Friday, April 4, 2014

वैष्णों देवी यात्रा

बच्चों के परीक्षा परिणाम आने के बाद एक सप्ताह की छुट्टी मिली तो मन में माँ वैष्णों देवी दर्शन की लालसा जाग उठी। भोपाल से दिल्ली और फिर वहाँ से देवर-देवरानी, जेठ-जेठानी के परिवार और बड़ी ननद के साथ हम 12 पारिवारिक सदस्य रात्रि को बस से सोते-जागते माँ के दर्शन के लिए निकल पड़े। दिल्ली से 10-11 घंटे के सफर के बाद हम सुबह 6 बजे जम्मू पहुँचे। यहाँ से पहाड़ी मार्ग से कटरा की यात्रा शुरु हुई तो मन खुशी से झूमने लगा। पहाड़ देखते ही मेरा मन उसमें डूब जाता है। आखिर यह परमात्मा की सबसे अनुपम रचना जो ठहरी! एक ओर घुमावदार ऊँची-नीची सड़क पर सरपट भागती बस की खिड़की से पहाडि़यों की तलहटी में बहती नदी और सुदूर हिमपूरित तराइयों में हिमावृत्त चोटियों पर सूर्य किरणों के पड़ने से बनते अद्भुत रंग के नीले, पीले, कुमकुम जैसी चित्ताकर्षक दृश्यों के इन्द्रधनुषी रंगों में डूबना बड़ा सुखकारी बन पड़ा। वहीं दूसरी ओर ऊँचे-ऊँचे अपार अनगिनत वृक्ष समूहों से आती शीतल मंद पवन के झोंखों से मन झूम उठा। प्रकृति के पल-पल परिवर्तित रूप बडे उल्लासमय और हृदयाकर्षक होते हैं। वह मुस्कराती रहती है; सर्वस्व लुटाकर भी हँसती है। सूर्याेदय हो या सूर्यास्त का समय प्राकृतिक छटा अनुपम और मनोमुग्धकारी होती है। ऐसी ही कश्मीर की प्राकृतिक छटा से मुग्ध होकर श्रीधर पाठक गा उठे-
प्रकृति यहाँ एकान्त बैठि, निज रूप संवारति,
पल-पल पलटति भेष, छनिक छवि छिनछिन धारति।
विहरित विविध विलासमयी, जीवन के मद सनी,
ललकती, किलकति पुलकति, निरखति थिरकति बनि ठनी।“  
जम्मू की पहाड़ी वादियों में डेढ़-दो घंटे डूबते-उतरते हुए हम कब कटरा पहुँच गए, इसका भान न हुआ। कटरा पहुँच कर वहाँ दो कमरे किराये पर लेने के बाद सभी नहा-धो और खाने-पीने के बाद शाम 5 बजे वैष्णों देवी दर्शन के लिए चल पड़े।
आते-जाते भक्तों के साथ हमने बड़े उत्साहपूर्वक ‘जय माता दी’ के स्वर में स्वर मिलाया और बाण गंगा होते हुए धीरे-धीरे चरण पादुका और आदिकुमारी की चढ़ाई चढ़नी आरम्भ की। कभी घुमावदार तो कभी सीढ़ीनुमा रास्ते से हम धीरे-धीरे आगे बढ़ते चले। हम शहर में रच-बस चुके बड़े सदस्य तो थोड़ी चढ़ाई चढ़ते ही थककर बार-बार जहाँ-कहीं आराम करने बैठ जाते, लेकिन बच्चों का उत्साह देखकर मन को बड़ी राहत मिली। वे ‘जय माता दी’ का उद्घोष करते हुए हरदम हमसे चार कदम आगे बढ़ते रहे। उनका जोश बरकरार रखने के लिए उनकी मनपंसद चीजें जैसे- चाकलेट, चिप्स, बिस्कुट आदि खिलाना-पिलाना थोड़ा महंगा जरूर लग रहा था लेकिन कुल जमा यह पिट्ठू, घोड़े-खच्चर, पालकी, हेलिकाॅप्टर के खर्च के आगे नगण्य रहा। हमारे शरीर में एक तरफ चाय-काॅफी पीने से फुर्ती आ रही थी तो दूसरी तरफ अपने परिवार के भरण-पोषण के वास्ते अपने कंधों पर पालकी उठाये बिना विश्राम किए तेजी से कदमताल करते हुए चुपचाप श्रद्धालुओं को उनके गंतव्य तक पहुंचाने वाले मजदूरों, घोड़े-खच्चरों में लदे लोगों को तेजी से हाँककर ले जाने वालों, तेल मालिश करने वालों और एक आध किलोमीटर की दूरी पर ढोल बजाने वालों को सोच-विचारने पर थके-हारे पैरों में जान आ रही थी।  इसके साथ मैं समझती हूँ कि पारिवारिक सदस्यों के साथ पैदल मिलजुल कर, एक दूसरे को सहारा देते हुए माँ वैष्णों देवी की यात्रा करने में जो आनंद है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।
रात्रि लगभग 9 बजे आदिकुमारी पहुंचकर गुफा मंदिर दर्शन कर होटल में खाने-पीने और थोड़ा सुस्ताने के बाद हमने लगभग 11 बजे 'भवन' की यात्रा आरम्भ की। दुर्गम पहाड़ी रास्ते में अभूतपूर्व जन सुविधाओं जैसे- जगह-जगह यात्रियों की सुविधा के लिए शेड, पीने के लिए स्वच्छ पानी, टायलेट, बिजली की चौबीस घंटे निर्बाध आपूर्ति देखकर 12-13 वर्ष पहले और आज के समय में बहुत बड़ा सुनहरा परिवर्तन देखने को मिला तो यह मन खुशी से खिल उठा। चलते-चलते एक बारगी भी नहीं लगा कि हम जिस समतल राह पर आसानी से चल रहे हैं, वह कोई दुर्गम पहाड़ी है। हम धीरे-धीरे आगे बढ़ते हुए बीच-बीच में जितनी बार विश्राम करतेे, उतनी बार पहाड़ों के झुरमुट से तलहटी स्थित लाखों सितारों जैसे जगमगाते कटरा की खूबसूरती को देखना नहीं भूलते। यह सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक वह हमारी आँखों से ओझल न हुआ।
माँ के दरबार के करीब पहुंचते ही ‘जय माता दीकी सुमधुर गूंज कानों में पड़ी तो माँ के दर्शनों की तीव्र उत्कण्ठा के चलते हमारे कदम तेजी से उस ओर बढ़ चले। यहाँ यात्रियों का परस्पर प्रेम देखकर लगा जैसे यही स्वर्ग है। सुगमतापूर्वक माँ के दर्शन हुए तो मन को असीम शांति मिली।  धर्मशाला में 3-4 घंटे आराम करने के उपरांत हमने सुबह-सवेरे एक बार फिर भैरवनाथ के दर्शनों के लिए चढ़ाई चढ़कर उस पर फतह पायी। माँ के सुनहरे भवन और प्राकृतिक सौंदर्य में गोते लगाते हुए जब हमने भैरोनाथ के दर्शन किए तो यात्रा पूरी होने पर मन को बड़ा सुकून मिला। थोड़ी देर चहलकदमी करने के बाद हम आदिकुमारी होते हुए कटरा के लिए निकल पड़े। आदिकुमारी पहुंचकर थोड़ा खा-पीकर और सुस्ताने के बाद हमने कटरा की राह पकड़ी।
सीढि़याँ उतरते समय हमारी आपस में घर पहुंचकर सबसे पहले कन्या भोज करवाने की बातें चल रही थी। लेकिन मुझे घर आकर कन्या भोज करवाने से अच्छा पेट की खातिर सीढि़यों पर माँ की चुनरी ओढ़े, दो पैसे की आस लगाई बैठी कन्याओं को दान-दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद लेना ज्यादा उचित और फलदायी लगा।  मोबाइल बैटरी खत्म होने से मन में माँ के दरबार, भैरवनाथ और आस-पास की फोटो न उतार पाने का बड़ा मलाल था, लेकिन जब कटरा पहुंचकर सबने नहा-धोकर फोटो स्टूडियों में माता रानी के सजे दरबार में सामूहिक फोटो खिंचवा ली, तो मन का मलाल जाता रहा। रात्रि 8 बजे हमने दिल्ली के लिए बस पकड़ी और माँ वैष्णो देवी का स्मरण करते हुए हम सुबह लगभग 8 बजे वापस अपनी दुनिया में लौटकर उसमें खो गए।

'जय माता दी'

 ...कविता रावत


Thursday, March 13, 2014

झुमरी के बच्चे

जब से पड़ोसियों के घर विदेशी कुत्ता 'पग' (Pug) आया है, तब से जब-तब झुमरी के दोनों बच्चे उसके इधर-उधर चक्कर काट-काट कर हैरान-परेशान घूमते नजर आ रहे हैं। कुर्सी पर शाही अंदाज में आराम फरमाता लंगूर जैसे काले मुँह वाला प्राणी उन्हें फूटी आँख नहीं सुहा रहा है। उसका अजीबोगरीब थोबड़ा देखकर वे यह अंदाज नहीं लगा पा रहे हैं कि वह उनकी जात-बिरादरी का है भी कि नहीं!  वे कई दिन से अपनी भूख-प्यास भूलकर उसे घूरने, घुड़कने, आँख दिखाने और एक साथ भौंक-भांक कर डरा-धमकाकर अपने इलाके से बाहर खदेड़ने की पुरजोर लेकिन नाकाम कोशिश में लगे हुए हैं। क्योंकि वे बेचारे यह नहीं जानते कि कुर्सी पर बैठा 'रईसजादा' उनकी तरह आम नहीं खास है, जिसकी पूछ-परख करने वालों की लम्बी फेहरिस्त है। फिर भी इससे बेखबर वे आश्वस्त दिखते हैं कि जिस प्रकार उन्होंने बहादुरी से आज तक हर छोटे-बड़े कुत्ते हो या सुअर या फिर कोई दूसरा जानवर अपने इलाके से बाहर खदेड़ कर ही दम लिया है, एक बार फिर ऐसा कारनामा दिखा रहेंगे।  इंसानों की तरह ही बहुत से जानवर भी अपने इलाके के शेर कहलाना पसन्द करते हैं। हाँ यह बात जरूर अलग है कि इसके लिए उन्होंने कभी 'महाभारत' नहीं रचा। लेकिन उन्हें देख एक बात तो समझ आती है कि वे गीता के असली मर्म को बेहतर समझते हैं, तभी तो एक बार लड़ने के बाद कभी दुश्मनी नहीं पालते, कुछ पल बीतने के बाद ही अपने स्वजातीय बंधु-बांधवों में इस तरह घुल-मिल जाते हैं, जैसे कुछ देर पहले कुछ हुआ ही न था। 
अभी कुछ माह पूर्व ही झुमरी से मैं परिचित हुई। जब भी मै सुबह-सवेरे कभी घूमने या दूध लेने सांची कार्नर तक जाती तो वह मेरे साथ-साथ हो लेती और वापस घर लौटने पर आंगन में थकी-हारी  इस तरह पसर जाती जैसा उसी का आंगन हो और उससे मेरा कोई पूर्व जन्म को नाता हो। वह बच्चों को जन्म देने वाली थी, इसलिए उसकी स्थिति समझकर मुझे उससे हमदर्दी हो गई। वह बड़ी सुस्त रहती। खाना भी वह बड़े आराम-आराम से खा पाती। इस दौरान उसकी आम कुत्तों से एक बात मुझे बड़ी अजीब लगी कि वह सूखी रोटी खाना बिल्कुल भी पंसद नहीं करती थी। बहुत से लोग कहते हैं कि कुत्तों को घी हजम नहीं होता, लेकिन उसे घी या तेल लगी चुपड़ी रोटी या फिर दूध-रोटी-ब्रेड-बिस्कुट खाना ही अच्छा लगता। झुमरी को कोई परेशानी न हो इसके लिए मैंने जब उसके लिए बगीचे में रहने की व्यवस्था की तो उसकी आंखों में मुझे कृतज्ञता के भाव दिखे। बहुत से लोग आवारा कुत्तों को बड़ी हिकारत से देखकर दुत्कारते हुए उन पर राशन-पानी लेकर चढ़ बैठते हैं। अपने घर-आंगन में देखते ही झाडू, डंडा, चप्पल या पत्थर जो भी मौकाए हाथ में आया, उठाकर दे मारा। वे भूल जाते हैं कि हमारी तरह ही जानवर भी प्यार के भूखे होते हैं। तभी तो वे हम इंसानों के करीब रहना पसंद करते हैं। झुमरी ने छः पिल्लों को जन्म दिया, तो नए मेहमानों को देखकर मन को खुशी हुई। किन्तु दो दिन के अंतराल में जब 3 बहुत कमजोर पिल्ले एक के बाद एक चल बसे तो मन को गहरी पीड़ा पहुँची। झुमरी की बेवस दुःखियारी आँखों को देख मेरी आँखे भी नम हुई। लेकिन जल्दी ही झुमरी अपने तीनों बच्चों में रम गई। दो माह तक बच्चों को बड़ा होते और सबकुछ ठीक-ठाक चलता देख मन को बड़ी तसल्ली हुई। लेकिन एक दिन जब मैं ऑफिस से घर लौटी तो घर के पास झुमरी का एक बच्चा सड़क पर बुरी तरह कुचला मिला तो दिल धक से रह गया। आँगन में झुमरी के दो बच्चे खेल रहे थे लेकिन झुमरी नदारद थी। किसी अप्रिय आशंका के चलते मैं फ़ौरन उसकी खोजबीन में जुट गई, लेकिन अफसोस उसका कोई अता-पता नहीं चला। भले ही झुमरी के जाने के बाद उसके बच्चों की  देखरेख की जिम्मेदारी उठानी पड़ रही है, लेकिन जब भी घर-आँगन में बच्चों की चहल-कदमी देखती हूँ तो दिन भर का थका-हारा मन तरोताजगी से भर उठता है। 
          झुमरी के बच्चे भी अपनी माँ पर ही गये हैं। उन्हें भी दूध-रोटी-ब्रेड-बिस्कुट या फिर घी-तेल लगी रोटी खाने को चाहिए। जब कोई पास-पड़ोसी उनके आगे बची-खुची सूखी रोटी पटक देते हैं तो वे उसे सूंघने के जहमत तक नहीं उठाते, ऐसी उपेक्षा देख वे यही कहते-फिरते हैं कि हमने उनके भाव बढ़ा रखे हैं। कई बार ऑफिस से आते ही उनकी कई शिकायतें भी सुननी पड़ती है। जैसे- आज वे छत में पहुंच कर धमा-चौकड़ी मचा रहे थे, कल हमारी कार या स्कूटर में चढ़कर आराम फरमा रहे थे, हमारे घर में बेधड़क घुसे चले आते हैं आदि चलता रहता है। इतना होने के बावजूद भी यह देखकर मन को बड़ी राहत है कि आजकल आस-पड़ोस वाले मेरे ऑफिस जाने के बाद उनका पूरा ख्याल रखने लगे हैं।
          आजकल जब भी सुबह-सुबह घूमने निकलती हूँ तो झुमरी के बच्चे भी उछलते-कूदते साथ-साथ निकल पड़ते हैं। रास्ते भर उनकी शरारत बराबर चलती रहती है। कभी किसी जानवर को देखा नहीं कि लगे उसे आंख दिखाने, गुर्राने, सामने वाला उनसे कितना ताकतवर है, इसका भी ख्याल नहीं रखते। वे मेरा दम भरते हैं। सुबह-सवेरे कई लोग अपने पालतू कुत्तों के साथ घूमते नजर आते हैं, जिनसे घर-परिवार से लेकर देश-दुनिया भर की अंतहीन बातें होती रहती हैं। ऐसे ही एक बुजुर्ग दम्पत्ति जो भरे-पूरे परिवार के बावजूद अपनी पत्नी और पालतू कुत्ते के साथ अकेले रहते हैं। उन्होंने एक निराशाभरी बात कही-“बुढ़ापे में अपने पास का पैसा, जीवन साथी और पालतू कुत्ता ही साथ देता है। बाकी सब छोड़कर चले जाते हैं" उनकी यह बात हमारी आज की पारिवारिक विघटन व्यथा बयान कर मन में एक गहरी टीस पैदा कर जाती है। 

 ....कविता रावत



Friday, February 7, 2014

भारतीय प्रजातंत्र में नोटा की उपयोगिता

अण्णा हजारे ने अनशन तोड़ने के साथ चुनाव सुधारों को लेकर संघर्ष छेड़ने की बात की थी। अण्णा के अनुसार मतदाता को मतपत्र पर दर्ज उम्मीदवारों को खारिज करने का भी हक मिलना चाहिए। अगर दस प्रत्याशी मतपत्र में दर्ज हैं तो ग्यारहवाँ या अन्तिम खाना प्रत्याशी को नकारने का हो। 
प्रतिनिधि को खारिज करने और वापस बुलाने का मुद्दा नया नहीं है।  1974 के बिहार आंदोलन में यह एक प्रमुख मुद्दा था। बिडम्बना यह है कि इस आन्दोलन के सहारे सत्ता में आयी पार्टियों ने जयप्रकाश नारायण के मुद्दे को भुला दिया। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ समेत कुछ राज्यों में पहले से ही पंचायती राजव्यवस्था में प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार जनता को मिला हुआ है। किसी भी राज्य में जवाबदेही सुनिश्चित करने के नजरिए से जनप्रतिनिधियों को खारिज करने के जनाधिकार का भय व्याप्त होना जरूरी है। अमेरिका में किसी हद तक यह अधिकार 1903 से लागू है। वहाँ दो गवर्नरों को इस अधिकार के चलते पदमुक्त होना पड़ा। कनाडा में तो प्रधानमंत्री को भी वापस बुलाने का हक जनता को मिला हुआ है।
अम्बेडकर जी ने कहा था कि हमें कम से कम दो शर्तें पूरी करनी चाहिए- एक तो स्थिर सरकार हो, दूसरी वह उत्तरदायी सरकार हो। भारतीय लोकतन्त्र की दो बड़ी समस्याएँ हैं- एक तो यह है कि जनप्रतिनिधि पर मतदाताओं के अंकुश का कोई प्रावधान नहीं है। हमारे लोकतंत्र की एक बड़ी विकृति यह है कि मताधिकार एक तरह की विवशता में बदल गया है। उम्मीदवारों में से किसी एक को चुनने को मतदाता अभिशप्त होते हैं। संविधान के अनुच्छेद 19 के भाग ‘क’ में नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है। लेकिन निर्वाचन के समय मतदाता के पास जो मतपत्र होता है उसमें केवल मौजूदा उम्मीदवारों में से किसी एक को चुनने का प्रावधान है, न चुनने का नहीं? अगर मतदाता उनमें से किसी को भी नहीं चुनना चाहता तो इसे जाहिर करने और इसे नापंसदगी के वोट के तौर पर गिने जाने का कोई प्रावधान नहीं है।
"नन ऑफ द अबॅव" नोटा बटन को लेकर जबलपुर हाईकोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई। रिटायर आईपीएस अधिकारी विजय वाते द्वारा दायर इस याचिका में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन के मुताबिक नोटा बटन का प्रावधान किया गया है लेकिन लोगों को शिक्षित करने के लिहाज से इसका प्रचार-प्रसार नहीं किया जा रहा है। याचिका में भारत निर्वाचन आयोग, मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी और कलेक्टर भोपाल को भी पार्टी बनाया गया। वाते "राइट टू रिजेक्ट ग्रुप" के संयोजक हैं।
राजस्थान विधान सभा की सभी दो सौ सीटों के लिए चुनाव हुए थे, नोटा का उपयोग लगभग प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र में किया गया। इनमें 11 ऐसे क्षेत्र थे जहाँ नोटा मतों की संख्या जीत की संख्या से अधिक थी। मध्यप्रदेश में 230 में से 25 और छत्तीसगढ़ में 90 में से 15 विधानसभा क्षेत्र ऐसे रहे जहाँ हार-जीत का अन्तर नोटा मतों से कम रहा।
          नोटा का प्रयोग देश में पहली बार था इसलिए लोगों के मन में इस बटन के प्रभावों के प्रति जिज्ञासा भी थी। कुछ यूँ ही प्रयोग कर देखना चाहते थे। कुछ बागियों, प्रतिबागियों तथा अवसरवादियों ने इसे कमाई का जरिया बना लिया।  राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों को ध्यान में रखते हुए उनकी कथनी और करनी को जानना जरूरी है। घोषणापत्रों में दलों, उम्मीदवारों और बुनियादी मुद्दों के अलावा भी बहुत कुछ देखने-समझने को होता है। उनमें किए गए वादे अक्सर भरमाने के लिए ही होते हैं। सत्ता में रहे दल के पिछले घोषणा पत्र से उसके वादों की गम्भीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। 
नागरिक को नकारात्मक मत का अधिकार दिए जाने की व्यवस्था चुनाव सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण निर्णय है। इससे जन कल्याण के कामों के लिए होड़ चलेगी। प्रतिनिधि अपने दायित्वों के प्रति सचेत और क्षेत्र के विकास के लिए प्रयत्नशील रहेंगे। राष्ट्र के समग्र विकास की दिशा में यह एक शुभ शुरूवात है। वरना मतदाताओं और प्रतिनिधियों के बीच दूरी और बढ़ती जाएगी। लोकतंत्र सुधार का सबसे अनिवार्य तकाजा मतदाताओं का सशक्तीकरण है।
भारतीय प्रजातंत्र में नोटा की उपयोगिता यही वह स्वप्न है जिसे देखकर अशफाक उल्ला खाँ जैसे शहीद ने कहा था-
"कभी वो दिन भी आएगा
जब अपना राज देखेंगे
जब अपनी ही जमीं होगी
जब अपना आसमाँ होगा।"

डॉ. अनीता देशपांडे, प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष, राजनीति विज्ञान-लोक प्रशासन, उच्च शिक्षा उत्कृष्टता संस्थान, भोपाल के सहयोग से.....

....कविता रावत

Thursday, January 30, 2014

विवशता में फायदे का सौदा नहीं किया जा सकता है














विवशता की हालत में कोई नियम लागू नहीं होता है।
कीचड़ में फँसे हाथी को कौआ भी चोंच मारता है।।

कुँए में गिरे शेर को बंदर भी आँखें दिखाता है।
उखड़े हुए पेड़ पर हर कोई कुल्हाड़ी मारता है।।

मुसीबत में फँसा शेर भी लोमड़ी बन जाता है।
मजबूरी के आगे किसी का जोर नहीं चलता है।।

विवशता नई सूझ-बूझ को जन्म देती है।
विवशता लोहे के सलाखों को तोड़ सकती है।।

विवशता में ईमानदार भी धूर्त  बन जाता है।
विवशता कायर को भी शूरवीर बना सकता है।।

जरूरत पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है।
विवशता में फायदे का सौदा नहीं किया जा सकता है।।

....  कविता रावत 

Monday, January 13, 2014

गुलाबों के साथ एक शाम

मध्यप्रदेश रोज सोसायटी संचालनालय उद्यानिकी एवं प्रक्षेत्र वानिकी की ओर से बीते रविवार को जब मैं सपरिवार भोपाल स्थित शासकीय गुलाब उद्यान में आयोजित 32वीं अखिल भारतीय गुलाब प्रदर्शनी देखने पहुँची तो सप्ताह भर का थका-हारा मन देशभर से आए प्रतिभागियों के 600 से अधिक प्रजातियों के गुलाबों की खूबसूरती के रंग में डूबकर तरोताजा हो उठा।  
लगभग 30 स्टॉल्स पर पिटोनिया, लिबोनिका, पैंजी, फलॉक्स,  डायम्पस, गुलदाउदी, डहेलिया, लिफोरिया, सालविया, पंसेटिया और सकीलैंड्स जैसे पौधों के बहुत से प्रकार  सतरंगी गुलाबी खुशबुओं से अपनी महक चारों ओर फैला रहे थे। दिल्ली, कोलकाता, हैदराबाद, महाराष्ट्र, जमशेदपुर, नागपुर, इन्दौर, पचमढ़ी, जयपुर आदि शहरों से लाए गए गुलाब की विभिन्न किस्मों जैसे- कबाना, ब्लैक बकारा, डकोलेंडी, डायना प्रिंसिंस ऑफ  द वॉल, डीप सीक्रेट, जस जॉय, रोज ओ बिन, हैडलाइनर की खूबसूरती और खूबियों में लोग डूबते-उतर रहे थे। 
गुलाबों की महक और उनके शोख इन्द्रधनुषी रंगों को हर कोई देखने वाला  अपने मोबाइल कैमरे में कैद करने को आतुर दिख रहा था। इसके साथ ही बहुत से फोटोग्राफर भी अपने कैमरे से रंग-बिरंगे गुलाबों की खूबसूरती के साथ लोगों की तस्वीरें  उतारने के बाद थोड़ी देर बाद उन्हें देते जा रहे थे। यह सब आधुनिक फोटोग्राफी तकनीकी का ही कमाल है कि जहाँ फोटो लेने के बाद उसे मिलने में 3-4 दिन लग जाते थे, वह 5 मिनट में मिलने लगे हैं।   
गुलाब उद्यान में लगे टैंट के अन्दर सुन्दर लाल, गुलाबी, सफेद और पीले गुलाब अपनी सुन्दरता बिखेर रहे थे तो बाहर विभिन्न प्रजातियों के कतारबद्ध बहुरंगी फूल उद्यान की शोभा में चार चांद लगा रहे थे। हरे-भरे उद्यान में ईएमई सेंटर भोपाल के म्यूजिकल बैंड की समधुर धुन पर देशभक्ति गीतों में डूबना दर्शकों को खूब रास आ रहा था। अपनी-अपनी पसंद के अनुसार कुछ लोग प्रदर्शनी में लगे स्टॉल्स पर खाने-पीने में डटे दिख रहे थे तो कुछ लोग गुलाब के पौधे खरीद कर उनकी देखभाल के गुर देश-विदेश से आए गुलाब विशेषज्ञों से जानने में लगे थे।   
एक ओर जहाँ हर वर्ष की तरह इस बार भी गुलाब प्रदर्शनी में गुलाब प्रेमियों के सिर पर गुलाबी रंग चढ़कर बोला तो वहीं दूसरी ओर पहली बार तीन बोनसाई क्लबों की विशिष्ट बोन्साई कला भी अपने सार्थक प्रदर्शन के कारण सबका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने में कामयाब रहा। बरगद, पीपल, साइकस पाम, आम, नीबू, अमरूद, शहतूत, नारंगी, लोलिना पाम, टी साइकस आदि  बोन्साई  पेड़-पौधों की खूबसूरती ने सबका मन मोह लिया। मैं भी इन सुन्दर सजावट के साथ रखे बोनसाई पेड़-पौधों की सुन्दरता निहारते-निहारते कई घंटे इनमें समाहित पर्यावरणीय उपयोगिता में डूबती-उतरती रही।
आज शहरों में बढ़ती पर्यावरण प्रदूषण की समस्या शहरवासियों से प्राकृतिक वायु और शुद्ध जल छीन रही है तथा नई-नई असाध्य बीमारियों की ओर धकेल रही है। शुद्ध हवा जीवन-जीने का अनिवार्य तत्व है, जिसके स्रोत हैं- वन, हरे-भरे बाग-बगीचे और लहलहाते पेड़-पौधे। हम क्यों भूल जाते हैं कि इनके संरक्षण में ही हम सबका हित समाहित है। जिस प्रकार माता अपना स्तनपान से शिशु को पालती है, उसी प्रकार पेड़-पौधे अपनी ऑक्सीजन से पर्यावरण को स्वस्थ और शुद्ध रखते हैं। आइए हम भी पर्यावरण की शुद्धि के लिए तथा प्रदूषण से मानवों की रक्षा के लिए अपने आस-पास पेड़-पौधों को उपजाकर पल्लवित-पुष्पित करने का संकल्प करें।  
      .......कविता रावत

Wednesday, January 1, 2014

नानी बनने की खुशखबरी

मेरी सोनिया माँ बनी और मैं नानी माँ। जैसे ही मुझे उसने यह खुशखबरी दी, मैं खुशी से झूम उठी। इधर एक ओर बच्चों की परीक्षाओं का बोझ सिर पर था तो दूसरी ओर विधान सभा चुनाव के कारण छुट्टी नहीं मिलने से मन आकुल-व्याकुल होता रहा। लेकिन जैसे ही बच्चों की परीक्षा और चुनाव से मुक्ति मिली तो मैंने उसके ससुराल (गजियाबाद) की राह पकड़ ली। रेल और बस के सफर में “गूँथ कर यादों के गीत, मैं रचती हूँ विराट् संगीत“ की तर्ज पर मैं उसके बचपन की यादों में डूबती-उतराती रही। तब मैंने कालेज में प्रवेश लिया ही था कि उसी समय मेरे बडे़ भाई की बिटिया सोनिया मेरे परिवार में खुशियों की सौगात लेकर आयी। हम दो भाई और तीन बहिनों को जैसे कोई खिलौना मिल गया हो; उसे खिलाने-पिलाने के लिए आपस में खूब झीना-झपटी मची रहती थी। यह तब-तक चलता रहता जब तक माँ-पिताजी से एक जोरदार डाँट सुननी को न मिल जाती थी। बुआ-बुआ की सुमधुर बोल आज भी मेरे कानों में गूँज रहे हैं।
अपनी सोनिया के बचपन से लेकर विवाह तक की तमाम मधुर स्मृतियों में गोते खाते हुए जब मुझे अहसास हुआ कि अरे! अब तो मैं नानी बन गई हूँ और अब मुझे तो नानी की तरह नन्हें लाड़-दुल्लारे को कहानियाँ सुनाने पड़ेगी तो क्या कहूँगी? क्या सुनाऊँगी? इसी के बारे में सोचती चली गई। मैं तो जब चार अक्षर पढ़ना सीखी तभी नानी माँ की कहानियों के बारे में जान सकी कि नानी के पास मीठी-मीठी कहानियों का पिटारा होता है। जिसमें से नानी बारी-बारी से राजा-रानी, परियों से लेकर भूत-प्रेत, देवता-राक्षस इन सबको बाहर निकालकर अपने नाती-पोतों को अनूठे और रोचक ढ़ंग से परिचित कराती है। इस मामले मैं सौभाग्यशाली नहीं रही। क्योंकि मेरी नानी माँ मेरे आने से पहले से चल बसी। इसलिए बचपन में न नानी माँ का प्यार-दुलार मिला और न ही उनकी कहानियाँ सुननी को मिली। अब सोचने लगी हूँ कि भले ही मुझे यह सौभाग्य न मिला हो लेकिन अब जब मैं नानी बन गई तो अपने नाती को जब तक वह थोड़ा-बहुत बोलने-सुनने लायक होता है तब तक कुछ नहीं तो कुछ कहानियाँ ही रच लूँ, ताकि जब-तब वह मैं उसके पास जाऊँ या वह मेरे पास आये, तब-तब मैं उसे बिना कहे सुना सकूँ। इस बारे में मुझे बड़ी सजगता बरतने और आज के जमाने के मुताबिक मशक्कत करने की जरूरत पड़ेगी। क्योंकि आज सूचना क्रांति के इस युग में नौनिहालों के लिए नानियों को नई कहानियाँ गढ़ने के साथ ही उनके साथ चलने के लिए तैयार रहना होगा, तभी वे उन्हें सुन सकेंगे, उनके करीब आ पायेंगे। यदि ऐसा न हुआ तो फिर वे घर-परिवार, नाते-रिश्ते सब भूलकर कम्प्यूटर, टी.वी. मोबाइल से रिश्ता बनाकर हर समय उससे ही चिपके रहेंगे।
दुनिया भर के बातों में उलझती-सुलझती जब मैं अपनी सोनिया के पास पहुँची और मैंने अपने नन्हे-मुन्ने, प्यारे-प्यारे लाड़-दुल्लारे नाती का मासूम हंसता-खिलखिलाता चेहरा देखा तो मुझे सुभद्राकुमारी जी की तरह अपना बचपन याद आने लगा-
बीते हुए बचपन की वह, क्रीडापूर्ण वाटिका है।
वही मचलना, वही किलकना, हँसती हुई नाटिका है।
जब मैंने भोले-भाले बच्चे को गोद में उठाया तो दौड़ती-भागती, संघर्षमय, अशांत और श्रांत-क्लांत जीवन में उसकी समधुर सुकोमल मुस्कान और किलकारी की गूँज मेरे कानों में गूँजकर मधुर रस घोलने लगी। विश्वास नहीं हो रहा था कि जैसे कल ही की तो बात हो; जिस नन्हीं सोनिया को मैंने इसी तरह गोद में उठाया था, आज वही माँ बन गई है। इस खुशी के माहौल में भरे-पूरे परिवार के साथ नाते-रिश्तेदारों को एक साथ हिल-मिल कर खुशियाँ मनाते देखकर मेरे मन को बड़ा सुकून मिला। अक्सर ऐसे सुअवसरों पर मेरा मन भावुक हो उठता है। हमारे हिन्दू-दर्शन में भले ही स्वर्ग और नरक की कल्पना है। लेकिन मुझे तो इसके परे हमेशा स्वर्ग घर-परिवारों के सुखद और उत्साहवर्द्धक वातावरण में ही मिलता है।

अभी फिलहाल मुझे नानी के रूतवे से नवाजने वाली मेरी सोनिया को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ यह नसीहत देती चलूँगी कि-

जिन्दगी आसान रखना

कम से कम सामान रखना
जिन्दगी आसान रखना । 
फिक्र औरों की है लाजिम
पहले अपना ख्याल रखना।।
हर कोई कतरा के चल दे
नहीं ऐसा अभिमान करना।
भीड़ में घुलमिल के भी तू 
अपनी पहचान रखना।।
राहों  पर रखना आंखे
आहटों पर कान रखना।
कर निबाह काँटों से लेकिन
फूल का भी ध्यान रखना।।

     ....कविता रावत


Tuesday, December 24, 2013

आप भी बच्चों के साथ क्राफ्ट प्रदर्शनी देखने जाइए

घर से सीधे दफ्तर और दफ्तर से सीधे घर की भागमभाग। इस उलझती-सुलझती दोहरी भूमिका के साथ जब बच्चों की साफ-सफाई, खिलाने-पिलाने के अतिरिक्त पढ़ाने का जिम्मा भी खुद उठाना पड़ता है तो शरीर बुरी तरह थककर चूर हो जाता है। इस पर भी जब-तब, समय-असमय स्कूल से बच्चों को प्रोजेक्ट मिलते रहते हैं तो वे भी अपने ही माथे लिखे होते हैं। इसके आगे स्कूल में यदि कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम निश्चित हुआ तो उसके लिए बच्चों की तैयारी और फिर उसमें शामिल होना माथा-पच्ची जान पड़ता है। लेकिन इन तमाम दिखते झमेलों से उभरकर जब हम अपने स्कूल के दिन याद करते हैं तो बच्चों की इन गतिविधियों में शामिल होना बड़ा सुखद बन पड़ता है। ऐसा ही सुखद आभास मुझे तब हुआ जब मैं अभी हाल ही में आयोजित बच्चों के सेंट जोसफ को-एड स्कूल में आयोजित विज्ञान और क्राफ्ट प्रदर्शनी देखने पहुँची।
पहले तो सुबह-सुबह ठंड के बावजूद बच्चों के उत्साह को देखकर सारी ठंड जाती रही फिर जैसे ही स्कूल के बाहरी द्वार से स्कूल प्रांगण में दाखिल हुए तो सुन्दर बहुरंगी छोटी-छोटी छतरियों से सजी स्कूल बिल्डिंग देखकर मन खुशी से प्रफुल्लित हो उठा। मुख्य द्वार से प्रवेश करते ही भारत माता का फूलों से सजाया मानचित्र जिसके चारों ओर छोटे-छोटे प्रज्ज्वलित जगमगाते दीपक हमारी सृष्टि के आदि से चली आ रही गरिमामयी सांस्कृतिक एकता की विशेषता का बखान करते दिखे तो मन रोशन हो उठा। सोचने लगी इसी विशेषता के चलते हमारी संस्कृति विश्व प्रांगण में उन्नत मस्तक किए हैं। रोम हो या मिश्र या बेवीलोनिया या फिर यूनान की संस्कृतियाँ, ये सभी काल के कराल थपेड़ों से नष्ट हो गईं, लेकिन हमारी संस्कृति काल के अनेक थेपेड़े खाकर भी आज भी अपने आदि स्वरूप में जीवित है। इस संबंध में इकबाल की पंक्तियाँ याद आयी कि- “कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।"  
स्कूल की कक्षाओं में तीन विंग में प्रदर्शनी विभक्त थी। जिसमें के.जी.विंग, प्रायमरी विंग और सेकेण्डरी विंग के अंतर्गत लगभग 2000 से अधिक माडल सजाये गए थे। इन माडलों का छोटी कक्षा से लेकर बड़ी कक्षाओं के छात्रों  द्वारा बड़ी कुशलता से अपनी भरपूर ऊर्जा शक्ति से मंत्रमुग्ध कर देने वाली मोहक प्रस्तुती देखना बड़ा रोमांचकारी लगा। के.जी.विंग के छोटे-छोटे नन्हें-मुन्ने बच्चों द्वारा उनकी शिक्षकों की मदद् से बनाये गए सुन्दर-सुन्दर छोटे-छोटे मिट्टी के बर्तन, खिलौनों में उन्हीं की तरह मासूम झलक देखने को मिली तो साथ ही उनका मनमोहक फैशन परेड और सुकोमल मधुर हँसती-मुस्कुराती भोली अदा में नृत्य देखना अविस्मरणीय रहा। 
प्रायमरी विंग के अंतर्गत पहली कक्षा के छात्रों का बनाया ‘अतुल्य भारत’ देशप्रेम को भावना को जाग्रत कर मन में उमंग भर रहा था। दूसरी कक्षा के छात्रों का विभिन्न क्षेत्रों में सर्विस मॉडल  जिसमें पायलट, एयर हास्टेज, फैशन शो और शैफ का शानदार प्रदर्शन देखते ही बनता था। तीसरे कक्षा के छात्रों का हार्वेस्ट फेस्टीवल का धूम-धमाल मन को खूब रास आया। चौथी -पांचवी कक्षा के छात्रों का स्वास्थ्य संबंधी माडल जिसमें आजकल की बिगड़ती खानपान शैली के प्रति सावधान करते हुए स्वस्थ रहने के लिए नसीहत देते स्लोगन जैसे- ‘पेट के दुश्मन हैं तीन, पिज्जा, बर्गर और चाउमिन’, रहना है अगर डाक्टर से दूर, फल-सब्जी रोज खाओ हुजूर  मोटापा है गर घटाना, गाजर-मूली ज्यादा खाना’ ‘बनना है अगर जीनियस, फल-सब्जी को लेकर रहो सीरियस’ दर्शकों को अपने शरीर को स्वस्थ रखने का संदेश दे रहे थे।  कक्षा 6 से 9 तक के छात्रों का दीवाली, ईद और क्रिममस जैसे धार्मिक त्यौहारों के माडल और सांस्कृतिक झलकियों के प्रस्तुतीकरण ने अनोखी छठा बिखेरते हुए दर्शकों का ध्यान अपनी ओर आकृषित कर अपने रंग में खूब रंगाया।  कक्षा 6वीं के छात्राओं द्वारा बनाया स्पाई कार मॉडल भी बड़ा ही रोमांचकारी और अद्भुत था। इसके साथ ही संस्कृत भाषा के माडल और प्रस्तुतीकरण सबको ऋषि-मुनि, आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति, जड़ी-बूटियां और जंतुशाला की झलक दिखलाते हुए हमारे प्राचीन महत्व को जीवंत किए हुए विराजमान थे।
सेकेण्डरी विंग के छात्रों का अपने विषय के अनुरूप विभिन्न मॉडल उनकी रचनात्मकता को प्रदर्शित कर रहे थे। जहाँ एक ओर मैथ्स के छात्रों का अपने विषयानुकूल क्रिप्टोग्राफी, वैदिक गणित, ज्यामिती, त्रिकोणमितीय, पहेलियों और गेम्स के विभिन्न मॉडल  विशेषता बता रहे थे। वहीं दूसरी ओर कामर्स के छात्रों द्वारा ’बैंकिंग सिस्टम, उपभोक्ता अधिकार, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, विज्ञापन आदि के आकर्षित मॉडल देखने को मिले। साइंस के छात्रों के विभिन्न मॉडल दिमाग की सारी खिड़कियां खोलकर धूम मचा रहे थे। एक ओर विंडमिल, साइकिलिंग इलेक्ट्रिसिटी, ट्रैफिक  सिग्नल, ह्यूमन जनरेटर, केपलर्स स्पेस टेलीस्कोप तैयार था तो दूसरी ओर जियो थर्मल इनर्जी और रोबोटिक कार, मैग्नेटिक कार की उत्सुकता से विशेषता बताते छात्रों को सुनना और उनके माडल्स देखना किसी अजूबे से कम न था।  
विविध मॉडल में नेपकिन होल्डर, बाल हैंगिंग, पेन होल्डर, डोर हैंगिंग, ड्राय फूड बाक्स, वर्ड हाउस और टिश्यू पेपर से बने उपहार स्वरूप दिए जाने वाले सुन्दर और आकर्षक गुलदस्ते सबका ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करने में किसी से पीछे नहीं थे।
लगभग चार घंटे तक प्रदर्शनी देखने के बाद भी हमारा मन नहीं भरा; उसकी तमन्ना थी और दखेने की, लेकिन जैसे ही सुबह 8 बजे से दोपहर 1 बजे तक अपनी कक्षा के माडल प्रदर्शन में जुते बच्चों की छुट्टी हुई तो फिर हमारी एक न चली। बच्चों को साथ लेकर जैसे ही थोड़ी देर और प्रदर्शनी देखने निकले ही थे कि प्रदर्शनी में उन्हें स्वादिष्ट व्यंजनों की झलक दिखी नहीं कि वे झट से अपना पेट पकड़ते हुए बाहर लगे स्टॉल की ओर इशारा करते हुए हमारा हाथ खींचकर बाहर ले आये। जब बच्चों को उनकी मनपंसद का खिला-पिला दिया तो उनके थके-हारे मासूम चेहरों पर रंगत लौट आयी। सच में बच्चों के साथ उनके मेलों में उनके साथ बच्चे बनकर जाने का अर्थ है -बच्चों में जिम्मेदारी की भावना का विकास। व्यस्त जिंदगी में थोडा सा समय बड़ा निवेश है।


























.... कविता रावत


Friday, November 29, 2013

कविता तेरे प्यार में ........

गया दिल अपना पास तेरे जिस दिन तूने मुझे अपना माना है
आया दिल तेरा पास अपने जिस दिन मैंने प्यार को जाना है।
दिल न वश में अब मन भी भागा जाये रे!
कविता तेरे प्यार में हाले दिल बेहाल रे।।

पहले सोचा न था कभी मुझे इतनी खुशी मिल सकेगी
होकर कल्पना साकार मेरी एक प्यारभरी कविता बनेगी
तेरे प्यार भरे खत से दिल होता निहाल रे।
कविता तेरे प्यार में हाले-दिल बेहाल रे।।

जब दिन ढ़लता शाम होती तब मन होने लगता उदास
पागल दिल ढूंढ़ता-फिरता तू छुपी यहीं-कहीं पास
होता भान दूरी का दिल में उठता तूफान रे
कविता तेरे प्यार में हाले-दिल बेहाल रे।।

तेरी प्यार भरी बातें मुझे सुखद अहसास कराती हैं
आंख मूंद लो तो लगे ऐसे जैसे तू पास बुलाती है
अब तो व्याकुल मन तेरी रटन लगाये रे
कविता तेरे प्यार में हाले-दिल बेहाल रे।।

अब तो रात क्या दिन में भी तेरे प्यार के सपने बुनता हूं
और कुछ सूझता नहीं अब तो तेरे प्यार में डूबा रहता हूं।
है तमन्ना प्यार यूं ही सदा बढ़ता जाये रे
कविता तेरे प्यार में हाले-दिल बेहाल रे।।
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शादी के 18  वर्ष पहले ऐसे ही प्यार में जाने क्या-क्या लिखते-पढ़ते। तब उनकी चिट्ठी मिलती तो ख़ुशी से मैं उसे सहेज कर उसे कविता में बदल कर रख देती। तब न इंटरनेट था न टेलीफ़ोन। एसटीडी से कभी-कभार बात हो जाती।  अब तो बच्चों और ऑफिस की भागदौड़ में हाले-दिल मत पूछो! ३० नवंबर के दिन की यादों की ताजगी आप लोगों के साथ बाँट रही हूँ। जानती हूँ ऐसे प्यार भरे पल सबके जीवन में कभी न कभी आते हैं, इस पर आपकी टीप चाहूंगी।

     ..कविता रावत   

Thursday, November 21, 2013

यह चुनाव महोत्सव

इन दिनों चारों तरफ उत्सवों का उत्सव चुनाव महोत्सव की धूम मची है। एक ओर जहाँ जिन ढूंढा तिन पाइया, गहिरे पानी पैठि की तर्ज पर विभिन्न राजनैतिक दलों के साथ ही निर्दलीय उम्मीदवारों के दौड़ते वाहनों से आती-जाती एक से बढ़कर एक गीत-संगीत के साथ वादों-नारों की पुकार से घर-परिवार, गली-मोहल्ले अलसुबह से देर रात तक गुलजार हैं, वहीं दूसरी ओर गरीबों की झुग्गी-झोपडि़यों पर अलग-अलग तरह से सजी धजी बहुरंगी झंडी-डंडी और मालाओं से उनकी रौनक इसकदर बढ़ी है कि लगता है जैसे सारे त्योहारों का संगम हो चला हो, इनका कोई अपना चाहने वाला कई वर्ष और लाख मिन्नतों के बाद सुध लेने घर चला आया हो, जिससे इनके दिन फिरने वाले हों, बहार आने वाली हो। 
इस महोत्सव की रंग-बिरंगी बदलती छटा बड़ी निराली है। एक पल को उम्मीदवार जब गले में माला लटकाए अपने समर्थकों के साथ मतदाताओं से अपनेपन से मिलता है तब इस आपसी मेलमिलाप, भाईचारे को देख बरबस ही होली, दीवाली और ईद मिलन का आभास होने लगता है तो दूसरे पल ही जब मतदाता उनकी वर्षों बाद सुध लेने की वजह से नादानीवश नाराजगी में डांटने-फटकारने लगता है तो उम्मीदवार की दीनता भरी मुस्कराती चुपी किसी मझे हुए खिलाड़ी की तरह देखने लायक होती है।  अपनी भड़ास निकालने के बाद मतदाता खुश होता है, तो उम्मीदवार मन ही मन यह सोच मुस्कराता रहता है कि मतदाताओं से बंधी उनकी प्रीति कभी पुरानी नहीं हो सकती। क्योंकि-
प्रीति पुरानि होत है न, जो उत्तम से लाग।
सो बरसां जल में रहै, पत्थर न छोड़े आग।।
इसके साथ ही उम्मीदवार यह भी बखूबी जानते हैं कि यह दिनन का फेर है।  आने वाला समय उन्हीं का है, इसलिए अभी चुपचाप सुनकर जैसे-तैसे अपना उल्लू सीधा कर लेने में ही भलाई है-
अब ‘रहीम‘ चुप करि रहउ, समुझि दिनन कर फेर।
जब दिन नीके आइहैं, बनत न लगि हैं देर।।
यह करिश्माई महोत्सव है, क्योंकि इसमें सभी जाति, धर्म, सम्प्रदाय, अमीर-गरीब एक मुख्यधारा से जुड़ते हैं। आम आदमी के हत्थे भले ही कुछ चढ़े न चढ़े लेकिन  बड़ी-बड़ी रैलियों और सभाओं के माध्यम से जब देश के तारणहारों के मुखारबिंद से उनकी दुर्लभ वाणी सुनने को मिलती है तो उन्हें लगता है ऊपर वाले ने उन्हीं के लिए यह सब छपर फाड़ के छोड़ा है। कल तक ऊपर उड़ने वाले, बड़े-बड़े एयरकंडीशन कमरों में बैठने वाले जब सड़क पर आकर शहर की गली-मोहल्लों से होकर झुग्गी-झोपडि़यों में हांफते-कांपते हुए सुदूर बसे गांवों तक उनकी सुध लेने पहुंचकर आम दीन-दुःखी घर-परिवारों से आत्मीय रिश्ता जोड़कर अपनी मुस्कराती जादुई वाणी से उनके दुःख-दर्द दूर करने का वादा करते हैं, भरोसा दिलाते हैं, तो उनके लिए यह किसी ईश्वर या खुदा के फरिश्ते के बोल से कम नहीं होते, जिसे देख वे फूले नहीं समाते।
अब चुनाव महोत्सव के रंग में सभी रम जाय, यह जरूरी नहीं। क्योंकि जिसे जो अच्छा लगता है वही उसके लिए काम का है, बाकी सब बेकार!  ठीक उसी तरह जैसे फल खाने वालों को अनाज से कोई लेना-देना नहीं होता-
नीकौ हू फीको लगे, जो जाके नहिं काज।
फल आहारी जीव कै, कौन काम कौ नाज।।
चुनावी महोत्सव की धूम में गरीब-गुरबे मतदाताओं को दो जून की रोटी की जगह सिर्फ नारे-वादों से पेट न भरना पड़े, इसके लिए समय रहते उन्हें जाग्रत होना होगा।अन्यथा फाख्ता उड़ाने के अलावा कुछ हाथ नहीं आएगा। उन्हें यह भलीभांति समझ लेना चाहिए कि यह नींद से प्यार करने का समय नही है क्योंकि यह संसार रात के सपने जैसा है- 
जागो लोगो मत सुवो, न करू नींद से प्यार।
जैसा सपना रैन का ऐसा ये संसार।।
यदि समय पर कोई दूर की सोचकर नोन-तेल, लकड़ी के चक्रव्यूह में से बाहर निकलकर सही को चुन लेने में सक्षम होता है, तो उसे बाद में पछताना नहीं पड़ता है। समय रहते चेत जाना ही बुद्धिमानी है। इस बात को महान समाज सुधारक कबीरदास जी ने बहुत सटीक शब्दों में व्यक्त किया है-
चेत सबेरे बावरे, फिर पाछे पछताय।
तोको जाना दूर है, कहै कबीर बुझाय।।

         ...कविता रावत

Wednesday, October 30, 2013

दीपावली का आरोग्य चिन्तन

दीपावली जन-मन की प्रसन्नता, हर्षोल्लास एवं श्री-सम्पन्नता की कामना के महापर्व के रूप में मनाया जाता है। कार्तिक की अमावस्या की काली रात्रि को जब घर-घर दीपकों की पंक्ति जल उठती है तो वह पूर्णिमा से अधिक उजियारी होकर 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' को साकार कर बैठती है। यह पर्व एक दिवसीय न होकर कार्तिक कृष्णा त्रयोदशी से शुक्ल पक्ष की दूज तक बड़े हर्षोल्लास से सम्पन्न होता है। इसके साथ ही दीपावली को कई महान तथा पूज्य महापुरूषों के जीवन से सम्बद्ध प्रेरणाप्रद घटनाओं के स्मृति पर्व के रूप में भी याद किया जाता है। कहा जाता है कि इसी दिन महाराज युधिष्ठिर का राजसूय-यज्ञ भी सम्पन्न हुआ था। राजा विक्रमादित्य भी इसी दिन सिंहासन पर बैठे थे। आर्य समाज के प्रवर्तक स्वामी दयानंद सरस्वती, जैन धर्म के अंतिम तीर्थंकर महावीर स्वामी तथा सर्वोदयी नेता आचार्य विनोबा भावे का स्वर्गारोहरण का भी यही दिवस है। सिक्खों के छठवें गुरु हरगोविन्द जी को भी इसी दिन कारावास से मुक्ति मिली। वेदान्त के विद्वान स्वामी रामतीर्थ का जन्म, ज्ञान प्राप्ति तथा निर्वाण, तीनों इसी दिन हुए थे। 
भारत वर्ष में दीपावली को मनाने का सबसे प्रचलित जनश्रुति भगवान श्रीराम से जुड़ी है। जिसमें माना जाता है कि आदर्श पुरूष श्रीराम जब लंका विजय के बाद माता सीता सहित अयोध्या लौटे तो अयोध्यावासियों ने उनके स्वागत के लिए अपने-अपने घरों की साफ-सफाई कर सजाया और अमावस्या की रात्रि में दीपों की पंक्ति जलाकर उसे पूर्णिमा में बदल दिया। जिससे यह प्रथा दीपों के पर्व के रूप में मनाया जाने लगा। 
दीपावली में साफ-सफाई का विशेष महत्व है। क्योंकि इसका सीधा सम्बन्ध हमारे शरीर को आरोग्य बनाए रखने से जुड़ा होता है। शरीर को सत्कर्म का सबसे पहला साधन माना गया है (शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्) और यह तभी सम्भव हो सकता है जब हम स्वस्थ रहेंगे। क्योंकि पूर्ण स्वास्थ्य संपदा से बढ़कर होता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का वास हो सकता है। इसके लिए जरूरी है वर्षा ऋतु समाप्त होने पर घरों में छिपे मच्छरों, खटमलों, पिस्सुओं और अन्य दूसरे विषैले कीट-पतंगों को मार-भगाने का यचोचित उपचार जिससे मलेरिया, टाइफाइड जैसी घातक बीमारियों को फलने-फलने को अवसर न मिले। सभी लोग अपनी सामर्थ्य अनुसार घरों की लिपाई-पुताई, रंग-रोगन कर घर की गन्दगी दूर कर आरोग्य होकर खुशियों की दीप जलायें। 
दीपावली में घर की साफ़-सफाई तो सभी कर लेते हैं लेकिन जरा गंभीर होकर क्यों न हम अपने -अपने आस-पास के वातावरण को भी देख लें, जिसमें हमें आरोग्य रहना है। आरोग्य रहने की पहली शर्त है ताजी हवा और शुद्ध पानी का सेवन। गांवों में ताजी हवा तो मिलती है लेकिन गंदगी के कारण वह दूषित हो जाती है। गांवों में जगह-जगह कूढ़े-करकट के ढेर लगे रहते हैं। कई लोग आज भी आस-पास ही दिशा-पानी के लिए बैठ जाते हैं, जिससे गंदगी फैलती है और मक्खी-मच्छर उत्पन्न हो जाते हैं, जिससे कई रोग उत्पन्न होते हैं। जरा सोचिए, ऐसी हालत में कैसे स्वस्थ होकर खुशी मनाएंगे। गांवों को साफ-सुथरा रखा जाए तो वहाँ के निवासी ताजी हवा का सेवन कर हमेशा स्वस्थ रह सकेंगे। गाँव में पीने के पानी की भी बड़ी समस्या रहती है। कच्चे कुएं का पानी नुकसानदेह तो होता ही है साथ ही पोखर और तालाबों का पानी पीने से भी कई प्रकार की बीमारियां लग जाती है। सारा गांव उन्हीं में नहाता-धोता रहता है और उसी पानी को पीता है, जिससे कई बीमारियां उसे घेर लेती हैं। अब जरा शहर पर नजर दौड़ाइए- यहां न तो ताजी हवा ही मिलती है और न पानी। गाड़ी-मोटर, मिल और कारखानों के कार्बन-डाइआक्साइड उगलते धुएं से दूषित वातावरण स्वास्थ्य के लिए कितना नुकसानदेह है, इससे सभी जानते हुए भी अनभिज्ञ बने रहते हैं। शहर की घनी आबादी के गली-कूंचों से यदि कोई सुबह-सुबह ताजी हवा के लिए निकल पड़े तो साक्षात नरक के दर्शन होना बड़ी बात नहीं हैं। नदियों का पानी हो या तालाबों का जब सारे गांव-शहर भर की गंदगी को समेटे नाले उसमें गिरते हैं तो वह कितना पीने लायक होता है यह किसी से छिपा नहीं। इससे पहले कि वैज्ञानिकों का कहना है कि कुछ समय बाद शहर का अर्थ होगा, मौत का घर’ वाली बात सच हो हम एकजुट होकर समय रहते जागें और स्वस्थ रहने के उपायों पर जोर दें ताकि स्वयं के साथ ही देश की खुशहाली में अपनी भागीदारी निभायें। शक्तिहीन रोगी इंसानों का देश न तो कभी खुशहाल और सुख से रह सकता है और न धरती का स्वर्ग बन सकता है। 
गांव में किसान हो या मजदूर दिन भर काम करके बुरी तरह थक जाते हैं। इस परिश्रम की थकान को मिटाने तथा प्रसन्न रहने के लिए समय-समय धूमधाम से मनाये जाने वाले त्यौहार उनमें नई उमंग-तरंग भरकर ऊर्जा संचरण का काम करते हैं, जो स्वस्थ रहने के लिए बहुत जरूरी हैं। यद्यपि शहर की अनियमित दिनचर्या के बीच जीते लोगों के लिए आरोग्य बने रहने के लिए कई साधन उपलब्ध हैं, जिसमें सबसे मुख्य व्यायाम कहा जा सकता हैं। तथापि शहरी भागमभाग में लगे रहने से उनका ध्यान इस ओर बहुत कम और जरा सी अस्वस्थता के चलते अंग्रेजी दवाएं गटकने में ज्यादा रहता है, जिसका दुष्परिणाम कई तरह की बीमारियों के रूप में आज हम सबके सबके सामने है। वे भूल जाते हैं कि नियमित व्यायाम स्वस्थ तन को आरोग्य बनाए रखने के लिए कितना आवश्यक है। इसके साथ ही उनके लिए यह त्यौहार भी थके-हारे, हैरान-परेशान मन में उमंग-तरंग भर आरोग्य बने रहने के लिए कम नहीं हैं। 

स्वस्थ और सार्थक जीवन हेतु दीपपर्व पर अनेकानेक हार्दिक शुभकामनाएं!

        -कविता रावत


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