिहास 3000 वर्ष पुराना है, तब भी गुलाब की बगियों और गुलाब प्रमियों का उल्लेख मिलता है। धार्मिक ग्रन्थों में भी गुलाब की बगियों और गुलाबों का उल्लेख मिलता है। हिमालय की वादियों से लेकर उत्तर-पूर्व अर्थात् संपूर्ण भारत में गुलाब की खेती होती थी। गुलाब का उपयोग न केवल सौन्दर्यीकरण अपितु चरक-संहिता आदि के अनुसार दवाईयों विशेषकर आयुर्वेद में किया जाता रहा है।  इस प्रकार यह सर्वमान्य है कि गुलाब के प्रति लोगों में अगाध प्रेम की अभिव्यक्ति प्राचीनकाल से ही है तथा तब से ही भारत में सौन्दर्य, प्रेम, शांति, संस्कृति एवं खुशहाली का प्रतीक रहा है, जिसका उल्लेख विशेषकर मुगलकाल में पाया जाता है। 
आज हमारे देश में गुलाब की लगभग तीन हजार किस्में उपलब्ध हैं, जिनमें से लगभग 400 किस्में मध्यप्रदेश में उपलब्ध हैं। प्रत्येक किस्म उसके रंग के आधार पर अपनी महत्ता एवं सम्बन्ध का प्रतीक रखती है। एक मात्र गुलाब ही ऐसा पुष्प है, जो अपनी रंगों की सुन्दरता और महक के कारण विशिष्ट स्थान पाकर फूलों का राजा कहलाता है। इस तरह की प्रदर्शनी एवं संगोष्ठियों का आयोजन शहरी क्षेत्रों के अलावा ग्रामीण स्तर पर भी किए जाने चाहिए, जिससे इस दिशा में कृषकों को अधिक से अधिक जानकारी प्राप्त हो सके और वे इसका समुचित लाभ उठा सके।    ....कविता रावत 







Thursday, January 14, 2016

सूर्योपासना का पर्व है मकर संक्रांति

हमारे भारतवर्ष में मकर संक्रांति, पोंगल, माघी उत्तरायण आदि नामों से भी जाना जाता है। वस्तुतः यह त्यौहार सूर्यदेव की आराधना का ही एक भाग है। यूनान व रोम जैसी अन्य प्राचीन सभ्यताओं में भी सूर्य और उसकी रश्मियों को भगवान अपोलो और उनके रथ के स्वरूप की परिकल्पना की गई है। अपोलो मतलब ऊष्मा, प्रकाश तथा स्वास्थ्य व उपचार के देवता। अर्थात् जब से मानव में समझ का विकास हुआ, तब से ही उसे यह भी स्पष्ट आभास हो गया कि सूर्य इस धरती के नियंताओं में सर्वोपरि है। सूर्य का उत्तरायण होना एक खगोलीय घटना भर नहीं है। संक्रांति पर पर्व और उल्लास की परम्परा शायद मानव जाति की ओर से सूर्यदेव को धन्यवाद ज्ञापन है अथवा शायद हर नई पीढ़ी को हमारे पुरखों की नैसर्गिक विद्वता में लिपटा संदेश है, जिसे उन्होंने गहन अनुभव शोधन से समझा था। 
          मकर संक्रांति आध्यात्मिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पर्व है। इसी दिन सूर्य उत्तर दिशा की ओर बढ़ता है। इसी दिन उत्तरायण शुरू होता है, अभी तक दक्षिणायण रहता है। खगोलीय दृष्टि से भी यह बहुत महत्वपूर्ण दिन है। पुराणों में कहा गया है कि दक्षिणायण देवताओं की रात और उत्तरायण देवों के लिए दिन माना जाता है। यह दिन दान, पूजा-हवन, यज्ञ करने के लिए सर्वाधिक श्रेष्ठ है। मकर संक्रांति से सम्बंधित कई कथाएं है- एक समय दुर्वासा ऋषि कौरव-पांडव के गुरु द्रोणाचार्य के आश्रम में समिधा की खोज में पहुंचे। उस समय उनकी पत्नी कृपी आश्रम में थी। कृपी ने ऋषि से निवेदन किया कि संतान प्राप्ति का कोई उपाय बताएं।दुर्वासा ने कहा कि वह मकर संक्रांति को स्नान कर सूर्य की उपासना करें। कृपी ने ऐसा ही किया तो उन्हें अश्वथामा जैसा प्रतापी पुत्र प्राप्त हुआ। एक अन्य कथा के अनुसार यशोदा ने जब कृष्ण जन्म का व्रत लिया तो सूर्य की गति उत्तरायण में आरम्भ हुयी थी और उस दिन मकर संक्रांति थी।भीष्म पितामह ने उत्तराणी सूर्य होने के कारण इसी दिन प्राण त्यागे। पितरों के लिए 16 दिन तर्पण करने से जो शास्त्रोक्त फल प्राप्त होता है उतना पुण्य मकर संक्रांति के दिन तर्पण करने से मिलता है।
          इस माह कहीं पूर्णिमा से माह की शुरुआत होती है तो कहीं मकर संक्रांति से होती है। मकर राशि में सूरज जिस दिन प्रवेश करता है, उसे सौरमान कहते हैं। यह दिन अच्छा पुण्यकाल माना जाता है इसलिए किसी नदी में आह्वान करके स्नान करने का विधान है। पद्मपुराण में उल्लेख है कि भगवान विष्णु ने इस दिन असुरों का वध करके, नाश करके भूमि पर शांति स्थापित की थी। अधर्म का नाश हुआ और धर्म की प्रतिष्ठा हुई इसलिए इसे मुख्य पर्व माना गया। मकर संक्रांति पर सूरज की पूजा, अपने पूर्वजों के लिए तर्पण और नदी स्नान करना चाहिए। नई फसल का दान करना चाहिए। अन्य पर्वों का उद्देश्य होता है कि खा-पीकर खुश हो जाना, जबकि मकर संक्रांति पर दान करके आनन्द प्राप्त किया जाता है। स्मृतियों में कहा गया है कि जो आप कमाई करते हैं, उसका दो फीसदी धर्म कार्यों के लिए खर्च करना चाहिए, जो पूरे साल राशि संचित की है, उसको मकर संक्रांति पर खर्च करना चाहिए। अर्थात् 12 माह में जुटाई गई 24 फीसदी कमाई का दान करना चाहिए। इससे दान पाने वाले गरीब का जीवन सुधरता है। धनी लोगों का पैसा निचले तबके के लोगों के पास जाता है जिससे उनके धन में भी वृद्धि होती है। इस दिन तेल से स्नान करना, तिल का दान करना, तिल से होम करना, तिल को जल में मिलाकर तर्पण करना, तिल को खाना और खिलाना श्रेयस्कर माना गया है। श्राद्ध के दौरान तो तिल में होम करते हैं, तर्पण नहीं करते हैं। इसलिए यह पर्व खास है। पूर्वजों के लिए यह पर्व अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है। तिल का उपयोग सभी पापों से मुक्त कराता है। मकर संक्रांति जैसे पर्वों के बारे में नई पीढ़ी को संस्कारित किया जाना चाहिए। इसके लिए सामूहिक आयोजन कर उन्हें इसके महत्व की जानकारी देनी चाहिए। पूर्व में हर गांव, शहर, नगर में ऐसे आयोजन होते थे, अब नहीं होते हैं इसलिए ऐसे पर्वों के संस्कार पीछे छूट गए हैं।          
अथर्ववेद की ऋचा कहते है-  आभारिषं विश्वभेषजीमस्यादृष्टान् नि शमयत्।  अर्थात्, सूर्य किरणें सर्वरोगनाशक हैं। वे रोगकृमियों को नष्ट करें। इस विषय पर विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी अपनी रिपोर्ट के अनुसार सूर्य की रोशनी में पाए जाने वाले अल्ट्रा वाॅयलेट विकिरण की अधिकता से होने वाले नुकसान की अपेक्षा सूर्य प्रकाश की कमी से होने वाली समस्याओं का बोझ कहीं ज्यादा है। विटामिन-डी लगभग एक हजार जीन के सही संचालन में मददगार है, वो जीन जो मुख्यतः कैल्शियम मेटाबाॅलिज्म, न्यूरोमस्कुलर तंत्र तथा प्रतिरक्षा तंत्र के लिए आवश्यक है। यह विटामिन हमारी त्वचा में सूर्य प्रकाश की मदद से ही बनता है, जिसमें कपड़े, तन की अतिरिक्त चर्बी और त्वचा का मेलैनिन पिगमेंट बाधा डालते हैं। कैल्शियम मेटाबाॅलिज्म पर विटामिन-डी की कमी का असर है हड्डियों का कमजोर होना और कमजोर हड्डी हर घड़ी के दर्द और टीस से लेकर स्त्रियों में गर्भावस्था के दौरान विभिन्न जटिलताओं का कारण बनती है। आजकल बहुत से वैज्ञानिक शोधों के उपरांत विटामिन-डी का उपयोगी किरदार समझ में आ रहा है। मेलाटोनिन, सेरोटोनिन जैसे जैव-रसायनों का बहुत गहन संबंध मानसिक स्वास्थ्य से भी है। विभिन्न अनुसंधानों में पाया गया है कि सूर्य की रोशनी का अभाव तनाव (डिप्रेशन) की समस्या को जन्म देता है। यह तो सर्वविदित है कि सूर्य की ऊर्जा मनुष्य के लिए हानिकारक लगभग सभी बैक्टीरिया, वायरस तथा फफूंद का नाश करती हैं। इसी वैज्ञानिक तथ्य के परिणामस्वरूप हमारे घरों में सदियों से सामान को धूप दिखाकर शुद्ध करने की परम्परा आज भी कायम है।

सभी ब्लॉगर्स साथियों और सुधि पाठकों को मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं!

Saturday, January 9, 2016

शक्ति और शिक्षा पर विवेकानन्द का चिंतन

शारीरिक दुर्बलता :  महान् उपनिषदों का ज्ञान होते हुए भी तथा अन्य जातियों की तुलना में हमारी गौरवपूर्व संत परम्पराओं का सबल होते हुए भी मेरे विचार में हम निर्बल हैं। सर्वप्रथम हमारी शारीरिक निर्बलता ही हमारी विपदाओं और कष्टों का विषम आधार है। हम आलसी हैं, हम कृतत्वहीन हैं, हम संगठित नहीं हो सकते, हम परस्पर स्नेह नहीं करते, हम अत्यधिक स्वार्थी हैं, हम सदियों से केवल इस बात पर आपस में लड़ रहे हैं कि मस्तक पर टीका लगाने का ढंग कैसा हो? और ऐसे तर्कहीन विषयों पर हमने अनेक ग्रन्थों की रचना कर डाली कि किसी के देखने मात्र से हमारा भोजन दूषित हो जाता है अथवा नहीं! यह नकारात्मक भूमिका हम विगत कुछ शताब्दियों से लगातार अपना रहे हैं। क्या कोई जाति ऐसे कुतर्कपूर्ण, अनुपयोगी समस्याओं और उनके अन्वेषणों पर अपने बौद्धिक चातुर्य का दुरुपयोग कर किसी महान् अभिलाषा की कल्पना कर सकती है? और इसके कारण हम आत्म-लज्जित भी नहीं हैं! हाँ, इसके कारण हम ऐसा सोचते भी हैं और मानते हैं कि ये तुच्छ विचार हैं, परन्तु उन्हें छोड़ नहीं पाते!
 हम अनेक विचार ‘तोता-रटंत’ की तरह दोहराते हैं परन्तु उनका कभी पालन नहीं करते, किसी बात को कहना परन्तु उसका पालन नहीं करना हमारी आदत और नियति बन चुकी है, इसका कारण क्या है? हमारी शारीरिक दुर्बलता के कारण हमारी कमजोर बुद्धि किसी काम को करने में समर्थ नहीं है, हमें इस कमजोरी को ताकत बनाना चाहिए, ऐसी आपको मेरी सलाह है। आप गीता पढ़ने की बजाय, फुटबाल के द्वारा स्वर्ग के अधिक पास पहुँच सकते हो! ये शब्द बेधड़क किन्तु सुस्पष्ट हैं और मैं ये इसलिए कह रहा हूँ कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ, मुझे मालूम है कि तुम्हें जूता कहाँ पर काट रहा है, मुझे इस विषय का कुछ अनुभव भी हुआ है। तुम्हें अपने घुटनों के और भुजाओं के तनिक से अधिक बल पर गीता ज्ञान का कुछ अधिक बोध हो सकता है, जब तुम अपने मजबूत पैरों पर खड़े होकर अपने पुरुषत्व का अनुभव करोगे तभी तुम उपनिषदों को भली प्रकार समझ सकोगे। तब तुम्हें महान् प्रतिभा और भगवान कृष्ण की महान् शक्ति का आभास होगा जब तुम्हारी रगों में कुछ तेज रक्तप्रवाह का संचार होगा। इस प्रकार तुम अपनी आवश्यकताओं के अनुसार उठ सकोगे।
आधुनिक औषधि विज्ञान के अनुसार हम जानते हैं कि किसी भी व्याधि के आने के दो कारण होते हैं, बाहरी विषाणु और शारीरिक अल्प-आरोग्यता। जब तक शरीर में जीवाणु प्रवेश के प्रति अवरोध शक्ति है, जब तक शरीर की आंतरिक शक्ति जीवाणु-प्रवेश, उनके पनपने एवम् संवृद्धि के प्रतिकूल है तब तक कोई जीवाणु इतना शक्तिशाली नहीं है कि वह शरीर में रोग उत्पन्न कर सके। वास्तव में लाखों जीवाणु लगातार मानव शरीर में आते-जाते रहते हैं, परन्तु जब तक शरीर हृष्ट-पुष्ट है वह उनसे अप्रभावित रहता है। शरीर कमजोर होने पर ही जीवाणु उस पर हावी होते हैं और रोग उत्पन्न करते हैं। 
         बल :  यह एक बड़ा सत्य है कि बल ही जीवन है और दुर्बलता ही मरण। बल ही अनन्त सुख है, अमर और शाश्वत जीवन है और दुर्बलता ही मृत्यु। 
लोग बचपन से ही शिक्षा पाते हैं कि वे दुर्बल हैं, पापी हैं। इस प्रकार की शिक्षा से संसार दिन-ब-दिन दुर्बल होता जा रहा है। उनको सिखाओ कि वे सब उसी अमृत की संतान हैं- और तो और, जिसके भीतर आत्मा का प्रकाश अत्यन्त क्षीण है, उसे भी यही शिक्षा दो। बचपन से ही उनके मस्तिष्क में इस प्रकार के विचार प्रविष्ट हो जायें, जिनमें उनकी यथार्थ सहायता हो सकें, जो उनको सबल बना दें, जिनसे उनका कुछ यथार्थ हित हो। दुर्बलता और अवसादकारक विचार उनके मस्तिष्क में प्रवेश ही न करें। सच्चिन्तन के स्त्रोत में शरीर को बहा दो, अपने मन से सर्वदा कहते रहो, ‘मैं ही वह हूँ, मैं ही वह हूँ।’ तुम्हारे मन में दिन-रात यह बात संगीत की भाँति झंकृत होती रहे और मृत्यु के समय भी तुम्हारे अधरों पर सोऽहम्, सोऽहम् खेलता रहे। यही सत्य है- जगत की अनन्त शक्ति तुम्हारे भीतर है।
वह क्या है जिसके सहारे मनुष्य खड़ा होता है और काम करता है? वह है बल। बल ही पुण्य है तथा दुर्बलता ही पाप है। उपनिषदों में यदि कोई एक ऐसा शब्द है जो वज्र-वेग से अज्ञान-राशि के ऊपर पतित होता है, उसे तो बिल्कुल उड़ा देता है, वह है ‘अभीः’ - निर्भयता। संसार को यदि किसी एक धर्म की शिक्षा देनी चाहिए तो वह है ’निर्भीकता’।  यह सत्य है कि इस एैहिक जगत में अथवा आध्यात्मिक जगत में भय ही पतन तथा पाप का कारण है। भय से ही दुःख होता है, यही मृत्यु का कारण है तथा इसी के कारण सारी बुराई होती है और भय होता क्यों है?- आत्मस्वरूप के अज्ञान के कारण।
बलिष्ठ एवम् निर्भीक बनो!
       बलिष्ठ बनो! बहादुर बनो! शक्ति एक महत्वपूर्ण विधा है, शक्ति जीवन है। निर्बलता मृत्यु है। खड़े हो जाओ। निर्भीक बनो। शक्तिशाली बनो। भारत वीरों का आह्वान कर रहा है। नायक बनो। चट्टान की भाँति अटल खड़े हो जाओ। भारत माता अनन्त ऊर्जा, अनन्त उत्साह और अनन्त साहस का आह्वान कर रही है। 
स्वामी विवेकानंद ने संस्कारित शिक्षा-प्रणाली पर जोर दिया। वे चाहते थे कि समाज में संस्कार युक्त शिक्षा प्रणाली का विकास हो। उन्होंने देश में ऐसी शिक्षा प्रणाली का विकास किया, जो देश व समाज की सांस्कृतिक जीवनदर्शी व राष्ट्रीय परम्पराओं के अनुरूप हो। स्वामी विवेकानंद चाहते थे कि व्यक्ति की श्रेष्ठता, महानता व इसके असीम विकास का आधार मात्र-शरीर, बुद्धि कौशल व शिक्षा नहीं है, बल्कि इसका आधार है ज्ञानार्जन के साथ-साथ संस्कारित शिक्षा पद्धति। इसके साथ ही अन्दर की पवित्रता तथा आचरण की श्रेष्ठता। 
         शिक्षा :  शिक्षा का अर्थ है, उस पूर्णता की अभिव्यक्ति, जो सब मनुष्यों में पहले ही से विद्यमान है। शिक्षा किसे कहते हैं? क्या वह पठन-मात्र है? नहीं। क्या वह नाना प्रकार का ज्ञानार्जन है? नहीं, यह भी नहीं। जिस संयम के द्वारा इच्छा-शक्ति का प्रवाह और विकास वश में लाया जाता है और वह फलदायक होता है, वह शिक्षा कहलाती है। अब सोचो कि शिक्षा क्या वह है, जिसने निरन्तर इच्छा-शक्ति को बलपूर्वक पीढ़ी-दर-पीढ़ी रोककर प्रायः नष्ट कर दिया है, जिसके प्रभाव से नये विचारों की तो बात ही जाने दो, पुराने विचार भी एक-एक करके लोप होते चले जा रहे हैं, क्या वह शिक्षा है, जो मनुष्य को धीरे-धीरे यंत्र बना रही है?
मेरे विचार से तो शिक्षा का सार मन की एकाग्रता प्राप्त करना है, तथ्यों का संकलन नहीं। यदि मुझे फिर से अपनी शिक्षा आरम्भ करनी हो और इसमें मेरा वश चले, तो मैं तथ्यों का अध्ययन कदापि न करूँ। मैं मन की एकाग्रता और अनासक्ति को सामथ्र्य बढ़ाता और उपकरण के पूर्णतया तैयार होने पर उससे इच्छानुसार तथ्यों का संकलन करता। बच्चों में मन की एकाग्रता और अनासक्ति का सामथ्र्य एक साथ विकसित होना चाहिए।
        संस्कारित शिक्षा:  “जो समाज गुरु द्वारा प्रेरित है, वह अधिक प्रेम से उन्नति के पथ पर अग्रसर होता है, इसमें कोई संदेह नहीं। किन्तु जो समाज गुरु विहीन है, उसमें भी समय की गति के साथ-साथ गुरु का उदय तथा ज्ञान का विकास होना उतना ही निश्चित है।“
       योग शिक्षा :  “हम सब योगी बनकर जीवन सफल बनाएँगे। भारत के हरेक व्यक्ति को योग सिखाएँगे।।“
प्रत्येक व्यक्ति में अनंत ज्ञान और शक्ति का आवास है। वह शिक्षा देता है कि जिस प्रकार वासनाएँ और अभाव मानस के अंतर में हैं, उसी प्रकार उसके भीतर ही मन के अभावों के मोचन की शक्ति भी है और जहाँ कहीं और जब कभी किसी वासना, अभाव या प्रार्थना की पूर्ति होती है, तो समझना होगा, कि वह इस अनंत भंडार से ही पूर्ण होती है। हम लोग अपने वर्तमान सविशेष अर्थात् सापेक्ष भाव के पीछे विद्यमान एक निर्विशेष भाव में लौटने के लिए लगातार अग्रसर हो रहे हैं। स्वामी विवेकानंद जी ने योग शिक्षा के माध्यम से एक नई शिक्षा प्रणाली का प्रचार कर जन-जन को योग शिक्षा के महत्व से परिचित कराया। उन्होंने योग शिक्षा को जीवन में महत्वपूर्ण स्थान देने के लिए प्रेरित किया। आज भी प्रत्येक व्यक्ति योग शिक्षा के महत्व को जानता है और उसे अपने जीवन में अपनाता है।
        आज हमारे देश को आवश्यकता है लोहे के मांसपेशियों, इस्पात की तंत्रिकाओं और अति विशाल आत्मविश्वास की, जिसको कोई नकार न सके।
“उठो! जागो! और लक्ष्य प्राप्त होने तक रुको मत।“  

संकलित  

Friday, December 18, 2015

उद्यम से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है

सोए हुए भेड़िए के मुँह में मेमने अपने आप नहीं चले जाते हैं।
भुने   हुए   कबूतर   हवा   में  उड़ते  हुए  नहीं  पाए  जाते  हैं।।

सोई लोमड़ी के मुँह में मुर्गी अपने-आप नहीं चली जाती है।
कोई  नाशपाती बन्द मुँह  में  अपने  आप  नहीं  गिरती है।।

गिरी  खाने  के लिए अखरोट को तोड़ना पड़ता है।
मछलियाँ पकड़ने के लिए जाल बुनना पड़ता है।।

मैदान  का नजारा देखने के लिए पहाड़ पर चढ़ना पड़ता है।
परिश्रम में कोई कमी न हो तो कुछ भी कठिन नहीं होता है।।

एक जगह मछली न मिले तो दूसरी जगह ढूँढ़ना पड़ता है।
उद्यम   से   सब   कुछ   प्राप्त   किया   जा   सकता  है।।

... कविता रावत 

Thursday, December 3, 2015

भोपाल गैस त्रासदी: मैं ही नहीं अकेली दुखियारी

अब तक 15 हज़ार से भी अधिक लोगों को मौत के आगोश में सुला देने वाली विश्व की सबसे बड़ी औधोगिक त्रासदी की आज 31वीं बरसी है। आज भी जब मौत के तांडव का वह भयावह दृश्य याद आता है तो दिल दहल जाता है और ऑंखें नम हुए बिना नहीं रहती. आधी रात बाद हुई इस विभीषिका का पता हमें तब लगा जब आँखों में अचानक जलन और खांसी से सारे घरवालों का बुरा हाल होने लगा। पिताजी ने बाहर आकर देखा तो बाहर अफरा-तफरी मची थी। घर के सामने पहाड़ी से लोग गाडी-मोटर और पैदल इधर-उधर भाग रहे थे। लोग चिल्ला-चिल्लाकर कह रहे थे कि गैस रिस गई है। हम भी एक गाडी में जो पहले से ही ठूस-ठूस कर भरी थी। उसमें ही ठुस गए। भोपाल से दूर जाकर ही कुछ राहत मिली। सुबह 5 बजे वापस आये तो फिर से अफवाह फैली कि फिर से गैस रिस गई है और हमें फिर भागना पड़ा।आँखों में जलन और श्वास की तकलीफ का चलते जब हॉस्पिटल जाना हुआ तो रास्ते में सैकड़ों मवेशी इधर-उधर मरे पड़े दिखे। भ्रांतियों और आतंक से घोर सन्नाटा पसरा था। लोग ट्रकों से भर-भर कर इलाज के लिए आ रहे थे, कई लोग उल्टियाँ तो कई आँखों को मलते लम्बी लम्बी सांस लेकर सिसकियाँ भर रहे थे। कई बेहोश पड़े थे जिन्हें ग्लूकोस और इंजेक्शन दिया जा रहा था। अस्पताल के वार्डों के फर्श पर शवों के बीच इंजेक्शन के फूटे एम्म्युल और आँखों में लगाने की मलहम की खाली ट्यूबें बिखरी पड़ी थी। मरने वालों में सबसे ज्यादा बच्चे थे, जिन्हें देखकर हर किसी के आँखों से आंसूं रुके नहीं रुकते थे. 
          इस त्रासदी में लोगों का असहनीय दुःख देख मैं अपना दुःख भूल गई.....

मैं ही नहीं अकेली कहाँ इस जग में दुखियारी
आँख खुली जब दिखी दुःख में डूबी दुनिया सारी
एक तरफ कांटे दिखे पर दूजी तरफ दिखी फुलवारी 
समझ गयी मैं गहन तम पर उगता सूरज है भारी 
गहन तम में नहीं इस दिल को कुछ सूझ पाया है
पर परदुःख में मैंने अक्सर दुःख अपना छुपाया है 
इसी भाव से मन में बहती सबके सुख-दुःख की सरिता
जब द्रवित होता अंतर्मन तब साकार हो उठती कविता 
         इस विभीषिका के कई सवाल उभर कर आये लेकिन समय के साथ-साथ ये सवाल भी काल के गर्त में समा गए हैं. मसलन क्यों और किस आधार पर इतनी घनी आबादी के बीच संयंत्र लगाने की अनुमति दी गई. पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था के इंतजाम क्यों नहीं थे आदि बहुत से प्रश्नों के साथ यह भी अनुतरित प्रश्न आज भी हैं कि गैस त्रासदी की जांच के लिए बिठाए गए न्यायिक आयोग को गैस सयंत्र की स्थापना की अनुमति सम्बन्धी जांच का अधिकार क्यों नहीं सौंपा गया? सयंत्र के अध्यक्ष वारेन एंडरसन एवं कंपनी के ७ अन्य अधिकारियों के खिलाफ सबसे पहले आईपीसी की किन धाराओं में मुकदमें दर्ज हुए, उनमें से १२० व अन्य धाराएँ बाद में कैसे हट गई? चेयरमेन को ७ दिसम्बर को गिरफ्तार कर जमानत पर रिहा क्यों किया गया? कार्बाइड कारखाने के घातक रसायनों का अब तक निपटारा क्यों संभव नहीं हो सका है?
          भोपाल की यह विभीषिका जहाँ विश्व की भीषण दुर्घटनाओं में एक है, जिसमें हजारों लोग मारे गए और आज भी कई हजार कष्ट और पीड़ा से संत्रस्त होकर उचित न्याय और सहायता की आस लगाये बैठे हैं, क्या यह खेदजनक और दुखप्रद नहीं कि सत्ता की गलियारों में बैठे अपनी सिर्फ थोथी शेखी बघारकर अपने प्राथमिक कर्तव्य से विमुख होकर वोट की राजनीति में ही लगे रहते हैं?
         ....कविता रावत 


Monday, November 30, 2015

क्या है तेरे दिल का हाल रे

मिला तेरा प्यारा भरा साथ
हुआ है मेरा दिल निहाल रे
आकर पास तू भी बता जरा
क्या है तेरे दिल का हाल रे

मिला प्यारा हमसफ़र जिंदगी का
दिल ने दिल से नाता जोड़ा रे
जब से प्यार में डूबना सीखा दिल ने
तब से मन ने उदास रहना छोड़ा रे

अब हुआ है दिल पागल प्यार में
तुझसे दूर नहीं कोई दिल का राज रे
अच्छा लगता तेरे प्यार में डूबना
अब तो सूझे नहीं दूजा कोई काज रे

डूबकर लिखूं प्यार भरी पाती
हुआ प्यार से दिल  निहाल रे
उठा कलम तू भी लिख जरा
क्या है तेरे दिल का हाल रे।

वैवाहिक जीवन की 20वीं वर्षगांठ पर सोच रही थी कि क्या लिखूं, तो संदूकची में पड़ी डायरी याद आयी तो उसमें बहुत सी प्रेम पातियाँ निकलती गई। यादें ताजी हुई तो सोचा एक छोटी सी अबोध रचना प्रस्तुत कर दूँ।
 ....कविता रावत 


www.hamarivani.com
 halchal
रफ़्तार www.blogvarta.com bloggiri.com - Indian Blogs Aggregator
 I.A.S.I.H
ब्लॉग - चिठ्ठा "img" alt= width="100" border="0" height="70" src=" http://i1064.photobucket.com/albums/u367/Rajendra_Kumar/Capture_zps46dc7fe8.jpg " />
 I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़

Install Codes


CG Blog रफ़्तार रफ़्तार href="http://blogworld-rajeev.blogspot.com/"target="_blank"> iBlogger

CG Blog