Thursday, June 6, 2013

शिंगणापुर के शनिदेव

कई वर्ष बाद इस वर्ष 8 जून को शनिवार के दिन शनि जयंती का संयोग बना है। इसी दिन शिंगणापुर की यात्रा के वे पल याद आ रहे हैं जब हम पहली बार सांई बाबा के दर्शन कर सीधे शनिदेव के दर्शन के लिए शिंगणापुर पहुंचे। यह सौभाग्य ही है कि यह मेरा जन्मदिन भी है। ऐसी मान्यता है कि जो पहली बार सांई बाबा के दर्शन करने जाता है उसे शनिदेव के भी दर्शन हेतु शिंगणापुर जरूर जाना चाहिए तभी बाबा की कृपा होती है और यात्रा का उद्देश्य पूर्ण होता है। शिर्डीधाम से लगभग 70 कि.मी. दूरी तय करने के बाद शनि शिंगणापुर पहुँचकर मुझे ज्ञात हुआ कि सूर्यदेव और माता छाया के पुत्र शनिदेव का जन्मस्थान यही है। बहुत से लोग शनिदेव को अनिष्टकारी देव मानकर उनकी पूजा अर्जना कम उनसे बचने के उपाय ज्यादा ढूंढ़ने-फिरने के फिराक में खुद ही उलझकर रह जाते हैं, जबकि बहुत से ज्योतिषियों का मत है कि शनिदेव स्वभाव से गंभीर, हठी, क्रोधी किन्तु न्यायप्रिय देव तथा हनुमान और कालभैरव के प्रिय सखा हैं। विधि विधान से उनकी आराधना करने पर वे अन्य देवताओं के मुकाबले बड़ी जल्दी प्रसन्न होकर अपने भक्तों को मनोवांछित फल देने में सबसे आगे रहते हैं। यही कारण है कि दूर-दूर बसे देश-विदेश के लोग उनके दर्शन करने यहाँ दौड़े चले आते हैं। यहाँ पहुंचकर मेरे मन को भी बहुत आत्मीय संतोष मिला। यहाँ दुकानों में पहले से ही टोकरियों में शनिदेव की पूजा का सामान सजा रहता है जिसे खरीदने पर दुकानदार खुद ही पूजा विधि समझा देता है। यहाँ आकर मुझे एक और सबसे अच्छी बात यह लगी कि जहाँ पहले इस मंदिर में केवल पुरुषों को ही निर्धारित वस्त्र पहनकर दर्शन करने की अनुमति दी जाती थी वहीं अब ऐसा कुछ भी नहीं है। अब पुरुषों की तरह ही उनके साथ-साथ स्त्री भी बेरोक-टोक इस मंदिर में पूजा-दर्शन करती हैं। खुले चबूतरे पर शनिदेव की काले पत्थर की लगभग साढ़े पांच फीट ऊँची और डेढ़ फीट चौड़ी मूर्ति स्थापित है जिस पर पुजारी लगातार पहले तेल और बाद में पानी से नहलाने में लगा रहता है, जो कि मनोहारी दृश्य होता है। हमें भी पूजा विधान के अनुसार पहले त्रिशूल पर मदार के पत्ते चढ़ाने फिर नारियल, फूल और अंत में तेल चढ़ाकर शनिदेव की पूजा-दर्शन कर बड़ी आत्मसंतुष्टि मिली।
दुनिया भर में प्रसिद्ध शनि शिंगणापुर की वह विशेषता जिसमें यहाँ के घरों में दरवाजे नहीं होने का जिक्र मिलता है, जिसे प्रत्यक्ष देखकर सुखद अहसास हुआ। यहाँ के लोगों की मान्यता है कि यहाँ कोई कुछ भी चुरा नहीं सकता है क्योंकि अगर किसी ने यह हिमाकत की तो तुरन्त शनिदेव उस पर कुपित होकर दंडित कर देते हैं। इसी दृढ़ विश्वास के चलते यहाँ पुराने बने सभी घरों में मुझे कोई दरवाजे नजर नहीं आए।  हालांकि अब जो नए मकान-दुकान बन रहे थे उनमें अधिकांश में दरवाजे लगाये जा रहे थे। शहर की चकाचैंध से दूर बसा शनि शिंगणापुर निश्चित ही दूर-दूर से आने-जाने वाले भक्तजनों/दर्शकों के लिए एक सुन्दर मनभावन स्थान है, जहाँ पहुँचकर निश्चित रूप से सुकून महसूस किया जा सकता है।
शिंगणापुर से वापस शिर्डी आते समय मुझे इक्के-दुक्के खेतों में गन्ने की फसल के अलावा दूर-दूर तक कुछ भी हरा-भरा नजर नहीं आ रहा था। हाँ अगर कुछ दिखाई दे रहा था तो वह सड़क किनारे लगभग हर 2 कि.मी. दूरी पर गन्ने की रेहडि़यां दिखाई दे रही थी, जिन पर लकड़ी से बने कोल्हू पर जुता बैल धीरे-धीरे घूमता नजर आ रहा था जिससे कोल्हू से गन्ने का रस बाहर निकल रहा था जिसे  गर्मी से हाल-बेहाल आने-जाने वाले लोग गले में उतार कर राहत महसूस कर रहे थे। इस तरह कोल्हू से गन्ने का रस निकलते देख मुझे अपने गांव का वह सरसों पेरने के लिए बनी लकड़ी के कोल्हू याद आने लगा, जिसको बैल नहीं बल्कि आदमी चलाये करते थे। जब उत्सुकतावश हम बच्चे भी कभी-कभार खेलते-कूदते मस्ती में दो-दो की जोड़ी बनाकर उसे ढेलकर घुमाने में जुत जाते थे तब हमें बड़ा मज़ा आता था। इसके साथ ही जिस व्यक्ति का वह कोल्हू होता था, उसे भी एक तरह से मदद मिल जाया करती थी जिसके कारण वह भी हमारे साथ-साथ खुश हो लेता था। अब तो गाँव में यह सब जाने कब से एक भूली-बिसरी दास्तां बनकर रह गई है।
   .....कविता रावत

Saturday, June 1, 2013

दूर-पास का लगाव-अलगाव


कोई सेब अपने पेड़ से बहुत दूर नहीं गिरता है।

बछड़ा अपनी माँ से बहुत दूर नहीं रहता है।।


दूर का पानी पास की आग नहीं बुझा सकता  है।

मुँह मोड़ लेने पर पर्वत भी दिखाई नहीं देता है।।


दूर उड़ते हुए पंछी के पंख बहुत लुभावने होते हैं।

किसी सुंदरी के केश दूर से घने दिखाई देते हैं।।


दूर रहने वाले बंधु-बांधव भले जान पड़ते हैं।

दूर के ढोल सबको ही बड़े सुहावने लगते हैं।।


बाड़ के पार घास ज्यादा हरी दिखाई देती है।

अक्सर दूरी घिनौनेपन को छिपा लेती है।।


.....कविता रावत

Saturday, May 18, 2013

फाख्ता का घर-परिवार

कभी जब घर आँगन, खेतिहर जमीनों में, धूल भरी राहों में, जंगल की पगडंडियों में भोली-भाली शांत दिखने वाली फाख्ता (पंडुकी) भोजन की जुगत में कहीं नजर आती तो उस पर नजर टिक जाती। उसकी भोलेपन से भरी प्यारी सूरत देखकर उसे पकड़कर अपने पास रखने को मन मचल उठता तो उसके पीछे-पीछे दबे पांव चल देते। वह भी हमें पास आता देख मुड़-मुड़ कर टुक-टुक-टुक कर दाना चुगते हुए तेजी से आगे बढ़ जाती। इससे पहले कि हम उसके करीब पहुंचकर झपट्टा मारकर उसे पकड़ने की नाकाम कोशिश करते, वह फर-फर कर उड़ान भरकर जैसे यह कहते हुए फुर्र हो जाती कि- "फिर कभी संग चलूंगी तुम्हारे! जरा अभी दाना-पानी में व्यस्त हूँ।"
आज 30 बरस बाद जब घर की खिड़की से लटके टीवी एन्टिना पर फाख्ता का घरौंदा देख रही हूं तो मन खुशी से आश्चर्यचकित है। अभी साल भर ही तो हुआ है हमें अपने इस नए घर में रहते हुए, लेकिन इस दौरान तीन बार उसी एक ही घौंसले में फाख्ता ने भी अपना घर परिवार बसा लिया है। अभी दो बार फाख्ता के चार बच्चों को पलते-बढ़ते देखना मुझे और मेरे परिवार को बहुत सुखकर लगा। अब तीसरी बार फिर जब उसी घरौंदे में उसे 2 सफेद झक अंडों को सेंकती देख रही हूं तो एक अचरज भरी खुशी से झूम उठती हूं कि निश्चित ही उसे भी मेरे घर के पास रहना सुरक्षित लगता होगा!  मेरे घर के सदस्यों में उसे कुछ तो अपनापन झलकता होगा  तभी तो वह भी बेफिक्र होकर मेरे घर के एक हिस्से पर  अधिकार भाव से अपना घर-परिवार बसाती चली आ रही है।  
जब कभी छुट्टी के दिन भरी दोपहरी में एक साथ 2-3 फाख्ताओं की "टुटरू की टुर्र-टुर्र टुर्र-टुर्र" सी   प्यारी ममता भरी आवाज मेरे कानों में गूंजती है तो मुझे आभास होता है जैसे मैं गर्मियों के दिन जंगल में कहीं छोटे-छोटे झबरीले-रौबीले चीड़ की छांव में आराम से बैठी उसकी टहनियों में छिप कर बैठी फाख्ताओं (स्थानीय बोली में घुघुता-घुघती) की धुन में रमी हुई हूँ। उनकी लरजती -खनकती ममतामयी बोली में मुझे अपना वह  प्रिय लोकगीत याद आने लगता है जिसमें मायके से दूर ससुराल में रह रही कोई नई नवेली दुल्हन व्याकुलतावश मायके को याद कर अपना दुःखड़ा फाख्ता को सुनाने बैठ जाती है- 
  "ना बांस घुघती चैत की, खुद लगी च मां मैत की।"
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 "घुघुती घुरौण लैगे मेरा मैत की, बौडि़-बौडि़ ऐगे ऋतु चैत की"
आजकल जब ऑफिस  निकलती हूँ तो बच्चों को नानी के घर छोड़ आती हूँ। पहले तो उन्हें मौसी का घर अच्छा लगता था लेकिन जैसे ही स्कूल की छुट्टियाँ लगी उनको नानी का घर कुछ ज्यादा ही प्यारा लगने लगा और लगे  भी क्यों नहीं आखिर वहाँ उन्हें नानी के लाड़ दुलार के साथ-साथ अच्छी-अच्छी चीजें खाने-पीने को तो मिलती ही हैं साथ ही टीवी पर अपनी पंसद का कार्टून देखने,  कम्प्यूटर पर इंटरनेट में नये-नये गेम खेलने का मुफ्त में लायसेंस जो मिल जाता है!  मैं जब ऑफिस में होती हूँ तो दिन में एक-दो बार जरूर फोन लगाकर हाल-चाल पूछकर बच्चों की चिन्ता से मुक्त हो लेती हूँ लेकिन इस बीच आंखों में घर के एन्टिना पर बड़ी शांतिपूर्वक घौंसले में बैठी मासूम फाख्ता अंडों को सेंकती नजर आने लगती है। इसी चिन्ता में मैं कभी-कभी भगवान से प्रार्थना करने बैठ जाती हूँ कि वह उन्हें सपरिवार सलामत रखे और जब अंडों से बच्चे बाहर निकल आयें तो उन्हें भी जल्दी से बड़ा कर दें, ताकि वे हमेशा मेरे बगीचे, घर-आंगन में रहकर मेरे करीबी बने रहें। इसी सोच विचार के चलते जब शाम को बच्चों को लेकर जैसे ही घर पहुंचती हूँ  तो घर का ताला बाद में खोलती हूँ पहले फाख्ता का घर परिवार देख चिन्ता मुक्त हो लेती हूँ।
जब-जब मैं उसे बड़ी आत्मीयता से देखती हूँ तब-तब मुझे महसूस होता है जैसे वह भी उसी तन्मयता से मुझे अपनी प्यारी ममता भरी मासूम नजर से निहार रही है, जिसे देख मेरा मन आत्मविभोर हो उठता है और इससे मेरे घर में एक खुशी की लहर दौड़ने लगती है।
        ...कविता रावत



Sunday, May 12, 2013

परशुराम-लक्ष्मण संवाद प्रसंग


परशुराम जयंती के के लिए जब सम्पूर्ण ब्राह्मण समाज ने शासन का आभार व्यक्त किया तो मेरे मन में भी कभी रामलीला के एक दृश्य में सीता स्वयंवर के समय परशुराम-लक्ष्मण संवाद चलचित्र स्मृतिपटल पर उभरने लगा। जब रामचन्द्र जी ने घनुष भंग किया तो इससे कुपित होकर परशुराम जी क्रोध में आग बबूला होकर हाथ में अपना फरसा लहराते हुए मंच पर आकर स्वयंवर में आए सभी उपस्थित राजा-महाराजाओं को ललकारते हुए सचेत करते हैं कि जिसने भी उनके गुरुदेव का धनुष भंग किया है वह सहस्त्रबाहु के समान ही मेरा शत्रु है।  यह सुनकर श्रीराम उनसे विनयपूर्वक कहते हैं -
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
यह सुनते ही परसुराम जी क्रोधित हो कहते हैं-
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥

इतना सुनते ही जब उपस्थित राजा-महाराजा डर के मारे थर-थराकर कांपते हुए भाग खड़े होने लगते तो हम बच्चों का भी डर के मारे गला सूखने लगता, हाथ-पैर कांपने लगते और आंखे भी डर के मारे बन्द हो जाया करती।  इसके बाद जब लक्ष्मण का परशुराम जी से गर्मागर्म संवाद चलता तो बीच में रामचन्द्र जी उन्हें शांत करने की कोशिश करते तो वे बड़े आत्मीय होकर कहते-
‘हे राम तू तो बहुत शांत है लेकिन तेरा यह भाई बड़ा दुष्ट है।‘ यह सुन  शांतचित्त होकर श्रीराम कहते- 
नाथ करहु बालक पर छोहू। सूध दूधमुख करिअ न कोहू ।। 
जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना । तौ कि बराबरि करत अयाना ।। 
जौं लरिका कछु अचगरि करहीं। गुर पितु मातु मोद मन भरहीं।।  
करिअ कृपा सिसु सेवक जानी । तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी ।। 
यह सुनकर जैसे ही परशुराम जी अपना परसु लक्ष्मण को दिखाते हुए समझाना चाहते हैं, तो लक्ष्मण उन्हें चिढ़ाकर कहते हैं -
बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महा भटमानी॥
पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू॥

 यह देख क्रोध  से परसुराम जी कहते हैं -
‘यह बच्चा नहीं जहर की बेल है, समझा है इसने मेरे लिए कोई खेल है।‘
इस पर लक्ष्मण भी बिगड़कर कहते-
 ‘तो लक्ष्मण भी कोई तमाशा नहीं, जो मुंह में डालो बताशा नहीं।‘‘  
इसी तरह बहुत देर तक लक्ष्मण-परशुराम संवाद जारी रहता। लक्ष्मण कभी क्रोध से तो कभी बड़े ही भोलेपन से विभिन्न भाव-भंगिमाओं के माध्यम से परशुराम जी से हास-परिहास करने लगते, जो देखते ही बनता था-   
एही धनु पर ममता केहि हेतु। सुनि रिसाइ कह भृगुकुल केतू।।
जौं अति प्रिय तौ करिअ उपाई। जोरिउ कोउ बड़ गुनी बोलाई।।

तब रामलीला हमारे लिए केवल शुद्ध मनोरंजन भर से अधिक कुछ न था। उसमें निहित कथा प्रसंग, संवाद आदि के बारे में जानना-समझना हमारे बूते की बात नहीं थी। आज इस कथा से जुड़े कई रहस्य और संवाद नए अर्थ देते हैं।
इसी प्रसंग में कहा जाता है कि  हैहय वंशी राजा सहस्त्रबाहु ने परशुराम जी के पिता महर्षि जमदग्नि का वध इसलिए कर दिया था क्योंकि महर्षि ने राजा को अपनी कामधेनु देने से मना कर दिया था। जब परशुराम जी ने अपनी मां रेणुका को 21 बार अपनी छाती पीटकर करुण क्रन्दन करते देखा तो वे ये देखकर इतने द्रवित हुए कि उन्होंने प्रण किया कि मैं पृथ्वी को क्षत्रिय रहित कर दूंगा। इसी कारण उन्होंने सहस्त्रबाहु के साथ ही 21 बार अपने फरसे से पृथ्वी को क्षत्रिय रहित कर दिया। माना जाता कि इन क्षत्रियों से प्राप्त अस्त्र-शस्त्र, धनुष-बाण, आयुध आदि का कोई दुरूपयोग न हो इसके लिए धरती ने मां का तथा शेषनाग ने पुत्र का रूप धारण किया और वे परशुराम जी के आश्रम में गए। जहां धरती मां ने अपने पुत्र को उनके पास कुछ दिन रख छोड़ने की विनती की  जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया  जिस पर धरती मां ने यह वचन लिया कि यदि मेरा बच्चा कोई अनुचित काम कर बैठे तो आप स्वभाववश कोई क्रोध नहीं करेंगे, जिसे परशुराम जी ने मान लिया। एक दिन उनकी अनुपस्थिति में धरती पुत्र बने शेषनाग ने सभी अस्त्र-शस्त्र, धनुष-बाण, आयुध आदि सब नष्ट कर दिए। जिसे देख परशुराम जी को पहले तो क्रोध आया लेकिन अपना वचन याद कर वे कुछ भी नहीं बोले। क्योंकि लक्ष्मण को शेषनाग का अवतार माना जाता है इसलिए वे परशुराम जी को सीता स्वयंवर के समय याद दिलाते हुए कहते हैं- 
‘बहु धनुहीं तोरी लरिकाई। कबहुं न असि रिस कीन्हि गुसाईं।।
मान्यता है कि नौ गुणों शम, दम, तप, क्षमा, शौर्य, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता से सम्पन्न भगवान परशुराम अन्तिम बार पृथ्वी को क्षत्रिय रहित करने के बाद सम्पूर्ण पृथ्वी को ऋषि कश्यप को दान देकर उनकी आज्ञा से समुद्र स्थित महेन्द्र पर्वत पर रहने लगे। उन्हें भी हनुमान, अश्वथामा, बलि, कृपाचार्य, व्यास और विभीषण की तरह ही अमर माना जाता है।

सबको मातृ दिवस एवं परशुराम जयंती की हार्दिक शुभकामनाएँ.....कविता रावत

Tuesday, April 30, 2013

मजबूरी के हाथ

यूँ रविवार छुट्टी और आराम का दिन होता है। लेकिन अगर पूछा जाय तो मेरे लिए यह सबसे ज्यादा थकाऊ और पकाऊ दिन होता है। दिन भर बंधुवा मजदूर की तरह चुपचाप हफ्ते भर के घर भर के इकट्टा हुए लत्ते-कपडे, बच्चों के खाने-पीने की फरमाईश पूरी करते-करते कब दिन ढल गया पता नहीं चलता। अभी रविवार के दिन भी जब दिन में थोड़ी फुर्सत मिली तो बच्चों की फरमाईश आइसक्रीम खाने को हुई तो निकल पड़ी बाजार। घर से कुछ दूरी पर सड़क की मरम्मत करते कुछ मजदूर दिखे। उनके पास ही जमीन पर एक ३-४ माह का बच्चा लेटा था, जिसके पास ही उसके भाई-बहन थे। पास बैठी तो भरी दुपहरी में भी मासूम बच्चे की मुस्कान ने मन मोह लिया। मजदूर माँ को कहकर मैं उनके बच्चों को अपने घर ले आयी। अपने बच्चों के साथ-साथ उनको भी जब खाना और आइसक्रीम खिलाई तो मन को गहरी आत्मसंतुष्टि मिली। सभी बच्चों को उस छोटी से जान के साथ खेलते-खिलाते देख सोचने लगी कि हम क्यों नहीं हर समय इन बच्चों सा मासूम दिल रख पाते हैं? क्यों नहीं ऊँच-नीच, जात-पात का भेदभाव भुलाकर मानवता का धर्म निभा पाते हैं? जाने कितने ही विचार मन में कौंध रहे थे। शाम को उनकी माँ के साथ दो घडी बैठकर बतियाना बहुत अच्छा लगा। जब वे ख़ुशी से हँसते-मुस्कराते अपने घर से निकले तो मन में आत्मसंतुष्टि तो थी कि मैंने अपना कुछ तो मानवता का फर्ज निभाया लेकिन उन्हें मैं अपने पास हमेशा नहीं रख सकती इस बात का दुःख हो रहा था। उनके चले जाने के बाद जब मुझे मजदूर दिवस का ख़याल आया तो जाने कितने ही विचार मन में कौंधने लगे। मन की बात मन में रखने से वे घुट न जाये इसलिए बाहर निकल रही है। आप भी विचार कीजिये। 
भारत में मजदूर दिवस मनाना मेरे हिसाब से कोई गौरव की बात नहीं है। क्योंकि आज मजदूरों के हालात बहुत दयनीय है। न इंसाफ मिलता है, न पेटभर भोजन मिलता है और ना ही जीने की आजादी। मुझे तो लगता है कि भारत में मजदूर होने ही नहीं चाहिए क्योंकि मजदूर मजबूर होता है। आज भारत में कृषि से पलायन हो रहा है। आज का किसान अपने बच्चे को न तो किसान बनाना चाहता है और नहीं खुद किसान बना रहना चाहता है। गाँव से वह शहरी चकाचौंध में अपनी सुखमय जिंदगी के सपने देखता है। बस मजदूर (मजबूर) की कहानी यहीं से शुरू होती है। अपने बच्चों को थोडा बहुत पढ़ा-लिखा कर और कभी खुद भी किसानी छोड़ शहर की ओर निकल तो जाता है लेकिन योग्यता, चालाकी और पैसे की चलते हजार दो हजार की नौकरी मजबूरी में कर किसान से मजदूर बन जाता है। जहाँ रहने का कोई ठिकाना नहीं, रात को किसी फुटपाथ पर सो गए तो सुबह सही सलामत जागने की कोई गारंटी नहीं रहती। इनकी बातें हम न तो समाचार पत्र में पढ़ पाते हैं और नहीं इनके नजदीक रह पाते हैं। तो क्या मजदूर दिवस के दिन उनकी स्थिति सुधारने के बजाय हमारा सिर्फ बड़े-बड़े झंडे-डंडे, पोस्टर आदि लेकर भीड़ जुटाकर भाषण सुनना भर रह गया है? यह बहुत गहन विचार का विषय नहीं है कि जहाँ सामंतवादी सोच के कारण चंद लोगों के पास अकूत धन-दौलत के भण्डार है, वही दूसरी और गरीब मजदूरों के पास दरिद्रता, भूख, उत्पीडन, नैराश्य, अशिक्षा और बीमारी के सिवाय कुछ नहीं है। देश में जिस तीव्र गति से करोड़पतियों की संख्या में वृद्धि हो रही है, उससे चौगुनी मजदूरों की संख्या का बढ़ना एक बहुत बड़ा चिंता का कारण है नहीं तो और क्या है? आज तमाम सरकारी-गैर सरकारी घोषणाओं, दावों के बीच भी इनकी वास्तविक कहानी आधे पेट भोजन, मिटटी के वर्तन, निकली हुई हड्डियाँ, पीली ऑंखें, सूखीखाल, फोड़ेयुक्त पैर, मुरझाये चेहरे और काली आँखों में गहरी दीनता और निराशा ही बनी हुई है। ऐसे में एक दिनी कार्यक्रम के बाद समाचार पत्रों और न्यूज चैनलों की सुर्खियों में रहने के बाद यह सोच लेना कि मजदूर दिवस सार्थक रहा, इसे कितना ठीक है? मेरे हिसाब से अगर भारत को वापस सोने की चिडि़या बनाना है तो पहले मजदूर को उसकी बदहाली से मुक्त करना होगा।

.....कविता रावत   


Friday, April 26, 2013

लोकहित में सानुरोध अपील!


हमारे गढ़वाल क्षेत्र का एक करीबी परिवार जो कि गांव में ही रहता है। जो कि गत सप्ताह  दिल्ली स्थित अपने एक निकट सम्बन्धी के विवाह समारोह में शामिल होने आए हुए थे। विवाह उपरांत वे अपने छोटे भाई के 156-A, कामना वैशाली, सेक्टर-1, गाजियाबाद स्थित (जो कि दिल्ली आनंद विहार बस अड्डे से मात्र 1 कि.मी. दूरी पर है) घर पर ठहरे हुए थे।  4-5 दिन पूर्व उनका बेटा जिसकी आयु 12 वर्ष है जो बोल नहीं पाता है, जब घर के लोगों के साथ शाम को बाजार से लौट रहा था तो चलते-चलते बाजार की भीड-भाड़ में अचानक कहीं गुम गया। जो बहुत खोजबीन बाद भी अभी तक नहीं मिल पाया है। गांव में पूरे गरीब परिवार के साथ ही सभी परिचित भी इससे बहुत दुःखी है। भले ही गुमशुदा लड़के के चाचा अपनी पूरी सामर्थ्यपूर्वक खोजबीन में लगे हुए हैं लेकिन उनकी भी बहुत अच्छी आर्थिक स्थिति नहीं है, जिस कारण नाते रिश्तेदारों और पुलिस  के अलावा एक-दो समाचार पत्र और न्यूज चैनल के माध्यम से ही अभी तक खोजबीन जारी है।  इस खोजबीन को आगे बढ़ाते हुए  उनके द्वारा बांटा गया फोटोयुक्त पम्पलेट मैं आप सभी ब्लॉगर और सुधि पाठकों को इस विनम्र अनुरोध के साथ पोस्ट कर रही हूं कि आप अपने सभी संभावित स्तर से जैसे- टीवी न्यूज चैनल, समाचार पत्र, स्वयंसेवी संस्था आदि के माध्यम से इस दिशा में मानवीय आधार पर निःशुल्क सार्थक पहल करते हुए बच्चे को खोजने में हमारी सहायता करने की कृपा करें इसके लिए पीडि़त परिवार के साथ-साथ मैं भी आपकी हृदय से आभारी रहूंगी।
कृपया बच्चे के  विषय में कोई भी सूचना मिलने पर अथवा अपने स्तर पर प्रचार-प्रसार हेतु किसी भी प्रकार से निःशुल्क सहायता प्रदान करने हेतु पम्पलेट में उल्लेखित पते अथवा फोन नम्बर पर सूचित करने की कृपा करें। 

कविता रावत 

Thursday, April 18, 2013

तिन्ह कहूँ मैं पूरब वर दीन्हा

चाँद  चढ़े,  सूरज  चढ़े  दीपक जले हजार। 
जिस घर में बालक नहीं वह घर निपट अंधियार।। 

कभी रामलीला में गुरु वशिष्ठ के सम्मुख बड़े ही दीन भाव से राजा दशरथ के मुख से जब भी ये पंक्तियां सुना करती थी तो मन भारी हो जाया करता था। सोचती कि जब एक प्रतापी राजा को नि:संतान होने का इतना दुःख है तो आम आदमी के दुःख की परिधि क्या होगी? समय के साथ ही ऐसी परिस्थिति में जीते लोगों के दुःख को मैंने उनके बहुत करीब जाकर गहराई से जाना ही नहीं अपितु इसका कटु ज्ञान मुझे 10 वर्ष की कठिन तपस्या उपरांत पुत्र प्राप्ति के बाद भी मिला। मैंने अनुभव किया कि संतान न होने की पीड़ा राजा हो या रंक हमेशा ही सबमें समान रूप में विद्यमान है। एक ओर जहाँ वे अपने मन की व्यथा से अन्दर ही अन्दर घुटते रहने के लिए विवश रहते हैं वही दूसरी ओर जब कभी घर- समाज द्वारा उन्हें प्रताड़ित होना पड़ता है तो उनकी बुद्धि कुंठित  होकर उन कठोर कहे गये शब्दों के इर्द-गिर्द घूमती रहती है, जिससे वे और भी चिन्तित होकर दुःख के निराकरण की युक्ति ढूंढते रहते हैं। ऐसा ही दुःख महाराज दशरथ को भी अपनी 60000 वर्ष की आयु बीत जाने पर हुआ, जिसका उल्लेख वाल्मीकि रामायण में बालकाण्ड सर्ग-20 में किया गया है। रामकथा वाचकों से बहुत पहले सुना एक प्रसंग याद रहा है कि एक बार राजा दशरथ जंगल में शिकार की खोज में निकले। बहुत देर बाद उन्हें एक हिरणी दिखाई दी वह उसके करीब पहुंचते इससे पहले ही वह भागने लगी। महाराज दशरथ भी उसके पीछे-पीछे भागते चले गए। जब हिरणी थक गई और उसे अपना अंत निकट लगा तो वह निकट ही एक सरोवर में कूद गई। राजा ने अवसर देख जैसे ही उस पर अपना बाण साधा वह हिरणी मनुष्य वाणी में बोली-“हे राजन्! तुम मुझे मारना चाहते हो लेकिन मैं निर्वंश क्षत्रिय राजा के हाथों से न मरने की कामना से ही इस सरोवर तक पहुंची हूँ। यदि आपने मुझे मारने की कोशिश की तो मैं इसी सरोवर में डूब जाउंगी लेकिन आप जैसे निर्वंशियों के हाथ नहीं मरूंगी।" ऐसे कठोर वचन सुनते ही महाराज दशरथ के हाथों से धनुष-बाण छूटकर नीचे गिर गए। वे सोच में पड़ गये कि यदि एक पशु भी मुझे धिक्कारता है तो मेरी प्रजा मुझे किस दृष्टि से देखती होगी? मेरी रानियों पर क्या गुजरती होगी? यह सोचते ही वे सीधे महल पहुंचे और उन्होंने अपनी व्यथा जब गुरु वशिष्ठ को सुनायी तो गुरु वशिष्ट के कहने पर श्रंगी ऋषि द्वारा पुत्रेष्ठि यज्ञ संपन्न कराया गया। इससे महाराज दशरथ को चार पुत्रों की प्राप्ति हुई।  यह माना जाता है कि भगवान कभी किसी के गर्भ से जन्म नहीं लेते हैं, वे तो अपने जन्म के समय ऐसी लीला करते हैं कि संसार के लोग अज्ञानवश उन्हें मानव समझ बैठते हैं। ऐसे ही भगवान विष्णु भी मां कौशल्या के सम्मुख चतुर्भुज रूप में प्रकट हुए। ऐसा करके उन्होंने पूर्व काल में कश्यप ऋषि और देव माता अदिति को दिए वचन को निभाने के लिए किया। क्योंकि देव माता अदिति को जिस समय भगवान विष्णु से उनके समान पुत्र का वरदान मिला उस समय वे चतुर्भज रूप में उनके सम्मुख विराजमान थे। 

मानस में राजा दशरथ और मां कौशल्या के पूर्वकाल में ऋषि कश्यप और देव माता अदिति होने और वरदान स्वरुप स्वयं जन्म लेने का उल्लेख इस प्रकार किया गया है -

कश्यप अदिति महातप कीन्हा। तिन्ह कहूँ मैं पूरब वर दीन्हा।। 
ते   दशरथ   कौसल्या  रूपा।  कोसल   पुरी  प्रगट  नर भूपा।। 
............................................................................

भए प्रकट कृपाला, दीन दयाला, कौशल्या हितकारी। 
हरषित मतहारी, मुनि मन हारी, अद्भुत रूप विचारी।।

श्रीराम जय राम जय जय राम! 

राम नवमी की हार्दिक शुभकामनाओं सहित ...कविता रावत

Sunday, April 7, 2013

मेरी बहिना जाएगी स्कूल!














मम्मी देखो!  पापा देखो!
बहिना मेरी रट लगाती है।
'मैं भी स्कूल चलूँगी भैय्या'
खींचकर बस्ता कहती है।।

जाकर बाजार से जल्दी 
एक स्लेट-बत्ती ला दो ।
पकड़कर हाथ इसका
ABCD सिखला दो।।

रात को जल्दी सुलाकर इसे
सुबह जगाना न जाना भूल।
मेरे संग उछलकूद करती
मेरी बहिना जाएगी स्कूल।।

       ...कविता रावत

Friday, March 22, 2013

होली के गीत गाओ री!

















सखि! घर आयो कान्हा मेरे, खुशी से होली मनाओ री।
झूमती हूँ खुशी के मारे, तुम संग-संग मेरे झूमो री।।

उछलती कूदती मचलती, कभी खुशी से झूम उठती,
भूलकर अपना बिच्छोह, पल-पल प्रिय गले लगती।
कभी  प्रिय गले लगती, कभी खुशी के आसूं बहाती,
कभी झूम-झूम, घूम-घूम कर गली-गली घूम आती।।

गली-गली जाकर कहती, तुम संग मेरे झूमो री।
सखि! घर आयो कान्हा मेरे,खूब रंगोली सजाओ री।।

गए जब प्रियतम दूर मुझसे  नित बैचेन रहती थी,
प्रिय मिलन की बेला को, नित आतुर रहती थी।
अब सम्मुख कान्हा मेरे, नजरें उनसे चुराती हूँ,
जताकर प्रेम  उन्हीं से, गीत सुमंगल गाती हूँ।

गा रही हूँ खूब खुशी के मारे, तुम संग मेरे गाओ री।
सखि! घर आयो कान्हा मेरे, खुशी के रंग बरसाओ री।।

आया था बसंत जब, डाली-डाली हरियाली थी,
आकर कोयल आंगन में तब, गीत सुमंगल गाती थी।
फूल खिलते बहारों में, सबके ही मन लुभाती थी,
प्रिय बिनु यह सब तनिक दिल को न भाती थी।।

आया बसंत लौट के, फूलों के रंग में मुझे डुबाओ री।
सखि! घर आयो कान्हा मेरे, खुशी के फाग सुनाओ री।।

घिरकर भादो में काली घटायें, मन विकल कर गई थी,
गरज-गरज कर बरसते बादल, दिल झकझौर करती थी।
निरख दृश्य ऐसे उनकी यादों में खोई-खोई रहती थी,
लेकर आयेंगे होली के रंग, बैचेन दिल को समझाती थी।

लेकर आए वे होली के रंग, तुम भी  मेरे संग रंगो री।
सखि! घर आयो कान्हा मेरे,  होली के गीत गाओ री।।

  होली की हार्दिक शुभकामनायें!
                   ....कविता रावत 


Friday, March 15, 2013

गेहूँ चने से भरे-लदे खेतों में एक दिन


बच्चों के सिर से परीक्षा का बोझ उतरा तो उन्होंने चैन की बंसी बजाई तो मैंने भी कुछ राहत पायी। पिंजरे में बंद रटन्तु तोते की तरह एक ही राग अलापने की बोरियत से निजात दिलाने उन्मुक्त हवा में सांस लेने का विचार आया तो पहली फुरसत में हम थोड़ी मौज-मस्ती के बहाने भोपाल से 25 कि.मी. दूर खुरचनी गांव की ओर निकल पड़े। जहां लहलहाते गेहूं और चने से भरे-लदे खेतों को मुस्कराते देखा तो सभी खुशी से उछल पड़े, सबके मुरझाये चेहरों पर खुशी छलक उठी जिसे देख मुझे लगा बसन्त खिल गया है। कई वर्ष बाद खेतों में लहलहाते गेहूं की फसल का मनोमुग्धकारी दृश्य देखा तो मन आत्मविभोर हो उठा। वहीं दो पल बैठ आंख मूंद सुकूं भरी जो राहत मिली उसे शहर की दौड़-धूप के बीच कभी महसूस नहीं कर सकी।  
          एक तरफ गेहूं के भरे खेतों को देखकर मन खुशी से उछल रहा था तो दूसरी ओर चनों की हरी-भरी लहलहाती फसल दिखी तो मन ललचा उठा और कदम तेजी से उसी  ओर भागने लगे।  बच्चे तो देखते ही चनों (होलों) पर टिट्डी दल की तरह टूट पड़े। पहले जहां छोटे-छोटे दानों वाले चने बोए जाते थे वहीं अब उसकी जगह बड़े-बड़े दानों वाले चने बोए जाने लगे हैं, जिन्हें लोग आजकल काबुली चना के स्थान पर “डालर चना“ के नाम से बुलाना पंसद करते हैं। हमारी तो जैसे लाटरी लग गई। वहीं खेत में बैठे-ठाले ताबड़-तोड़ ढंग से भूखे बंदरों के तरह खाने में तल्लीन हो गए पर  घर का ख्याल आया तो थैले में भी भरते चले गए। कच्चे  चनों से जब मन उकताने लगा तो फिर वहीँ खेत में सबने मिल-बैठकर चनों के साथ ही गेहूँ  के बालियाँ (उम्बी) आग में भूंजकर खायी  तो बड़ा मजा आया।
जब बच्चों के पेट में चने-उम्बी पहुंची तब उन्हें पचाने की सूझी तो वे  गांव के बच्चों के साथ हिल-मिलकर कभी आम के पेड़ पर तो कभी इस खेत कभी उस खेत पर उछलकूद मचाते खेतों से निकल कर फुर्ती से गांव की ओर निकल पड़े, जहां दाल-बाटी तैयार थी। गांव के लोगों द्वारा बनाई दाल-बाटी और उसके साथ ताजा-ताजा बनाया गुड़ मुझे हमेशा ही बहुत पंसद आता है। जब भी हमारा वहां जाना होता है वे बिना कुछ कहे हमारी पसंद की दाल-बाटी झटपट परोस लेते हैं।
गेहूं के लदे खेतों की संकरी पगडंडियों के बीच प्याज की निराई-गुडाई करते परिचित दिखे तो दो घड़ी उनके पास बैठ  कुछ उनकी सुनना  तो कुछ अपनी सुनाना मन को बहुत अच्छा लगा। उसके बाद जब आगे निकली तो गेहूं की कटाई करते लोगों को देख मेरे मन में भी उत्सुकता जगी तो मै भी उनसे दंराती लेकर गेहूं काटने बैठ गई। वहां कटाई करते लोगों  का  अनुमान था कि  शायद दूसरे  शहरी हो चले लोगों के तरह मैं भी अब तक यह सब भूल चुकी होंगी। लेकिन जब मैंने 10-15 मिनट तक लगातार गेहूं  काटे तो  उनका यह भ्रम टूट गया और वे बड़े अचरज के साथ ही बड़ी उत्सुकतापूर्वक मुझे देखते रह गए।  मेरे इस कारनामे से वे सभी बहुत खुश हुए तो मुझे भी कई वर्ष बाद खेत में काम करना बहुत भला लगा। 
गांव जाकर अक्सर यही लगता है कि यहीं दो-चार दिन घूमते-फिरते, मौज मस्ती करते रहे, लेकिन यह हसरत अब चाहकर भी पूरी नहीं हो पाती। एक तरफ तो बच्चों को गांव में दो-चार दिन भी तक रोके रखना बहुत मुश्किल है तो वहीँ  दूसरी आजकल  के शहरी माहौल को देख घर को सूना रख छोड़ना खतरे की घंटी लगती है। 
गांव से शहर की ओर लौटते समय खेती-बाड़ी के अलग-अलग कामों में जुटे किसानों को देखते रही और सोचती रही कि यदि सृष्टि के पालन का दायित्व विष्णु भगवान का है तो हमारे ये किसान जो सच्चे कर्मयोगी की तरह मिट्टी से सोना उत्पन्न करने की साधना में दिन-रात जुटे रहते हैं, जो न चिलचिलाती धूप, न मूसलाधार बारिश, न कड़ाकी की ठण्ड की परवाह करते हैं, यदि इन्हें मानव समाज के सच्चे पालक कहें तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं! 
          बच्चों के साथ यूँ तो मुझे भोपाल के आस-पास समय के अनुसार बहुत से दर्शनीय स्थलों  जैसे बड़ा तालाब, छोटा तालाब, शाहपुरा तालाब, केरवा डैम, मनुभावन की टेकरी, मानव संग्रहालय, चिडि़या घर, मछली घर, बिडला मंदिर आदि जगहों पर घूमने-घामने या पिकनिक मनाने से शहरी तनावभरी जिन्दगी से कुछ पल राहत मिल जाती है। बाबजूद इसके जो सुकून प्रकृति की गोद में बसे गांव के भरे-पूरे खेत-खलिहान और हंसते-मुस्कुराते भोले-भाले गांव वालों के साथ मिल बैठकर मिलती है, उसे मैं शहर की भीड़-भाड़ में कभी भी नहीं तलाश पाती हूँ।  अब तो मैं शहरी थकी-हारी, भागदौड़ भरी जिन्दगी को देखते हुए कुछ पल सुकूं के लिए हंसी-खुशी, मौज-मस्ती के निमित्त ऐसे प्राकृतिक स्थलों को तन-मन में ताजगी भरने के लिए जरुरी समझने लगी हूँ। 
      .......कविता रावत



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